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10.1.21

लक्ष्य और विकल्प

महाभारत की कथा में अर्जुन द्वारा पक्षी की आँख ही दिखने की स्मृति जीवन में कई बार आई है। बाल्यकाल में पढ़ाई करते समय बहुधा मन भटकता था, कभी फुटबाल में तो कभी उपन्यास में, कभी घुमक्कड़ी में तो कभी घर में बन रहे माँ के व्यञ्जनों में। हर बार मन को डाँटा और याद किया अर्जुन के उत्तर को।

छात्रावास में अर्जुन और अधिक प्रेरक रहे। घर में परिवार की दृष्टि से बिंधे पंख वैसे ही नहीं फड़फड़ाते हैं। मित्रों के घर जाने के लिये आज्ञा का उद्योग, परिवार की दिनचर्या में बँधा भटकाव, संभावनायें चाह कर भी शिथिल पड़ जाती थीं। छात्रावास में उन्मुक्त मित्रमण्डली, समय की पूर्ण उपलब्धता और मानसिक स्वातन्त्र्य। लक्ष्यच्युत हो जाना सरल होता है इस परिवेश में। आँख के अतिरिक्त सब कुछ देखने का विकल्प बना रहा। उन वृत्तियों से बाहर निकल पाने में अर्जुन की कथा सहाय्य रही। एक विद्यार्थी पुस्तकों से जितना सीख सकता है, वह सीखता ही है, पर विकल्पों के इस मकड़जाल को जी लेना और उसे सफल पार कर जाना जितना सिखा जाता है, वह अद्वितीय है।


याद है कि जब गणित के कठिन प्रश्न विषय की सम्पूर्ण समझ प्रयुक्त करने के बाद भी नहीं सुलझते थे, एक पग भी नहीं, दिशा ही नहीं समझ आती थी कि कैसे प्रारम्भ करना है? उस समय लगता था कि कम से कम अर्जुन को लक्ष्य दिख तो रहा है, यहाँ तो लक्ष्य दिख ही नहीं रहा है, प्रश्न के हल की दिशा ही अनुपस्थित है। लक्ष्य तब बदल जाता था, प्रश्न पर लगे रहना ही लक्ष्य हो जाता था।


युवामन को बस यह पता लग जाये कि करना क्या है तो जीवन कितना सरल हो जाये। एक के बाद एक लक्ष्य पता चलते रहें तो सारी ऊर्जा संचित कर युवा उस दिशा में बढ़ता रहे। सिद्धान्त सरल लगता है पर मेरे जीवन में ऐसा नहीं रहा, गणित के उन प्रश्नों की तरह। जितना प्रश्न हल करके नहीं सीखा उससे कहीं अधिक उस असफल प्रयासों में सीखा जो उत्तर की दिशा से कोसों दूर थे। आईआईटी की तैयारी करते समय ब्रिलियण्ट टुटोरियल की वाईजी फाइल ली थी। गणित का पहला प्रश्न ही १५ दिन लील गया। जूझना नहीं आता यदि प्रश्न का हल पता चल जाता। उत्तर का त्वरित ज्ञान, लक्ष्य का सिमटना, समय की बचत आदि उस अनुभव से वंचित कर जाते, उस समझ से वंचित कर जाते जो अलक्षित भटकाव में प्राप्त हुये।


कहने को तो अर्जुन का कथन हर बार जीवन में प्रयुक्त रहा, पर पक्षी की आँख क्या हो, उस पर चिन्तन चलता रहा, उस पर जीवन बढ़ता रहा।


प्रारम्भिक जीवन में लक्ष्य तो बहुधा ज्ञात ही रहे, कभी इंगित, कभी प्रेरित, कभी स्वनिष्पादित। यथासंभव संधान भी होता रहा। शान्त मन से कभी उन विकल्पों पर भी विचार हुआ, जो छोड़ दिये गये। लगा कि जीवन कुछ अधिक भिन्न नहीं होता यदि वे विकल्प चुने जाते।


जीवन में उत्तरोत्तर लक्ष्य निर्धारित करने का उत्तरदायित्व आप पर ही आ जाता है। मानक क्या हों जब सबका जीवन विशेष हो, भिन्न हो। कौन किस पर कैसे मानक अधिरोपित करेगा? स्वयं ही निर्धारित करने होते हैं अपने लक्ष्य और उन लक्ष्यों को अर्जुन की तरह देखकर निष्पादित करने का क्रम। एक के बाद एक, लक्ष्य प्राप्तकर विस्मृत हो जाते हैं। कठिन लक्ष्य प्राप्ति में प्रतीक्षा में अपनी तीक्ष्णता खो सरल कर दिये जाते हैं। क्रम चलता रहता है, जो प्राप्त रहा और जो न पाया, दोनों में ही मन आपको समझा लेता है कि संभवतः यही ठीक था।


द्रोण कहें कि आँख पर मारना है तो हम भी अर्जुन की तरह आँख ही देखें। यहाँ तो हम ही द्रोण, हम ही अर्जुन, अघोषित लक्ष्य, जहाँ तीर लगा उसी को आँख बता देने में सक्षम भी हम और विडम्बना यह कि निर्णायक भी हम।


लक्ष्य, अनुमान, परिमाण, संधान और निर्णय का सतत क्रम।

16.7.14

है अभी दिन शेष अर्जुन

है अभी दिन शेष अर्जुन,
लक्ष्य कर संधान अर्जुन ।

सूर्य भी डूबा नहीं है,
शत्रु भी तेरा यहीं है,
शौर्य के दीपक जला दे, विजय की हुंकार भी सुन ।
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।१।।

सही की चाहे गलत की,
पार्थ तुमने प्रतिज्ञा की,
अगर निश्चय कर लिया तो, लक्ष्य का एक मार्ग भी चुन ।
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।२।।

व्यर्थ का नैराश्य तजकर,
असीमित आवेश भरकर,
करो तर्पित सिन्धु भ्रम के, व्यथाआें के तार मत बुन ।
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।३।।

सूर्य मेघों में छिपा था,
काल तेरे हित रुका था,
जीवनी जब तक रहेगी, रहेगा दिन शेष अर्जुन ।
है अभी दिन शेष अर्जुन ।।४।।

24.7.10

नहीं दैन्यता और पलायन

अर्जुन का उद्घोष था 'न दैन्यं न पलायनम्'। पिछला जीवन यदि पाण्डवों सा बीता हो तो आपके अन्दर छिपा अर्जुन भी यही बोले संभवतः। वीर, श्रमतत्पर, शान्त, जिज्ञासु, मर्यादित अर्जुन का यह वाक्य एक जीवन की कथा है, एक जीवन का दर्शन है और भविष्य के अर्जुनों की दिशा है। यह कविता पढ़ें अपने उद्गारों की ध्वनि में और यदि हृदय अनुनादित हो तो मान लीजियेगा कि आपके अन्दर का अर्जुन जीवित है अभी। उस अर्जुन को आज का समाज पुनः महाभारत में पुकार रहा है।


मन में जग का बोझ, हृदय संकोच लिये क्यों घिरता हूँ,
राजपुत्र, अभिशाप-ग्रस्त हूँ, जंगल जंगल फिरता हूँ,
देवदत्त हुंकार भरे तो, समय शून्य हो जाता है,
गांडीव अँगड़ाई लेता, रिपुदल-बल थर्राता है,
बहुत सहा है छल प्रपंच, अब अन्यायों से लड़ने का मन,
नहीं दैन्यता और पलायन ।

निर्णय तो जितने लेने थे, धर्मराज ने ले डाले,
मैं खड़ा रहा मर्यादावश, झूमे मदत्त गज मतवाले,
द्रुपदसुता के आँसू बन कायरता मेरी छलकी है,
हृदय धधकती लगातार, वह ज्वाला दावानल सी है,
क्षमतायें अब तक वंचित है, समझो मेरे मन का क्रंदन,
नहीं दैन्यता और पलायन ।

यह कहना क्या सही, क्या नहीं, मुझको कभी न भाया है,
मेरे हिस्से जब भी आया, निर्णय का क्षण आया है,
युद्ध नहीं होने देना, मेरी न कभी अभिलाषा थी,
और कौरवों को न कभी उकसाने वाली भाषा थी,
संभावित संहारों को मैं एकटक करता रहा मनन,
नहीं दैन्यता और पलायन ।

पीड़ा सबके घर आती है, या मैं हूँ या योगेश्वर,
सबको अपना भाग मिलेगा, जी लो उसको जी भर कर,
घुटना ना कभी मुझको भाया, व्यापकता मेरी थाती है,
मन की गहराई में जा, नीरवता सहज समाती है,
दिन सी उजली मन की स्थिति, हो कैसी भी रात बियावन,
नहीं दैन्यता और पलायन ।

मैने मन के पट नहीं कभी औरों के सम्मुख खोले हैं,
सम्बन्धों को अपनाया है और वचन यथोचित बोले हैं,
पर सदैव शतरंजी चालों को समझा, उदरस्थ किया,
और सभाओं की सम्मलित विद्वत-भाषा से त्यक्त जिया,
आज खड़ा निर्णय-क्षण, निर्मम अवसादों का पूर्ण दहन,
नहीं दैन्यता और पलायन ।