न दैन्यं न पलायनम्
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17.4.16
गन्तव्य
जीवन
की
अनचीन्ही
राहें
,
पार
किये
कितने
चौराहे
।
फिर
भी
जाने
क्यों
उलझन
में
,
मैं
पंछी
अनभिज्ञ
दिशा
से
।।
१।।
रोचक
है
,
हर
राह
नयी
जो
,
उत्सुकता
की
बहती
धारा
।
किन्तु
सदा
ही
मौन
प्रश्न
पर
,
पूछो
क्या
गन्तव्य
हमारा
।।
२।।
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