21.2.16

मन मेरा तू

कभी सुखों की आस दिखायी,
कभी प्रलोभन से बहलाया ।
मन मेरा तू शत्रु निरन्तर,
मुझको अब तक छलता आया ।।

प्रभुता का आभास दिलाकर,
सेवक जग का मुझे बनाया ।
और दुखों के परिलक्षण को,
तूने सुख का द्वार बताया ।
मन मेरा तू शत्रु निरन्तर,
मुझको अब तक छलता आया ।।१।।

इन्द्रिय को सुख अर्पित करने,
तूने साधन मुझे बनाया ।
इसी हेतु ही मैं शरीर हूँ,
तूने भ्रम का जाल बिछाया ।
मन मेरा तू शत्रु निरन्तर, 
मुझको अब तक छलता आया ।।२।।

और सुखों के छद्म रूप में,
कलुषित जग का पंक पिलाया ।
इस शरीर के क्षुद्र सुखों हित,
मुझसे मेरा रूप छिपाया ।
मन मेरा तू शत्रु निरन्तर, 
मुझको अब तक छलता आया ।।३।।

मुक्त गगन मैं कैसे जाऊँ,
मेरी कारागृह यह काया ।
हा हा मैं भी मूढ़ बुद्धि हूँ,
कारागृह को लक्ष्य बनाया ।
मन मेरा तू शत्रु निरन्तर, 
मुझको अब तक छलता आया ।।४।।

कैसे अपनी भूल सुधारूँ,
बिता दिया जो जीवन पाया ।
तेरे कारण, अवसर दुर्लभ,
प्राप्त हुआ था, उसे गँवाया ।
मन मेरा तू शत्रु निरन्तर, 
मुझको अब तक छलता आया ।।५।।

ज्योति अन्दर भी जगी थी,
और जब यह जान पाया ।
सत्य कहता, तभी मुझको,
स्वयं पर विश्वास आया ।
मन मेरा तू शत्रु निरन्तर, 
मुझको अब तक छलता आया ।।६।।


14.2.16

भौतिक प्यास

उतर गया गहरी पर्तों में,
जीवन का चीत्कार उमड़ कर ।
गूँज गया मन में कोलाहल,
हिले तन्तु अनुनादित होकर ।।१।।

स्वार्थ पूर्ति के शब्द तुम्हारे,
गर्म द्रव्य बन उतर गये हैं ।
शंकातृप्त तुम्हारी आँखें,
मेरे मन को अकुलातीं हैं ।।२।।

देखो भौतिक प्यास तुम्हारी,
जीवन का रस ले डूबी है ।
फिर भी तेरा स्वप्न कक्ष,
जाने कब से एकान्त लग रहा ।।३।।

व्यर्थ तुम्हारे इस चिन्तन ने,
जीवन का सौन्दर्य मिटाया ।
आओ मिलकर इस जीवन मे,
सुख का सुन्दर स्रोत ढूढ़ लें ।।४।।

7.2.16

रूपसी

यादों के चित्रकार ने थे, अति मधुर चित्र तेरे खींचे,
तब हो जीवन्त कल्पना ने, ला अद्भुत रंग उसमें सींचे ।
सौन्दर्य-देव ने फिर उसमें, भर दी आकर्षण की फुहार,
मेरे जीवन की स्वप्न-तरी, चल पड़ी सहज तेरे पीछे ।।

तेरे यौवन से हो वाष्पित,
सौन्दर्यामृत का सुखद नीर ।
रस-मेघ रूप में आच्छादित,
मैं सिंचित होने को अधीर ।।

उमड़ रहे रस-मेघों को,
बरसा मन उपवन में समीर ।
चख यौवन मधुरस उत्सुक है,
मधुमय हो जाने को शरीर ।।


31.1.16

आत्म-परिचय

जहाँ पर मन लग गया,
मैं उस जगह का हो गया ।
पर सत्य परिचय खो गया ।।

बाल्यपन में पुत्र बनकर,
लड़कपन में मित्र बनकर,
और 
सम्बन्धों के भारी जाल मैं बुनता गया ।
पर सत्य परिचय खो गया ।।१।।

और विद्यालय में जाकर,
ज्ञान का अंबार पाया ।
किन्तु वह सब व्यर्थ था,
यदि सत्य परिचय नहीं पाया ।।२।।

स्वयं को ज्ञानी भी समझा,
तुच्छ अभिमानी भी समझा ।
किन्तु हृद में प्रश्न था जो,
नहीं फिर भी जान पाया ।।३।।

देश, जाति, घर, धर्म आधारित,
सम्बोधन थे मैने पाये ।
किन्तु कभी भी इन शब्दों में,
परिचय अपना दिख न पाये ।।४।।

किन्तु तभी ही, मेरे प्रेम सरोवर की एक कृपा किरण से,
मैने जाना, सारे परिचय, मेरे तन पर आधारित थे ।
मैं अब तक इस नश्वर तन में, परिचय अपना पाता था,
मैं हूँ एक अविनाशी आत्मा, इसको भूला जाता था ।।

प्रश्न अब यह सुलझता है,
मन खुशी से मचलता है ।


24.1.16

ध्येय और प्रेम

आज फिर क्यों याद आयी,
नाव फिर से डगमगाई ।

ध्येय में क्या आज, अपने भी पराये हो चुके हैं,
ध्येय ही जीवन है, क्या और अब कुछ भी नहीं है ।
ध्येय की वीरानियों में, एक स्वर देता सुनाई ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।१।।

शुष्क धरती पर कोई, मृदुफल कभी बोता नहीं है,
साथ जल का न मिले, तो फल कोई होता नहीं है ।
प्रेम जल है, ध्येय फल है, यह सनातन रीति भाई ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।२।।

आज जब आराध्य को कुछ फूल अर्पित हो रहे हैं,
क्यों समुन्दर भ्रान्तियों के फिर हिलोरें ले रहे हैं ।
नयन में क्यों ध्येय-ज्योति, अश्रु बनकर डबडबाई ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।३।।

आज जब दिन का परिश्रम, रात्रि का सुख चाहता है,
शान्ति में यादों का झोंका, ध्यान सारा बाँटता है ।
रागिनी फिर आज अपने, स्वर में क्यों संताप लायी ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।४।।

ध्येय पथ में प्रेम का व्यवधान तो चिर काल से है,
किन्तु मानव की प्रतिष्ठा आज शर-सन्धान से है ।
फिर भी मैनें ध्येय-प्रतिमा प्रेम के जल से बनायी ।
आज फिर क्यों याद आयी ।।५।।


17.1.16

वियोग

मत दे वियोग सा असह्य शब्द,
यह धैर्य-बन्ध बह जायेगा ।
यह महाप्रतीक्षा का पर्वत,
बस पल भर में ढह जायेगा ।।१।।

जीवन के पथ में संदोहित,
तब भाव सभी उड़ जायेंगे ।
जीवन रस दाता मेघ सभी,
निज पंथ छोड़ मुड़ जायेंगे ।।२।।

सुख के भी सब स्रोत हमारे,
दूर दूर हो जायेंगे ।
जो लिये पात्र आशा मदिरा,
वह चूर चूर हो जायेंगे ।।३।।

हो रक्तिक आज सभी यादें,
दर्दों में जा उतरायेंगी ।
तन मन शीतलता की दात्री,
ही स्वयं अनल बन जायेगी ।।४।।

हो व्यथित विचारों की सरिता,
निज धार स्वयं ही बदलेगी ।
अमृतमय स्वप्नों की रचना,
फिर आज मुझे ही डस लेगी।।५।।

तब यौवन की तृष्णायें सब,
कर ताण्डव मन में नाचेंगी ।
जीवन की सुन्दर रागनियाँ,
कविता शोकाकुल बाँचेंगी ।।६।।

हो जड़वत आज सभी गतियाँ,
बस बीच पंथ रुक जायेंगी ।
तेरे ऊपर केन्द्रित जो थीं,
वे निष्ठायें थक जायेंगी ।।७।।

मधुरे तेरा है कार्य बड़ा,
मेरे इस जीवन-मंचन में ।
प्रतिपल, प्रतिक्षण तू आमन्त्रित,
मेरे उजड़े से उपवन में ।।८।।


10.1.16

सुख लौटा दो

शापित धन-यश नहीं चाहिये,
व्यथा-जनित रस नहीं चाहिये ।

त्यक्त, कुभाषित जीवन, तेरा संग पाने को अति आकुल है ।
तेरी फैली बाहों में छिप जाने को रग रग व्याकुल है ।।

मुझको अपने पास बुला लो,

मुझको मेरा सुख लौटा दो ।

3.1.16

ज्ञात होता यदि

ज्ञात होता यदि मुझे उद्देश्य मेरा,
व्यर्थ न मैं व्यथा का जीवन बिताता ।
छोड़ देता पत्थरों के संग्रहों को,
यदि कहीं मैं सत्य का उपहार पाता ।।

किन्तु अब मैं डूबता हूँ,
दुखों की गहरी नदी है ।
भूत के दुस्वप्न सारे,
वेदना बन चीखते हैं ।।१।।

चाहता मन व्यक्त करना,
आज दुविधा की व्यथा को ।
सत्य के सम्मुख खड़ा कर,
चाहता हूँ तृप्त करना ।।२।।

नहीं वाणी बोल पाती,
शब्द भी लड़खड़ा जाते ।
वेदना छिप नहीं पाती,
तर्क शंका बढ़ा जाते ।।३।।

समय सारा जा चुका है,
शेष केवल विकलता है ।
मन पराया हो चुका है,
मात्र निष्क्रिय तन बचा है ।।४।।

किन्तु अब मैं जानता हूँ,
प्रेम पूरित रूप तेरा ।
मूर्खता का तिमिर हर लो,
दिखा दो निर्मल सबेरा ।।५।।


27.12.15

जीवन-इच्छा

बहुधा मैं असहाय पाता हूँ स्वयं को,
खोखले दिखते मुझे उद्देश्य मेरे ।
विवश हो मैं चाहता हूँ गोद ऐसी,
तुष्ट हूँ मैं, सान्त्वना भी मिले मुझको ।।१।।

व्यथित मन में चीखता तम रिक्तता का,
जानता हूँ पर स्वयं से भागता हूँ ।
स्वयं के धोखे विकट हो काटते हैं,
प्राप्त जल पर तृप्त मैं न हो सका हूँ ।।२।।

विकल अन्तरमन उलसना चाहता है,
हर्ष का जीवन बिताना चाहता ।
व्यर्थ का दुख पा बहुत यह रो चुका है,
प्रेम का अभिराम पाना चाहता ।।३।।

20.12.15

राधा-माधव

देहभान में प्राण तिरोहित,
अन्तर आत्मा दुखी बेचारी ।
प्रेम भक्ति की सुधा चखा दो,
राधा माधव, कृष्ण मुरारी ।।१।।

भ्रम टूटा, मैं मुझसे छूटा,
नित माया की चोट करारी ।
मुझको अपनी गोद छुपा लो,
गोपी रक्षक, हे गिरिधारी ।।२।।

जग की जगमग रास न आये,
कैसे रह जाऊँ संसारी ।
मुझमें अपना रंग चढ़ा दो,
मेरे जीवन के अधिकारी ।।३।।

जीवन की अक्षय अभिलाषा,
मनमोहन, हे वंशीधारी ।
वृन्दावन मम हृदय उतारो,
प्रेम सरोवर, कुंज बिहारी ।।४।।

आनन्दित मन भरे कुलाँछे,
तेरी लीलायें अति प्यारी ।
बिन तेरे सब शान्त शुष्क है,
गोविन्दा, हे गोकुलचारी ।।५।।

हे शब्दों के उद्भवकर्ता,
तुम्हें समर्पित कृतियाँ सारी ।
छंदों के इस तुच्छ भोग को,
स्वीकारो हे रास बिहारी ।।६।।

13.12.15

और तुम

मन की तहों में क्या हलचल मची है ।
न बोलूँ अगर, पर ये आँखें बतातीं ।।१।।

अगर पूछ सकते तो धड़कन से पूछो ।
किसे कष्ट कितना, वह कहकर सुनाती ।।२।।

तुम्हारे लिये मात्र सो के है उठना ।
तड़प कितनी होती, जो रातें सताती ।।३।।

वचन था, हृदय को हृदय में रखेंगे ।
भूले नहीं, बात तुमने भुला दी ।।४।।

कहा, तुम नहीं तो, नहीं चैन आता ।
सुनी बात, सुनकर हँसी में उड़ा दी ।।५।।

है मन को मनाने के औरों तरीके ।
नहीं बोलते बात, तुमपर जो आती ।।६।।

तुममें बसा मन, तुम्हे मन में ढूढ़ूँ ।
यही कर्म औ चाह मन में बसा ली ।।७।।

मेरी जीवनी को, समझती है दुनिया ।
नहीं कुछ किया और यूँ ही बिता दी ।।८।।


6.12.15

परिचय

अतुलित रूप सम्पदा तेरी,
मादकता मधु का निर्झर ।
नयनों में अप्रतिमाकर्षण,
चेहरे का सौन्दर्य प्रखर ।।१।। 

नयन तुम्हारे कान्ति-सरोवर,
चेहरे पर अभिराम ज्योत्सना ।
परिचय तेरा शब्द रहित है,
तुम पृथ्वी पर अमर-अंगना ।।२।।

मधुरस के इस महासिन्धु में,
मन नैया चुपचाप बढ़ रही ।
मेरी सृजना, चुपके चुपके,
तेरा यह आकार गढ़ रही ।।३।।

पर यथार्थ में मिली नहीं तुम,
स्वप्नों में आ जाती प्रतिदिन ।
राग सभी अनसुने हैं अभी,
जो आकर गा जाती हर दिन ।।४।।

ना जानूँ, तुम कौन स्वप्न में,
मनस पिपासा जगा रही हो ।
ना जाने क्यों आशाआें के,
पुष्प सुनहरे खिला रही हो ।।५।।

अनुभूतित सौन्दर्य अतुल है,
पर अन्तः उत्सुक अतीव है ।
मैं जीवन की प्रथम संगिनी,
में तेरी आकृति चाहूँगा ।।६।।


29.11.15

क्यों

सकल, नित, नूतन विधा में,
दोष प्रस्तुत हो रहे क्यों ।
क्यों विचारों में उमड़ता,
रोष जो एकत्र बरसों ।।१।।

क्यों प्रदूषित भावना-नद,
तीक्ष्ण होकर उमड़ती है ।
ईर्ष्या क्यों मूर्त बनकर,
मन-पटल पर उभरती हैं ।।२।।

क्यों अभी निष्काम आशा,
लोभ निर्मित कुण्ड बनती ।
मोह में क्यों बुद्धि निर्मम,
सत्य-पथ से दूर हटती ।।३।।

और अब क्यों काम का,
उन्माद मन को भा रहा है ।
कौन है, क्यों जीवनी को,
राह से भटका रहा है ।।४।।

22.11.15

हृदय-कक्ष

हृदय के विस्तृत भवन में, अनुभवों से,
किये निर्मित काल्पनिक कुछ कक्ष मैंने ।

सजा उनको आचरण की सहजता से,
तृप्त करने कल्पना की प्यास मैंने ।

किया शब्दित अनुभवों को जटिलता से,
ग्रहण करके लुप्त होते स्वप्न मैंने ।

और आँसू अनवरत बहते नयन से,
कभी पाये रिक्त हृद के कक्ष मैंने ।

15.11.15

आभार

अति प्रसन्न हूँ, इस पथ पर, तेरा ढाढ़स और प्यार मिला है,
पृथक विचारों को तेरे ही, भावों का आधार मिला है,
अन्तः पीड़ा को तेरे कोमल मन का संसार मिला है,
सच कहता हूँ, बड़े भाग्य से, तेरे सा उपहार मिला है ।

कविता बनकर आज हृदय से प्यार बहे तो मत रोको,
इस बन्धन को प्रथम बार ही, शब्दों का आकार मिला है ।।

8.11.15

अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा

लिये समय का बोझ हृदय में, संवेदित जीता रहता हूँ ।
अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा, मन ही मन पीता रहता हूँ ।।

नेह नियन्त्रित नहीं, शीघ्र ही आँखों को सरसा जाता है ।
भावों से परिपूर्ण, अपेक्षित सुख-फुहार बरसा जाता है ।।
नहीं बिखरने पाये जग में,
पर दुख जो भी आये मन में,
कोमल मन है, कष्ट बड़े घनघोर, सहज जीता रहता हूँ ।
अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा, मन ही मन पीता रहता हूँ ।। १ ।।

कुटिल जगत की रीति, छिला था हृदय, अनेकों आघातों से ।
कब तक सहती, बहुधा आत्मा, चीखी भी थी संतापों से ।।
सोचा तब हुंकार कर उठूँ,
चालों का प्रत्युत्तर भी दूँ,
किन्तु स्वयं को समझाता हूँ, होठों को सीता रहता हूँ ।
अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा, मन ही मन पीता रहता हूँ ।। २ ।।

था निरीह, पाशित बन्धों में, कहता क्या, अपने जो थे ।
कई बार इच्छा होती थी, तन्तु तोड़ दूँ सम्बन्धों के ।।
नहीं किसी से कुछ भी कहता,
शान्त खड़ा शापित सा सहता,
सम्बन्धों को मधुर बनाये, दुविधा में जीता रहता हूँ ।
अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा, मन ही मन पीता रहता हूँ ।। ३ ।।

कैसे लब्ध आचरण छोड़ूँ, कैसे इतना गिर जाऊँ मैं ।
कैसे मान प्रतिष्ठा प्रेरित, अपने से ही फिर जाऊँ मैं ।।
नहीं ढूढ़ता हूँ अब कारण,
त्याग, तपस बन गये उदाहरण,
वही तर्क प्रस्तुत करता हूँ, वही कृष्ण-गीता कहता हूँ ।
अश्रु नहीं बन पाती पीड़ा, मन ही मन पीता रहता हूँ ।। ४ ।।

1.11.15

दावानल सा

कैसे सहज, मधुर हो बोलूँ,
सौम्य आत्म कोई छलता है ।
वाणी से कुछ दूर दृष्टि में,
दावानल सा जलता है ।।

नहीं विवादों में उलझा, बस हाँ की,
छलित वहीं पर, जहाँ नहीं शंका की ।
आज विरोधों से पूरित स्वर, बढ़ता और बदलता है ।
वाणी से कुछ दूर दृष्टि में, दानावल सा जलता है ।। १।।

नहीं कृष्ण हूँ, ना ही कोई शपथ धरी है ,
शस्त्र उठाने की इच्छा फिर हो सकती है ।
प्रत्युत्तर का अंकुर मन में, फलता और मचलता है ।
वाणी से कुछ दूर दृष्टि में, दावानल सा जलता है ।। २।।

रुका हुआ था, स्वयं बनाये अवरोधों से,
नहीं कभी भी क्रोध लुप्त, था हुआ रगों से,
आज धैर्य का सूर्य, हृदय से दूर कहीं पर ढलता है ।
वाणी से कुछ दूर दृष्टि में,दानावल सा जलता है ।। ३।।

नहीं कंठ रुकता, केवल यह कह कर,
अन्तः का आवेश उमड़ता रह कर,
नहीं गूँज यह नयी, हृदय में कोलाहल यह कल का है ।
वाणी से कुछ दूर दृष्टि में,दानावल सा जलता है ।। ४।।

25.10.15

उलझन

जीवन के इस समय सिन्धु में,  कुछ पल ऐसे आते होंगे,
जब मन-वीणा के तारों में,  एक अनसुलझी उलझन होगी ।
कर्कश स्वर तब इस वीणा के, वाणी से जा मिलते होंगे,
तब सकल अतल मन सागर में, तूफानों सी हलचल होगी ।।

मानव शरीर के यन्त्र सभी, तब भलीभाँति चलते होंगे,
यन्त्रों की कार्यिक क्षमता भी, संदेह रहित उत्तम होगी ।
मानव जीवन की प्रगति हेतु, निर्मित मानक तत्पर होंगे,
लेकिन भीषण मनवेगों से, अध्यात्म प्रगति स्थिर होगी ।।

मत हो अशान्त, एकात्म रहो,
निज धारा में चुपचाप बहो,
इस कालकर्म को शान्त सहो,
बस शान्ति तत्व के साथ रहो ।

जीवन जितना ही सादा हो,
सुलझाव भी उतना होता है,
उलझन का कोई प्रश्न नहीं,
मन विचरण सीमित होता है ।

यदि मानव फिर भी उलझ गये, तो तोड़ व्यथा के तारों को,
जो पीड़ा है वह सत्य नहीं, तू छोड़ असत्‌ व्यवहारों को ।
बढ़ स्वयं विचारों के पथ पर, मुख मोड़ वाह्य संसारों से,
तू दिगदिगन्त को गुञ्जित कर, ब्रह्मास्मि अहम्‌ ललकारों से ।।

18.10.15

तुम समर्थ हो

यदि कष्टों की धार बहे अनियन्त्रित,
नष्ट करो तुम उस कारण का स्रोतस्थल ।
व्यर्थ कष्ट क्यों सहो,मनुज तुम श्रेष्ठ सबल हो,
प्रभुसत्ता स्थापित कर दो तुम विरोध में ।।

डरा कोई हो, पुरुष नहीं था,
पौरुष तो निर्भयता में है ।
मृत्यु कभी भी अन्त नहीं है,
भय जीवन का सतत व्यर्थ है ।।

हो कोई बलशाली, तुम भी आत्मबली हो,
हों नियमों के शास्त्र, तुम्हे लभ ज्ञानशस्त्र हैं ।
यदि समाज जीवन तेरा कुंठित करता हो,
तुम अपने ही नियम बनाओ, तुम समर्थ हो ।।

नहीं दीखती राह, बढ़ो तुम,
प्रथम कदम में झलके दृढ़ता ।
भाग्य तुम्हारा मित्र बनेगा,
शेष राह भी आप खुलेगी ।।

11.10.15

संवाद

पूछती थी प्रश्न यदि, उत्तर नहीं मैं दे सका तो,
भूलती थी प्रश्न दुष्कर, नयी बातें बोलती थी ।
किन्तु अब तुम पूछती हो प्रश्न जो उत्तर रहित हैं,
शान्त हूँ मैं और तुमको उत्तरों की है प्रतीक्षा ।
राह जिसमें चल रहा मैं, नहीं दर्शन दे सकेगी,
तुम्हे पर राहें अनेकों, आत्म के आलोक से रत ।
किन्तु हृद के स्वार्थ से उपजी हुयी एक प्रार्थना है,
नहीं उत्तर दे सकूँ पर, पूछती तुम प्रश्न रहना ।
कृपा करना, प्रेम का संवाद न अवसान पाये,
रहे उत्तर की प्रतीक्षा, जीवनी यदि बीत जाये ।

4.10.15

नयन प्यारे

होंठ कपते लाज मारे, किन्तु आँखों के सहारे,
पूछती कुछ प्रश्न और अध्याय कहती प्रेम के ।।१।।

हठी मन के भाव सारे, सौंप बैठे बिन विचारे,
हृदय के सब स्वप्न तेरी झील आँखों में दिखें ।।२।।

समूचा अस्तित्व हारे, पा तुम्हारे नयन प्यारे,
द्रवित हूँ, उन्माद में मन, बहा जाता बिन रुके ।।३।।

27.9.15

वाक्य गूँजता

हर रात के बाद,
बरसात के बाद,
दिन उभरेगा,
तिमिर छटेगा,
फूल रंग में इठलायेंगे,
कर्षण पूरा, मन भायेंगे,
पैर बँधे ढेरों झंझावत,
पग टूटेंगे, रहे रुद्ध पथ,
बरसायेंगे शब्द क्रूरतम,
बहुविधि उखड़ेगा जीवनक्रम,
दिन की भेंट निगल जाने को,
संभावित गति हथियाने को,
यत्न पूर्णतः कर डालेंगे,
संशय भरसक भर डालेंगे,
खींच खींच कर उन बातों में,
अँधियारी काली रातों में,
ले जाने को फिर आयेंगे,
रह रह तुमको उकसायेंगे।

निर्मम हो एक साँस पूर्ण सी भर लो मन में,
जीवन का आवेश चढ़ाकर, भर लो तन में,
गूँजे भर भर, सतत एक स्वर दिग दिगन्त में,
नहीं दैन्यता और पलायन, इस जीवन में ।

20.9.15

जीना ही होगा

तुझे जीना ही होगा

अनुकूल बात, हो न हो,
कार्यान्त रात, हो न हो,
न्यूनतम व्याप्त, विषयगत आस , हो न हो।

हृदय-तम अब हटाना है,
उन्हें यह सच बताना है,
नहीं उनसे विश्व पालित,
यहाँ सबका ठिकाना है।

नहीं अमृत का कलश है,
प्राप्ति में श्वेदान्त रस है,
उपेक्षा का अर्क, पीना ही होगा,
तुझे जीना ही होगा।

13.9.15

पंथ प्रथम है

आँखों से क्यों खींच रही हो,
आकर्षण-तरु सींच रही हो,
नहीं शक्ति, आमन्त्रण तज दूँ,
उद्वेलित हूँ, नहीं सहज हूँ,
साँसों का आवेग विषम है,
आशंकित हूँ, पंथ प्रथम है ।

प्रेम तुम्हारा, आधी रचना,
आधा जगना, आधा सपना,
नहीं सूझता है कुछ मन को,
कैसे रोकूँ आज समय को,
सुख, व्याकुलता मिश्रित क्रम है,
आशंकित हूँ, पंथ प्रथम है ।

6.9.15

लोग हमारे जीवन का

लोग हमारे जीवन का आकार बनाने बैठे हैं ।
अरबी घोड़ों को टट्टू की चाल सिखाने बैठे हैं ।

जिनके अपने जीवन बीते छिछले जल के पोखर में,
सागर की गहराई का अनुमान लगाने बैठे हैं ।

मना किया किसने, अनुभव का लाभ प्राप्त हो आगत को,
जूझ रही जो लौ, उसका उपहास उड़ाने बैठे हैं ।

स्वप्न-उड़ानों हेतु तुम्हे प्रस्तुत करना था मुक्त गगन,
उड़ ना पायें पञ्छी, इस पर दाँव लगाने बैठे हैं ।

बहुधा बाधा बने राह की, अहं अधिक था, गति कम थी,
उस पर भी खुद को महती उपमान बनाने बैठे हैं ।

है साहस जिनको लड़ने का, पर विडम्बना, उनको भी,
कर्मक्षेत्र से भागे, गीता ज्ञान बताने बैठे हैं ।

चिन्तन जिनका चाटुकारिता, टिके रहो का मूल मन्त्र ले,
नयी पौध को आज लोक व्यवहार सिखाने बैठे हैं ।

सजा दिये हैं आडम्बरयुत, क्रम हैं और अधिक उपक्रम,
इसे व्यवस्था कहते, तृण को ताड़ बताने बैठे हैं ।