2.10.21

शब्द सामर्थ्य

 

शब्द भाव-गाम्भीर्य समझने में होते असमर्थ,

व्यर्थ ही डूबा जाता अर्थ ।

कल्पना को चित्रित कर सके,

वाक्य में ऐसी अब सामर्थ्य कहाँ है ?

 

मनुज के भावों से रसहीन, 

आज यह कविता सुख बेकार,

पुनः है काव्य खड़ा लाचार ।

अनुभवों को चित्रित कर सके,

आज रचना में ऐसी धार कहाँ है ?

 

न हो ज्यादा विस्तार, 

सहज हो अनुपम हो सौन्दर्य,

स्वतः ही छलके जो तात्पर्य ।

प्रयत्नों को निष्फल कर सके,

प्रकृति में वह जीवित बल वेग कहाँ है ?

 

मन के रोगों का उपचार, 

मनुज के जीवन का आधार,

जहाँ है काव्य शाख विस्तार ।

अब काव्य पिपासा त्याग सके,

मानव में वह अधिकार कहाँ है ?

2 comments:

  1. कवि मन की पीड़ा और अभिव्यंजना करती सुंदर उत्कृष्ट रचना । प्रवीण जी आपको बहुत शुभकामनाएं ।

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  2. कल्पना और यथार्थ के बीच झूलता कवि ह्रदय लाचार नहीं हो सकता कविता अपना मार्ग ढूंढ ही लेती है !! उत्कृष्ट सृजन !!

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