14.10.21

राम का निर्णय (प्रयाण)

 

सुमन्त्र का मन कैकेयी की कुटिल गति देखकर बिद्ध था। प्रातः से ही कैकेयी के आचरण ने उनको व्यथित कर रखा था। दशरथ और राम के बीच का यह संवाद सुनकर राज परिवार में मर्यादा का यथासम्भव मान रखने वाले सुमन्त्र का धैर्य भी टूट गया। मूर्च्छित दशरथ राम के कन्धे पर टिके थे, कक्ष में मचा हाहाकार शान्त हो चुका था, सबको व्यग्रता से प्रतीक्षा थी कि दशरथ की चेतना वापस लौटे। राम को आज्ञा पाने और शीघ्रता से वनगमन की आकुलता थी। संताप और समय की स्तब्धता ने सुमन्त्र को अवसर दिया कि वह कैकेयी को समझायें और अपना हठ त्यागने को प्रेरित करें। तनिक क्रोध भरे कंपित स्वर में सुमन्त्र ने कहा। 


देवि, जब तुमने अपने पति राजा दशरथ का ही त्याग कर दिया है तो हे कुलघातिनी, ऐसा कोई कुकर्म शेष नहीं रहा जो तुम न कर सको। जिस प्रतापी राजा ने तुम्हें इतना मान दिया, इतना ऐश्वर्य दिया, उसको इतना संताप न दो, इतना अपमान न करो। कुल की परम्परा से च्युत हो और अधर्मपूर्वक यदि तुम कार्य करोगी तो कौन ब्राह्मण, धर्मज्ञ, नगरवासी या सेवक यहाँ रुकेगा? तब किस पर तुम राज्य करोगी? 


मुझे लगता है देवि कि तुम्हारा स्वभाव भी तुम्हारी माता पर गया है। तुम्हारी माता के दुराग्रह से हम परिचित हैं और यह भी जानते हैं कि किस प्रकार एक साधु द्वारा तुम्हारे पिता को दिये गये वर से ज्ञात किसी तथ्य को जानने के लिये उन्होंने हठपूर्वक आचरण किया था। तथ्य बताने पर तुम्हारे पिता की मृत्यु निश्चित थी पर मना करने पर भी तुम्हारी माँ नहीं मानी। तब साधु से विमर्श करके तुम्हारे पिता ने तुम्हारी माँ को घर से निकाल दिया था। आज तुम अपनी माँ के समान ही हठ पर अड़ी हो। यह रघुकुल की ही मर्यादा और कुलपरम्परा है कि तुम्हें अपनी माँ जैसा दण्ड नहीं मिल रहा है। अभी भी चेत जाओ और राम को वन जाने से रोक लो। अपयश मत पाओ। राम सा आज्ञाकारी पुत्र त्याग कर तुम कहीं प्रसन्न नहीं रहोगी। सुमन्त्र के तीक्ष्ण, उद्वेलित और सार्वजनिक रूप से अपमानित करने वाले वचनों से भी कैकेयी के मुख पर कोई विकार नहीं आया। अपने वर पूर्ण होने के इतने निकट आ वह और भी कठोर हो गयी थी।


दशरथ चेतते हैं, राम को अपने समीप पाकर उनका हृदय शक्ति पा जाता था। सुमन्त्र को इस प्रकार कैकेयी को समझाते हुये सुनते भी हैं। मन में एक निश्चय कर सुमन्त्र को आज्ञा देते हैं। सूत, तुम रत्नों से भरी चतुरङ्गिणी सेना राम के साथ वन भेजो। वणिजों, सेविकाओं और राम के समस्त सहायकों को प्रचुर धन सहित राम के साथ जाने की आज्ञा दो। कोष, अन्न और समस्त मनोवाञ्छित भोगों से सम्पन्न कर राम को यहाँ से भेजा जाये। शेष अयोध्या का पालन भरत करेंगे। पूर्व में सुमन्त्र के वचनों से आहत हुयी और मन में क्रोध समाये कैकेयी तमतमा कर सहसा बोल उठी कि महाराज आप ऐसा नहीं कर सकते, तब भरत के लिये शेष ही क्या रहेगा? दशरथ ने कहा कि इस प्रकार का कोई प्रतिबन्ध तो तूने अपने वरों में नहीं लगाया था। कैकेयी का क्रोध अब कुल पर लक्षित हो गया था, वह बोली कि जिस प्रकार आपके पूर्वज राजा सगर ने अपने पुत्र असमञ्ज को राज्य से निकाल दिया था उसी प्रकार आप राम को निष्काषित कर राज्य के द्वार सदा के लिये बन्द कर दीजिये। जानबूझकर की गयी इस अपमानपूर्ण तुलना पर कक्ष में सभी लोग कैकेयी को धिक्कारने लगे। तब राज्य के आदरणीय और वयोवद्ध मन्त्री सिद्धार्थ आगे बढ़कर कैकेयी से तथ्यों को स्पष्ट करते हैं।


देवि, असमञ्ज दुष्ट बुद्धि का था, मार्ग पर खेल रहे बालकों को सरयू में फेंक देने को अपना मनोरञ्जन समझता था। प्रजाजनों द्वारा राजा सगर को जब इस संदर्भ में निवेदन किया गया तो उन्होंने मन्त्रियों के साथ राजकुमार के अन्य कार्यकलापों के बारे में मन्त्रणा कर उसे राज्य से बाहर भेजने का निर्णय किया था। राज्य के हित में सगर ने अपने अहितकारी पुत्र को त्याग दिया था। देवि, राम ने कौन सा अपराध किया है? हम सब लोग राम में एक भी अवगुण नहीं देखते हैं। यदि तुम्हें किञ्चित भी कोई दोष दिखता हो कहो पर इस प्रकार अनर्गल प्रलाप मत करो। अभी भी चेत जाओ और लोकनिन्दा से बचो। यह सुनकर दशरथ कैकेयी को झिड़कते हुये बोले, “पापरुपणी, तेरी सारी चेष्टायें साधुपुरुषों के विपरीत हैं। मैं भी सारा राज्य त्याग कर राम के पीछे चला जाऊँगा, तू राज्य का सुख भोग”।


माँ कैकेयी के प्रति पिता की क्षुब्धता और सभा में व्याप्त आकुलता देख राम अत्यन्त विनीत स्वर में कहते हैं। पिताजी, मैं समस्त भोगों का त्याग कर चुका हूँ और वन में वन के द्वारा ही जीवन निर्वाह करना चाहता हूँ। मुझे सेना से क्या प्रयोजन? उत्तम हाथी का त्याग कर बाँधे जाने वाले रस्से से क्या आसक्ति? मुझे तो माँ कैकेयी वल्कल वस्त्र ला दें।


राम और लक्ष्मण दोनों ने ही पिता के सामने ही वल्कल वसन धारण कर लिये। कक्ष में सबकी आँखों में अश्रु छलक आये। चीर धारण में कुशल न होने के कारण सीता रुद्ध और लज्जा भरे स्वर में राम को सहायता के लिये पुकारती है। राम राजस्त्रियों के बीच पहुँच कर सीता को वल्कल वस्त्र बाँधना बताते हैं। वहाँ उपस्थित मातायें और सभी नारियाँ राम से तनिक खिन्न स्वर में कहती है कि हे राम सीता को इस प्रकार वन में रहने की आज्ञा नहीं दी गयी है। माताओं के इस प्रकार कहने पर भी राम ने सीता को वल्कल वस्त्र पहना दिये। यह देखकर प्रशान्त स्वभाव के गुरु वशिष्ठ के भी नेत्रों में करुणाश्रु छलक आये। वह सीता को रोककर कुपित स्वर में कैकेयी से बोले। 


“अधर्मप्रवृत्त दुर्बुद्धि कैकेयी, तू कैकेयराज के कुल का कलङ्क है। राजा से छल कर अब पुनः अपनी सीमा लाँघ रही है। सीता राम की अर्धाङ्गिनी हैं। राम के पश्चात उनका इस सिहांसन पर अधिकार है। वह अब राम को प्रस्तुत हुये सिंहासन पर बैठेंगी। देवी सीता वन नहीं जायेंगी।”


गुरु वशिष्ठ से धर्म और नीति की व्याख्या सुन और सीता का अधिकार जानकर कैकेयी का मद तनिक ठहर गया। गुरु वशिष्ठ आगे कहते हैं। “यदि देवी सीता फिर भी वन जाती हैं तो हम सब और नगरवासी भी वन चले जायेंगे। और जिस भरत से बिना मन्त्रणा किये तूने यह प्रपंच रचा है, वह भरत भी तुझे धिक्कारेगा क्योंकि अयोध्या में कोई ऐसा नहीं है जो राम से स्नेह न करता हो। देवी सीता वल्कल वसन धारण नहीं करेंगी।” सीता सब सुनकर भी संकोचवश पति के समान ही वल्कल वसन धारण किये रही। यह देख दशरथ ने कैकेयी को धिक्कारते हुये सीता पर वल्कल वसन पहनने की बाध्यता समाप्त कर अपनी अभिरुचि, गरिमा और सुख के अनुसार वस्त्र और आभूषण धारण करने की व्यवस्था और आज्ञा दी।


दशरथ ने सुमन्त्र को रथ से राम को वन तक छोड़ आने की आज्ञा दी। राम ने पिता दशरथ से माँ कौशल्या के शोकनिवारण हेतु विशेष स्नेह देने की प्रार्थना की। माँ कौशल्या ने सीता को चौदह वर्ष के लिये पर्याप्त वस्त्र और आभूषण दिये और पति के साथ वन में जीवन निर्वाह करने के सूत्र दिये। माँ सुमित्रा ने पुत्र लक्ष्मण को नीति और सेवा सम्बन्धी शिक्षा और आशीर्वाद दिया। सबको अश्रु में छोड़ और पिताजी और माताओं की परिक्रमा कर राम लक्ष्मण और सीता सहित कक्ष से बाहर निकल गये। 


राम मुखमण्डल पर अपने गुरुतर निर्णय को शान्त पर सगर्व भाव से धारण किये थे। वह क्रियान्वयन की रूपरेखा बनाते रथ पर चढ़ते हैं। सुमन्त्र रथ को हाँकते हैं, नगरवासी राम को शोकमना हो वनगमन करते देखते हैं। उनका प्रिय राजकुमार राम अपनी अयोध्या छोड़ रहा है।

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