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25.7.12

उर्वशी, एक कथा

कथाओं का अपना संसार है, सच हों या कल्पना। उनमें एकसूत्रता होती है जो पात्रों को जोड़े रहती है। कथा में पात्रों का चरित्र महत्वपूर्ण है या परिस्थितियों का क्रम, कहना कठिन है, क्योंकि दोनों ही ऐसे गुँथे रहते हैं कि उन्हें अलग अलग कर उनका विश्लेषण असंभव सा होता है। उर्वशी की कथा का भी यही स्वरूप है, उर्वशी, पुरुरवा और समस्त पात्र परिस्थितियों से संबद्ध हो कथा का निर्माण करते हैं, एक बड़ी रोचक कथा का।

उर्वशी अप्सरा है, वह स्वर्ग की संस्कृति का अंग है, नृत्य, संगीत, मोहन, सम्मोहन आदि उसके दैनिक कर्म हैं पर उसे कुछ अतृप्त सा लगता है। सर्वसुखमयता के संसार में स्थिर पड़े रहने से उसे प्रकृति और उसके तत्वों के आड़ोलन का आस्वाद नहीं मिलता है। रात्रि को बहुधा वह अपनी सहेलियों के साथ मृत्युलोक का भ्रमण करती है। स्वर्ग में सब शाश्वत है, मृत्युलोक में सृजन और लुप्त होने की क्रिया उसे लुभाती है। रात में ओस का बनना, सूर्यकिरण पड़ते ही उड़ जाना, फूलों का खिलना, बन्द हो जाना, इनमें उसे कुछ क्रियाशीलता दिखती है, कुछ प्रकृतिशीलता दिखती है। मृत्युलोक के तत्वों की जीवटता, और जिजीविषा के प्रति मन में स्फोटित अग्नि, ये गुण उसके आकर्ष के प्रमुख उद्दीपन है। ऐसा क्यों है, यह एक वृहद विषय है, क्योंकि अध्ययन यह भी स्पष्ट करेगा कि देवता सदैव पृथ्वी में जन्म लेने के लिये लालायित क्यों रहते हैं?

पुरुरवा प्रतापी राजा हैं, चन्द्रवंशी, प्रतिष्ठानपुर के, आधुनिक प्रयाग के निकट। देवताओं के अधिकार क्षेत्र में दानव जब भी उत्पात मचाते हैं, पुरुरवा को सहायता के लिये पुकारा जाता है। वीरता, प्रखरता, संवेदनशीलता आदि सभी गुण होने पर भी उन्हें स्वर्ग का तन्त्र और ऐश्वर्य अत्यधिक अभिभूत करता है, स्वर्ग का हर तत्व सुन्दर लगता है। उसे पाने की एक अग्नि मन में रहती है। स्वर्गलोक के उत्सवों के बाद बहुधा वह रथारूढ़ बादलों में वेग से भ्रमण किया करते हैं, कोई दिशा नहीं, कोई ध्येय नहीं, बस मन की अग्नि को बुझाने, आवरगी सा कुछ।

दोनों की ऐसी ही मनःस्थिति की कोई रात्रि है, भ्रमणशील उर्वशी को केसी दानव देखता है, अरक्षित पा अपहरण कर लेता है, उर्वशी सहायता के लिये पुकारती है, निरुद्देश्य घूम रहे पुरुरवा की विचारतन्द्रा टूटती है। वीर पुरुरवा केसी दावन को युद्ध के लिये ललकारते हैं, मदमत्त और भीमकाय दानव पर सिंह सा टूट पड़ते हैं पुरुरवा। केसी से उर्वशी को छीनने के प्रयास में कई बार अनायास ही पुरुरवा व उर्वशी के शरीरों का स्पर्श होता है, नयन मिलते हैं, उस छुअन की तरंगें आसक्तिमय हो दोनों को ही अपहरित कर लेती है, अकथ प्रेम में। आहत केसी दानव भाग जाता है, पुरुरवा उर्वशी को सादर व ससम्मान वापस स्वर्ग भेज देते हैं, पुरुरवा वापस पृथ्वी आ जाते हैं। दोनों ही अपना हृदय खो आते हैं, स्मृतियाँ ले आते हैं, प्रेम दोनों का जीवन आच्छादित कर लेता है।

उर्वशी के लिये अपने प्रेम को पहले न कह पाने की लज्जा, पुरुरवा के लिये अस्वीकार कर दिये जाने का भय, पहल नहीं हो पाती है, प्रेम की अतृप्त ज्वाला दोनों का ही मन और जीवन लीलने लगती है। अनमनी सी उर्वशी एक बार विष्णु और लक्ष्मी पर आधारित नृत्यनाटिका कर रही है, लक्ष्मी का अभिनय करते हुये वह विष्णु को पुरुषोत्तम के स्थान पर पुरुरवा कह जाती है। निर्देशक भरत मुनि क्रोधित हो श्राप दे देते हैं कि जिस पुरुष के बारे में तू चिन्तनमग्न है, जा उसे वरण कर, स्वर्ग से निष्कासन का श्राप देते हैं। पर याद रख कि तुझे एक समय में पति या पुत्र ही मिलेगा, जिस समय तेरे पति और पुत्र का मिलन होगा, तुझे स्वर्ग वापस आना पड़ेगा।

तमिल मे कहावत है, उर्वशी शापम् उपकारम्, उस समय तो पुत्र का विचार मन में था ही नहीं इसलिये उर्वशी को यह श्राप भी एक उपकार सा लगता है। वह अपनी सखी से पुरुरवा को प्रणय-निमन्त्रण भेजती है, जिसे सहर्ष स्वागत मिलता है। उर्वशी प्रेमारूढ़ हो स्वर्ग से मही उतर आती है, पुरुरवा उसके साथ गन्धमादन की रमणीक पहाड़ी पर रहने लगते है, वहीं से राजकाज के निर्देश देते हैं। पुरुरवा की पहली पत्नी औशीनरी प्रतिष्ठानपुर में ही रहती हैं, निःसन्तान होने का दुख है उन्हें, पुत्रप्राप्ति के क्रम में पति के किसी दूसरी नारी के संग होने का क्षोभ वह राज्य के संचालन में सक्रिय रहकर छिपा लेती हैं।

एक वर्ष हर्षातिरेक में बीत जाता है, एक दूसरे के प्रेम में निमग्न दोनों को ही संसार की सुध नहीं रहती है। इस समय दोनों के बीच हुये संवाद को नर और नारी की परस्पर मनःस्थिति समझने के लिये आधारभूत माना जा सकता है। उन सूक्ष्म विवेचनाओं का वर्णन एक अलग अध्याय माँगता है। एक वर्ष के बाद की दो प्रचलित कथायें हैं, पर दोनों का उद्देश्य एक है। एक कथा के अनुसार वनभ्रमण के समय पुरुरवा की दृष्टि क्षण भर के लिये नदी से झुक कर जल भरती हुयी एक युवती पर ठहर जाती है, यह देख कर उर्वशी क्रोधवश और डाहवश लता बन जाती है। पुरुरवा उसे ढूढ़ते हैं पर वह मिलती नहीं है। पुरुरवा की विछोह दशा से द्रवित हो तथा उनके द्वारा ऋण को चुकाने के लिये देवता उन्हें एक मणि देते हैं, जिसको छूने से उर्वशी पुनः शरीररूप में आ जाती है। दूसरी कथा के अनुसार कुछ समय के लिये पुरुरवा यज्ञ कराने के लिये अपने राज्य वापस जाते हैं, तत्पश्चात वापस आ जाते हैं।

जो भी कथा हो पर इस समयावधि में उर्वशी ऋषि च्यवन और उनकी पत्नी सुकन्या के आश्रम में रहती है और अपने पुत्र आयु को जन्म देती है। पिता और पुत्र एक साथ मिल न जायें, उर्वशी की सहायता के लिये यह देवताओं की चाल थी। जो भी हो, पर उसके बाद उर्वशी पुरुरवा के साथ महल वापस आ जाती है और औशीनरी भी उसे स्वीकार कर लेती है। अगले १६ वर्ष उनका जीवन आनन्दमय और प्रेममय बीतता है, स्वर्ग और मही का श्रेष्ठस्वरूप उनके प्रेम के रुप में प्रतिष्ठापित होता है।

१६ वर्षों तक आयु का पालन पोषण महर्षि च्यवन और सुकन्या के आश्रम में होता है, माता-पिता से प्राप्त श्रेष्ठ गुणों को आश्रम की सम्यक और कुशल शिक्षा पद्धति और मणिमय कर देती है। योग्य आयु जब १६ वर्ष का होता है, महर्षि च्यवन उसे सुकन्या के साथ राजा के पास भेज देते हैं। श्राप के प्रभाव से उर्वशी को न चाहते हुये भी स्वर्ग वापस जाना पड़ जाता है। एक ओर उर्वशी के जाने का दुख, दूसरी ओर युवा पुत्र को सामने पाने का हर्ष, पुरुरवा राज्य आयु को सौंप कर गन्धमादन वापस चले जाते हैं। वर्षों से वात्सल्य हृदय में समेटे औशीनरी आयु को सहर्ष स्वीकार कर लेती है और राजमाता के रूप में अपने दायित्व का निर्वाह करती है।

दिनकर कथा यहीं समाप्त कर देते हैं पर अन्य विवरणों के अनुसार दानवों के साथ हुये एक और युद्ध के लिये देवताओं को पुरुरवा की सहायता की आवश्यकता पड़ती है, पुरुरवा सहायता करते हैं, देवता युद्ध जीत जाते हैं। युद्ध के बाद विदा लेते पुरुरवा के लिये इन्द्र उपहारस्वरूप उर्वशी को स्वर्ग से मुक्त कर देते हैं। पुरुरवा और उर्वशी तब जीवन पर्यन्त साथ साथ रहते हैं, उनके सात और पुत्र होते हैं। जीवन बीतता है, प्रेममुदित हो, प्रेम विजयी होता है, स्वर्ग और मही का मिलन स्थायी हो जाता है, गन्धमादन पर्वत पर।