23.10.21

मित्र - ३४(शुक्रवार की फिल्म)

यहाँ पर एक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है कि सभी छात्रावासी फिल्मों के प्रति इतने उत्साहित नहीं थे। कुछ उस समय का उपयोग अध्ययन में करते थे। कुछ जो देखने को मिल जाये, उसी को देखकर संतुष्ट हो जाते थे, अन्यथा प्रयास नहीं करते थे। कुछ संभावनाओं पर दृष्टि अवश्य रखते थे पर स्वयं कुछ भी साहसिक करने से बचते थे। यदि कोई व्यवस्था ऐसी स्थापित हो जाये जो कि कष्टप्रद न हो और उसमें पकड़े जाने की संभावना भी कम हो तो वे उसमें सम्मिलित हो जाते थे। पूरे छात्रावास में लगभग दस ही ऐसे अग्रणी महारथी थे जो परिधि का विस्तार बढ़ाने के सतत प्रयत्न में लगे रहते थे। संतुष्टि शब्द उनके लिये नहीं था, सीमायें उनके लिये नहीं थी, उनकी आँखों में चमक तब आती थी जब उत्पात का कोई विचार योजना की परिपक्वता के निकट होता था।

ऐसे लोग अप्राप्य को ध्येय बनाये रहते हैं और व्यस्त रहते हैं। टीवी के सारे कार्यक्रमों में बस एक ही अप्राप्य रह गया था, शुक्रवार देर रात की फिल्म। उसको देखने की बात तो दूर, उसकी चर्चा भी चारित्रिक अपयश ला सकती थी। रात ११ बजे प्रारम्भ होने वाली यह फिल्म शयनकाल में पड़ती थी, वयस्कों के लिये थी और किसी प्रकार से उचित नहीं ठहरायी जा सकती थी। फिर भी कुछ साहसी उसे देखने के लिये प्रयत्नशील रहते थे।


रात्रि के कार्यक्रमों में सबसे बड़ी बाधा यह थी कि वे किसी के घर जाकर नहीं देखे जो सकते थे। यह न केवल उनका व्यक्तिगत समय होता है वरन सबके सोने का समय होता है। मुझे स्पष्ट याद है कि जब १९८६ में फुटबाल का वर्ल्डकप आ रहा था तो मैच मध्य रात्रि को आते थे। फुटबाल के प्रति न केवल मुझे प्रेम था वरन पिताजी का भी उत्साह देखते बनता था। हम लोग पशोपेश में थे कि क्या किया जाये? निर्णय यही हुआ कि टीवी लिया जाये। इस प्रकार हमारे घर में प्रथम टीवी आया।


शुक्रवार देर रात्रि के फिल्म के लिये छात्रावास के टीवी पर ही आश्रय था, शेष अन्य टीवी अचिन्त्य थे। एक बार अनुमति के लिये प्रार्थनापत्र लिखा गया। उत्सुकजन सार्वजनिक रूप से जो निर्लज्ज किये गये कि उसके बाद से वैधानिक उपायों से फिल्म देखने का विचार आना भी बन्द हो गया। अब जो भी करना था, गुप्त रूप से करना था।


टीवी कक्ष प्रारम्भिक वर्षों में भोजनालय के साथ वाले कक्ष में था, जो कि आधार तल में था। छात्रावास प्रथम तल में था। जब छात्रावास में संख्या बढ़ी तो टीवी कक्ष भोजनालय में समा गया और टीवी कक्ष प्रथम तल में चला गया। छात्रावास के कुछ और कक्ष भी तब प्रथम तल में आ गये। उस समय छात्रावास के कक्षों के बीच ही टीवी कक्ष था। दोनों ही समय टीवी एक बड़े पल्ले की लकड़ी की अल्मारी में रहता था और उस पर एक ताला लगा रहता था। ताले की चाभी छात्रावास प्रमुख के पास थी। साथ में एक ताला कक्ष में भी लगा दिया जाता था।


प्रथम तल के टीवी कक्ष में दो चाभियों की व्यवस्था करनी होती थी, या तो छात्रावास प्रमुख से माँग कर या पार कर या उसकी प्रतिलिपि बनवा कर। इसमें दूसरा और तीसरा उपाय अधिक उपयोग में आया क्योंकि चाभी देने का पूरा उत्तरदायित्व छात्रावास प्रमुख पर ही आता। जब आधार तल में टीवी कक्ष था तब भोजनालय और टीवी कक्ष के बीच में एक किवाड़ था। भोजनालय में ही ताला बन्द होता था, टीवी कक्ष का कपाट अन्दर से बन्द किया जाता था। भोजन के बाद बर्तनों की सफाई के समय यदि किवाड़ के अन्दर की चिटकनी खोल दी जाती थी तो भोजनालय के ताले की चाभी की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।


एक बार जब अल्मारी का ताला बदला पाया गया तो कुण्डी के बोल्ट खोलकर फिल्म देखी गयी। उस समय दो सावधानियाँ रखी जाती थी। पहली सावधानी यह कि जो भी आता था वह अपने बिस्तर पर तकिया के ऊपर चादर चढ़ाकर आता था जिससे यह पता न लगे कि कोई अनुपस्थित है। दूसरी सावधानी में टीवी कक्ष का प्रकाश बन्द रखा जाता था और खिड़की पर चादर लगा कर टीवी से बाहर आ रहे प्रकाश को भी रोक दिया जाता था।


यह बताना कठिन है कि इस प्रकार कितनी बार हमें शुक्रवार की फिल्म देखने में सफलता मिली। सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि उस समय शेष सभी लोग विशेषकर छात्रावास अधीक्षक सो गये हों। हमारे महती प्रयासों की सुन्दर संरचना पर तुषारापात उस समय हुआ जब चादर की झीने प्रकाश के पीछे दीपकजी दिखायी पड़े। उसके बाद से न केवल शुक्रवार हाथ से गया वरन दण्डस्वरूप अन्य फिल्मों से भी हाथ धोना पड़ा।


फिर भी सब कुछ हाथ से नहीं गया था, जानेंगे अगले ब्लाग में।

1 comment:

  1. अब मोबाइल पर इतने OTT हैं. सारा एडवेंचर ही चौपट हो गया है. जिंदगी insipid हो गई है. या कुछ और तरह के एडवेंचर्स आ गए हैं जिनकी हमें हवा ही नहीं?

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