6.4.21

मित्र - २३

पाणिनि, पतंजलि, भृतहरि और अभिनवगुप्त को उनकी कृतियों के माध्यम से जानना मेरे लिये एक अद्भुत अनुभव रहा है। अभिव्यक्ति को उसके स्वरूप में समझ सकने का अतिलघु स्पंद ही इतना आनन्द दे जाता है कि बार बार उतर कर और गहरे डुबकी लगाने का मन करता है। भाषा, उसकी उपादेयता, संप्रेषण और रस, क्रमशः इन चार विषयों को मनीषियों ने जिस स्पष्टता और सिद्धहस्तता से व्याख्यायित किया है, उसकी तुलना में आधुनिक युग में किये कार्य तुच्छ प्रतीत होते हैं। जिन भी कारणों से हम उनके बारे में न जान पाये और न गर्व कर पाये, उनकी चर्चा से श्रेयस्कर है उन्हें पढ़कर और समझकर ग्रहण कर सकना।

संस्कृत से जुड़ाव अपने ग्रन्थों को उनके मौलिक स्वरूप में समझने का उपक्रम था। शब्दों की उत्पत्ति और अर्थ मेरे लिये एक सतत और अनवरत कार्य हो चला है। किसी भी शब्द का लौकिक अर्थ उसकी उत्पत्ति से भिन्न हो प्रयोग में रहता है पर उसे धातु, उपसर्ग और प्रत्यय में पृथक कर देखने से अर्थ अपने मौलिक स्वरूप में वापस दिखने लगता है। इस दृष्टि और अनुभव ने स्वाध्याय और अभिव्यक्ति की गुणवत्ता और स्तर को कई गुना बढ़ा दिया है। पहले एक झिझक और संकोच सा रहता था कि शब्द अभीप्सित अर्थ को व्यक्त कर पायेगा कि नहीं। अब एक नहीं कई शब्द आकर प्रतियोगिता करते हैं, आकर अपना पक्ष रखते हैं। संस्कृत समझने से अभिव्यक्ति सरल हो चली है।


मनीष का उपहार है कि उन्होंने प्रथम बार अभिनवगुप्त के बारे में परिचय कराया। उन्होंने भी कहीं सुना था कि अभिनवगुप्त के नाट्यशास्त्र संबंधित सिद्धान्त कई स्थानों के पाठ्यक्रम में हैं। भरत के नाट्यशास्त्र के बारे में तो सुना था पर अभिनवगुप्त को पहली बार जाना। मनीष बड़े ही उत्सुक और उत्साहित जीव है। वह बताकर निश्चिन्त हो जाते हैं, जानते थे कि हम पढ़ेंगे और उसके बारे में उन्हें बतायेंगे भी। पढ़ा भी, चर्चा भी की और यह उनका ही आग्रह था कि उसके बारे में लिखूँ। उनका स्नेहमयी आग्रह मेरे लिये आदेश है। मैं लिखूँगा भी पर छात्रावास के संदर्भ में अभिनवगुप्त का एक सूत्र बड़ा ही प्रासंगिक है। विषय था फिल्म या दूरदर्शन पर प्रतिबन्ध का।


वीतविध्नप्रतीतिग्राह्योभाव एव रसः। विघ्न के परे प्रतीति के ग्रहण का भाव ही रस है। प्रतीति, प्रति और इण(गतौ), सामने से आने का भाव, या ज्ञान। उसका ग्रहण और उससे उत्पन्न रस। यथारूप, बिना विघ्न के भावों का संचरण रस उत्पन्न करता है। रसविघ्न ७ प्रकार के होते हैं, उनके विस्तार में फिर कभी। नाटक, फिल्म, कविता, कथा आदि के संदर्भ में रस मुख्यतः चार स्तरों में उत्पन्न होता है। वह पात्र जिस पर नाटक लिखा गया, वह लेखक या कवि जिसने लिखा, वह अभिनेता जिसने अभिनय किया और वह दर्शक या पाठक जिसने उसे देखा या पढ़ा। बीच में कई और स्तर आ सकते हैं, संभव है कि पात्र का लेखक से या लेखक का अभिनेता से सीधा संबंध नहीं हो। उस स्थिति में रस के और भी मध्यस्थ संवाहक जुड़ जाते हैं।


उदाहरण लें, राम का सीता का पता लगाना, करुणा रस। राम पूछते हैं, हे खग मृग, हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनैनी। राम के नयन आर्द्र हैं, पक्षियों, पशुओं, भौरों से भावविह्वल हो सीता के बारे में पूछ रहे हैं। पात्र राम हैं, कवि तुलसीदास हैं, मंचन रामलीला का हो रहा है और अश्रु हमारे बह रहे हैं। एक बार नहीं, जितनी बार पढ़ा या देखा, जितनी बार भी उस घटना पर विघ्नरहित हो विचारा, उतनी बार।


रस की विशुद्ध अनुभूति चमत्कार कहलाती है। नाट्यशास्त्र में चमत्कार को आनन्द की क्षणिक अनुभूति कहा जाता है। रस परम का ऐन्द्रिय अनुभव है, क्षणिक ही सही। शतप्रतिशत रस संचरण तो संभव नहीं है। राम का अपार दुख अनुभव करा पाना संभव नहीं है, पर यथासंभव संचरण के कई तकनीकी पक्ष हैं। भावों के कई भाग हैं, विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी और संचारी भाव। इनका समुचित अनुपात ही रससंचरण को प्रभावी बना पाता है। उसका विवरण फिर कभी।


महत्वपूर्ण प्रश्न यहाँ पर यह आता है कि रस हमारे अन्दर पहले से ही विद्यमान है या संचरित हो हम तक पहुँचता है। अभिनवगुप्त के अनुसार यदि रस पहले से विद्यमान न हो, तो वह उत्पन्न नहीं हो सकता है। भाव बस पहले से बँधे तारों को झंकृत कर जाते हैं, अनुनादित कर जाते हैं, और स्वर बह निकलते हैं। इसे अभिनवगुप्त ने “प्रत्याभिज्ञ” दर्शन के माध्यम समझाया है। किसी को देखना प्रत्यक्ष है, पहचानना स्मृति से होता है। प्रत्यक्ष और स्मृति में एकरूपता आने से ज्ञान या पहचान होती है। स्मृति पूर्व में हुआ प्रत्यक्ष है। स्मृति के स्थान पर उस व्यक्ति के बारे में सुने वचन भी हो सकते हैं, जैसे अमुक व्यक्ति लम्बी श्वेत दाढ़ी वाला है। आप जैसे ही उस तरह के व्यक्ति को देखते हैं, उसे पहचान लेते हैं। यदि यह तथ्य आपको ज्ञात नहीं होगा, आप पहचान नहीं पायेंगे।


समाधि की स्थिति में भी वही प्रज्ञा प्रकट होती है, न प्रत्यक्ष से, न अनुमान से, न शब्द से। जो अन्दर पहले से विद्यमान है, वही प्रकट हो जाता है। स्थितप्रज्ञता, ऋतम्भरा प्रज्ञा, प्रातिभ ज्ञान, सब के सब उसी ज्ञान को इंगित करते हैं, बस गुरु या दैवीय माध्यम से और दीक्षा की प्रक्रिया से प्रत्यक्ष हो जाता है, विघ्न हट जाने से। आत्मज्ञान के बाद दृष्टि बदल जाती है, दृष्टि से सृष्टि बदल जाती है।


रस को काल्पनिक नहीं कह सकते हैं, क्योंकि वह अनुभव किया हुआ है हम सबका, एक नहीं दस प्रकार का। हम सबके अन्दर रस है, माध्यम कोई अच्छी पुस्तक हो सकती है, कोई अच्छा नाटक या कोई अच्छी फिल्म। इस परिप्रेक्ष्य में मुझे कभी समझ आया ही नहीं कि फिल्मों जैसे सशक्त माध्यम से हमें क्यों विलग रखा गया? क्यों बद्ध मानसिकता से जनित अतृप्त चाह बढ़ने दी गयी, जो बहुधा विकृत हो प्रकट हुयी। 


ऐसे ही कई प्रश्न और उससे जूझता बालमन, अगले ब्लाग में।

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