19.1.15

एक बचपन माँगता हूँ

अब समय की राह में,
अस्तित्व अपना जानता हूँ ।
यदि कहीं, कुछ भा रहा है,
एक बचपन माँगता हूँ ।

कहाँ से लाऊँ सहजता,
हर तरफ तो आवरण है ।
आत्म का आचार जग में,
बुद्धि का ही अनुकरण है ।
क्यों नहीं प्रस्फुट हृदय है,
कृत्रिम कविता बाँचता हूँ ।
एक बचपन माँगता हूँ ।।

खो गया हूँ, मैं अकेला,
स्वयं के निर्मित भवन में ।
अनुभवों की वृहद नद में,
आचरण के जटिल वन में,
क्यों सफलता के घड़ों से,
जीवनी मैं नापता हूँ ।
एक बचपन माँगता हूँ ।। २।।

11.1.15

कुछ पल अपने

दिन तो बीता आपाधापी,
यथारूप हर चिंता व्यापी,
कार्य कुपोषित, व्यस्त अवस्था,
अधिकारों से त्रस्त व्यवस्था,
होड़, दौड़ का ओढ़ चढ़ाये,
अवसादों का कोढ़ छिपाये,
कौन मौन अन्तर्मन साधे,
मन के तथ्यों से घबराते,
लगे सभी जब जीवन जपने,
कुछ पल अपने।१।

हमने तो सोचा था जीवन,
होगा अपना करने का मन,
कहाँ पता था, हर पग पग में,
लौहबन्ध और आतुर दृग में,
अँसुअन का अंबार दृष्टिगत,
अनुमोदित अधिकार हस्तगत,
नींव आपके शतकर्मों की,
स्वेद-सुपोषित सत मर्मों की,
जब उत्साह लगा हो छकने,
कुछ पल अपने।२।

जहाँ विकल्पों की सुविधा हो,
जहाँ श्रेष्ठ में नित दुविधा हो,
कौन बताये, क्या अपनायें,
किन मूल्यों पर मार्ग बितायें,
सबके अपने अपने अनुभव,
आशंकित, यदि पंथ चुने नव,
जीवन का वैशिष्ट्य बचाये,
निर्णय को आधार बनाये,
एक संसार लगा है सजने,
कुछ पल अपने।३।

स्थापित पंथों से घर्षण,
छितरे जग जगमग आकर्षण,
स्थितियों के मेरुदण्ड शत,
विश्वासों को उलझाते मत,
ज्ञात प्रात का अन्त भाप सा,
आशान्वित उत्सव विलाप सा,
आदि, अंत का द्वन्द्वयुद्ध जग,
शंका बरसे, संशोधित नभ,
लगता शोधित पंथ बिलखने,
कुछ पल अपने।४।

हर कपाल, एक विश्व रचित सा,
सम प्रायिकता गुण संचित पा,
सहजीवन निष्कर्ष अनन्ता,
हन्त्य चीखते, गुपचुप हन्ता,
अद्भुत खेला, अद्भुत मेला,
भीड़ भरे तत्वों का रेला,
आत्मा की पहचान बचाये,
भय, संभवतः खो न जाये,
मनवेगों को पुनि पुनि मथने,
कुछ पल अपने।५।

हमने तो शाश्वत जाना है,
पल, दिन, जीवन एक माना है,
एक अस्त, दूजा उद्भवमय,
मध्य अवस्थित लुप्त, मृत्यु भय,
कौन ठौर साधे मध्यम का,
जागृत विश्व रहा प्रियतम सा,
मध्य जगी ऊर्जा आगत की,
प्रचुर व्यवस्था है स्वागत की,
अब निद्रा हो, अब हों सपने,
कुछ पल अपने।६।

4.1.15

दृश्य-गंगा

रेतगंगा, श्वेतगंगा,
वेगहत, अवशेष गंगा।

रिक्त गंगा, तिक्त गंगा,
उपेक्षायण, क्षिप्त गंगा।

भिन्न गंगा, छिन्न गंगा,
अनुत्साहित, खिन्न गंगा।

प्राण गंगा, त्राण गंगा,
थी कभी, निष्प्राण गंगा।

लुप्त गंगा, भुक्त गंगा,
प्रीतिबद्धा मुक्त गंगा।

महत गंगा, अहत गंगा,
शान्त सरके वृहत गंगा।

पूर्ण गंगा, घूर्ण गंगा,
कालचक्रे चूर्ण गंगा।

27.12.14

पृथु जीवन के प्रथम वर्ष पर

पृथु, जीवन के प्रथम वर्ष पर,
नहीं समझ में आता, क्या दूँ ?

नहीं रुके, घुटनों के राही,
घर के चारों कोनो में ही,
तुमने ढूँढ़ लिये जग अपने,
जिज्ञासा से पूर्ण हृदय में,
जाने कितनी ऊर्जा संचित,
कैसे रह जाऊँ फिर वंचित,
सुख-वर्षा, मैं भी कुछ पा लूँ,
नहीं समझ में आता, क्या दूँ ?

भोली मुसकी, मधुर, मनोहर,
या चीखों से, या फिर रोकर,
हठ पूरे, फिर माँ गोदी में,
बह स्वप्नों से पूर्ण नदी में,
डरते, हँसते, कभी भूख से,
होंठ दुग्ध पीने वश हिलते,
देख सहजता, हृदय बसा लूँ,
नहीं समझ में आता, क्या दूँ ?

कृत्य तुम्हारे, हर्ष परोसें,
नन्हे, कोमल, मृदुल करों से,
बरसायी कितनी ही खुशियाँ,
चंचलता में डूबी अँखियाँ,
देखूँ, सुख-सागर मिल जाये,
मीठी बोली जिधर बुलाये,
समय-चक्र उस ओर बढ़ा दूँ,
नहीं समझ में आता, क्या दूँ ?

(पृथु के एक वर्ष होने पर लिखी थी, १३ वर्ष बाद आज भी लगता है कि जैसे कल की बात हो)

24.12.14

याद आती हो

मेरे दिन-रात चाहें, बस तुम्हारी याद में रहना,
सुबह बन गुनगुनाती, रात बनकर गीत गाती हो ।।१।।

नहीं अब है सताती, जीवनी ही स्वप्न में डूबी,
कली सी कुनमुनाती, फूल जैसी मुस्कुराती हो ।।२।।

तुम्हारा पास रहना भी, तुम्हारी याद के जैसा,
कभी तो छेड़ जाती और कभी मन गुदगुदाती हो ।।३।।

जिसे मैं ढूढ़ने निकला, जलाये दीप आशा के,
हृदय के रास्ते में धूप सी तुम फैल जाती हो ।।४।।

अधूरा चाँद अम्बर में, कभी तो पूर्णता पाये,
उसी अनुभूति का विश्वास, अधरों से पिलाती हो ।।५।।

20.12.14

आँख-मिचौनी

फिर आँखों को यूँ फिरा लिया, क्यों आँख-मिचौनी करती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।

भाव पुरातन, शब्द नये हैं, कैसे मन की बात उजागर,
कठिन बहुत भावों की भाषा, शब्द अशक्त रहे जीवन भर ।
आँखों की भाषा मौन बहे, कितने आमन्त्रण कहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।१।।

लज्जा बनकर दीवार खड़ी, तुम सहज और उद्वेलित हम,
कुछ बोलो यदि, जग जानेगा, कैसे वाणी का आलम्बन ।
झपकी, सकुचाती आँखों से, पर प्रणय-प्रश्न बन बहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।२।।

हो सकता आँखें पूछें मैं, कब तक रह सकती एकाकी,
कब तक एकाकी ढोऊँगी, घनघोर व्यथायें जीवन की ।
आँखों से जी भर बात करो, एकान्त कहाँ तुम रहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।३।।

मन प्रेम बसा या मंथन हो, या फिर भटकाता चिंतन हो,
अब आँख मिचौनी छोड़ो भी, क्यों खींच रही हो जीवन को ।
जो छिपा हृदय में बतला दो, क्यों मन उत्कण्ठा सहती हो ।
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।४।।

निःशब्द भाव की कविता हो तू सूर्य रश्मि हो, सविता हो 
जीवन में ऊष्मा भरती हो, कलकल छलछल सी सरिता हो 
मेरे जीवन के शोणित पर शीतल समीर सी बहती हो 
क्यों गहरी अपनी आँखों में, कुछ बात छिपाये रहती हो ।।५।।

* सिद्धार्थ जी द्वारा समर्पित

17.12.14

कटु यथार्थ

अनुपस्थित अब तक जीवन से, थी अश्रुत्पादित यथार्थता,
दोषों का अम्बार दिखेगा, ऐसा मैने सोचा ना था ।

इस शतरंजी राजनीति में,
जाने क्यों पैदल ही मरते,
मानव, धन से सस्ते पड़ते ।
सब सच था, कुछ धोखा ना था ।
मानव इतना गिर सकता है, ऐसा मैने सोचा ना था ।।१।।

अब शासन में शक्ति उपासक,
अट्टाहस कर झूम रहे हैं ,
हो मदत्त गज घूम रहे हैं ।
पर दुख से मैं रोता ना था ।
क्रोधानल में ज्वलित हुआ जो, अश्रु-सिन्धु वह छोटा ना था ।।२।।

बर्बरता का जन्तु कभी,
मानव-संस्कृति में पला नहीं है,
सदियों से यह रीति रही है ।
यह भविष्य पर देखा ना था ।
अब आतंक-भुजाआें का बल, बढ़ता था, कम होता ना था ।।३।।

मानव का व्यक्तित्व-भवन,
कब से चरित्र पर टिका हुआ,
जो संस्कृति का आधार रहा ।
क्या खण्ड खण्ड हो जाना था ।
वह महारसातल को उन्मुख, क्या उस पथ पर ही जाना था ।।४।।

13.12.14

कुछ निमन्त्रण

आज कुछ बरसात की बूँदें बरसती और हवा भी,
बह रही उन्मुक्त होकर और कोयल कूजती हैं,
औ’ मदित सा धुन्ध छाना चाहता निर्बाध होकर,
सरसता के इस समय में कमल-कोपल फूटती हैं ।

अब हृदय के द्वार में बजाते शहनाइयाँ है,
जो समय की बाट जोहे, थक गये थे चूर होकर ।

आज कविता बिन बँधे,
गाम्भीर्य की यादें भुला कर,
मस्त लहरों की तरह यूँ,
बहकना ही चाहती है ।

कभी जीवन की सुबह,
जो कल्पना की गोद में थी,
आज पाकर प्यार का,
संसार जीना चाहती है ।

आज यादों की सुनहरी शाम में,
मैने संजोये कुछ निमन्त्रण ।।

10.12.14

आया कोई याद हृदय में

आया कोई याद हृदय में,
सुखदायी अनुनाद हृदय में ।
तनिक विहँस कर हौले हौले,
कह जाता संवाद हृदय में ।।१।।

कहाँ छिपा था, मन में आया,
सुखारूढ़ जो समय बिताया ।
स्मृति के छोटे हाथों भर,
लाया लघु-उन्माद हृदय में ।
आया कोई याद हृदय में ।।२।।

याद आ रहे हैं मधुरिम क्षण,
काल-ताल में डूबा जीवन ।
भूला बिसरा राग सुनाये,
सुर बन गाये आज हृदय में ।
आया कोई याद हृदय में ।।३।।

कौन और किस प्रायोजन से,
स्मृतियों के महासिन्धु से ।
चुपके से जाकर ले आया,
सुख का बीता ज्वार हृदय में ।
आया कोई याद हृदय में ।।४।।

किसकी करनी, नहीं ज्ञात है,
इस जीवन पर ऋण अपार है ।
यादों से जो दे जाता है,
आस भरा विश्वास हृदय में ।
आया कोई याद हृदय में ।।५।।

6.12.14

बिताये हुये पल

बिताये थे जो पल, कभी संग तेरे,
वो बनकर उमड़ते हैं, यादों के बादल ।
बड़ी सोहती है, वो छाहों की ठंडक,
रहूँ काश ऐसी, बहारों में हर पल ।। १।।

अभी तक सुनाई पड़े बोल तेरे,
तेरा खिलखिलाना औ’ किस्से सुनाना ।
सताता है, रह रह कर, याद आ रहा है,
वो बातें बनाते हुये मुस्कुराना ।। २।।

कभी देर तक ही, बिना कुछ कहे ही,
सुझाये, बताये, दिखाये थे रस्ते ।
कई और बातें, छिपाई थी मन में,
आँखों ही आँखों में, चुपके से हँस के ।। ३।।

मुझे आकर हौले से, थपका गयी थी,
तेरी प्रेम-पूरित, सलोनी सी बातें ।
तेरी सान्त्वना से ही, सब मिल गया था,
उहापोह में क्यों बितायीं थी रातें ।। ४।।

अभी मेरे कानों में तुम बोलती हो,
रहो गुनगुनाती, वही गीत अपने ।
मैं सुनता रहूँ, तुम सुनाती रहो यूँ,
उनींदी सी आँखों में सजने दो सपने ।। ५।।

3.12.14

क्या जो मैनें पा लिया

और कहने को बहुत कुछ, जो था मैने पा लिया,
किन्तु पहचानों की गहरी छाँह में छिपता गया ।।१।।

कभी उड़ता था हवा में, धरा पर जब आ गया,
पंख थकने के सभी आरोप मैं सहता गया ।।२।।

और कर्तव्यों के ढाँचे में, सहज जीवन फँसा कर,
कष्ट का अभिशाप बनकर अश्रु जब बहता गया ।।३।।

मुझे आरोपी बनाकर, स्वयं ही निर्णय दिये थे,
नहीं कुछ उत्तर दिये, बस सजायें सहता गया ।।४।।

है यह माना, जीवनी, कुछ ज्वलित है, कुछ पददलित है,
किन्तु कूड़े ढेर जिसको जो मिला, कहता गया ।।५।।

सत्य कहता हूँ, हृदय से क्षीण हूँ, यह समय भीषण,
इसलिये ही स्वयं-निर्मित यज्ञ में जलता गया ।।६।।

जानता हूँ, इस जगत में, प्रश्न तो अस्तित्व का है,
कापुरुष तो बह गये, निज पंथ मैं बढ़ता गया ।।७।। 

29.11.14

आँखों के अभिवादन

लाख चाहकर, बात हृदय की, कहने से हम रह जाते है 
तेरी आँखों के अभिवादन, बात हजारों कह जाते हैं ।।

बहुत चित्रकारों ने सोचा, सुन्दर तेरे चित्र बनाये ,
तेरी आँखों की चंचलता, रंगों से लाकर छिटकायें ।
किन्तु कहाँ, कब रंग मिले थे,
कहीं सभी भंडार छिपे थे,
आवश्यक वे रंग तुम्हारी आँखों में पाये जाते हैं ।
तेरी आँखों के अभिवादन, बात हजारों कह जाते हैं ।।

बहा चलूँ निश्चिन्त, अशंकित, नयनों की सौन्दर्य-धार में,
आकर्षण के द्यूत क्षेत्र में, निज जीवन को सहज हार मैं ।
आशायें टिकती हैं आकर,
आँखें तेरी खुली रहें पर,
सारे जो आधार, तुम्हारे बन्द नयन में छिप जाते हैं ।
तेरी आँखों के अभिवादन, बात हजारों कह जाते हैं ।।

26.11.14

मन अपना ही था

आस जगी थी, लगा लगन में,
उड़ता पंछी नील-गगन में,
ताल समय की, थापों पर जो, 
झूम रहा मन अपना ही था ।।१।।

उत्सुकता के फूल खिले थे,
दृश्य राह के अलबेले थे,
आशाओं से संचारित और 
आनन्दित मन अपना ही था ।।२।।

अनुभूतित थी भारहीनता,
वेग व्यवस्थित था जीवन का, 
शान्ति-झील की सुखद नाव पर 
आत्मरमा मन अपना ही था ।।३।।

मेरा तेरा भेद नहीं था,
विमल रूप था अन्तरतम का,
प्यार लुटाता, सकल जगत को, 
मुग्ध-मुदित मन अपना ही था ।।४।।

सदा सभी के साथ चला यह,
हाथों में ले हाथ चला यह,
भीड़ भरे बाजारों में पर, 
बिछड़ गया, मन अपना ही था ।।५।।

22.11.14

एक अपरिचित सन्नाटा

एक अपरिचित सन्नाटा सा पीछे पीछे भाग रहा,
दिन को दिन में जी लेता, पर रात अकेले होता हूँ ।

कृत्रिम मुस्कानों से, मन की पीड़ायें तो ढक लेता,
कहाँ छुपाऊँ नंगापन, जब अँधियारे में खोता हूँ ।

खारे अँसुअन का भारीपन आँखों में ले जाग रहा, 
एकटक तकता दिशाहीन, मैं जगते जगते सोता हूँ ।

स्वप्नों का तैयार महल जब अपनों के द्वारा खण्डित,
छोड़ नहीं सकता मैं उनको, टूटे सपने ढोता हूँ ।

किससे मन की पीड़ा कह दूँ, दावानल जो धधक रहा,
दिन भर लुटकर शेष रहा जो जीवन वही संजोता हूँ ।

सब कहते हैं, दुख से मन के भाव प्रौढ़ होने लगते,
पता नहीं फिर क्यों बच्चों सा सुबक सुबक कर रोता हूँ ।

19.11.14

तुझे अब उठना होगा

विरह प्रतीक्षा पीड़ा ही है,
आँखे भी अनवरत बही हैं,
मन में जिसका रूप बसाया,
देखो, वह निष्ठुर न आया।
 
जीवन, पर क्यों रूठ, कहीं अटका अटका सा,
वर्तमान को भूल, कहीं भटका भटका सा।

बहुत हुआ अतिप्रिय, अब तुमको उठना होगा,
छूट गया वह छोड़ पुनः अब जुटना होगा,
नहीं कोई अपना जीवन इतना भी भर ले,
वह अपना क्यों जो अपनों से जीवन हर ले? 

15.11.14

प्रियतम

खोजता दो नेत्र, जिनमें स्वयं को पहचान लूँ मैं,
आप आये, पंथ को विश्राम मिल गया है ।

प्रेम की दो बूँद चाही, किन्तु सागर में उतरता,
आपके सामीप्य का अनुदान मिल गया है ।

हृदय में प्रतिमा बनी थी, और मन से पूजता था,
कहूँ कैसे देवता अन्जान मिल गया है ।

12.11.14

प्रेम-प्लावन

प्रेम-प्लावित हो गया मन,
पा गया अभिराम चिन्तन ।
खोज में कब से तुम्हारी,
भटकता अविराम जीवन ।।

साधना का प्रात और वह ज्ञान की तपती दुपहरी,
निर्णयों की साँझ प्रेरित, संयमों के अडिग प्रहरी ।
आज रजनी मधुर स्वर में कर रही मधुमाय गुञ्जन ।
प्रेम-प्लावित हो गया मन ।। १।।

आज लक्षित निज जनों में, स्वार्थ परिभाषा बने,
कर्म का अवमूल्यन, जब व्यक्तिगत आशा बने ।
शुष्कता से दग्ध नयनों को मिला है प्रेम-अञ्जन ।
प्रेम-प्लावित हो गया मन ।। २।।

जब सुखों की पूर्णता पर काल की बेड़ी पड़ी है,
स्रोत सीमित, विवशता भी आज मुँह बाये खड़ी है ।
प्रेम का अम्बार लेकिन, बढ़ रहा निर्बाध हर क्षण ।
प्रेम-प्लावित हो गया मन ।। ३।।

8.11.14

जाने कितने ऋण बाकी हैं

मुश्किल है ढोना कृतघ्नता,
चुभते अब समझौते भी हैं ।
अर्पण जो तुझको करने हैं,
जाने कितने ऋण बाकी हैं ।।

रमकर तेरे उपकरणों में,
चिन्तन तेरा अनुपस्थित था ।
खोकर मैं अपनी दुनिया में,
स्वार्थ-अन्ध हो भूल गया था ।।
चित्रण तेरा कहाँ बनाता ?

मुझमें तो सामर्थ्य नहीं है,
भिक्षुक भी क्या दे सकता है ?
बूँदों का अस्तित्व कहाँ तक,
तृप्त सिन्धु को कर सकता है ।।
कौन क्षितिज को छू सकता है ?

जीवन तेरी बिन्दु-देन है,
अनुरागी तू, शाश्वत दाता ।
अनत कृपा बहती आती है,
बिन तेरे मैं कहाँ व्यक्त था ।।
खड़ा हुआ निरुपाय, विधाता ।

5.11.14

मन्दगति

कौन कहता है, ये जीवन दौड़ है,
कौन कहता है, समय की होड़ है,

हम तो रमते थे स्वयं में,
आँख मूँदे तन्द्र मन में,
आपका आना औ जाना,
याद करने के व्यसन में,

तनिक समझो और जानो,
नहीं यह कोई कार्य है,
काल के हाथों विवशता,
मन्दगति स्वीकार्य है। 

1.11.14

स्वप्न सुनहला

स्वप्न सुनहला देखा मैंने,
सुन्दर चेहरा देखा मैंने ।
मन में संचित चित्रण को,
बन सत्य पिघलते देखा मैंने ।।१।।

आनन्दित जागृत आँखों में,
सुन्दर तेरा रूप सलोना ।
मन की गहरी पर्तों में,
निर्द्वन्द उभरते देखा मैंने ।।२।।

शब्द कभी भी नहीं मिलेंगे,
उपमाओं में नहीं समाना ।
आज कल्पना को फिर से,
हो विकल विचरते देखा मैंने ।।३।।