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26.10.21

मित्र - ३५(वीसीआर)

शुक्रवार की देर रात की फिल्म का अध्याय असमय अवसान पा चुका था। यह भेद छात्रावास अधीक्षक तक कैसे पहुँचा उसका पता अभी तक नहीं चला। मन की ऊर्जा कार्यविशेष की राह नहीं तकती है, उसे तो जो भी दिशा मिल जाये, जो भी समक्ष राह दिख जाये, वह उसी में बढ़ी चलती है। हमारा पंथ भी इसी सिद्धान्त से प्रेरित था।

व्यक्तियों, वस्तुओं की तरह ही विचारों का अपना कालखण्ड होता है जिसमें वे उत्पन्न होते हैं, बढ़ते हैं, विकसित होते हैं और अन्ततः अवसान पा जाते हैं। तब उनका स्थान कोई अन्य विचार ले लेता है। अपने प्राधान्य का उछाह और साम्राज्य विचारों ने बहुत देखा है। जिस समय विचार अपने चरम पर होता है उसके चारों ओर संरचनाओं के ताने बाने इस प्रकार बुने जाते हैं मानो वह सदा ही रहने वाला है। जैसे ही वह अस्त होता है उस पर आधारित सारे स्वप्न अवसाद में डूब जाते हैं। हमारा युवा मन संभवतः इस शाश्वत तथ्य को समझता था। हमारी ऊर्जा का कालखण्ड हमारे अस्त हुये विचारों और प्रयोगों से कहीं बड़ा था।


तकनीक का क्षेत्र ऐसा है जिसमें परिवर्तन की गति अधिक है। एक विचार आता है, पल्लवित होता है और प्रयाण कर जाता है। इस शताब्दी में जन्में युवाओं को यदि बताया जाये कि हम लोग वीसीआर में फिल्में देखते थे तो उन्हें साथ में यह भी बताना पड़ेगा कि वीसीआर होता क्या था? यद्यपि आजकल गूगल महाराज पुराने ज्ञान को संजो कर रखे रहते हैं नहीं तो इसकी स्वतः कल्पना करना कठिन होता। इसी प्रकार टीवी आने के समय किसी ने कहाँ सोचा था कि वीसीआर जैसा कोई यन्त्र आयेगा और उसमें फिल्में देखी जा सकेंगी। जिन्होने वह कालखण्ड जिया है वही इसकी रोचकता को समझ सकते हैं और व्यक्त कर सकते हैं।


हमें भी याद है रात रात भर जग कर तीन फिल्में एक के बाद एक देखना। दृश्य, गीत, संवाद और कहानी इस प्रकार मस्तिष्क में गुत्थमगुत्था हो जाते थे कि एक फिल्म के प्रकरण में दूसरी फिल्म कब घुस जाती थी पता ही नहीं चलता था। स्पष्ट याद है उन तीन फिल्मों को चयनित करने में लगे समय, बुद्धि, ऊर्जा और वे विवाद भी जब कोई एक निर्णय नहीं हो पाता था। याद है थकान से पथरायी आँखों में संतुष्टि की रेखायें। साथ ही याद है बड़ी माचिस के आकार के डब्बों में बन्द जीवन्त और रोमांचक कहानियाँ।


हम छात्रावासियों की स्मृति में वीसीआर को लेकर एक और अध्याय जुड़ा था। शुक्रवार के प्रकरण के बाद कुछ ऐसा करना आवश्यक था जिस पर आगामी समय को और आगामी पीढ़ी को अपनी क्षमताओं पर क्षोभ न हो। इतिहास रचने का दायित्वबोध हमें नित नये काण्ड करने की प्रेरणा देता था। वीसीआर जैसे यन्त्र ने अतृप्त साहस को पुनर्जीवित कर दिया।


छात्रावास में वीसीआर मँगाने की योजना बनी। उद्योग करने वाले कुछ न कुछ सीखते रहते हैं, चाहे सफलता मिले या असफलता। वीसीआर लगाने वाले एक बड़े से घनाकार डब्बे में टीवी लाते थे और साथ में एक ब्रीफकेस जिसमें वीसीआर रहता था। बहुधा एक रिक्शे में सारा सामान आता था। रिक्शे को छात्रावास में पूरे उपकरणों के साथ लाना संदेह उत्पन्न कर सकता था। यह निश्चित किया गया कि केवल वीसीआर लाया जायेगा, टीवी स्थानीय ही लगेगा। बाहर के व्यक्ति का छात्रावास परिसर में टहलना भी योजना के लिये ठीक नहीं था अतः उसे लाने और लगाने की सारी व्यवस्थाओं को भी स्थानीय प्रकार से सम्पन्न करना पड़ा। छात्रावास के टीवी में उसे लगाना अनुपयुक्त था अतः छात्रावास सहायक के घर लगा कर देखना निश्चित हुआ।


यह बताना ठीक न रहेगा कि इस प्रकार कुल कितनी फिल्में देखी गयी। इससे व्यर्थ ही आकड़ा विचार से अधिक महत्व पा जाता है। जैसे हर विचार का कालखण्ड होता है, इसका भी पटाक्षेप एक फिल्म विशेष के साथ हो गया। अनुराग बताते हैं कि फिल्म थी देवानन्द की “जानी मेरा नाम” और उस समय गाना चल रहा था, “पल भर के लिये कोई हमें प्यार कर ले”। देवानन्द सारी खिड़कियों और कपाट में झाँक झाँक कर मुख दिखाते हैं और अभिनेत्री सारी खिड़कियाँ और कपाट एक एक कर बन्द करती है। उसी क्रम में सहसा हम देखते हैं कि फिल्म के बाहर उस कक्ष के कपाट में एक दाढ़ी वाले अभिनेता खड़े थे। उनके हाथ में एक सोंटा था। यद्यपि उसी गीत की पंक्तियाँ टीवी में गूँज रही थी पर लग रहा था कि आचार्यजी बोल रहे हों। पंक्तियाँ थी “हमने बहुत तुम्हें छिप छिप कर देखा”।


आगे का वर्णन स्वतः समझने योग्य है। इससे अधिक नाटकीयता से इस प्रकरण का अन्त नहीं हो सकता था। पर क्या करें, हर प्रयोग का एक कालखण्ड होता है, इसका भी था।


इस प्रकार बार बार पकड़ा जाना मन को बहुत खटक रहा था। जानेगें उनके कारकों को भी, अगले ब्लाग में।

23.10.21

मित्र - ३४(शुक्रवार की फिल्म)

यहाँ पर एक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है कि सभी छात्रावासी फिल्मों के प्रति इतने उत्साहित नहीं थे। कुछ उस समय का उपयोग अध्ययन में करते थे। कुछ जो देखने को मिल जाये, उसी को देखकर संतुष्ट हो जाते थे, अन्यथा प्रयास नहीं करते थे। कुछ संभावनाओं पर दृष्टि अवश्य रखते थे पर स्वयं कुछ भी साहसिक करने से बचते थे। यदि कोई व्यवस्था ऐसी स्थापित हो जाये जो कि कष्टप्रद न हो और उसमें पकड़े जाने की संभावना भी कम हो तो वे उसमें सम्मिलित हो जाते थे। पूरे छात्रावास में लगभग दस ही ऐसे अग्रणी महारथी थे जो परिधि का विस्तार बढ़ाने के सतत प्रयत्न में लगे रहते थे। संतुष्टि शब्द उनके लिये नहीं था, सीमायें उनके लिये नहीं थी, उनकी आँखों में चमक तब आती थी जब उत्पात का कोई विचार योजना की परिपक्वता के निकट होता था।

ऐसे लोग अप्राप्य को ध्येय बनाये रहते हैं और व्यस्त रहते हैं। टीवी के सारे कार्यक्रमों में बस एक ही अप्राप्य रह गया था, शुक्रवार देर रात की फिल्म। उसको देखने की बात तो दूर, उसकी चर्चा भी चारित्रिक अपयश ला सकती थी। रात ११ बजे प्रारम्भ होने वाली यह फिल्म शयनकाल में पड़ती थी, वयस्कों के लिये थी और किसी प्रकार से उचित नहीं ठहरायी जा सकती थी। फिर भी कुछ साहसी उसे देखने के लिये प्रयत्नशील रहते थे।


रात्रि के कार्यक्रमों में सबसे बड़ी बाधा यह थी कि वे किसी के घर जाकर नहीं देखे जो सकते थे। यह न केवल उनका व्यक्तिगत समय होता है वरन सबके सोने का समय होता है। मुझे स्पष्ट याद है कि जब १९८६ में फुटबाल का वर्ल्डकप आ रहा था तो मैच मध्य रात्रि को आते थे। फुटबाल के प्रति न केवल मुझे प्रेम था वरन पिताजी का भी उत्साह देखते बनता था। हम लोग पशोपेश में थे कि क्या किया जाये? निर्णय यही हुआ कि टीवी लिया जाये। इस प्रकार हमारे घर में प्रथम टीवी आया।


शुक्रवार देर रात्रि के फिल्म के लिये छात्रावास के टीवी पर ही आश्रय था, शेष अन्य टीवी अचिन्त्य थे। एक बार अनुमति के लिये प्रार्थनापत्र लिखा गया। उत्सुकजन सार्वजनिक रूप से जो निर्लज्ज किये गये कि उसके बाद से वैधानिक उपायों से फिल्म देखने का विचार आना भी बन्द हो गया। अब जो भी करना था, गुप्त रूप से करना था।


टीवी कक्ष प्रारम्भिक वर्षों में भोजनालय के साथ वाले कक्ष में था, जो कि आधार तल में था। छात्रावास प्रथम तल में था। जब छात्रावास में संख्या बढ़ी तो टीवी कक्ष भोजनालय में समा गया और टीवी कक्ष प्रथम तल में चला गया। छात्रावास के कुछ और कक्ष भी तब प्रथम तल में आ गये। उस समय छात्रावास के कक्षों के बीच ही टीवी कक्ष था। दोनों ही समय टीवी एक बड़े पल्ले की लकड़ी की अल्मारी में रहता था और उस पर एक ताला लगा रहता था। ताले की चाभी छात्रावास प्रमुख के पास थी। साथ में एक ताला कक्ष में भी लगा दिया जाता था।


प्रथम तल के टीवी कक्ष में दो चाभियों की व्यवस्था करनी होती थी, या तो छात्रावास प्रमुख से माँग कर या पार कर या उसकी प्रतिलिपि बनवा कर। इसमें दूसरा और तीसरा उपाय अधिक उपयोग में आया क्योंकि चाभी देने का पूरा उत्तरदायित्व छात्रावास प्रमुख पर ही आता। जब आधार तल में टीवी कक्ष था तब भोजनालय और टीवी कक्ष के बीच में एक किवाड़ था। भोजनालय में ही ताला बन्द होता था, टीवी कक्ष का कपाट अन्दर से बन्द किया जाता था। भोजन के बाद बर्तनों की सफाई के समय यदि किवाड़ के अन्दर की चिटकनी खोल दी जाती थी तो भोजनालय के ताले की चाभी की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।


एक बार जब अल्मारी का ताला बदला पाया गया तो कुण्डी के बोल्ट खोलकर फिल्म देखी गयी। उस समय दो सावधानियाँ रखी जाती थी। पहली सावधानी यह कि जो भी आता था वह अपने बिस्तर पर तकिया के ऊपर चादर चढ़ाकर आता था जिससे यह पता न लगे कि कोई अनुपस्थित है। दूसरी सावधानी में टीवी कक्ष का प्रकाश बन्द रखा जाता था और खिड़की पर चादर लगा कर टीवी से बाहर आ रहे प्रकाश को भी रोक दिया जाता था।


यह बताना कठिन है कि इस प्रकार कितनी बार हमें शुक्रवार की फिल्म देखने में सफलता मिली। सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि उस समय शेष सभी लोग विशेषकर छात्रावास अधीक्षक सो गये हों। हमारे महती प्रयासों की सुन्दर संरचना पर तुषारापात उस समय हुआ जब चादर की झीने प्रकाश के पीछे दीपकजी दिखायी पड़े। उसके बाद से न केवल शुक्रवार हाथ से गया वरन दण्डस्वरूप अन्य फिल्मों से भी हाथ धोना पड़ा।


फिर भी सब कुछ हाथ से नहीं गया था, जानेंगे अगले ब्लाग में।

21.10.21

मित्र - ३३(शनिवार की फिल्म)

छात्रावास परिसर में कुछ ४ टीवी थे। यद्यपि कुछ की पहुँच छात्रावास के बाहर उन घरों में थी जहाँ पर टीवी होते थे, पर ऐसी संख्या बहुत कम थी और उन प्रयासों में दुगुना दुस्साहस था। एक तो बाहर निकल कर जाना, तीन घंटे के लिये और दूरदर्शन पर आने वाली फिल्म देखकर आना। इसमें पकड़े जाने की संभावना बहुत अधिक थी। साथ ही इस बात का भी भय था कि उनका छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी से भी परिचय था। इस स्थिति में हमारे प्रयास और भेद कब तक गुप्त रखे जा सकेंगे, इस बात पर भी संशय था। यदि तीन घंटे को बाहर जाने का साहस करने का अवसर ही रहा है, तो टाकीज में जाकर नयी फिल्म देखने का आनन्द क्यों न लिया जाये। संभवतः इन्हीं कारणों से यह प्रवृत्ति छात्रावासियों के मानस में अत्यन्त विरल मात्रा में थी।

एक टीवी छात्रावास में, एक प्रमुख छात्रावास अधीक्षक के घर में, एक छात्रावास अधीक्षक के घर में और एक छात्रावास सहायक के घर में था। यद्यपि बाद में कई अन्य सहायकों के घर में भी टीवी आ गये थे। प्रमुख छात्रावास अधीक्षक गृहस्थ थे अतः उनका टीवी प्रयोग की परिधि से बाहर था। रुचियाँ मिलने के कारण छात्रावास अधीक्षक का टीवी मुख्यतः क्रिकेट के लिये प्रयोग में आता था। छात्रावास का टीवी बिना अनुमति के अपना मुखमंडल नहीं खोलता था। शेष एक टीवी जो सहायक के यहाँ था उसी पर सभी की आशायें टिकी रहती थी।


पता नहीं कैसे प्रारम्भ हुआ पर कुछ अति उत्साही छात्रावासी शनिवार या रविवार की अनुमति न मिलने वाली एक फिल्म को वहाँ देखने जाने लगे। सहायकों का घर छात्रावास अधीक्षकों और प्रधानाचार्य के घरों से विपरीत दिशा में था। वहाँ पहुँचने के लिये छात्रावास के बीच से होकर जाना होता था। वह स्थान स्नानागार के पास भी था। वहाँ पहुँचने के लिये अधिक प्रयत्न की आवश्यकता नहीं थी और साथ ही पकड़े जाने की संभावना भी कम थी। कोई छात्रावास अधीक्षक यदि उस क्षेत्र के आसपास होता था तो वह सूचना त्वरित गति से वहाँ पहुँच जाती थी और सभी छात्रावासी विसर्जित होकर निर्विकार रूप कोई अन्य कार्य करते हुये प्रतीत होते थे।


सहायक नवगृहस्थ थे और टीवी भी उनके यहाँ नया ही आया था, बच्चों को आया देखकर वात्सल्यवश मना नहीं कर पाये होंगे। वैसे भी वह समय ऐसा था कि टीवी देखने आये आगन्तुक को मना नहीं किया जाता था। घर के टीवी को औरों के समक्ष प्रस्तुत करना ऐश्वर्य और औदार्य, दोनों के ही लक्षणों में गिना जाता था। रामायण और महाभारत के आने के बाद आगन्तुकों को बैठाकर टीवी दिखाना एक धार्मिक और पुण्य का कार्य भी समझा जाता था। हरि की अनंत कथा को प्रसारित होने में सहायक होने के कारण भक्त जैसा अनुभव होता था। कई गृहस्थ उस समय बालिका भोज या प्रसाद वितरण कर पुण्य को कई गुना बढ़ा लेते थे।


समस्या यह थी कि वह सहायक प्रधानाचार्यजी के अत्यन्त निकट थे, उनके व्यक्तिगत सहायक के रूप में। इस बात का भय रहना स्वाभाविक ही था कि कहीं उनके माध्यम से बात प्रधानाचार्यजी तक न पहुँच जाये। केवल वात्सल्य भाव ही था या नियम तोड़ने में सहभागिता का दोष या टीवी बन्द हो जाने का भय या कोई अन्य कारण, उन सहायक ने कभी भी यह बात प्रधानाचार्यजी को नहीं बतायी। यह बात अलग थी कि छात्रावास अधीक्षक को यह बात पता लगी पर उसका दण्ड छात्रावासियों की उद्दण्डता को ही मिला, सहायकों को विवशता का लाभ देकर प्रताड़ित नहीं किया गया।


आगे सहायकों के प्रकरण में यह उल्लेख रहेगा कि किस प्रकार सहायकगण हम लोगों की वेदना के प्रति मन ही मन अधिक संवेदी थे। यद्यपि सत्ता के प्रति प्रत्यक्ष रूप से निष्ठावान रहना उनके कर्तव्यों का अभिन्न अंग था पर परोक्ष रूप से और व्यवहारिकता के धरातल पर हमसे उनकी संवेदनायें अनुनादित थीं। हम छात्रावासियों ने सदैव ही सहायकों को अपने अनुकूल ही पाया था और कई स्वप्नों को जीवटता से जीने में अत्यन्त उपयोगी भी। आज भी छात्रावासियों की प्रफुल्लित यादों में सहायकों का आना जाना निर्बाध होता है, एक आवश्यक अंग की तरह।


छात्रावास के टीवी पर चित्रहार, रविवार पूर्वाह्न के कार्यक्रम और एक फिल्म देखते थे। क्रिकेट मैच बहुधा छात्रावास अधीक्षक के घर में देखने को मिल जाता था। छूट गयी दो फिल्मों में एक फिल्म छात्रावास सहायक के घर में देखना हो जाता था। इस सबके बाद भी कुछ छात्रावासियों का मन नहीं भरता था, उन्हें लगता था कि कोई भी मनोरंजन बिना मन को रंजित किये निकल न जाये, व्यर्थ न हो जाये। उनके महास्वप्नों का उत्कर्ष बिन्दु उन प्रयत्नों में परिलक्षित था जो शुक्रवार रात्रि की फिल्म देखने के लिये किये गये।


सब जानेंगे अगले ब्लाग में।

19.10.21

मित्र - ३२ (फिल्म और विकल्प)

मन सदा ही कुछ नया चाहता है, स्वयं को अपने स्वरूप से भिन्न रंगना चाहता है। मन को रंगने का उपक्रम मनोरंजन कहलाता है। मनोरंजन मन को सुख देता है, सुख राग उत्पन्न करता है, राग आकर्षण का हेतु है। टीवी के कार्यक्रम आपके अन्दर के मनोरंजन की थाह मापने लगे। प्रचार माध्यम उस आकर्षण को भुनाने लगे, विज्ञापन आपकी निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से उन कार्यक्रमों के बीच उपस्थित हो जाते जिन पर आपका मन लगा होता है। विज्ञापन मनोरंजन को प्रायोजित करने लगे, मनोहरण करने के लिये। फिल्में, चित्रहार, कथाश्रृंखलायें आदि मनोरंजन के साथ साथ दूरदर्शन की आय का साधन बनने लगीं। सप्ताह में एक के स्थान पर तीन फिल्में और दो चित्रहार हो गये।

बाहर की फिल्म देखने के असफल प्रयासों के प्रकरणों में दबे और क्षुब्ध छात्रावासी हृदयों को दूरदर्शन का यह विस्तार बड़ा ही आनन्द और उत्साह देने वाला था। सहज आशा के प्रवाह में पर शंकाओं की बाधायें खड़ी थी। एक चित्रहार, एक फिल्म और रविवार पूर्वाह्न के कार्यक्रम लगभग स्थिर हो चुके थे। जहाँ शुक्रवार देर रात को आने वाली फिल्म अपनी अनुमानित और अतिरंजित विषयवस्तु के कारण निषिद्ध थी, शनिवार की फिल्म आशा किरण की बनी हुयी थी। जब छात्रावास अधीक्षक का स्पष्ट निर्णय सुना कि एक सप्ताह में एक ही फिल्म देखने की अनुमति मिलेगी तो दुख भी हुआ और संतोष भी। दुख इस बात का दूरदर्शन के द्वारा प्रदत्त आधा मनोरंजन बिना सुख दिये ही व्यर्थ चला जायेगा। संतोष इस बात का था कि कम से कम एक फिल्म तो देखने को मिलेगी। पहले इस बात की संभावना भी रहती थी कि रविवार को कहीं ऐसी फिल्म न आ जाये जिसके लिये अनुमति न मिले। अब लगता था कि दो में कम से कम एक तो अनुमति योग्य होगी ही।


दैवयोग से यह एक ऐसी परिस्थिति थी जिसमें दोनों ही पक्षों को लगता था कि उनकी जीत हुयी थी। एक ही फिल्म होने से उसकी अनुमति मिलने से हमारी विजय, न मिलने से हमारी हार होती थी। यहाँ तीन फिल्में थी, एक प्रतिबन्धित, एक की अनुमति और एक की अनुमति नहीं। इस प्रकार सबके भाग में कुछ न कुछ था। कभी कभी संसाधन बढ़ा देने से दोनों पक्षों को ही विजय की अनुभूति होने लगती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से दोनों पक्षों के हाथ में कुछ न कुछ रहने से निष्कर्ष आनन्दमयी और दीर्घकालिक रहते हैं। जब कभी भी किसी विषय पर प्रतिपक्ष से समझौता वार्ता होती है तो आदान प्रदान की स्थितियाँ बनती हैं। आधार सिमटा होने पर या एक ही निश्चित विषय पर कई बार वार्तायें टूट जाने का भय रहता है। जो वस्तु या माँग पानी है, उसके साथ कई और वस्तुओं या माँगों को जोड़ देने से यह संभावना बनी रहती है कि कम से कम मूल माँग तो पूरी हो ही जायेगी। दोनों पक्ष अपनी माँगों पर पीछे जाते हैं, दोनों को एक जीत का भाव रहता है और दोनों को ही संतोष रहता है। आधुनिक प्रबन्धन में वार्तातन्त्र का विकास और क्रियान्वयन एक विशिष्ट विषय है।


समस्या विकल्पों में होती है। विकल्प भ्रमित करते हैं। प्रकृति की जटिलता भी ऐसी है कि हर विकल्प कुछ गुण तो कुछ दोष लिये रहता है। संसाधन इतने नहीं रहते हैं कि सारे विकल्प प्राप्त किये जा सकें। हमारे लिये जब एक ही फिल्म देखने की अनुमति रहती थी तो प्रश्न इस बात का उठता था कि कौन सी फिल्म देखी जाये, शनिवार की या रविवार की? तुलना बड़ी घातक होती है, एक को दूसरे से लड़ाती है। सप्ताहान्त में आने वाली दो फिल्मों ने कभी नहीं सोचा होगा कि छात्रावासी बैठकर उनके गुणदोषों का निर्धारण करेंगे कि कौन सी देखी जाये, कौन सी नहीं? तब कई स्वर बौद्धिक उठते हैं, कई अपने अनुभव से बात करते हैं, कई केवल अभिनेता या अभिनेत्री के नाम पर मुग्ध रहते हैं। कुल मिलाकर एक कार्य मिल जाता है कि क्या देखें और क्या नहीं? कुछ कहते हैं कि शनिवार की ही देख लो, पता नहीं रविवार को बिजली आये न आये? देखा जाये तो यह भी अत्यन्त व्यवहारिक दृष्टिकोण है कि जो हाथ में है, उसे भोग लो।


कभी कभी बच्चे किसी खिलौने आदि की माँग करते हैं तो बुद्धिमान अभिभावक उन्हें दो तीन और विकल्प बताकर चिन्तन में ठेल देते हैं। बच्चों को भी लगता होगा कि उनके अभिभावक उनके बारे में इतना अधिक सोचते हैं। इस प्रकार के भ्रम उत्पन्न कर कभी कभी बच्चों से विकल्पों का खेल खेला जाता है। “पर शर्माजी के बच्चे टिंकू का यही खिलौना तो दो दिन में टूट गया था”, एक और गुगली और निर्णय प्रक्रिया में बच्चा जूझता रहता है। हमें कभी कभी लगता था कि एक फिल्म का विकल्प देकर हमारी सम्मिलित निर्णय प्रक्रिया में विभ्रम उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा था।


समस्या तब आती है जब आपने विकल्प ठीक से नहीं चुना। प्रश्नपत्र में यदि विकल्प वाले प्रश्न में दुर्भाग्यवश अंक नहीं मिले तो दुख के साथ क्रोध इस बात पर आता है कि दूसरा प्रश्न हल कर लेना चाहिये था। परीक्षाओं में विकल्प को भी एक प्रश्न के रूप में लेना चाहिये। ८ में से ५ प्रश्न करना, यह सुविधा कम, दुविधा अधिक होती है। या तो ३ प्रश्न अत्यन्त कठिन हों तो शेष ५ प्रश्न सरलता से चुने जा सकते हैं। यदि सारे प्रश्न एक ही स्तर के हों तो विकल्प दुविधा बढ़ा जाते हैं। बहुधा ऐसे ५ प्रश्न चुन लिये जाते हैं जो कि अन्ततः हानिप्रद होते हैं।


एक फिल्म चुनने के प्रयास में हमारे साथ कई बार ऐसा हुआ। जिसे अच्छी फिल्म विचार कर देखा उसमें निराशा हुयी। देखा जाये तो यह निराशा भी मायावी थी, मानसिक थी। जब तक दोनों फिल्म नहीं देखी जायें तब तक इस बात का निर्णय कैसे होगा कि कौन सी फिल्म अच्छी है? जिस प्रकार लोग किसी और के सुखों कर देखकर व्यर्थ ही दुखी होते रहते हैं उसी प्रकार हम लोग भी न देखी हुयी फिल्म को देखी हुयी फिल्म से अच्छा मानकर दुखी हो लेते थे। 


फिर भी अनपाये को पाने का प्रयास कुछ छात्रावासियों न कभी छोड़ा ही नहीं। कुछ अनुमति वाली फिल्म तो देखते ही थे। साथ ही साथ जिसकी अनुमति नहीं मिलती थी उसे भी निपटा आते थे। कई बार जब शुक्रवार की फिल्म देखने के प्रयास हुये तब जाकर लगा कि हम सबके अन्दर फिल्म का आनन्द उठाने की इच्छा अदम्य है।


प्रयासों की न समाप्त होने वाली यही उर्ध्वाग्नि अगले ब्लाग में।

4.5.21

मित्र - ३१ (रविवार की फिल्म)

छात्रावास में जिस समय पहुँचे थे, उस समय टीवी नहीं था। अनुराग ने बताया कि हम लोगों के वहाँ पहुँचने के कुछ दिन बाद ही एशियाड हुआ था, उसी समय टीवी छात्रावास में आया था। टीवी भोजनालय के बगल में ही एक कक्ष में रखा गया था, बड़े पल्लों की एक अल्मारी के अन्दर और बाहर से ताला। चाभी या तो छात्रावास प्रमुख के पास रहती थी या छात्रावास अधीक्षक के पास। लिखित अनुमति के बाद ही उस पिटारे का ताला खुलता था।

जिस समय टीवी आया, वह समय दूरदर्शन पर रविवार की एक फिल्म और बुधवार के चित्रहार का होता था। धीरे धीरे वह बढ़ता हुआ सप्ताह में ३ फिल्म और दो चित्रहार का हो गया। फिर समय आया रविवार के पूर्वाह्नों का जिसमें हास्य विनोद के, प्रेरक, ज्ञानवर्धक और सांस्कृतिक पक्ष के रंगोली जैसे कई रोचक कार्यक्रम आते थे। इन तीनों प्रकार के कार्यक्रमों के लिये प्रारम्भिक समय में बनाये गये नियम ही चलते रहे, थोड़े बहुत बदलावों के साथ।


छात्रावास में बुधवार के चित्रहार के लिये तो संघर्ष नहीं करना पड़ता था, बहुधा अनुमति मिल जाती थी। एक तो यह आधे घंटे का होता था और रात्रि के भोजन के पहले ही समाप्त हो जाता था। उस समय तक गानों में फूहड़ता नहीं पिरोयी जाती थी, संगीत और सुरों का प्राधान्य था, श्रृंगार भी प्रतीकात्मकता से प्रदर्शित होता था, गानों के चयन में सभी भावों की समावेशिता रखी जाती थी। जहाँ छात्रावास आने पर रेडियो छूट गया था, हम सबको चित्रहार अत्यन्त सुखद लगता था।


रविवार पूर्वाह्न के कार्यक्रमों में भी विविधता रहती थी। यह संभवतः सबकी रुचियों के अनुसार तैयार किया गया था अतः इसमें कुछ विशेष आपत्तिजनक निकाल पाना कठिन होता था। टीवी के कार्यक्रमों के पहले रविवार पूर्वाह्न का वह समय हमारे लिये मुख्यतः खेलकूद का होता था। कई लोग इस समय का उपयोग अपने कपड़े धोने में, सामान व्यवस्थित करने में, बाल कटवाने में या आवश्यक वस्तुयें खरीदने के लिये हाट जाने में करते थे। उत्साहित पढ़ाकू छात्र इसी समय का उपयोग अध्ययन कर के शेष समाज से आगे निकलने में करते थे। जब व्यस्त दिनचर्या में कोई समय का टुकड़ा दिखता था तो कल्पना मुखर हो जाती है, हम भी बहुधा पूरे न होने वाले स्वप्न देख लिया करते थे। छात्रावास अधीक्षक के लिये समय व्यर्थ होने की दृष्टि से टीवी की अनुमति न देना उतना सशक्त कारण नहीं था। परीक्षा न हो या कोई अन्य आवश्यक कार्यक्रम न हो तो उसकी भी अनुमति मिल जाती थी।


समय व्यर्थ होना और फूहड़ता, ये दोनों कारक रहते थे जब टीवी देखने की अनुमति नहीं मिलती थी। क्रिकेट के मैचों के लिये स्पष्ट मनाही थी। टेस्ट मैच तो वैसे ही ५ दिन खा जाते थे, टी२० का आविर्भाव हुआ नहीं था, कुछ एकदिवसीय में अनुमति मिल जाती थी। क्रिकेट इतना रुचिकर लगता था कि कुछ न कुछ युक्ति लगाकर हम लोग मैच देख लेना चाहते थे। यह हम लोगों का भाग्य ही कहा जायेगा कि छात्रावास अधीक्षक जी को भी क्रिकेट अत्यन्त प्रिय था और अभी भी है। यद्यपि अन्य बातों पर सहमति नहीं हो पाती थी पर क्रिकेट देखने के लिये हम उत्साहीगण छात्रावास अधीक्षक जी के घर ही पहुँच जाते थे। दोपहर में आधे घंटे का मध्यान्तर हो या सायं का खेल समय या रविवार को पूरा दिन, हम लोग चुपचाप बैठकर क्रिकेट देख लेते थे, कुछ भी नहीं कहा जाता था। हाँ, एक अनकही सी सहमति होती थी कि पढ़ाई में कोई ढील नहीं होनी चाहिये।


रविवार की फिल्म के पहले पूरा संघर्ष होता था। फिल्म का नाम तो समाचारपत्र से पता चल जाता था, साथ में उसके अभिनेता, अभिनेत्री आदि की सूचना उपलब्ध रहती थी। न ही वह फिल्म हमने पहले से देखी होती थी और न ही छात्रावास अधीक्षक जी ने। तब अनुमति मिलने के दो प्रमुख तत्व रहते थे। पहला यह सिद्ध करना कि उस फिल्म में कोई फूहड़ता नहीं है और दूसरा कि वह फिल्म हमारे व्यक्तित्व के विकास में सहायक होगी। अनुमति के लिये लिखे प्रार्थनापत्र में इन दोनों तत्वों का समावेश आवश्यक हो जाता था। सारे छात्रावास की आशाओं का केन्द्रबिन्दु वह प्रार्थनापत्र रहता था जिसमें इन दो तत्वों को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करना होता था।


अब आप छात्रावास प्रमुख की मनःस्थिति समझ सकते हैं। एक ओर सबकी आकांक्षायें, दूसरी ओर छात्रावास अधीक्षक की अनुमति और बीच में वह प्रार्थनापत्र जिसमें बिना देखी-सुनी फिल्म का चारित्रिक महिमामंडन करना है। उस समय तो गूगल महाराज भी नहीं थे कि सारी फिल्मों के बारे में तथ्य उपस्थित होते। ऐसे में हमारी कल्पनाशीलता ही हमारी सहायता को आती थी। पता नहीं कि अच्छे निबन्धों का अनुभव प्रार्थनापत्र लिखने में काम आया या प्रार्थनापत्रों में छिटकी कल्पनाशीलता ने हमें अच्छे निबन्ध लिखना सिखाया, पर कई बार हमें अनुमति प्राप्त होने में सफलता मिली। 


कुछ संकेत फिल्म के नाम से मिलते थे। फिल्मों के नाम बहुधा अच्छे ही रखे जाते हैं और उनसे कोई न कोई सकारात्मक पक्ष निकाला जा सकता है। किसी नाम को किस प्रकार से व्यक्तित्व विकास के लिये सहायक दिखाना है, यह आयुर्वेद के उसी सिद्धान्त की तरह था जो कहता है कि हर वनस्पति उपयोगी है, किसी न किसी रोग की दवा है। रही सही कमी अभिनेता और अभिनेत्री पूरा कर देते थे। हर अभिनेता की कोई न कोई देशभक्ति या समाजोत्थान की फिल्म वर्तमान फिल्म की सार्थक समीक्षा में सहायक होती थी। हम लोग प्रार्थनापत्र में क्या लिखकर अनुमति पाते थे और फिल्म की वास्तविकता क्या रहती थी, इसका अन्तर बड़े बड़े फिल्म समीक्षक न कर पायेंगे। हाँ यदि एक आध दृश्य तनिक अनुचित हुये तो उसकी सूचना गुप्तचर यथास्थान पहुँचा देते थे और आगामी मंगलवार को हमें अपने चारित्रिक पतन पर एक लंबा प्रवचन सुनना पड़ता था।


सप्ताह में जब तीन फिल्में आने लगीं तो अनुमति की कथा और भी रोचक हो चली। जानेंगे अगले ब्लाग में।

27.4.21

मित्र - २९(फिल्म और समग्रता)

आलोक बताते हैं कि उनके जीवन में फिल्म, संगीत और यात्रायें, ये तीन ही प्रमुख तत्व हैं। शेष सब या तो इनके बीच के रिक्त समय को भरने के लिये हैं या इनके लिये धन, साधन और संसाधन जुटाने के लिये हैं।

यह वक्तव्य आलोक के फिल्म अनुराग को सशक्तता और स्पष्टता से व्यक्त करता है। इस परिप्रेक्ष्य में छात्रावासीय जीवन में उनके फिल्म देखने हेतु किये गये एकनिष्ठ प्रयत्न उत्पात की श्रेणी में नहीं आयेंगे। जीवन उद्देश्य को निभाने का आग्रह तो सत्कर्मों की श्रेणी में आता है। हम कभी समझ ही न पाये कि जिस मित्र के साथ फिल्म देखकर हम अपने साहस और जीवटता जैसे गुणों का बखान कर रहे थे, वह तो छात्रावास की कहानी में चरित्र अभिनेताओं जैसा प्रदर्शन था। फिल्म देखने के पूरे प्रकरणों के मुख्य पात्र तो आलोक थे। हम ही नहीं वरन आचार्यजी भी उस समय नहीं सोच पाये होंगे कि मन में गहरे बसे जीवट भाव दण्डात्मक प्रावधानों से नहीं जाते हैं। देर से ही सही हम सबने यह तथ्य स्वीकार कर लिया है। यहाँ तक कि छात्रावास जीवन में आलोक के फिल्म प्रयत्नों के धुर विरोधी रहे आचार्यजी भी ने इसे मान दिया है और वर्तमान में आलोक के निमन्त्रण पर दो फिल्में भी देखी हैं।


आलोक सरल, बौद्धिक और अन्तर्मुखी व्यक्तित्व हैं। उनसे कुछ निकलवा पाने के लिये बहुत कुरेदना पड़ा है, पर जो पक्ष निकल कर आया है वह पठनीय और मननीय है। पाठकों की सुविधा के लिये मैं उसका भावार्थ कह देता हूँ।


“फिल्में मेरा धर्म थीं, हैं और रहेंगी। सब यहीं छोड़कर, आज और अभी से कहीं दूर, कल्पना की उड़ानों में, रूमानी विश्व में, फिल्मों की प्रशान्त काव्यत्मकता में, बस डूब सा जाता हूँ। फिल्मों के नायक तो मुझे प्रिय हैं पर उससे से भी अधिक प्रिय है कहानियों के माध्यम से चारों ओर उभारे उनके चरित्र, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अपनी पुरातन गाथाओं में कहानियाँ और चरित्र गुँथे हुये से हैं। मेरे लिये यह समझना बहुत ही कठिन था कि एक ओर मैं ऐतिहासिक पात्रों को तो चाहूँ पर फिल्मों के पात्रों से घृणा करूँ। वह भी मात्र उनमें निहित कामुकता, विमोहन, पुरुषत्व या वीरता के कारण? मेरे लिये पुरुरवा की उर्वशी भी उतनी ही विमोहक है जितनी मास्टरजी की श्रीदेवी, कामायनी का मनु उतना ही पुरुषत्व धरे है जितना गुलामी का मिथुन।


कहानी कहानी है, कथानक कथानक है। किसी भी शैलीविशेष की फिल्म में आरोह और अन्त की रोचकता एक सी ही होती है। तब हमसे यह क्यों कहा जाता है कि इस शैली की फिल्म देखो और उस तरह की नहीं? कहें तो इस प्रकार भेद के लिये प्रेरित करना अपने आप में एक भेदपूर्ण व्यवहार है। यह अन्यथा प्रयास एक युवा मन को अच्छी कहानी, उसकी प्रस्तुति आदि जैसे तत्वों को समझ पाने से वंचित कर देता है। साड़ी, सूट, सलवार या स्कर्ट, कौन क्या पहने है उस आधार पर भेदपूर्ण आक्षेप लगाना सुन्दरता में दोष देखने जैसा है।


मेरे जीवन में फिल्म, संगीत और यात्रायें, ये तीन ही प्रमुख तत्व हैं। शेष सब या तो इनके बीच के रिक्त समय को भरने के लिये हैं या इनके लिये धन, साधन और संसाधन जुटाने के लिये हैं।


मुझे इस बात का गर्व है कि विद्यालय और मेरे अभिभावकों ने मुझे एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति के रूप में विकसित किया है। मुझे इस बात से कोई अन्तर नहीं पड़ता है कि कोई मेरे कार्यक्षेत्र या प्राथमिकताओं के बारे में क्या सोचता है? इनके साथ फिल्मों ने भी मुझे बहुत कुछ सिखाया है।


अहा…यह मेरे विचार थे। कुरेदने के लिये आभार”


अत्यन्त सशक्त अभिव्यक्ति, आलोक को शेष छात्रावासियों से अलग पंक्ति में खड़ा करती हुयी, अभिनवगुप्त के रस सिद्धान्त को विशिष्ट प्रायोगिकता देती हुयी। फिल्मों को लेकर छात्रावास में विद्रोह स्वरूप से लेकर मोह स्वरूप तक की इन्द्रधनुषीय प्रवृत्तियाँ व्याप्त थीं। वहीं दूसरी ओर आचार्यों के मनस्थलों में फिल्मों के संबंध में अनुशासनीय दृढ़ता से लेकर चारित्रिक शिथिलता की धारणायें बनी हुयी थीं। इन्हीं दोनों विमाओं में उत्पात और दण्ड के न जाने कितने चक्र चले थे और संभवतः अभी भी चल रहे होंगे।


यह एक अनवरत कथा है, सबके अपने सामयिक और तात्कालिक पक्ष हैं। निष्कर्ष निकाल कर कथा के आनन्द में व्यवधान लाने का न कोई विचार है और न ही कोई शीघ्रता। अगले ब्लाग में अन्य रणक्षेत्रों पर संघर्ष की स्मृतियाँ।

24.4.21

मित्र - २८(फिल्म और विधा)

फिल्मों के प्रति सबका ही अपना अलग दृष्टिकोण है। मेरा दृष्टिकोण क्या था या क्या बना, कभी इस बारे में व्यवस्थित और गहरे सोचा नहीं। कहें कि जीवन की आपाधापी में इस बारे में कभी अवसर ही नहीं मिला। मनोरंजन के साधन के रूप में फिल्में लुभाती रहीं। अभिव्यक्ति की एक विधा के रूप में फिल्में प्रेरित भी करती रहीं। जिस प्रकार अन्य विधाओं में सृजनात्मकता और रसात्मकता का आस्वादन मिलता है, उसी प्रकार फिल्में भी बनी रहीं। 

छात्रावासीय जीवन में फिल्मों की सान्ध्रता के बाद फिल्में जीवन से अनुपस्थित सी हो गयीं। पढ़ाई के प्रति अधिक समय देना हो या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करनी हो, प्राथमिकतायें जीवन पर अपना अधिकार जताती गयीं। ऐसा नहीं था कि फिल्मों से पूर्णतया सन्यास ले लिया हो पर बहुत कम फिल्में या कहें कि जो चर्चित रहीं, बस वही देखीं और वह भी बहुत जाँच पड़ताल के बाद।


जब जीवन संघर्ष कर रहा होता है तो सृजनात्मकता और रसात्मकता छिप सी जाती है। रस पाने की चाह और रस को उत्पन्न कर सके, ऐसे सृजन को करने की चाह तो उसी समय संभव है जब आपका जीवन एक स्थैर्य प्राप्त कर चुका हो। वर्तमान सेवा और विवाह के प्रारम्भिक वर्षों के बाद ही वह स्थायित्व मिला जब एकान्त बैठकर अभिनवगुप्त की रससंचरणता को समझा जा सके।


बचपन में रामलीला, घर में पिताजी द्वारा रामचरितमानस का पाठ और उससे संबंधित कथाओं का विवरण, विद्यालय में संस्कृति का कहानियों के रूप में प्रस्तुतीकरण, गाँव में पूर्वजों और संबंधियों की कहानियाँ, यही सब मनोरंजन और संस्कार के साधन रहे। लगभग यही सब रात में सोते समय भी सुनाया जाता था। टीवी उस समय तक अधिक व्यवहार में नहीं था। नगर में प्रदेश सरकार के चलचित्र निगम द्वारा संचलित एक सिनेमाहाल होता था जिसमें कुछ विशेष फिल्मों के लिये ही अनुमति थी।


कहानियों से लगाव गहरा था। घर में श्रीमदभागवतम् के दो खण्डों वाला हिन्दी अनुवाद पढ़ डाला था, विशेषकर वह भाग जिसमें कोई कथा होती थी। चाचा के जासूसी हिन्दी उपन्यासों में कदाचित ही कोई छूटा होगा। कोई भी देशी पत्रिका हो, सोवियत पत्रिका हो, कहानी से संबंधित सभी भाग पढ़ डाले गये। छात्रावास में इन्हीं छूटी कहानियों को फिल्मों में ढूढ़ लेने की उत्कण्ठा ही फिल्मों के प्रति आकर्षित करती थी।


फिल्मों की अन्य विधाओं से तुलना में अभिव्यक्ति के दो तत्व महत्वपूर्ण हैं। पहला यह कि फिल्मों में अभिव्यक्ति का विस्तार बहुत होता है। दृश्य और श्रव्य माध्यमों के बहुत पक्ष फिल्मों में उपस्थित रहते हैं। जिस स्थान का वर्णन पुस्तक में दो या तीन अनुच्छेदों में होता है, वह फिल्म में एक ही दृश्य में संप्रेषित हो जाता है। जिस पात्र का चरित्र निर्माण करने में पुस्तक में तीन या चार घटनायें लगती हैं, फिल्मों में भंगिमाओं और भावों से वही कुछ क्षणों में हो जाता है। इस प्रकार फिल्मों का प्रभाव क्षेत्र अति व्यापक है। 


वहीं दूसरी ओर फिल्मों में प्राथमिक अनुभव से दूरी बढ़ जाती है। इसकी प्रत्यक्ष तुलना उन फिल्मों को देखकर की जा सकती है जो किसी पुस्तक पर आधारित रहती हैं। कई बार यह हुआ है कि पुस्तक उस पर बनी फिल्म से कहीं अच्छी लगी। रससंचरण में यह दूरी उसकी सान्ध्रता को उत्तरोत्तर क्षीण कर देती है। जब फिल्म में कई दृश्य एक साथ चल रहे हों, कई संदेश एक साथ देने का प्रयास हो तो स्वाभाविक है कि सब पर उतना ध्यान नहीं जा पायेगा। कुछ पक्षों में कार्य अच्छा होगा और वह उत्कृष्ट लगेंगे, वहीं कुछ पक्ष अपनी संप्रेषणता खो भी देंगे।


ये सारे विश्लेषण रोचक होने पर भी फिल्मों का कथा पक्ष अभी भी अत्यन्त सुहाता है। उस पर भी यदि गीतों के बोल मधुर हों तो आनन्द और बढ़ जाता है। फिल्म की सफलता मेरे लिये इस बात पर बहुत निर्भर करती है कि कथा को किस तरह से प्रस्तुत किया गया है। अभिव्यक्ति के आरोह, चरित्रों का निर्माण और घटनाओं का भावनात्मक संस्पर्श एक सुदृढ़ कथा को और भी रोचक बना देते हैं।


नेटफिल्क्स, अमेजन प्राइम आदि ने फिल्मों में एक बाढ़ सी ला दी है। प्रारम्भ में तो विविधिता के कारण आकर्षण बना पर धीरे धीरे कहानियों के स्वरूप में एकरूपता सी आने लगी। एक ही तरह की कहानी, एक ही तरह का संदेश देने का प्रयास, पात्रों के चरित्र निर्माण में एक फूहड़पन, परिस्थितियों से सतत विद्रोह, समाज और देशविशेष की पूर्वाग्रह भरी छवियाँ, व्यवस्था के ध्वंस अवधारित स्वरूप, इन सब कारणों से मेरे लिये कथा की रोचकता अवसान पर है। एक अच्छी पुस्तक यदि कथा के सहारे मन आलोड़ित कर सके या तर्क से बौद्धिकता उद्वेलित कर सके तो वह आजकल की दस फिल्मों से भी अच्छी है। जीवन के ढलान पर सरलता सुहाने लगती है, जटिल चित्रण खटकने लगते हैं।


बात आलोक की होनी थी, मैं अपना ही फिल्म पुराण ले बैठा। अगले ब्लाग में आलोक के विचार। 

20.4.21

मित्र - २७ (फिल्म और उद्योग)

प्रतिबन्ध और उल्लंघन के बीच की गुत्थमगुत्था में फिल्मों के प्रति कभी कोई स्पष्ट दृष्टिकोण पनपा ही नहीं। फिल्म देख कर आना और पकड़े जाना, इस प्रकरण में फिल्म के रसतत्व वहीं सूख जाते थे। तब सर्वप्रथम इस बात की युक्ति लगने में बुद्धि दौड़ती थी कि बात घर तक न पहुँचे। कुटाई की पीड़ा, सार्वजनिक उपहास का दंश वास्तव में साहस के परिलक्षण थे, सहे जाते थे और सगर्व कहे जाते थे। नियमों का उल्लंघन छात्रावास के लिये एक खेल सा था, उसमें हुयी जीत या हार को कोई यश-अपयश या हानि-लाभ के रूप में नहीं लेता था। उसमें मिले दण्ड या प्रताड़ना खेल भावना के रूप में स्वीकार की जाती थी। आचार्यजी ने जब छात्रावासियों के बीच यह परमहंसता अनुभव की तो उन्होने रणनीति बदली। उन्होनें घर में पत्र लिखने प्रारम्भ किये। जब से बात घर में पहुँचने लगी, खेल के नियम ही बदल गये। यह पूरे फिल्म प्रकरण में “फाउल” कहा जा सकता है, पर ऊर्जा का उछाह फिर भी इस असंतुलित खेल में जूझा रहा।

रवीन्द्र ने बताया कि वह आलोक और प्रदीप के साथ निगार में “पालेखाँ” फिल्म देखने गये थे। दीवार के ऊपर लोहे के काँटेदार बाड़ लगी थी। पार करने की विधि बड़ी सधी होती थी। पहले दीवार के ऊपर लोहे का एंगल पकड़ कर खड़ा होना होता था, एक टाँग उठाकर दीवार पर ही उस पार, फिर दूसरी टाँग उठाकर बाड़ को पूरा पार करना होता था। तब लगभग छह फिट की दीवार से नीचे कूदना होता था। पूरी प्रक्रिया में सर्वाधिक कठिन भाग बाड़ पार करना होता था, कई बार उसमें कपड़े फट जाने का या टाँग छिल जाने का भय रहता था।


रवीन्द्र उस दिन रेशम का नया कुर्ता पायजामा पहने थे। बाड़ पार करते समय उनका पूरा पायजामा उलझकर फट गया और तहमत सा हो गया। दीवार के उस पार किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति, वापस छात्रावास जाकर नया वस्त्र पहने या बाहर निकल आने की बढ़त को यथावत बनाये रखा जाये। वापस अन्दर जाने में समय लगने और पकड़े जाने की संभावना जो थी। निर्णय हुआ कि इसी तहमतिया वेश में “पालेखाँ” को निपटाया जायेगा। इतना बड़ा त्याग कर फिल्म देखी, आर्थिक हानि हुयी सो अलग। वापस आये तो आचार्यजी कुर्सी में बैठे थे और प्रतीक्षा में थे। उस समय कुछ नहीं बोले। आचार्यजी इस बात का पूरा समय देते थे कि आपकी आशंकायें आपको ही तहस नहस कर दें। सायं तीनों को बुलाया गया, संवाद के जो भी स्तर पहुँचे हों, अनुनय विनय में घरती की जो भी गहराईयाँ कम पड़ी हो, अन्ततः तीनों के घर पत्र लिख दिये गये।


इन विकट परिस्थितियों में बिना पकड़े फिल्म देख आना एक सम्मान का विषय होता था। एक गर्व की अनुभूति होती थी कि कितनी बड़ी संभावित प्रताड़ना से बच गये। इस गर्व के भाव में फिल्म के स्वरूप पर कोई विचार होना या दृष्टिकोण विकसित होना संभव ही नहीं होता है। उस समय तो आप नायक से भी बड़े नायक हो जाते हो, देखी हुयी फिल्म के समानान्तर एक फिल्म आपकी चलने लगती थी। आपके चेहरे पर विजय के यही भाव बहुधा आपके पराभव का कारण बन जाते थे। आपके मित्रों को समझ आ जाता था कि आपका देदीप्यमान मुखमण्डल किसी विशिष्ट कार्य की सफलता का द्योतक है। उस समय तो बिना पकड़े फिल्म देख आना ही सफलता के हस्ताक्षर होते थे। आपको बहुधा कुरेदा जाता था, आपके अहम को आपके मित्र उकसाते थे। मानव स्वभाव है, प्रशंसा के वशीभूत हो बहुधा मन बह जाता है। आप अपनी वीरगाथा सबको सुना देते थे। कई बार आपके प्रशंसाकारों में कोई दूत भी बैठा होता था, वही जाकर सारा किस्सा यथास्थान जड़ देता था। कई बार हम इस प्रकार भी पकड़े गये।


यही सब कारण रहे होंगे कि जब भी हम मित्रों के बीच फिल्म की चर्चा चलती है, उसमें देखी हुयी फिल्मों की कथा गौड़ हो जाती है और बार बार रह रह कर छात्रावासियों की साहसगाथायें उभर कर सामने आती हैं। ऐसा नहीं है कि हम फिल्मों की कहानियों में रुचि नहीं लेते थे। बड़ा ही स्वाभाविक होता है कथानक याद हो जाना। उन कथाओं का उपयोग रसात्मकता या विश्लेषणात्मकता से अधिक प्रमाण के रूप में होता था। यदि आप प्रत्यक्ष नहीं पकड़े गये हैं और आपने अपने मुखमण्डल को भी सौम्य बनाये रखा फिर भी फिल्म देख आने का कृतत्व का भाव पेट में बिना आन्दोलित हुये अधिक दिन तक रह नहीं पाता है। अपने प्रमुख मित्रों से तो फिर भी आपको अपनी वीरगाथा वर्णित करनी ही होती थी। उनसे कुछ छिपाना संभव नहीं होता था या कई बार तो उनकी सहायता से ही भागकर फिल्म देखना संभव हो पाता था।


कार्यसिद्धि के प्रमाण के रूप में सुनाये या कार्यफल के प्रसाद के रूप में सुनायें, फिल्मों के कथानक मित्रों को सुनाने होते थे। किन्तु उसके पहले छात्रावास से भागने की कथा और वापस आने के प्रयास, उसमें ली गयी सावधानियाँ और रोचक मोड़ों सहित वर्णित करनी होती थीं। जितनी लम्बी फिल्म की कथा होती थी उससे कहीं अधिक लम्बी उसे देखने की कथा। फिल्म की कथा यदि उतनी सुदृढ़ यदि रोचक न रही हो तो, फिल्म देखने की कथा को ही सविस्तार और रोचक शैली में सुनाया जाता था। संदीप को इस विधा में महारत थी। हमारे लिये फिल्म में प्राप्त रस अपने मित्रों के साथ ही पूरा होता था, एक बार नहीं, बार बार। लगभग ठीक वैसे ही जैसे एक बन्दर अपने मुँह में चने भर ले और बाद में एक साथ आनन्द लेकर धीरे धीरे खाये।


इस प्रकार देखा जाये तो हमारे लिये फिल्म की रसात्मकता फिल्म देखने के प्रयासों से प्रारम्भ होती थी और फिल्म की कथा के सार्वजनिक वर्णन के साथ समाप्त होती थी। आज भी वे सारे क्षण याद किये जाते हैं और प्रस्तुत वर्णन भी उसी कालखण्ड का यथारूप आनन्द दे रहा है। फिल्मों के संदर्भ में हम संभवतः इसके आगे सोच नहीं पाते हैं या कहें कि शेष सभी कथानक फीके पड़ जाते हैं। आलोक इस विषय में अग्रिम पंक्ति के विचारक रहे हैं। प्रारम्भ से ही फिल्मों के संबंध में उन पर उनकी बौद्धिकता हावी रही। जहाँ पर आकर हमारा दृष्टिकोण अवसान पा जाता था वहाँ से आलोक का दृष्टिकोण प्रारम्भ होता था। 


इसकी विस्तृत चर्चा और आलोक के स्पष्ट विचार अगले ब्लाग में।

17.4.21

मित्र - २६(फिल्म और बौद्धिकता)

आलोक रसज्ञ हैं। अभिनवगुप्त रसग्रहण के संदर्भ में दो शब्दों का प्रयोग करते हैं, सहृदय और तन्मय। इन दोनों शब्दों को मूर्तता प्रदान करती है आलोक की रसप्रियता। ७ प्रकार के रसविघ्नों को तो कभी का जीत चुके थे, उससे भी कुशलता उन्होंने छात्रावास के प्रतिबन्धों पर विजयारूढ़ होने में दिखायी। कैसा भी प्रतिकूल समय रहा हो, उनकी रससाधना निर्बाध गतिमय रही।

जहाँ हम सबका कारण मूलतः मानसिक था, आलोक का फिल्मों के प्रति लगाव बौद्धिक था। हम लोगों का किसी तरह भाग कर फिल्म देख लेना अपने आप में एक महती उपलब्धि होती थी। कौन सी फिल्म देखी और उसकी क्या कथा थी, यह बात हमारे लिये गौड़ हो जाती थी। हर प्रकार की फिल्म में लगभग एक सा ही आनन्द आया, स्वतन्त्रता का। कालान्तर में एकरूपता नीरस हो जाती है। पहले रसगुल्ले में जो सुख मिलता है, वह दसवें में कहाँ? यदि विश्वास हो कि जब चाहेंगे रसगुल्ला प्राप्त हो जायेगा तो उसके प्रति उतना आकर्षण नहीं रह जाता है। वयस्क होने के बाद हम सबके साथ लगभग यही हुआ। जहाँ प्रतिबन्धों में एक के बाद एक कई बार स्वातन्त्र्य का आनन्द लिया, वहीं मुक्त होने के बाद फिल्मों के प्रति उतनी ललक और आकर्षण नहीं रह गया।


आलोक के जीवन में फिल्मों के प्रति एकरूपता कभी आयी ही नहीं क्यों उन्होंने फिल्मों को गहन बौद्धिक भाव से पकड़ा हुआ था। हम सबके अन्दर रस की उतनी मात्रा नहीं थी जितनी आलोक के अन्तर में समायी थी। जहाँ हमारे स्रोत धीरे धीरे कर सूखने लगे, आलोक आज भी उतने रसमयी हो जाते हैं, फिल्मों को लेकर। या यह भी संभव है कि हम सबने अन्तर्निहित रस को उतना नहीं पहचाना जितना आलोक ने।


बाहर जाकर खा पी आना उतना कठिन कार्य नहीं रह गया था। बहुधा आधे या एक घंटे का अवसर मिल जाये तो हम अपनी क्षुधा तृप्त कर आते थे। बहुधा ५-६ लोग भी एक साथ निकल जायें तो पता नहीं चल पाता था। अधिक समय के लिये निकलना और छात्रावास से दूर जाकर फिल्म देखना कठिन था। निकटतम सिनेमागृह में पहुँचने में कम से कम ४५ मिनट तो लग ही जाते थे। यही कारण था कि फिल्मों के लिये निकल पाना २ या ३ के समूह में ही हो पाता था। एक तो छात्रावास की भीड़ में अधिक अन्तर नहीं पड़ता था और कम लोग होने से रहस्य छिपा भी रहता था।


आलोक की विशिष्टता यह रही कि उन्होंने सभी संभव समूहों के साथ फिल्में देखी होंगी। जितने मित्रों से बात की है, सबके साथ आलोक फिल्म देख चुके हैं। जैसे जैसे रहस्यों की परतें खुल रही हैं, लगता है कि हमने आलोक की योग्यता का आकलन ठीक से किया ही नहीं। आलोक को हमने अपने स्तर पर जाना, स्थानीय स्वरूप में, इस रूप में कि वह हमारे साथ फिल्में देखता था। पर वह सबके साथ फिल्म देखता था, यह किसी ने नहीं जाना। रस की अथाह चाह और सबके साथ बाहर निकल जाने की अदम्य लालसा, यह आलोक को विशिष्ट बना देती है। इस बात का अनुमान ही लगाया जा सकता है कि आलोक ने छात्रावास के कालखण्ड में कुल कितनी फिल्में देखीं।


इस पूरे प्रयासक्रम में वह कई बार पकड़े भी गये। किस बार कौन सी फिल्म देखने गये थे यह उनके साथ गये मित्रों से उद्घाटित हो गया। कई बार वह अकेले भी पकड़े गये, उन अवसरों पर कौन सी फिल्म देखी यह उन्होने कभी बताया नहीं। छुट्टियों पर हम लोग अकेले ही घर से आते जाते थे। यद्यपि घर और छात्रावास के बीच दोनों बार फिल्में देखने का अवसर रहता था, समस्या यह रहती थी कि सामान अस्थायी रूप से कहाँ रखा जाये? इस प्रकार भी आलोक ने बहुत फिल्में निपटायी होंगी। 


हम सबने मिलकर विनोदवश कई बार उनका मन टटोलने का प्रयास किया, आलोक ने पूरा सत्य कभी बताया नहीं। यहाँ तक कि हमने उस समय की संभावित फिल्मों की सूची को विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया पर आलोक निर्वेद रस में डूबे रहे। कई बार बात करने में बस यही लगा कि हम सब फिल्मों को जिस विनोद भाव से देखते हैं, चर्चा करते हैं और स्मृति में लाते हैं, उसकी तुलना में आलोक की फिल्मों के प्रति लगाव अत्यन्त गहरा है। हम संभवतः वहाँ तक पहुँच न पाते हों। जब किसी की आत्मीयता गहन हो तो उस पर सतही या उत्श्रृंखल चर्चा मन में तटस्थता का भाव ले आता है। आलोक की उत्तर न देने की इच्छा इसी बौद्धिक जुड़ाव की ओर इंगित करती है।


हमारा फिल्मों के प्रति प्रेम उतना सुसंस्कृत नहीं था जितना आलोक का। यदि आप किसी प्रवृत्ति को बाधित करेंगे तो विकार आयेंगे। हमारा फिल्में के प्रति घोर तात्कालिक आकर्षण और कालान्तर का सहसा अवरोह इसी विकार की श्रेणी में आयेगा। आलोक का प्रेम स्थितिप्रज्ञता को प्राप्त हो गया है, अभी भी उतना ही स्थिर है जितना छात्रावास के दिनों में था।


आलोक का फिल्मों के प्रति एक स्पष्ट और विशिष्ट दृष्टिकोण है, उसकी चर्चा अगले ब्लाग में।

13.4.21

मित्र - २५(फिल्म और उन्माद)

अशोक ने बताया कि वह कक्षा ३ में थे, लगभग ९ वर्ष के होंगे। उस समय सुहाग फिल्म आयी थी, अमिताभ और शशिकपूर वाली। दोपहर का समय था, घर में माँ सो रही थी, पिताजी बैंक में थे। खलासी लाइन से विवेक टाकीज में वह साइकिल से पहुँच गये। उस समय इतनी लम्बाई नहीं हुयी थी कि साइकिल गद्दी पर बैठकर चला पाते, बस कैंची चलाकर मुहल्ले की गलियाँ नाप आते थे। टिकट लेने पहुँचे और जेब से कुछ सिक्के निकाले। ये सिक्के उन्होने अपनी गुल्लक में जोड़े थे, कई महीनों की बचत थी, कई महीनों का त्याग था उसमें, जलेबी और समोसे का त्याग था। हाथ ऊपर तक उठाकर भी काउन्टर तक नहीं पहुँच पा रहे थे, पीछे से किसी सहृदय ने उठाया और उनका मुख काउन्टर के समक्ष कर दिया। पैसे दिये, टिकट लिया, अन्दर गये और पूरी फिल्म देखकर घर आ गये, ऐसे कि जैसे कुछ हुआ ही न हो।

अशोक के जीवन में यदि कोई तत्व सदा ही प्रचुर मात्रा में रहा है तो वह है आत्मविश्वास। कभी अपने व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर सशंकित नहीं पाया है उनको। कभी कभी यह आत्मविश्वास इतना उभर कर आ जाता है कि शेष वातावरण उसमें छिप जाता है। विद्यालय में उनकी छवि ऊर्जायुक्त, क्षणिकमना, नित्यउद्धत और उत्फुल्लहृदय मित्र की थी। कोई दैवीय कारण रहा होगा कि उनसे बहुत पटती थी, पढ़ाई के अतिरिक्त सभी कार्यों में। कई घटनायें हैं पर जिस भौकाल से जाकर उन्होंने फिल्म निपटायी होगी वह बड़ा ही दर्शनीय रहा होगा। पूरे कालखण्ड में किसी ने उनसे कुछ बोला नहीं, कोई प्रश्न पूछा नहीं, कहीं रोका नहीं और यहाँ तक कि टिकट लेने में उठाकर सहायता भी की। पिता का हाथ पकड़े या माँ से पीछे छिपे ढुलुर मुलुर बच्चे अपने समकक्ष को जब इस प्रकार वयस्क विश्व में देखते होंगे तो बिना प्रभावित हुये तो न रह पाते होंगे।


कार्य सम्पादित करने की जो भी विशिष्ट शैली रही हो, अशोक का फिल्मों के प्रति प्रेम अगाध रहा है। कदाचित ही कोई चर्चित फिल्म उन्होंने छोड़ी होगी। फिल्मों से जुड़े इतने संस्मरण हैं उनके पास जिन्हें संकलित करके एक फिल्म बनायी जा सकती है। जिस उत्श्रृंखलता और उन्मुक्तता से कानपुर में फिल्में देखी जाती हैं और उन्हें जीवन में उतारा जाता है, वह अद्वितीय है। अशोक बताते हैं कि जिस समय ब्रज टाकीज में तेजाब फिल्म आयी थी, “एक दो तीन चार” वाले गाने के पहले वहाँ के प्रबन्धक पुलिस को बुला लेते थे क्योंकि झींक के नाचने में लड़कों को ध्यान नहीं रहता था कि उनसे क्या क्या टूट रहा है? कानपुर के इसी वातावरण का सारक्रम था उनका फिल्मप्रेम। उनके साथ घटित ३ घटनायें संभवतः इस प्रभाव को समझा सकने में पर्याप्त होंगी।


“मैंने प्यार किया” निशात में लगी थी, १२ से ३ का शो। अशोक के मित्र टिकट लेने के लिये पंक्ति में खड़े, दो टिकट ले पाने की सफलता को अपनी शैली में व्यक्त कर रहे थे, कनपुरिया उत्साह में। चर्चित महिला सीओ ब्लैक में टिकट बेचने के विरुद्ध अभियान और भीड़ नियन्त्रण में वहाँ उपस्थित थीं। कईयों के साथ उनको भी धरा गया और यूपी पुलिस द्वारा व्यवस्थित और सीओ द्वारा व्यक्तिगत कुटाई हुयी। मित्र का मुँह सूज गया था, पीड़ा अधिक हो रही थी, फिल्म देखने की न मुखभंगिमा थी और न ही मानसिक स्थिति। अशोक पशोपेश में, एक आतुर युवा युगल दिखते हैं, मित्र का दयनीय मुखमंडल भी भुना लेते हैं, दो सौ में टिकट बेच देते हैं। अत्यधिक पीड़ा के चिकित्सीय उपचार के स्थान पर फिल्मी उपचार, सोमरस पिलाया जाता है। घर जाने की स्थिति नहीं, बाहर ही विश्राम।


मन में एक बार फिल्म की कीड़ा बिना फिल्म देखे कहाँ शान्त होता है। रात्रि को ९ से १२ वाला शो निश्चित हुआ, “जमाईराजा”, हीरपैलेस में। रात में पुलिस वैसे ही टाकीजों में घूम आती है। इनके मित्र का सबसे अलग मुख और उससे निकलती सोमरस की सुगन्ध, श्रीमन फिर धरे गये। ईश्वर की कृपा ही थी कि सिपाही ने समझा कर छोड़ दिया। मध्यान्तर होता है, दीर्घशंका हेतु भागते हैं, वहाँ पर पहले से ही एक व्यक्ति अन्दर बैठा था। ऐसे दबाव में सारा विश्व शत्रुवत लगता है। क्रोधावेश में द्वार भड़भड़ाते हैं, सशब्द। द्वार खुलता है और अन्दर से क्रोध में एक और सीओ निकलते हैं, पुनः विधिवत कुटाई। फिल्म का ज्वर अगले तीन माह शान्त रहता है।


फिल्म “प्रेमदीवाने” चर्चित गाना, “ए बी सी डी….पी पी पी पी पिया…“। दोनों मित्र पूरे स्वर में, तान में और आरोह में गाते चले आ रहे थे। शंकर भगवान का प्रसाद चढ़ा हो या होली का समय हो, स्वर को और शरीर को एक विशेष शक्ति मिल जाती है, गान और नृत्य स्वतः प्रस्फुटित होने लगते हैं। ध्यान नहीं दिया पर पीछे पीछे पुलिस की जीप धीरे धीरे अनुसरण करती आ रही थी। जब न रहा गया, तो इनको रोका गया। एक ही डण्डे में मित्र का आधा नशा उतर गया था। पुलिस ने अशोक को भी गाने को कहा। भय में पद्य गद्य बन जाता है और श्रृंगार निर्वेद। गीत किसी तरह बाँच दिया। दरोगा ने पूछा कि पी से कुछ और भी होता है। इनका मस्तिष्क कौंधा, कहा “पुलिस”। पूछा और कुछ, “हाँ वह पुलिस पिये लोगों को ठीक करती है”। दरोगाजी मुस्करा दिये, जान लिये कि अशोक पूरी चेतना में हैं, जाने दिया।


२०-२२ मित्र फिल्म देखकर लौट रहे थे, “कर्मयोद्धा” ९ से १२ का शो, दीप सिनेमा में। हमीरपुर की ओर से आने वाली एक बस रुकती है, एक वृद्ध अपनी बिटिया के साथ उतरते हैं और रिक्शा में बैठकर चलते हैं। कोई अपनी रौ में उसी फिल्म का ताजा ताजा सुना गाना गाने लगता है, “हाय ये लड़कियाँ”। समूह में कईयों ने रोका भी पर उत्श्रंखलता संक्रमित होने लगती है, वातावरण अशोभनीय हो जाता है। सहसा कुछ दूर पर जाकर रिक्शा रुकता है, वृद्ध उतरते हैं, संभवतः बुन्देलखण्ड के होंगे, कुर्ता उठाकर रिवाल्वर निकालते हैं और भीड़ पर तान देते हैं। स्तब्धता, पूरी फिल्म हवा में उड़ जाती है। शोले की तरह कहा कि ६ गोलियाँ हैं, ६ तो जायेंगे ही। उनका मन भरा नहीं, कहा सब मुर्गा बन जाओ, सड़क पर तुरन्त २२ मुर्गे खड़े थे। कुछ मिनट बाद जाते समय कहा कि इसकी रेन्ज ३०० मीटर है, जो खड़ा हुआ, वही जायेगा। इसके बाद रिक्शे में बैठकर चल दिये। अगले ५ मिनट कोई हिला नहीं, कोई उठा नहीं, सब चुपचाप घर चले गये, एक माह तक कोई किसी से कुछ बोला नहीं, फिल्म देखना तो बहुत दूर की बात थी।


अशोक के लिये फिल्में सदा ही मनोरंजन का स्फूर्त साधन रही है। कभी उनको फिल्मों से बड़ी बड़ी प्रेरणा मिलती है, कभी मन का तम घुल जाता है, कभी निर्बद्ध आनन्द की विषयवस्तु। कोई भी पुरानी हो या नयी, समय रहता है तो वह देखने बैठ जाते हैं। उनके पुत्र आजकल उन्हें नये साधनों से परिचित करा रहे हैं। अशोक बताते हैं कि फिल्मों से क्या नहीं ग्रहण करना है, यह सबको समझ आता है। आप बच्चे नहीं हैं कि बिन जाने ही प्रभावित हो जायेंगे। अशोक का जीवन्त व्यक्तित्व फिल्मों की जीवन्तता से बहुधा अनुनादित होता रहता है।


वहीं दूसरी ओर आलोक का बौद्धिक कारण रहा है, फिल्मों के प्रति आकर्षण का। अगले ब्लाग में।

10.4.21

मित्र - २४(फिल्म और प्रतिबन्ध)

छात्रावास में फिल्में पूर्णतया प्रतिबन्धित थीं। कोई फिल्मों के प्रति तनिक भी अनुराग या आकर्षण प्रकट नहीं होने देता था, बस इस आशंका से कि कहीं उसे निकृष्ट कोटि का छात्र घोषित न कर दिया जाय। “देखिये, ये फिल्मों के दीवाने हैं”, यह आपके चरित्र पर एक अतिव्यंगात्मक आक्षेप सा होता था। इसके कई प्रत्यक्ष और परोक्ष अर्थ निकाले जा सकते थे।

पहला कि आप सभ्य और सुसंस्कृत समाज से भिन्न हो। प्रधानाचार्यजी सहित सब के सब फिल्में नहीं देखते हैं और आप एक विशिष्ट प्राणी हो, जिसकी अभिरुचियाँ प्रश्नवाचक हैं, विकृत हैं और निन्दनीय हैं। दूसरा आक्षेप होता था आपके परिवार पर क्योंकि फिल्म देखने का संस्कार आपने घर से ही सीखा होगा। आप तब किसी भी उस अनुभव की चर्चा नहीं कर सकते हैं जिसमें आप अपने अभिभावकों के साथ फिल्म देखने गये हों। फिल्मों के दृश्य या उनकी कहानियों के संदर्भ अस्पृश्य थे। किसी अभिनेता की प्रशंसा तो परिवेश में अधर्म को बढ़ाने सा था और यदि किसी अभिनेत्री के बारे में कुछ भा गया तो वह व्यक्तिगत रूप से अधर्म में डुबकी लगाने सा था।


तीसरा यह कि फिल्में फूहड़ हैं और उनमें कमर मटकाने के अतिरिक्त कुछ और दिखाया नहीं जाता है। कमर मटकाना या नृत्य देखने से मानसिकता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। मन दिग्भ्रमित होता है, पढ़ने में मन नहीं लगता और पुस्तकों में छपे शब्द भी बिना अर्थ दिये उछलकूद मचाने लगते हैं। चौथा कि फिल्म देखना समय को व्यर्थ करना है। न केवल समय को वरन धन को भी। इससे श्रेयस्कर है वही धन और समय नाली में बहा दिया, कम से कम वह आपको बिगड़ने में साधन नहीं बनेगा।


पाँचवा संदेश संभवतः सकारात्मक था। विद्याकाल अपने भविष्य को सँवारने के लिये होता है, इस समय किसी भी अन्यथा वस्तु के प्रति आकर्षण का एक बड़ा मूल्य होता है। ये सब प्रतीक्षा कर सकते हैं। पाँचों प्रकार के संदेश भिन्न भिन्न रूपों में कहे, बताये और समझाये जाते थे पर उनमें अन्तर्निहित भाव यही रहता था कि फिल्में प्रतिबन्धित हैं।


भरतमुनि का नाट्यशास्त्र या अभिनवगुप्त का प्रत्याभिज्ञ दर्शन छात्र जीवन में नहीं पढ़ा था। पढ़ा होता तो उसी समय बताते कि रस मनीषियों द्वारा इच्छित परमानन्द का ऐन्द्रिय निरूपण है और नाटक या फिल्म उस निरूपण का सशक्त माध्यम। फिल्में प्रशिक्षण या अध्यापन का सशक्त अंग हैं और विषय को अधिकाधिक ग्राह्य बनाने में सहायक होती हैं। बंगलुरु में बिटिया के विद्यालय में एक फिल्म हर सप्ताह दिखायी जाती थी। बनारस में ही उसके विद्यालय में लघु फिल्मों के ऊपर एक पूरी पुस्तक थी, एक वैकल्पिक विषय के रूप में। मेरे वर्तमान कार्यस्थल में जो कि राजपत्रित अधिकारियों का प्रशिक्षण संस्थान है, वहाँ पर फिल्म के माध्यम से विषय के सूक्ष्म बिन्दुओं का संप्रेषण एक उत्कृष्ट विधा समझी जाती है।


इस परिप्रेक्ष्य में जब अपने बच्चों से अपने छात्रावास जीवन की समकक्ष तुलना करता हूँ तो स्वयं के फिल्मों के प्रति अतिविशिष्ट आकर्षण को न समझ पाता हूँ और न ही उनको समझा पाता हूँ। उनके लिये फिल्में देखना या न देखना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना हम लोगों के लिये हुआ करता था। उनके लिये अच्छी फिल्म तभी देखी जाती है जब उसके बारे में एक ठीक ठाक समीक्षा हो या किसी ऐसे विषय पर हो जिसमें अभिरुचि हो या किसी का सशक्त अभिनय हो। हम लोगों कि यह स्थिति रहती थी कि यदि तीन घंटे का स्वच्छन्द कालखण्ड मिल गया तो सामने जो भी फिल्म हो, देख आते थे।


हम सबके मन में सदा ही उहापोह रही कि मन सही या प्रतिबन्ध सही? मन था कि फिल्मों के प्रति अगाध आकर्षण पाले बैठा था, वहीं व्यवस्था दूसरी ओर खड़ी थी। इस विषय में प्रश्न पूछना कि फिल्में क्यों अनुचित हैं, यही अपने आप में अपराध की श्रेणी में आ जाता। फिल्मों के कई कुप्रभाव भी हैं, कई फिल्में स्तरीय नहीं होती हैं, इस कारण से यदि सारी फिल्में प्रतिबन्धित हो, यह बालमन को स्वीकार ही नहीं था। कितना भी प्रयत्न किया समझने का, उत्तर पाने का, पर प्रतिबन्धों का कारण कभी समझ आया ही नहीं। यदि उस समय कोई यही पूछ देता कि फिल्म देखकर क्या मिल जायेगा तो भी बु्द्धि विश्लेषण नहीं कर पाती। फिल्में नहीं देखकर या कम देख कर क्या पा लिया? या भागकर देख आये और किसी को पता नहीं चला, उससे क्या उपलब्धि हो गयी? बस मन को भाता था फिल्में देखना, प्रतिबन्धों ने उस तड़प को द्विगुणित कर दिया था, साहस ने इसी को लक्ष्य बना लिया और एक दो बार नहीं कई बार भाग कर फिल्में देखीं।


फिल्मों के प्रति क्या अभी भी उतना ही आकर्षण है जितना छात्रावास के समय होता था? है भी और नहीं भी है। उस समय के प्रतिबन्धों में जितनी फिल्में देख पाते थे, आज के मुक्त वातावरण में कहीं कम देखते हैं। क्या बदलाव आया है? क्या दृष्टिकोण बदल गया या प्रतिबन्धों का कोई कारण समझ आ गया? ज्ञानचक्षु खुल गये या आवश्यकता समाप्त हो गयी?


फिल्मों में कहानी होती है, पर फिल्मों के बारे में हम सबकी अपनी कहानी है। ऐसी ही कुछ कहानियाँ जानेंगे अगले ब्लाग में।

6.4.21

मित्र - २३(अभिनवगुप्त और रस)

पाणिनि, पतंजलि, भृतहरि और अभिनवगुप्त को उनकी कृतियों के माध्यम से जानना मेरे लिये एक अद्भुत अनुभव रहा है। अभिव्यक्ति को उसके स्वरूप में समझ सकने का अतिलघु स्पंद ही इतना आनन्द दे जाता है कि बार बार उतर कर और गहरे डुबकी लगाने का मन करता है। भाषा, उसकी उपादेयता, संप्रेषण और रस, क्रमशः इन चार विषयों को मनीषियों ने जिस स्पष्टता और सिद्धहस्तता से व्याख्यायित किया है, उसकी तुलना में आधुनिक युग में किये कार्य तुच्छ प्रतीत होते हैं। जिन भी कारणों से हम उनके बारे में न जान पाये और न गर्व कर पाये, उनकी चर्चा से श्रेयस्कर है उन्हें पढ़कर और समझकर ग्रहण कर सकना।

संस्कृत से जुड़ाव अपने ग्रन्थों को उनके मौलिक स्वरूप में समझने का उपक्रम था। शब्दों की उत्पत्ति और अर्थ मेरे लिये एक सतत और अनवरत कार्य हो चला है। किसी भी शब्द का लौकिक अर्थ उसकी उत्पत्ति से भिन्न हो प्रयोग में रहता है पर उसे धातु, उपसर्ग और प्रत्यय में पृथक कर देखने से अर्थ अपने मौलिक स्वरूप में वापस दिखने लगता है। इस दृष्टि और अनुभव ने स्वाध्याय और अभिव्यक्ति की गुणवत्ता और स्तर को कई गुना बढ़ा दिया है। पहले एक झिझक और संकोच सा रहता था कि शब्द अभीप्सित अर्थ को व्यक्त कर पायेगा कि नहीं। अब एक नहीं कई शब्द आकर प्रतियोगिता करते हैं, आकर अपना पक्ष रखते हैं। संस्कृत समझने से अभिव्यक्ति सरल हो चली है।


मनीष का उपहार है कि उन्होंने प्रथम बार अभिनवगुप्त के बारे में परिचय कराया। उन्होंने भी कहीं सुना था कि अभिनवगुप्त के नाट्यशास्त्र संबंधित सिद्धान्त कई स्थानों के पाठ्यक्रम में हैं। भरत के नाट्यशास्त्र के बारे में तो सुना था पर अभिनवगुप्त को पहली बार जाना। मनीष बड़े ही उत्सुक और उत्साहित जीव है। वह बताकर निश्चिन्त हो जाते हैं, जानते थे कि हम पढ़ेंगे और उसके बारे में उन्हें बतायेंगे भी। पढ़ा भी, चर्चा भी की और यह उनका ही आग्रह था कि उसके बारे में लिखूँ। उनका स्नेहमयी आग्रह मेरे लिये आदेश है। मैं लिखूँगा भी पर छात्रावास के संदर्भ में अभिनवगुप्त का एक सूत्र बड़ा ही प्रासंगिक है। विषय था फिल्म या दूरदर्शन पर प्रतिबन्ध का।


वीतविध्नप्रतीतिग्राह्योभाव एव रसः। विघ्न के परे प्रतीति के ग्रहण का भाव ही रस है। प्रतीति, प्रति और इण(गतौ), सामने से आने का भाव, या ज्ञान। उसका ग्रहण और उससे उत्पन्न रस। यथारूप, बिना विघ्न के भावों का संचरण रस उत्पन्न करता है। रसविघ्न ७ प्रकार के होते हैं, उनके विस्तार में फिर कभी। नाटक, फिल्म, कविता, कथा आदि के संदर्भ में रस मुख्यतः चार स्तरों में उत्पन्न होता है। वह पात्र जिस पर नाटक लिखा गया, वह लेखक या कवि जिसने लिखा, वह अभिनेता जिसने अभिनय किया और वह दर्शक या पाठक जिसने उसे देखा या पढ़ा। बीच में कई और स्तर आ सकते हैं, संभव है कि पात्र का लेखक से या लेखक का अभिनेता से सीधा संबंध नहीं हो। उस स्थिति में रस के और भी मध्यस्थ संवाहक जुड़ जाते हैं।


उदाहरण लें, राम का सीता का पता लगाना, करुणा रस। राम पूछते हैं, हे खग मृग, हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनैनी। राम के नयन आर्द्र हैं, पक्षियों, पशुओं, भौरों से भावविह्वल हो सीता के बारे में पूछ रहे हैं। पात्र राम हैं, कवि तुलसीदास हैं, मंचन रामलीला का हो रहा है और अश्रु हमारे बह रहे हैं। एक बार नहीं, जितनी बार पढ़ा या देखा, जितनी बार भी उस घटना पर विघ्नरहित हो विचारा, उतनी बार।


रस की विशुद्ध अनुभूति चमत्कार कहलाती है। नाट्यशास्त्र में चमत्कार को आनन्द की क्षणिक अनुभूति कहा जाता है। रस परम का ऐन्द्रिय अनुभव है, क्षणिक ही सही। शतप्रतिशत रस संचरण तो संभव नहीं है। राम का अपार दुख अनुभव करा पाना संभव नहीं है, पर यथासंभव संचरण के कई तकनीकी पक्ष हैं। भावों के कई भाग हैं, विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी और संचारी भाव। इनका समुचित अनुपात ही रससंचरण को प्रभावी बना पाता है। उसका विवरण फिर कभी।


महत्वपूर्ण प्रश्न यहाँ पर यह आता है कि रस हमारे अन्दर पहले से ही विद्यमान है या संचरित हो हम तक पहुँचता है। अभिनवगुप्त के अनुसार यदि रस पहले से विद्यमान न हो, तो वह उत्पन्न नहीं हो सकता है। भाव बस पहले से बँधे तारों को झंकृत कर जाते हैं, अनुनादित कर जाते हैं, और स्वर बह निकलते हैं। इसे अभिनवगुप्त ने “प्रत्याभिज्ञ” दर्शन के माध्यम समझाया है। किसी को देखना प्रत्यक्ष है, पहचानना स्मृति से होता है। प्रत्यक्ष और स्मृति में एकरूपता आने से ज्ञान या पहचान होती है। स्मृति पूर्व में हुआ प्रत्यक्ष है। स्मृति के स्थान पर उस व्यक्ति के बारे में सुने वचन भी हो सकते हैं, जैसे अमुक व्यक्ति लम्बी श्वेत दाढ़ी वाला है। आप जैसे ही उस तरह के व्यक्ति को देखते हैं, उसे पहचान लेते हैं। यदि यह तथ्य आपको ज्ञात नहीं होगा, आप पहचान नहीं पायेंगे।


समाधि की स्थिति में भी वही प्रज्ञा प्रकट होती है, न प्रत्यक्ष से, न अनुमान से, न शब्द से। जो अन्दर पहले से विद्यमान है, वही प्रकट हो जाता है। स्थितप्रज्ञता, ऋतम्भरा प्रज्ञा, प्रातिभ ज्ञान, सब के सब उसी ज्ञान को इंगित करते हैं, बस गुरु या दैवीय माध्यम से और दीक्षा की प्रक्रिया से प्रत्यक्ष हो जाता है, विघ्न हट जाने से। आत्मज्ञान के बाद दृष्टि बदल जाती है, दृष्टि से सृष्टि बदल जाती है।


रस को काल्पनिक नहीं कह सकते हैं, क्योंकि वह अनुभव किया हुआ है हम सबका, एक नहीं दस प्रकार का। हम सबके अन्दर रस है, माध्यम कोई अच्छी पुस्तक हो सकती है, कोई अच्छा नाटक या कोई अच्छी फिल्म। इस परिप्रेक्ष्य में मुझे कभी समझ आया ही नहीं कि फिल्मों जैसे सशक्त माध्यम से हमें क्यों विलग रखा गया? क्यों बद्ध मानसिकता से जनित अतृप्त चाह बढ़ने दी गयी, जो बहुधा विकृत हो प्रकट हुयी। 


ऐसे ही कई प्रश्न और उससे जूझता बालमन, अगले ब्लाग में।