29.2.12

आस धुआँ, हर साँस धुआँ

रघुबीरजी के लिये कूड़े के ढेर का प्रकरण अन्ततः एक चिरकालिक शान्ति लाया, यद्यपि इसके लिये उन्हें नगर निगम के अधिकारी के साथ मिलकर सारा भ्रम दूर करना पड़ा। अपने प्रयासों से रघुबीरजी एक जागरूक नागरिक के रूप में पहचान बना चुके थे, लोगों को उन पर विश्वास बढ़ चला था और पर्यावरण संबंधी किसी भी नये विषय में पहल करने के लिये अधिकृत थे।

मानसून अतृप्त धरा को संतृप्त कर के चला गया, कृतज्ञ धरती ने भी फल फूल दिये, धनधान्य दिया। जीवजगत की जठराग्नि प्रचंड ठंड में अपने पूरे आयाम में रहती है, प्रकृति जब खाने को देती है तो भूख भी देती है। शरीर को जीवन रस मिलता रहता है, स्वास्थ्य बढ़ने लगता है, मन भी प्रसन्न हो जाता है। शरीर और प्रकृति का बसन्त साथ साथ ही आ जाता है। रघुबीरजी प्रकृति के इस चक्रीय कालखण्ड को सानन्द बिता रहे थे, अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक कार्य निपटा रहे थे, तभी पतझड़ आ पहुँचा।

प्राकृतिक परिवेश में प्रकृति के कार्य स्पष्ट रूप से दिखायी नहीं पड़ते हैं, स्वतः हो जाते हैं, पता ही नहीं चलते हैं। प्राकृतिक परिवेश की अनुपस्थिति हमें प्राकृतिक प्रक्रियायें समझने को विवश कर देती है। पतझड़ गावों में भी आता है, पेड़ों से पत्ते झड़ते हैं, धरती से पोषित पत्ते धीरे धीरे धरती में विलीन हो जाते हैं, खाद बनकर, आगामी पत्तों को पोषित करने के लिये। नगरों में यह संभव नहीं हो पाता है, एक तो पेड़ ही कम हो चले हैं। दूसरा जब पत्ते झड़कर कांक्रीट या रोड पर गिरते हैं तो अपना निर्वाण बाधित सा पाने लगते हैं। नगरीय जीवन का यह पक्ष एक नयी समस्या लाता है, पत्तों को समेटने की समस्या और यदि उन्हें तुरन्त न समेटा जाये तो वह कूड़े के रूप में नगर में बिखर जाते हैं, यत्र तत्र सर्वत्र।

नगरनिगम होता ही है, नगरीकरण से उत्पन्न समस्याओं का निवारण करने के लिये। एक तन्त्र ही है कोई मन्त्र नहीं कि सारे कार्य पलक झपकाते ही कर डाले। कहने को तो पतझड़ के समय पत्ते समेट कर ले जाने का कार्य नियमित रूप से होना चाहिये, नगरनिगम साप्ताहिक ही कर दे तब भी कृतज्ञ बने रहना चाहिये। नगरनिगम की उदासीनता ने रघुबीरजी के पड़ोसियों को एक नयी विधि अपनाने को विवश कर दिया। आसपास की सोसाइटियों के कुछ उत्साही युवकों ने सफाई कर्मचारियों द्वारा एकत्र इन पत्तों को आग लगा देने का उपाय निकाल लिया। दिन के समय सड़कों पर आवागमन बना रहता है अतः लोगों ने रात में सुलगाने का क्रम बना लिया।

आत्मिक उन्नति और प्राणों में आयाम बनाये रखने के लिये रघुबीरजी अपनी बालकनी में प्राणायाम करते हैं, सुबह सुबह की शुद्ध ऑक्सीजन पूरे शरीर को ऊर्जामय कर देती है। पिछले दो दिनों से प्राणायाम निष्प्रभावी हो रहा था, कारण था फेफड़ों में पहुँची धुँयें की पर्याप्त मात्रा। गन्ध और दृष्टि से समझने का प्रयास किया तो कारण स्पष्ट समझ में आ गया। लगभग सौ मीटर की दूरी पर पत्तों की आग रात भर से सुलग रही थी। धुयें का यह गुबार धीरे धीरे स्मृति में घनीभूत होने लगा। ऐसा नहीं कि यह पतझड़ की ही समस्या थी, धुयें के दो और स्रोत रघुबीरजी को याद आ गये।

जाड़ों के समय भी उसी ओर से सुबह सुबह कुछ सुलगने की गंध आती थी। यद्यपि उस समय बालकनी में प्राणायाम न करने से वह धुआँ रघुबीर जी को अधिक प्रभावित नहीं करता था, पर परिवेश में जले टायर और प्लास्टिक की गंध से वातावरण बुरी तरह से प्रदूषित हो जाता था। उसका कारण भी उन्हें समझ आ गया था, आसपास की सोसाइटियों और एटीएम के चौकीदारों को रात में तापने के लिये जो भी मिल जाये, उसे सुलगाने की आदत थी। अब जीवन किसे प्रिय नहीं होता पर जब विकल्प ठंड या प्रदूषण में से किसी एक से मरने का हो, तो सब प्रदूषण करने बैठ जायेंगे, इस पर कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिये।

यदि ६ ऋतुओं में केवल दो ही धूम्रदोष से ग्रसित होतीं तो भी एक संतोष किया जा सकता था, भाग्य का खेल मानकर भूला जा सकता था। एक और धुयें की गन्ध थी जो मानसून के महीनों को छोड़ वर्ष पर्यन्त आती थी, और वह भी रात में। धीरे धीरे उसका भी कारण खोजा रघुबीरजी ने। वह घर से निकले कूड़े को सफाई के ठेकेदारों के द्वारा वहीं पर एकत्र कर जला देने के कारण आती थी, यद्यपि नगरनिगम के ठेके में ठेकेदारों को धन उस कूड़े को नगर की सीमाओं से बाहर फेकने का मिलता होगा। लोभवश ठेकेदार स्थानीय निवासियों को सड़ा सा धुआँ पिला रहे थे, वह भी लगभग नियमित।

समस्यायें गम्भीर थीं, स्वयं के प्राणायाम के अतिरिक्त, प्रकृति के प्राणों की रक्षा का दायित्व था रघुबीरजी पर। जैसा कि अंदेशा था, कार्यकारिणी में यह समस्या रखते हुये ही उसे सुलझाने का उत्तरदायित्व रघुबीरजी को सौंप दिया गया। आसपड़ोस के पत्रकार और युवा भी रघुबीरजी के साथ संभावित सफलता में शामिल होने के लिये उत्साहित हो गये। वायु को शुद्ध रखना आवश्यक था, रघुबीरजी ने पुनः गहरी साँस भरी और मन को तैयार कर लिया, एक महत कार्य के लिये....

25.2.12

परीक्षा

परीक्षा श्रेष्ठता सिद्ध करने की विधि है, श्रेष्ठ होने की अनिवार्यता नहीं है। यह दर्शन का वाक्य नहीं, हम सबके दैनिक अनुभव की विषयवस्तु है। उदाहरणों की बहुतायत है, जो जीवन में श्रेष्ठ रहे और जो परीक्षा में श्रेष्ठ घोषित किये गये, उनके बीच कभी किसी प्रकार का तार्किक संबंध रहा ही नहीं है। कारण दो ही हो सकते हैं, या तो जिस पाठ्यक्रम पर परीक्षा होती है, वह बड़ा छिछला है, या तो परीक्षा की विधि में दोष है। तुरन्त ही निष्कर्ष पर पहुँच कर कुछ असिद्ध करने की व्यग्रता में नहीं हूँ, क्योंकि स्वयं भी परीक्षा की पद्धति का प्रतिफल हूँ।

क्या परीक्षा आवश्यक है? हाँ और नहीं भी। जब संसाधनों की माँग अधिक हो और आपूर्ति कम तो वह संसाधन किसे मिले, उसके लिये प्रतियोगिता होती है। प्रतियोगिता बहुधा धन की होती है, जिसके पास अधिक धन, उसके पास अधिक संसाधन। इसी प्रकार जब किसी नौकरी के लिये अधिक लोग आवेदन करते हैं तो सुयोग्य पात्र का निर्धारण करने के लिये भी प्रतियोगिता होती है, जो धन के स्थान पर ज्ञान पर आधारित होती है। यही प्रतियोगिता परीक्षा का उद्गम बिन्दु है। यह एक अलग विषय है कि परीक्षा में परखे गये ज्ञान में और नौकरी में काम आने वाले ज्ञान में जमीन आसमान का अन्तर होता है। जब संसाधन अधिकता में होते हैं, तब प्रतियोगिता होती ही नहीं है, परीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं।

निर्धन समाज में संसाधन कम होते हैं, उनके लिये प्रतियोगिता अधिक होती है, परीक्षा एक के बाद आती रहती है, संघर्ष में बीतता है जीवन। हर छोटी छोटी चीज के लिये जूझना जब नियति हो, तब परीक्षा जीवन का अनिवार्य अंग बन कर हम सबसे चिपक जाता है। अरब के देशों के लिये परीक्षा का कोई महत्व नहीं, पश्चिमी धनाड्य देशों में भी परीक्षा होती हैं पर उनका स्वरूप इतना संघर्षमय तो नहीं ही रहता होगा जैसा अपने देश में है।

यह मानसिकता बहुत गहरे उतरी है, हमारी शिक्षा पद्धति में। यदि हम कल्पना करें कि विद्यालय में कोई परीक्षा न हो, सबको उत्तीर्ण कर दिया जाये, सबको अपने योग्य नौकरी चुनने का अधिकार हो, कोई प्रतियोगिता नहीं, सब अपना जीवन जियें, अपनी रुचि के अनुसार, आनन्द में। बहुत लोग यह बात पचा नहीं पायेंगे। मान मिले न मिले पर यह स्वप्न रह रह कर आता ही रहेगा, क्योंकि यही मेरे लिये किसी सभ्य और सुसंस्कृत समाज की आदर्श स्थिति है। आप कह सकते हैं कि यदि प्रतियोगिता नहीं रहेगी तो लोग पढ़ेगे नहीं, विज्ञान, साहित्य, तकनीकी आदि विकसित ही नहीं होंगी, हम असभ्य के असभ्य रह जायेंगे। आपके इस तर्क से मैं तुरन्त सहमत हो जाऊँगा, पर पाठ्यक्रम और परीक्षा की विधि का विश्लेषण करने के बाद।

हमारी ७० प्रतिशत बौद्धिक क्षमता समाज से प्राप्त अनौपचारिक शिक्षा से विकसित होती है, शेष ३० प्रतिशत औपचारिक शिक्षा में भी दो तिहाई क्षमता हमारी जिज्ञासा से आती है। मात्र १० प्रतिशत क्षमता नियमित अध्यापन से आती है। इसी १० प्रतिशत को विकसित करने के लिये हमारी शिक्षा पद्धति कटिबद्ध है। पूरी पठनीय सामग्री को एक वर्षीय १०-१२ पाठ्यक्रमों में बाटना, हर वर्ष परीक्षा, सब विषयों का प्रारम्भिक ज्ञान, हर बार कुछ और नया। जितना पढ़ना पड़ता है उसका केवल १० प्रतिशत ही स्मृति में रह पाता है, स्मृति में उपस्थित आधा ज्ञान ही किसी काम का होता है। कुल मिला कर जितना ज्ञान आवश्यक है उसका २० गुना हमें हजम करना पड़ता है औपचारिक शिक्षा के माध्यम से। हर पीढियों में यह मात्रा बढ़ती जाती है, क्योंकि हर विषय के पुरोधा अपने विषय के प्रति छात्रों को आकर्षित करने के लिये विषय से संबंधित तकनीकियाँ और विशिष्ट ज्ञान पाठ्यक्रम में ठूस देना चाहते हैं। गणित के जो सवाल हम कक्षा १२ में करते थे, उसे कक्षा ९ में देखकर हमारे होश उड़ गये। आने वाले समय में आवश्यक औपचारिक ज्ञान से ३० गुना बच्चे को घोटना पड़े, और वह भी मात्र १० प्रतिशत कुल बौद्धिक क्षमता विकसित करने के लिये, तो कोई आश्चर्य नहीं है, अपने बच्चों को सुपरमैन की उपाधि देना तब आपके लिये अधिक सरल होगा।

जब पाठ्यक्रम की मात्रा अधिक होगी, तो परीक्षा का भार भी उतना ही होगा। अब आयें परीक्षा की विधि पर। क्या परीक्षा यह निश्चित कर पाती है कि सब पाठ्यक्रम पढ़ डाला गया है और ढंग से समझ में आ गया है? क्या परीक्षा के प्रश्नपत्र का प्रारूप यह जानने के लिये होता है कि आपको क्या आता है या क्या नहीं आता है? परीक्षा हो जाने के बाद कितना रह पाता है दिमाग में? इन तीनों प्रश्नों का उत्तर ढूढ़ने में हमें वे राहें मिल जायेंगी, जिन पर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को चलते देखना चाहते हैं। अपने शैक्षणिक जीवन में परीक्षा की कई विधियों से साक्षात्कार हुआ, जिसके विषय में एक अलग पोस्ट में लिखूँगा। कोई तो कारण होगा कि परीक्षा का नाम सुन जितना पसीना और कँपकपी लोगों को आती है, उतना जून की गर्मी व दिसम्बर की सर्दी में भी नहीं आती होगी।

यदि प्रतियोगी परीक्षाओं को भी देखें तो उनमें नियत ज्ञान का स्तर, उस नौकरी में वांछित ज्ञान के स्तर से बहुत अधिक होता है। रेलवे में परास्नातकों को पत्थर ढोते हुये देखता हूँ तो देश के भविष्य के बारे कुछ बोल पाना कठिन सा लगने लगता है। हर क्षेत्र में यही स्थिति है, पढ़े अधिक हैं पर उनका महत्व नहीं है। संभवतः परीक्षा पद्धति को सही स्वरूप में देख पाना और उसे ज्ञान और उपयोगिता के अनुसार प्रयोग में ला पाना हमारे भविष्य को तय करेगा।

परीक्षा पद्धति हमारी शिक्षा व्यवस्था के लिये परीक्षा की घड़ी है।

22.2.12

फेसबुक, आपको भी धन्यवाद और विदा

नकारात्मकता से सदा ही बचना चाहता हूँ, बहुत प्रयास करता हूँ कि किसे ऐसे विषय पर न लिखूँ जिसमें पक्ष और विपक्ष के कई पाले बना कर विवाद हो, विवाद में ऊर्जा व्यर्थ हो, ऊर्जा जो कहीं और लगायी जा सकती थी, सकारात्मक दिशा में। जीवन में प्रयोगों का महत्व है, प्रयोगों से ही कुछ नया संभव भी है, प्रयोगों में प्राप्त अनुभव और भी महत्वपूर्ण होते हैं और विषयवस्तु की उपादेयता के बारे में औरों को आगाह करने में सहायक भी।

ऐसा ही एक प्रयोग फेसबुक के साथ किया था, कुछ माह पहले, सम्पर्क लगभग २५० के साथ, कई पुराने मित्र और परिवार के सदस्य, उपयोग मूलतः अपने पोस्ट का लिंक देने के लिये, साथ ही साथ कुछ रोचक पढ़ लेने का उपक्रम। बस इसी भाव से फेसबुक में गया था, वह भी किसी के यह कहने पर कि फेसबुक में साहित्य का भविष्य है। अनुभव यदि कटु नहीं रहा तो उत्साहजनक भी नहीं रहा, कुछ दिनों पहले अपना खाता बन्द कर दिया है, पूरा विचार किया, अपनी न्यूनतम और अनिवार्य की श्रेणी में उसे बैठा नहीं पाया। इसके पहले दो माह का साथ ट्विटर के साथ भी था पर वह चूँ चूँ भी निरर्थक ही लगी। अब रही सही उपस्थिति अपने ब्लॉग के साथ ही बची है, वह चलती रहेगी।

हर निर्णय का आधार होता है, आधार स्पष्ट हो तो व्यक्त भी किया जा सकता है। आधार के तीन सम्पर्क बिन्दु थे, समय, साहित्य और सामाजिकता। इन तीनों बिन्दुओं पर कितना कुछ रिस रहा था और कितना रस मिल रहा था, यह अनुभव हर व्यक्ति के लिये भिन्न हो सकता है, पर विश्लेषण हेतु विषय का उठना आवश्यक है।

पहला है सामाजिकता। यह फेसबुक का सुदृढ़ पक्ष है। अपने कई परिचितों के बारे में जाना, वे कहाँ रह रहे हैं, क्या कर रहे हैं, कुछ चित्र उनके परिवारों के, कुछ घूमने के, कुछ त्योहार के, कुछ मित्रों के साथ, जन्मदिन और वैवाहिक वर्षगाँठ की शुभकामनायें। वैसे तो जिन मित्रों और संबंधियों को जानना आवश्यक था, वे तो फेसबुक से पहले भी सम्पर्क में थे। फेसबुक के माध्यम से उनके बारे में कुछ और जान गये। कुछ और लोगों से भी परिचय बढ़ा पर उसका आधार साहित्यिक न हो विशुद्ध जान पहचान का ही रहा, वह भी किसी तीसरे पक्ष के माध्यम से। संबंधों को महत्व देने वालों के लिये, संबंधों की संख्या से कहीं अधिक, उनकी गुणवत्ता पर विश्वास होता है। फेसबुक में संबंधों का प्रवाहमयी संसार तो मिला पर जब उसकी अभिव्यक्ति में गाढ़ेपन की गहराई ढूढ़ी तो छिछलेपन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं पाया।

दोष वातावरण का है, जहाँ स्वयं को व्यक्त करने की होड़ लगी हो, सम्पर्कों की संख्या चर्चित होने के मानक हों, औरों की अभिव्यक्ति का अवमूल्यन केवल लाइक बटन दबा कर हो जाता हो, वहाँ संबंधों के प्रगाढ़ होने की अपेक्षा करना बेईमानी है। संबंधों को पल्लवित करने के लिये समय देना पड़ता है, लगभग बराबर का, स्वयं की अभिव्यक्ति में दिया समय औरों द्वारा अभिव्यक्त को पढ़ने में दिये समय से कम ही रहे। इस वातावरण में ऊपर ऊपर तैरने को आनन्द तो बना रहा पर गहरे उतर कुछ संतुष्टि जैसा कुछ भी अर्जित नहीं हुआ।

दूसरा है समय। जहाँ पर गतिविधियों की झड़ी लगी हो, वहाँ कितना समय सर्र से निकल जाता है, पता ही नहीं चलता है। कई लोगों को जानता हूँ जो सुबह उठकर मुँह धोने के पहले फेसबुक देखते हैं। दिन में कई बार फेसबुक में कुछ न कुछ देखने में समय स्वाहा करने की लत लग जाती है सबको। संभवतः यही कारण है कई संस्थानों में फेसबुक पर रोक लगा दी गयी है। एकाग्रता नहीं रह पाती है, जब भी कुछ सोचने का समय आता है, मन में फेसबुक की घटनायें घूम जाती हैं। भरी भीड़ में परिवेश से त्यक्त युवा बहुधा फेसबुक में विचरते पाये जाते हैं। मेरा भी पर्याप्त समय फेसबुक चुराता रहा, जो पिछले कई दिनों से मुझे पूरी तरह से मिल रहा है।

तीसरा है साहित्य। साहित्य की दृष्टि से अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम ब्लॉग ही है। ट्विटर के १५० अक्षरों में केवल चूँ चूँ ही की जा सकती है। आप अपने होने, न होने, खोने, पाने की सूचना तो दे सकते हैं पर साहित्य सा कुछ लिख नहीं सकते हैं। फेसबुक में भी जहाँ सामाजिकता प्रधान वातावरण हो, वहाँ साहित्य गौड़ हो जाता है। वैसे तो ब्लॉग भी साहित्य का गहरा प्रारूप नहीं है, पाँच छै पैराग्राफ में बड़ी कठिनता से एक विषय समेटा जा सकता है, पर वर्तमान में यही साहित्य की न्यूनतम अभिव्यक्ति और ग्रहण करने की ईकाई है। जहाँ लाखों उदीयमान साहित्यकारों के योगदान से साहित्य सृजन के स्वप्न देखे जा रहे हों, वहाँ अभिव्यक्ति के लिये ब्लॉग से छोटी ईकाईयों का स्थान नहीं है।

पाठक ढूढ़ने का श्रम लेखक को करना होता है, उसी तरह अच्छे लेखक को ढूढ़ने का श्रम पाठक को भी करना पड़ता है। माध्यमों की अधिकता ध्यान बाटती है, अभिव्यक्ति का कूड़ा एकत्र करती है। छोटी चीजें से कुछ बड़ा बन पाने में संशय है, रेत से पिरामिड नहीं बनते, उनके लिये बड़े पत्थरों की आवश्यकता होती है। महाग्रन्थों का युग नहीं रहा पर कम से कम ब्लॉग की ईकाई से सबका योगदान बनाये रखा जा सकता है। साहित्य संवर्धन तो तभी होगा, जब अधिक लोग लिखें, अधिक लोग पढ़ें, लोग अच्छा लिखें, लोग अच्छा पढ़ें, अधिक समय तक रुचि बनी रहे, जब समय मिले तब साहित्य ही पढ़ें, बस में, ट्रेन में, हर जगह। फेसबुक सामाजिकता संवर्धित कर सकता है, साहित्य नहीं।

फेसबुक, आपको भी धन्यवाद और विदा।

18.2.12

मटर की फलियाँ

सप्ताहन्त का एक दिन नियत रहता है, सब्जी, फल और राशन की खरीददारी के लिये, यदि संभव हो सके तो शनिवार की सुबह। जब आईटी शहर के नागरिक शुक्रवार की पार्टी के बाद अलसाये से ऊँघ रहे होते हैं, मुझे मॉल खाली मिलता है, सारा का सारा सामान ताजा और व्यवस्थित, भुगतान काउण्टर आपकी प्रतीक्षा में, सब कर्मचारी आपकी सहायता करने को उद्धत। घर से बलात भेजे गये मानुष को जब स्वतन्त्र देवता जैसा सम्मान मिलता है, तो सब्जी खरीदने जैसा कर्म भी अत्यन्त रोचक हो जाता है।

घर से जो सूची बनाकर जाता हूँ आईफोन पर, वह भी मॉल में सामानों के क्रम के अनुसार होती है, सब्जी, फल, राशन और अन्त में साबुन आदि। सूची सबके सम्मिलित प्रयासों से बनती है, बच्चों की किसी विशेष सूप की फरमाईश, श्रीमतीजी की किसी व्यञ्जन बनाने की उत्कण्ठा, रसोई में समाप्तप्राय आटा, दाल, चीनी, चावल आदि के बारे में हमारे रसोईये जी की घोषणा। सप्ताह भर के बाद तैयार हुयी सूची में बहुधा कोई सामान छूट ही जाता है क्योंकि यदि ऐसा न हो, तो सामान खरीदते समय श्रीमतीजी के मोबाइल पर मिले निर्देशों से वंचित होने लगेगा जीवन। खरीददारी मुख्यतः सूची पर ही आधारित होती है पर इतने बड़े मॉल में घंटे भर बने रहने से कई और आवश्यक वस्तुयें दिख जाती हैं, घर में सामान अधिक ही आ जाता है, कुछ छूटने की घटना यदा कदा ही होती है।

कहते हैं कि आप जिस चीज से भागना चाहते हैं, वह जीवन भर आपका पीछा करती है, मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बचपन में पिताजी सब्जी खरीदने जाते थे, सप्ताह में दो दिन हाट लगती थी गृहनगर में, बहुत भीड़ रहती थी मानो पूरा शहर उमड़ आता हो वहाँ। पता नहीं भविष्य में गृहस्थी का क्या स्वरूप रहेगा, पता नहीं भविष्य में पति पत्नी की भूमिकायें क्या हो जायेंगी, संभवतः यही सोचकर पिताजी मुझे भी साथ ले जाते थे। सोचते होंगे, चलो कुछ तो सीख लेगा, यदि बाहर रहकर पढ़ना पड़े तो कम से कम खाना बनाकर पेट तो भर लेगा। बाहर रहकर पढ़ने के लिये यह सब जानना तो अत्यन्त आवश्यक था, पिताजी ने किया था, छोटे भाई ने भी बाद में किया, अब स्थिति यह है कि घर में मुझे छोड़कर सब खाना बना लेते हैं, बहुत अच्छा।

हाथ में एक छोटा झोला उठाये, भीड़ की रोचकता में गर्दन मटकाते हुये पिताजी के पीछे लगा रहता था। गेहूँ, चावल, दाल के दानों में जाने क्या देखकर खरीदते थे, समझ नहीं आता था। आलू, टमाटर, प्याज, एक एक को चारों ओर से देख कर क्या निश्चित करते होंगे, समझ नहीं आता था। पालक, मेथी, धनिया, पुदीना, ताजा और बासी में कैसे अन्तर करते थे, समझ नहीं आता था। हल्दी, जीरा, मसाला की महक कैसे परखते थे, समझ नहीं आता था। बस एक सहायक की तरह पीछे लगा रहता था, बस इस आस में कि किसी तरह अन्त में गन्ने का रस या बरफ के लच्छे खाने को मिल जाये, पर उसके लिये धूल भरे वातावरण में इतना श्रम करना खलता था। भगवान ने सुन ली, छात्रवास रहने आ गया, इस साप्ताहिक श्रम से छूट मिल गयी, उसके बाद पिताजी छोटे भाई को अपने साथ बाजार ले जाने लगे।

शेष पढ़ाई छात्रावास में, प्रशिक्षण और रेलवे में नौकरी, हर जगह बना बनाया खाना मिलता रहा। विवाह के बाद भी घर में रसोईया लगा रहा, सब्जी, राशन आदि आता रहा, हम अपने भय से मुक्त बने रहे, जो मिलता रहा, वह खाते रहे। कभी किसी व्यंजन विशेष के लिये आग्रह नहीं किया, कभी किसी खाने में कमी इंगित नहीं की। ऐसा लगने लगा कि पिता जी ने जो समय मुझे खरीददारी सिखाने में निवेश किया था उसका कोई प्रतिफल आ ही नहीं रहा है। जहाँ तक हो सका मैं खरीददारी से भागता रहा। अवसर भी अपनी प्रतीक्षा में था और बचपन में सीखी हुयी चीजें व्यर्थ नहीं जानी थीं, इन दोनों का सुयोग बंगलुरु में बनने लगा।

वस्तुतः तीन कारण रहे, पहला कारण हमारे रसोईयेजी का व्यक्तिगत कारणों से कई बार अपने गाँव जाना रहा। श्रीमतीजी को रसोई का पूरा कार्य करने के बाद यह सम्भव नहीं रहता था कि खरीददारी कर सकें, अतः हमको ही उस उत्तरदायित्व का निर्वाह करना पड़ा। दूसरा कारण खानपान के क्षेत्र में बच्चों की वैश्विक मानसिकता का रहा। अपने विद्यालय में पिछले दिन आये टिफिनबाक्सों के आधार पर अगले दिन की माँग रखे जाने के कारण, हर बार हम ही को प्रस्तुत होना पड़ा, या तो बाहर जाकर खिलाने के लिये या घर में बनाने हेतु आवश्यक सामग्री लाने के लिये। इटली, थाईलैण्ड, चीन, मेक्सिको, अमेरिका के व्यंजनों के साथ साथ ठेठ दक्षिण भारतीय भोजन के लिये साधन जुटाने का भार हमको ही सौंप दिया गया। तीसरा कारण मॉल में स्वयं चुनने की सुविधा व स्वच्छ और वातानुकूलित परिवेश रहा।

यह कार्य पुनः प्रारम्भ करना थोड़ा भारीपन अवश्य लाया पर बचपन में पाये तीन वर्षों के अनुभव के कारण अधिक कठिनाई नहीं हुयी। कई बार तो कार्य भार स्वरूप निपटाया पर धीरे धीरे रस आने लगा। एक एक आलू, प्याज, टमाटर, मटर छाँट के रखने में ऐसा लगने लगा मानो अपने परिवार के लिये एक स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन जुटाने में उपयोगी योगदान कर रहे हैं। घर में बच्चों ने जब मटर छीलकर खायी और कहा कि बड़ी मीठी और ताजी मटर है, तो सहसा एक एक मटर चुनना याद आ गया। साथ ही याद आया एक और व्यक्ति जो झोले में मुठ्ठी भर भरकर मटर डाल रहा था, संभवतः वह बचपन में अपने पिताजी के साथ बाजार नहीं गया होगा या उसे इस कार्य में रस नहीं आ रहा होगा।

पिताजी का सिखाया व्यर्थ नहीं गया, घर के लिये राशन, सब्जी आदि खरीदने से अधिक आत्मीय पारिवारिक अवसर सरलता से मिलता भी नहीं हैं। अगली बार से पृथु को भी ले जाऊँगा, भविष्य का क्या भरोसा, सुना है कई पतियों को घर में खाना बनाने का कार्य अधिक रुचिकर लगने लगा है।

15.2.12

लहरों से खेलना

सागर से साक्षात्कार उसकी लहरों के माध्यम से ही होता है। किनारे पर खड़े हो विस्तृत जलसिन्धु में लुप्त हो जाती आपकी दृष्टि, कुछ कुछ कल्पनालोक में विचरने जैसा भाव उत्पन्न करती है, पर इस प्रक्रिया में आप सागर में खो जाते है। पानी की लहराती कृशकाय सिहरन आपके पैरों को नम कर जाती है, पर इस प्रक्रिया में सागर पृथ्वी में खो जाता है। एक स्थान, जहाँ सागर का साक्षात्कार विधिवत और बराबरी से होता है, वह है जहाँ लहरें बनना प्रारम्भ होती हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से लहरों का बनना समझाया जा सकता है। पृथ्वी के गतिमय रहने से सागर में कुछ तरंगें उत्पन्न होती है, तरंगें सदा किनारे की ओर भागती हैं, पृथ्वी से प्राप्त ऊर्जा को पुनः किनारे पटक आने के लिये। किनारे आने पर गहरी जलराशि को जब तल में चलने की जगह नहीं मिलती है, वह ऊपर आने के लिये होड़ मचाती है, एक के ऊपर एक, ऊपर वाली आगे, नीचे वाली पीछे। धीरे धीरे ऊँचाई बढ़ती जाती है, गति बढ़ती जाती है। जब और किनारा आता है, गति स्थिर नहीं रह पाती है, लहरें टूटने लगती हैं, पीछे से आने वाली जलराशि उस ऊँचाई से जलप्रपात की तरह गिरने लगती है, दृश्य गतिमय हो जाता है, लहरों से फेन निकलने लगता है, थपेड़ों की ध्वनि मुखर होने लगती है, लगता है मानो लहरें साँप जैसी फन फैलाये, फुँफकारती चली आ रही हैं।

सम्मोहनकारी दृश्य बन जाता है, लोग मुग्ध खड़े हो निहारते रहते हैं, घंटों। मुझे भी यह देखना भाता है, घंटों, बिना थके, लगातार। मेरी दार्शनिकता मुझसे बतियाने लगती है, दिखने लगता है कि जब धीर, गम्भीर व्यक्ति को छिछले परिवेश में स्वयं को व्यक्त करने की विवशता होती होगी, उसका भी निष्कर्ष किनारे पर सर पटकती लहरों जैसा ही होता होगा। लहरों का बनना और टूटना ऊर्जा को सही स्थान न मिल पाने की देश की अवस्था को भी चित्रित कर जाता है। मेरे मन में, जूझने की जीवटता, उन लहरों से कुछ सीख लेना चाहती है। पूर्णिमा का चाँद जब प्रेमवश सागर को अपनी ओर अधिक खींचने लगता होगा, सागर की वियोगी छटपटाहट इन लहरों के माध्यम से ही स्वयं को व्यक्त कर पाती होगी।

सायं का समय है, सूरज अपनी लालिमा बिखरा रहा है, सागर किनारे, दोनों ओर बच्चे बैठे बतिया रहे हैं। समुद्र से जुड़ा सारा ज्ञान धीरे धीरे उलीच रहे हैं दोनों, पिता की स्नेहिल उपस्थिति में। दोनों को ही ज्ञात है कि यदि अगले प्रश्न में अधिक समय लिया तो पिताजी कल्पनालोक में सरक जायेंगे। अपने समय में कल्पना की अनाधिकार चेष्टा से सचेत बच्चे बहुधा मेरी कल्पनाशीलता से उकताने लगते हैं। उन्हें दूर बनती लहरों का बनना, बहना, टूटना और किनारे आकर वापस लौट जाना, यह देखना तो अच्छा लगता है पर उससे भी अच्छा लगता है, लहरों से खेलना। लहरों से खेलने का हठ सायं को पूरा नहीं किया जा सकता था, अगले दिन सुबह का समय निश्चित किया गया।

जल का आनन्द, संग संग, देवला और पृथु
बच्चों को लहरें बहुत पसन्द हैं, बेटा अब ठोड़ी तक आ गया है, तैरना आता है अतः गले तक की ऊँचाई में निर्भय हो पानी में बना रहता है। ऊँची लहर आती है तो साथ में उछल कर तैरने लगता है, पूरा आनन्द उठाता है, बस स्वयं से आगे नहीं जाने देता हूँ उसे। बिटिया माँ के साथ किनारे बैठे बैठे उकताने लगती है, भैया की तरह लहरों से खेलना चाहती है। दोनों ही साथ साथ सागर के अन्दर तक आ जाते हैं, बेटा बगल में, बिटिया गोद में। बिटिया छोटी है, लहरों की ऊँचाई उससे डेढ़ गुना अधिक है। सारी लहरें ऊँची नहीं आती हैं, वह गिनने लगती है, संभवतः हर पाँचवी लहर ऊँची होती है। धीरे धीरे उसका भी भय छूटता है, चार लहरों तक वह अपने पैरों पर खड़ी रहती हैं, बस हाथ पकड़े रहती है। हर पाँचवी लहर पर गोद में आकर चिपट जाती है। गोद में चढ़ पिता से भी ऊँची हो जाती है, लहर को अपने नीचे से जाते हुये देखती है तो खिलखिला कर हँस पड़ती है, बालसुलभ।

लहरों के साथ खेलते खेलते दो घंटे निकल जाते हैं, आँखों में थोड़ा खारा पानी जाने लगता है, धूप शरीर को तपाने लगती है, थकान होने लगती है, बच्चे वापस चले जाते हैं, मुझे कुछ और देर लहरों से खेलने का मन होता है। मैं हर पाँचवी लहर की प्रतीक्षा में रहता हूँ, लहर आती है, मैं स्वयं को छोड़ देता हूँ, थोड़ा तैरता हूँ, लहर चली जाती है, पुनः अपने पैर पर खड़ा हो जाता हूँ।

वापस अपने कमरे जा रहा हूँ, दार्शनिकता पुनः घिर आती है, आसपास की हलचल ध्यान भंग नहीं करती है। मन में विचार घुमड़ने लगते हैं, लहरों से खेलना बिल्कुल जीवन जीने जैसा ही है, हर पाँचवी लहर ऊँची आती है, थोड़ा प्रयास कर लीजिये, लहर चली जायेगी, पैर पुनः जमीन पर।

'आप फिर सोचने लगे, न' बिटिया टोक देती है, देखता हूँ, मुस्कराता हूँ, सर पर हाथ रख कर बस इतना ही कहता हूँ, 'शाम को फिर लहरों से खेलने चलेंगे'।

11.2.12

क्लाउड का धुंध

विकल्प की अधिकता भ्रम उत्पन्न करती है, भ्रम स्पष्ट दिशा ढाँक देता है, भ्रम सोचने पर विवश करता है, भ्रम निर्णय लेने को उकसाता है, भ्रम का धुंध छटने का अधैर्य एक अतिरिक्त भार की तरह साथ में लगा रहता है। कितना ही अच्छा होता कि विश्व एक मार्गी होता, एक विमीय, बढ़ते रहिये, कोई चौराहे नहीं, कोई विकल्प नहीं। पर क्या यह मानव मस्तिष्क को स्वीकार है, नहीं और जिस दिन यह स्वीकार होगा, उस दिन विकास का शब्द धरा से विदा ले लेगा। किसी कार्य को श्रेष्ठतर और उन्नत विधि से करने की ललक विकास का बीजरूप है। यह बीजरूप इस जगत में बहुतायत से फैला है। अतः जब तक विकास रहेगा, विकल्प रहेगा, भ्रम रहेगा, धुंध रहेगा। धुंध के पीछे का सूरज देखने की कला तो विकसित करनी होगी, धुंध छाटते रहना विकासीय मानव का नियत कर्म है।

ऐसा ही कुछ धुंध, इण्टरनेट में क्लाउड ने कर रखा है। क्लाउड का शाब्दिक अर्थ बादल है, प्रतीक पानी बरसाने का, संभवतः ध्येय भी वही है, सूचना के क्षेत्र में। यही भविष्य माना जा रहा है क्योंकि अपने उत्पाद बेचने के लिये और अपनी बेब साइटों पर आवागमन बनाये रखने के लिये क्लॉउड को विशेष उत्प्रेरक माना जा रहा है। पहले कितना अच्छा था कि एक हार्डडिस्क या पेन ड्राइव लिये हम लोग घूमते रहते थे, कभी कार्यालय के कम्प्यूटर से, कभी घर के कम्प्यूटर से, कभी मोबाइल से, कभी इण्टरनेट से, सूचनायें निकालते और भेजते रहते थे। एक कीड़ा काटा किसी को, कि काश यह सब अपने आप हो जाता, लीजिये प्रारम्भ हो गयी क्लाउड यात्रा।

इसके तीन अंग हैं, पहली वह सूचना जो आप इण्टरनेट पर संरक्षित रखना चाहते हैं, दूसरे वे यन्त्र जिन्हे आप उपयोग ला रहे हैं और तीसरे वह एप्पलीकेशन व माध्यम जो इस प्रक्रिया में सहायक बनते हैं। इन तीनों अंगों को दो कार्य निभाने होते हैं, पहला स्वतः सूचना संरक्षित करने का और दूसरा आपके यन्त्रों के बीच सूचनाओं की सततता बनाये रखने का। जो लोग यह मान कर चलते हैं कि इण्टरनेट की उपलब्धता अनवरत बनी रहेगी और उसके अनुसार इन सेवाओं का प्रारूप बनाते हैं, वे प्रारम्भ से ही उन स्थानों को इन सेवाओं से बाहर कर देते हैं जहाँ इंटरनेट अपने पाँव पसारने का प्रयास कर रहा है। इसके विस्तृत उपयोग के लिये यह आवश्यक है कि इन सेवाओं को, इंटरनेट की उपलब्धता और अनुपलब्धता, दोनों ही दशाओं में सुचारु चलने के लिये बनाया जाये।

तीन सिद्धान्त हैं जिनके आधार पर आप किसी भी क्लाउड सेवा की गुणवत्ता माप सकते हैं।

१. मोबाइल, लैपटॉप और इण्टरनेट पर एक ही प्रोग्राम हो। यह हो सकता है कि प्रोग्राम अपने पूर्णावतार में लैपटॉप पर हो, मोबाइल व इंटरनेट पर अर्धावतार में आ पाये, पर सूचनाओं के संपादन की सुविधा तीनों में होना आवश्यक है। इस प्रकार किसी भी माध्यम में कार्य करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। यदि प्रोग्राम केवल इंटरनेट पर ही होगा तो आप इंटरनेट के लुप्त होते ही अपंग हो जायेंगे।

२. ऑफलाइन संपादन बहुत आवश्यक है, इस प्रकार आप उस सेवा का उपयोग कभी भी कर सकते हैं। पिछले समन्वय के बाद हुये परिवर्तनों को एकत्र करने और उसे इंटरनेट के उपलब्ध होते ही क्लाउड पर भेज देने से समन्वय का एक नया बिन्दु बन जाता है। यही क्रम चलता रहता है, हर बार, जब भी ऑफलाइन संपादन होता है। हुये बदलाव को किस प्रकार कम से कम डाटा में परिवर्तित कर क्लाउड में भेजा जाता है, यह एक अत्यन्त तकनीकी विषय है।

३. एक बार क्लाउड में परिवर्तन हो जाता है, उसके बाद किस प्रकार वह सूचना अन्य यन्त्रों पर पहुँच कर संपादित होती है, इस पर क्लाउड सेवा की गुणवत्ता का स्पष्ट निर्धारण होता है। यदि आपको उस प्रोग्राम में जाकर सूचना को अद्यतन करने के लिये अपने हाथों समन्वय करना पड़े तो वह सेवा आदर्श नहीं है। प्रोग्राम खोलते ही समन्वय स्वतः होना चाहिये। यह भी हो सकता है कि किसी एक ही लेख पर आपने मोबाइल और लैपटॉप पर आपने अलग अलग ऑफलाइन संपादन किया, बाद में इंटरनेट आने पर उन दोनों संपादनों को किस प्रकार क्लाउड सेवा सुलझायेगी और सहेजेगी, यह क्लाउड सेवा की गुणवत्ता का उन्नत अंग है।

कई कम्पनियाँ क्लाउड सेवाओं में 'कई लोगों के द्वारा संपादन की सुविधा' को जोड़कर उसे और व्यापक बना रही हैं। इसमें एक फाइल पर एक समय में कई लोग कार्य कर सकते हैं। बड़े लेखकीय प्रकल्पों पर एक साथ कार्य कर रहे कई व्यक्तियों के लिये इससे उत्कृष्ट और स्पष्ट साधन नहीं हो सकता है।

आजकल मैं अपने लेखन में इस सेवा का भरपूर उपयोग कर रहा हूँ, यह पोस्ट आधी आईफोन पर, आधी मैकबुक पर, एक चौथाई ब्रॉडबैंड के समय, एक चौथाई जीपीआरएस के समय और आधी इंटरनेट की अनुपलब्धता के समय लिखी है। एक जगह किया संपादन स्वतः ही दूसरी जगह पहुँचता रहा और अन्ततः पोस्ट आप तक।

इस समय कई क्लाउड सेवायें सक्रिय हैं, जो भी चुनें उन्हें उपरोक्त सिद्धान्तों की कसौटी पर ही चुनें, आपका जीवन सरल हो जायेगा। यदि क्लाउड सेवा में इतनी सुविधायें नहीं है तो अच्छा है कि पेन ड्राइव से ही काम चलाया जाये।

8.2.12

ब्लॉगिंग - एक हिसाब

ज्ञानदत्तजी बंगलुरु में थे, पिछले दो दिन। जब आप यह पोस्ट पढ़ रहे होंगे, उनकी ट्रेन सुन्दर दृश्यों को अपने दोनों ओर बराबर से बाँटती हुयी पूरी गति से उत्तर दिशा में भाग रही होगी। उनकी प्रशासनिक यात्रा का स्थानीय सूत्र होने के कारण बहुत समय मिला उनके साथ, कार्यालय में, मालगोदाम में, गाड़ी में, कैरिज में और घर में। बैठकों की व्यस्तता के अतिरिक्त सारा समय उनके साथ बिताने का प्रयास किया। स्वार्थ मेरा था, ब्लॉगिंग यात्रा का प्रारम्भ उन्हीं ने कराया था, लगभग ढाई वर्ष बाद उस यात्रा का विश्लेषण आवश्यक हो चला था, सब चलचित्र की तरह आँखों के सामने से निकलता चला गया।

तब लेखन के नाम पर कुछ कवितायें ही थी हाथ में, कहते हैं कि समय गाढ़ा होता है तो ही कविता अधिक बहती है, वह भी कभी कभी, महीनों के अन्तराल में रुक रुककर। नियमित लेखन के नाम पर संभवतः कुछ भी नहीं था, विचार बिन्दु घनीभूत हो बरस जाते थे, प्रवाहमयी नदी बनना कहाँ आता था उन्हें? ब्लॉगलेखन न होता तो कितना ही अनुभव अनछुआ रह जाता जीवन में।

यात्रा के कई महत्वपूर्ण पड़ाव चर्चा का विषय बन सकते हैं, विस्तृत अध्याय लिखे जा सकते हैं, पर उन सबसे हट कर बस उन अन्तरों को स्पष्ट करना चाहूँगा जो यात्रा के प्रारम्भ और वर्तमान को विभाजित करने के लिये पर्याप्त हैं। ६ अन्तर ही मुख्य हैं।

पहला है दृष्टिकोण। हर वस्तु, कर्म, घटना और विचार को अभिव्यक्ति के माध्यम से जोड़ने का अभ्यास, उनको भिन्न तरीके से देखने का भी आधार बनने लगा। विचारों की गहनता बढ़ी, हर परिस्थिति में छोटा ही सही पर कुछ न कुछ विचारणीय दिखने लगा। पहले कई दृश्य जो अधिक रोक नहीं पाते थे, बस स्वतः रुक रुक हृदय में संस्थापित होने लगे, विचार श्रंखलायें बनने लगीं, स्थिरदृश्यता आ गयी जीवन में, संवेदनाओं ने आधिपत्य जमा लिया उच्छृंखलता पर। अनुभव गाढ़े होने लगे।

दूसरा है सामाजिकता। विचारों के विनिमय का बाजार बहुत बड़ा है। बिना यहाँ आये पता ही नहीं चलता कि कैसे कैसे रत्न गढ़ रखे हैं ईश्वर ने। पढ़े लिखे लोगों की दुनिया में ढेरों दोष हो सकते हैं पर फिर भी वह जाहिलों के स्वर्ग से कहीं अधिक रोचक होती है। यहाँ न जाने कितने ऐसे लोग हैं जिनका आपके जीवन में होना एक ईश्वरीय उपहार है। प्रारम्भिक आकर्षण अपने स्थान पर बने रहेंगे पर बुद्धि आधारित सामाजिकता के क्षेत्र ईश्वर की श्रेष्ठतम रचना का श्रेष्ठतम पक्ष है।

तीसरा है अपार ज्ञान। ब्लॉग का सशक्ततम पक्ष संभवतः यही है। जब अभिव्यक्ति को पाठक के अनुरूप बना कर प्रस्तुत करने की बात हो तो ब्लॉग का कोई जोड़ नहीं। कठिन से कठिनतम विषय भी यहाँ मीठे रस की चासनी जैसे सरस बना कर उतारे जाते हैं। हर क्षेत्र के बारे में, तकनीक, संगीत, पुरातत्व, फिल्म, कोई भी विषय उठा लें, आपकी ही समझ की भाषा में उपलब्ध मिल जायेगा ज्ञान, सुपाच्य भाषा में परोस दिया गया ज्ञान। पहले केवल बड़े लेखकों की पुस्तकें पढ़ पाता था, कितने ऐसे लोगों को नहीं पढ़ पाता था जो उतने ही योग्य थे पर किसी कारण पुस्तक न लिख पाये। पढना बहुत अच्छा लगता है, स्वयं को हरकारा बना पाता हूँ, बड़े लेखकों और ब्लॉगरों के बीच, बड़ा ही साम्य दिखता है उनकी समझ के बीच। उस समझ का पुल बनने और बनाने का प्रयास करता हूँ, अपने लेखन से।

चौथा है किसी से कह देने का भाव। भले ही मन की व्यग्रता से उपजा लेखन ब्लॉग पर पूरा न आ पाये पर उस समय लिख लेने से यह लगता है कि मन किसी से कह दिया,बड़ा हल्का हो जाता है मन इस प्रकार। तनाव उतारने का इससे सहज माध्यम और क्या हो सकता है भला? विकार उपचार चाहते हैं, विचार भी लखेदते हैं, आकार चाहते हैं, एक बार अभिव्यक्ति से तृप्त हो जाने के बाद चुपचाप शान्त बैठ जाते हैं। आपका सखा बन जाता है लेखन, जिस पीड़ा से उत्पन्न होता है उसी की दवा बन जाता है लेखन।

पाँचवा है समय का सदुपयोग। टीवी आधारित मनोरंजन से छुटकारा नहीं मिल पाता यदि लेखन में मन नहीं लगता। विचार जैसे जैसे गहराते हैं, मनोरंजन का स्तर भी गहरा हो जाता है, छिछले पोखर और समुद्र के बीच का अन्तर स्पष्ट होने लगता है। टीवी देखने से कई गुना अच्छा लगता है कुछ लिखना और कुछ पढ़ना, विशेषकर ब्लॉग पर।

छठा है जीवन की गतिशीलता। जीवन में एकरूपता थका देती है, सुबह से सायं तक एक ही कार्य कीजिये तो ऊबन होने लगती है स्वयं से, संभवतः अभिरुचियाँ इसीलिये आवश्यक भी हैं जीवन में। रेलवे और साहित्य के बीच आते जाते रहने से गतिशीलता बनी रहती है। एक से ऊबे तो दूसरे में गये, विचारों में नयापन बनाये रखने में यह गतिशीलता अत्यन्त आवश्यक है, उतार चढ़ाव हो पर यह गतिशीलता जीवन में बनी रहे।

यदि उपरोक्त परिवर्तन को एक शब्द में व्यक्त करना हो तो ब्लॉगिंग एक नशा है, चढ़ने लगता है तो कुछ और नहीं सूझता, रमे रहना चाहता है, जहाँ है। नशे का हिसाब पूछना मयखानों में मना है। चढ़ा लो, हिसाब मिल जायेगा।

4.2.12

पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा

एप्पल ने शिक्षा के क्षेत्र में पहल करते हुये आईबुक ऑथर के नाम से एक सुविधा प्रारम्भ की है। इस एप्लीकेशन के माध्यम से आप कोई पुस्तक बड़ी आसानी से लिख सकते हैं और आईट्यून के माध्यम से ईबुक के रूप में बेचकर धन भी कमा सकते हैं। उपन्यास, कविता इत्यादि के अतिरिक्त गणित, विज्ञान जैसे विषयों पर पाठ्य पुस्तक लिखने के लिये कई प्रारूप दिये गये हैं इस सुविधा में। किसी भी अध्याय में लेखन और चित्रों के अतिरिक्त वीडियो, त्रिविमीय दृश्य, पॉवर प्वाइण्ट प्रस्तुति, एक्सेलशीट गणनायें आदि के होने से पढ़ने का अनुभव अलग ही होने वाला है। पुस्तक आप मैकबुक में लिख सकते हैं पर समुचित पढ़ने के लिये आईपैड का विकल्प ही रहेगा। इस माध्यम से एप्पल का प्रयास आईपैड को शिक्षा के आवश्यक अंग के रूप में स्थापित करने का रहेगा।

मेरे अग्रज नीरजजी ने अपने पुत्र को हाईस्कूल के समय नियमित पढ़ाया है और वह प्रचलित कई पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता से संतुष्ट नहीं हैं, उनका कहना है कि पाठ्यपुस्तकों को और अधिक प्रभावी ढंग से लिखा जा सकता है और रोचक बनाया जा सकता है। आईबुक ऑथर के रूप में नीरजजी को रोचक ढंग से पुस्तक लिखने के लिये एक उपहार मिल गया है। यदि वह कोई पुस्तक इसपर लिखेंगे तो वह कैसी लगेगी? इसी उत्सुकता में एक अध्याय लिखकर देखा, वह आईपैड पर कैसा लगेगा यह देखने के लिये एप्पल के स्टोर इमैजिन में गया। खड़ा हुआ आईपैड में वह अध्याय देख रहा था, बगल में एक १४-१५ साल की लड़की अपने माता पिता के साथ आईपैड देख रही थी, उनके बीच की बातचीत, न चाहते हुये भी सुनायी पड़ रही थी।

लड़की किसी तरह यह सिद्ध करने में प्रयासरत थी कि वह आईपैड एक खिलौने के रूप में नहीं लेना चाहती, वरन उसका उपयोग अपनी पढ़ाई में कर अच्छा भविष्य बना सकती है। मैं थोड़ा प्रभावित हुआ, मुझे भारत का भविष्य आशावान लगने लगा। मुझे भारतीय मेधा पर कभी संशय नहीं रहा है, पर अपनी बात खुलकर कह पाने का गुण भारतीय बच्चों में न पाकर निराशा अवश्य होती है, कुछ संकोच के कारण नहीं बोलते हैं, कुछ मर्यादा के लबादे में दबे रहते हैं। वह लड़की जब बोल रही थी, जिज्ञासावश मैं अपना कार्य छोड़ तन्मयता से बस सुने जा रहा था। भारत अपने महत भविष्य में दौड़ लगाने जा रहा था, तभी पिता का एक आश्वासन सुनकर ठिठक गया। पिता बोले, बेटी परीक्षा में पहले तीन में आओ, आईपैड मिल जायेगा।

कुछ जाना पहचाना सा लगता है यह आश्वासन, सबके साथ हुआ होगा जीवन में, बस इस वाक्य में तीन के स्थान पर कोई और संख्या व आईपैड के स्थान पर कोई और वस्तु बदल जाती होगी। आपके साथ बचपन में हुआ होगा और संभव है कि आप अपने बच्चों को यही सूत्र पिला रहे हों, पतिगण अपनी पत्नियों से कुछ ऐसा ही मीठा संवाद बोलते होंगे, पत्नियाँ भी ऐसे गुड़भरे संवादों को सूद समेत चुकाती होंगी, ध्यान से देखें तो हर जगह यही सिद्धान्त पल्लवित हो रहा है। बड़ी गहरी पैठ बना चुका है यह अन्तर्पाश, हर परिवार में।

बचपन से अब तक की दो ही घटनायें याद आती हैं, इस प्रकार के अन्तर्पाश की, क्रिकेट बैट पाने के लिये गणित की किसी परीक्षा में पूरे अंक लाने का लक्ष्य और घड़ी पाने के लिये हाईस्कूल में ससम्मान उत्तीर्ण होने का लक्ष्य। दोनों ही लक्ष्य प्राप्त हुये थे और पिताजी ने दोनों ही वचन पूरे किये, पर उसके बाद से मैं अपने कर्म करता रहा, पिताजी स्वतः ही कुछ न कुछ फल देते रहे, किसी फल विशेष के लिये किसी कर्म विशेष को विवश नहीं किया गया, कोई अन्तर्पाश नहीं रहा।

कर्मफल का सिद्धान्त है, कर्म करने से फल मिलता है, पर जगतीय कर्मफल के सिद्धान्त से थोड़ा अलग है पारिवारिक कर्मफल का सिद्धान्त। जगतीय कर्मफल में सफलता और सफलता की प्रसन्नता अपने आप में फल होता है। पारिवारिक कर्मफल में किसी कार्य की सफलता ही कर्म है, फल पूर्णतया असम्बद्ध होता है। आशाओं और आकांक्षाओं का आदान प्रदान होता है पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में।

खैर, लड़की के पास दो माह का समय है, प्रथम तीन में आकर आईपैड पाने के लिये। भगवान करे, उसका दृढ़निश्चय उसे सफलता दिलाये। इसी बीच मैं नीरजजी को भी बोलता हूँ कि एक स्तरीय पुस्तक लिखना प्रारम्भ कर दें, आने वाली पीढियाँ ढर्रे वाली पुस्तकों के अतिरिक्त अच्छे लेखकों की पुस्तकें पढ़ने को तैयार बैठी हैं। टिम कुक जी का ईमेल लेकर उन्हे भी सूचना देता हूँ कि आप जो शिक्षा को भी संगीत, फोन और लैपटॉप की तरह एक नया स्वरूप दे रहे हैं, उसमें सप्रयास लगे रहिये। भारत में बच्चों की मेधा प्रखर है और उसे स्तरीय पोषण की आवश्यकता है, घिसे घिसाये तरीकों से कहीं अलग। भारत में हर बच्चे के पास होगा आईपैड, क्योंकि अपनी मेधा के बल पर भारत ही प्रथम तीन में सदा बना रहेगा।

1.2.12

गर्दन की मोच

यह तो निश्चित और सिद्ध था कि गर्दन की मोच नहाते समय ही आयी थी, क्योंकि पहले के गतिशील और बाद के गतिहीन जीवन के बीच वही एक स्पष्ट बिन्दु था। यह तो अच्छा हुआ कि मोच घर में ही आयी, नहीं तो क्या पता शारीरिक पीड़ा के साथ साथ ही मानसिक पीड़ा भी झेल रहे होते, अनावश्यक इधर उधर देखने के आक्षेप की। कारण वह शीघ्रता थी जिसकी आवश्यकता ही नहीं थी, निष्कर्ष वह जो पिछले ७ दिन झेला। एक समय में एक कार्य न करने का दण्ड अब ईश्वर कैसे दे या कैसे बताये कि बेटा जो भी कार्य करो मन लगा कर करो। आधे घंटे में प्रारम्भ होने वाले निरीक्षण के बारे में चार विचार मन में, समय कम, स्नान करने के लिये हाथ बाल्टी में, ललक यह देखने की, कि तौलिया रखा है कि नहीं। गर्दन बेचारी घूमती है, कोमल है, इतनी घनघोरता सह नहीं पाती है, दर्द की एक हूक सी उठती है, तुरन्त समझ में आ जाता है कि बेटा गये काम से।

राणा सांगा के संस्कार सीख में थे, पैर और हाथ चल रहे थे, गर्दन में एक दर्दनिवारक स्प्रे किया 'वोलिनी'। पूरे निरीक्षण के समय सर और कन्धे एक साथ ही घूमते थे, धीरे धीरे, सामने वाले को भी लगता था कि ध्यान पूरा दिया जा रहा है। येन केन प्रकारेण निरीक्षण समाप्त हुआ तो घर के कुछ आवश्यक कार्य निकल आये। मुख्यालय में होने वाली एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बैठक की सूचना सायं मिली। आने जाने में दो रातों की ट्रेन यात्रा और मुख्यालय में दिन भर की व्यस्तता, जब वापस बंगलुरु आया, गर्दन की पीड़ा विकराल रूप ले चुकी थी, जरा भी हिलने से सारा शरीर पीड़ा से थरथरा जाता था।

कभी सोचा नहीं था कि एक छोटी सी मोच इतना बड़ा प्रभाव डालेगी। पहले भी मोच आयीं हैं, एक या दो दिन रह कर चली गयीं, पर यह मोच कुछ विशेष थी, मानो बहुत कुछ सिखाने आयी हो। यह पूरा दैनिक क्रम बिगाड़ कर रख सकती है, इसका अनुभव पहली बार हुआ जीवन में। रात की नींद टूटी रहने लगी, करवट बदलते ही दर्द की हूक सी उठती, सहसा याद आता कि इस पीड़ा ने करवट बदलने का अधिकार भी छीन लिया है, सहज होने में समय लगता, अगली करवट तक नींद बनी रहती। करवटें बड़ी पुरानी हैं, वे तो बनी रहेंगी, गर्दन की पीड़ा के लिये वे अपना स्थान छोड़ने वाली नहीं, पुराना नये को नहीं आने देता है, दोनों ही नहीं माने, करवटें भी रहीं, मोच भी रही, रात भी हमारी आहों से जीवन्त रही।

रात की थकान आगत दिवस को भी आहत किये रहती है, दिन में चैतन्यता बिना बताये ही कभी भी सरक लेती, सामने वाले को लगता कि साहब की ऊर्जा या तो बहुत कम है या मूड उतरा हुआ है, उत्साह की बातें या अत्यन्त आवश्यक कार्य पीछे रह जाते हैं। साथ रहने वाले पर्यवेक्षक को भी ज्ञात है कि जब साहब की ऊर्जा का स्तर कम हो तब उनका आगन्तुकों और अधीनस्थ कर्मचारियों से भेंट कराना ठीक नहीं, निर्णय उतने प्रभावी नहीं रहते हैं जैसे समान्यतया होते हैं। एकाकीपन पीड़ा को और गहरा देता है। दर्दनिवारक दवाई न खाने का हठ मेरा ही था, अपने शरीर और अपने बीच कोई अल्पकालीन झूलता तन्तु नहीं चाहता था मैं।

दो दिन बाद ही सही, अन्ततः पर्यवेक्षक ने मुझे गर्दन की सिकाई करने के लिये मना लिया, ५ दिन, नित्य आधा घंटे के लिये, रेलवे अस्पताल में। फिजियोथेरेपिस्ट श्री जॉयस योग्य थे, दो विधियाँ चुनी गयीं उनके द्वारा, इंटरफेरेन्स थेरेपी और इलेक्ट्रानिक डाइथर्मी, दोनों ही पीड़ा का क्षेत्र और प्रभाव सीमित करने के लिये। सिकाई के समय अपने आईफोन पर यह पोस्ट लिखता रहा साथ ही साथ बीच बीच में श्री जॉयस से बातचीत भी होती रही, उन्होने तकिया लगाने और पेट के बल लेटकर टाइप करने को तात्कालिक प्रभाव से मना कर दिया। जब उन्हें पता लगा कि हमारा अधिक समय कम्प्यूटर पर बीतता है तो समुचित बैठने और हर आधे घंटे में एक बार उठकर टहलने की सलाह भी हम पर थोप दी गयी। नयी जीवनशैली की गहरी समझ थी श्री जॉयस को, उनके साथ बातचीत करना अत्यन्त लाभकारी और रोचक अनुभव रहा मेरे लिये।

आज धीरे धीरे पीड़ा घट रही है और जीवन सामान्य हो रहा है, पर यह ७ दिन का समय कई अपरिवर्तनीय परिवर्तन लेकर आया। पहला तो इसके कारण सीधे रहकर चलना सीख लिया, बिना किसी विकर्षण के, पूर्ण एकाग्रमना हो। दूसरा बलात ही सही पर सुबह शीघ्र उठना होने लगा क्योंकि लेटने में होनी वाली पीड़ा से अच्छा था कुछ सार्थक कर लेना। तीसरा लाभ जीवनशैली के सम्बन्ध में श्री जॉयस की सलाह का अनुपालन, लम्बे समय ब्लॉगिंग करने वालों के लिये रामबाण। दो और परिवर्तन जो तत्काल तजना चाहूँगा, कुछ न खेलने से बढ़े वजन को और सुबह ठंड से बचने के लिये स्वेटर पहना कर बबुआ बना दिये गये स्वरूप को।

अब कहीं जाकर अंग्रेजी के इस प्रचलित मुहावरे(Pain in the neck) का व्यवहारिक अर्थ समझ में आया और साथ ही समझ आया अर्थ हिन्दी के एक गीत का, करवटें बदलते रहे सारी रात हम...आपकी कसम....