स्वतः तृप्ति है, प्रेम शब्द में प्यास नहीं है,
मात्र कर्म है, फल की कोई आस नहीं है,
प्रेम साम्य है, कभी कोई आराध्य नहीं है,
सदा मुक्त है, अधिकारों को साध्य नहीं है ।
यदि कभी भी प्रेम का विन्यास लभ हो जटिलता को,
सत्य मानो प्राप्ति की इच्छा जगी है, अनबुझी है ।
प्राप्ति का उद्योग यूँ ही मधुरता को जकड़ता है,
प्रेम तो उन्मुक्तता है, व्यथा शासित तम नहीं है ।।
प्रेम का निष्कर्ष सुख है,
वेदना का विष नहीं है ।
अमरता का वर मिला है,
काल से शापित नहीं है ।।