23.7.11

तोड़ महलिया बना रहे

उन्मादित सब जीव, वृक्ष भी,
अन्तरमन भी और दृश्य भी,
एक व्यवस्था परिचायक है,
अह्लादित हैं ईश, भक्त भी,

रहें विविध सब, पर मिल रहतीं,
भाँति भाँति की संरचनायें,
एक सृष्टि बन उतरी, फैलीं,
परम ईश की विविध विधायें,

नहीं अधिक है, नहीं कहीं कम,
जितनी जीवन को आवश्यक,
सहज रूप में स्वतः प्राप्त सब,
प्रकृति पालती रहे मातृवत,

धरती माँ सी, रहती तत्पर,
वन, नद, खनिज अपार सजी है,
तरह तरह के पशु पक्षी हैं,
पुष्प, वृक्ष, फल, शाक सभी हैं,

महासंतुलन सब अंगों में,
एक दूजे के प्रेरक, पूरक,
रहें परस्पर सुख से बढ़ते,
सब जीते हैं औरों के हित,

मानव ने पर अंधेपन में,
अपनी तृष्णा का घट भरने,
सकल प्रकृति को साधन समझा,
ढाये अत्याचार घिनौने,

संकेतों से प्रकृति बोलती,
समझो और स्वीकार करो,
जितने अंग विदेह किये हैं,
प्रकृति अंक में पुनः भरो,

देखो सब है प्राप्त, पिपासा-फन क्यों फैले?
सम्मिलित सभी सृष्टि में, फिर क्यों दंश विषैले?
किसकी बलि पर किसका बल हम बढ़ा रहे?
एक नगर था, तोड़ महलिया बना रहे ।

73 comments:

  1. उत्कृष्ट ...अनमोल भावनाओं से सजी ..संवरी ...एक प्रबल विचार देती हुई ...सटीक ..सुंदर रचना..!!
    आओ ये प्रण लें ..कर्मवीर बने हम सब ..वसुंधरा को सिसकने न दें ...!!
    इस रचना के लिए बधाई और अपने उद्देश्य पूर्ती के लिए शुभकामनायें ...!!

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  2. धरती की चिंता किसी को नहीं. सब गाल बजइये हैं.

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  3. वाकई हम धरती को माँ का सम्मान देने में असफल रहे हैं !

    धरती की छाती से निकली
    सहमी सहमी कोंपलें दिखे
    काला गहराता धुआं देख,
    कलियों में वह मुस्कान नहीं
    जलवायु प्रकृति को दूषित कर धरती लगती खाली खाली,
    विध्वंस हाथ से अपना कर क्यों लोग मनाते दीवाली ?

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  4. उत्कृष्ट रचना

    way4host

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  5. संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो,
    जितने अंग विदेह किये हैं,
    प्रकृति अंक में पुनः भरो,

    चेतना जगाती श्रेष्ठ रचना.समाधान भी साथ में उल्लेखित हैं.

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  6. सुन्दर पर्यावरण गीत...

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  7. हालात पर समग्र दृष्टि.
    कविता की हासिल पंक्ति- 'महासंतुलन सब अंगों में, एक दूजे के प्रेरक, पूरक' के 'महा' शब्‍द को 'सहज' बदल कर पढ़ा, मुझे भाया.

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  8. शुद्ध भाषा का कविता मे प्रयोग निसन्देह संग्रहण योग्य है

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  9. खूबसूरत कविता,सुन्दर प्रस्तुति.

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  10. प्रकृति को नुकसान पहुँचाता मानव। क्या किया जाए?

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  11. झूठे विकास की पोल खोलती विज्ञान-कविता !

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  12. देखो सब है प्राप्त, पिपासा-फन क्यों फैले?
    सम्मिलित सभी सृष्टि में, फिर क्यों दंश विषैले?
    किसकी बलि पर किसका बल हम बढ़ा रहे?
    एक नगर था, तोड़ महलिया बना रहे ।
    bahut hi zaruri baaten ... adwitiye rachna

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  13. संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो,
    जितने अंग विदेह किये हैं,
    प्रकृति अंक में पुनः भरो...
    --
    बहुत सुन्दर प्रेरक रचना!

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  14. देखो सब है प्राप्त, पिपासा-फन क्यों फैले?
    सम्मिलित सभी सृष्टि में, फिर क्यों दंश विषैले?
    किसकी बलि पर किसका बल हम बढ़ा रहे?
    एक नगर था, तोड़ महलिया बना रहे ।
    zaruri vichaar, adwitiye rachna

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  15. मनुष्य के अनतरबोद्ध को जाग्रत करती रचना अनुकरणीय है ।

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  16. रहें परस्पर सुख से बढ़ते,
    सब जीते हैं औरों के हित ||

    पर मनुष्य,
    मनुष्य अपनी बुद्धि का खुद
    शिकार हो गया है ||
    स्वार्थ सर्वोपरि ||
    अपना - अपना परिवार - मित्र-मण्डली ----क्रमश:

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  17. प्रवीण, आप की कविता प्रकृति तथा मानव के बीच जीवन की रक्षा हेतू शिष्टाचार व्यवहार का मंत्र है. धन्यवाद.

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  18. सर शीर्षक ही सब कुछ कह दिया ! प्रकृति को सुरक्षित रखना ही परमोधर्म होनी चाहिए !

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  19. हम प्रकृ्ति के प्रति अपना उत्तरदायित्व नही निभा रहे इसी चिन्ता को उजागर करता सुन्दर गीत। शुभकामनायें।

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  20. "मानव ने पर अंधेपन में,
    अपनी तृष्णा का घट भरने,
    सकल प्रकृति को साधन समझा,
    ढाये अत्याचार घिनौने"
    बहुत ही सुन्दर रचना. प्रकृति की गोद भरने का यही वक्त भी है.

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  21. जितना लूट सकते हो लूट लो अपने बाप का क्या जायेगा की तर्ज पर बाप त्प स्वर्गे सिधार गया है और बेटा जब मां धरती नष्ट हो जायेगी तो अपने निजी प्लेन से उड़ कर विदेश भागे जायेगा

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  22. मानव ने पर अंधेपन में,
    अपनी तृष्णा का घट भरने,
    सकल प्रकृति को साधन समझा,
    ढाये अत्याचार घिनौने,

    संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो,
    जितने अंग विदेह किये हैं,
    प्रकृति अंक में पुनः भरो,

    अभी भी वक्त है ...यह चेतना जागृत करती हुयी सार्थक सन्देश दे रही है यह रचना ..सुन्दर प्रस्तुति

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  23. प्रकृति को वन्दनीय मानना ही होगा, इसकी रक्षा का व्रत रखना ही होगा .

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  24. संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो,
    जितने अंग विदेह किये हैं,
    प्रकृति अंक में पुनः भरो,
    हम सभी को प्रकृति का संतुलन बनाये रखने का प्रयास तो करते ही रहना चाहिए.

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  25. संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो,
    जितने अंग विदेह किये हैं,
    प्रकृति अंक में पुनः भरो,

    बहुत खूब कहा है आपने ... बेहतरीन ।

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  26. सच्चाई बयाँ करती सुन्दर कविता।

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  27. छंदबद्ध प्रस्तुति| अनुपम शब्द संयोजन| काव्य की आत्मा के बेहद क़रीब| और चिंतन की तो क्या बात है प्रवीण भाई............ उम्दा चिंतन है|

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  28. मानव ने पर अंधेपन में,
    अपनी तृष्णा का घट भरने,
    सकल प्रकृति को साधन समझा,
    ढाये अत्याचार घिनौने,

    कितना सही कहा आपने...


    संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो,
    जितने अंग विदेह किये हैं,
    प्रकृति अंक में पुनः भरो,

    पर कौन सुनेगा यह...विध्वंसक बहरा अँधा और हृदयहीन हो चूका है...यह निवेदन उसके ह्रदय तक नहीं पहुंचेगा...
    जिस तेजी से ह्रास हो रहा है हमारे बाद की तीसरी चौथी पीढी जो संसार देखेगी ,वह कैसी होगी...
    विज्ञान का दंभ...पेड़ काट ,पहाड़ उजाड़ , एसी लगा रहे हैं, ठंडी हवा खाने को...
    लेकिन यह कबतक चलेगा...

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  29. नहीं अधिक है, नहीं कहीं कम,
    जितनी जीवन को आवश्यक,
    सहज रूप में स्वतः प्राप्त सब,
    प्रकृति पालती रहे मातृवत...

    काश यह सोच सभी अंगीकृत कर पाते..बहुत सार्थक और सुन्दर प्रस्तुति..

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  30. saral tatha sahaj parantu utna hi gambhir vishay.

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  31. मानव ने पर अंधेपन में,
    अपनी तृष्णा का घट भरने,
    सकल प्रकृति को साधन समझा,
    ढाये अत्याचार घिनौने,

    ऐसी पंक्तियाँ प्रकृति के दर्द को जीकर ही लिखी जाती हैं !
    पूरी कविता मन को आंदोलित करती है !
    आभार !

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  32. महासंतुलन सब अंगों में,
    एक दूजे के प्रेरक, पूरक,
    रहें परस्पर सुख से बढ़ते,
    सब जीते हैं औरों के हित,


    पर्यावरणीय संतुलन में ही पृथ्वी का भविष्य निहित है. अभी भी समय है कि इसे सब समझ लें.

    जागरूकता का संदेश देती महत्वपूर्ण रचना...

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  33. संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो,
    जितने अंग विदेह किये हैं,
    प्रकृति अंक में पुनः भरो,

    Hats of to this wonderful poet !

    Badhaii !

    .

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  34. काश सभी यही भावना रख सकें, सुंदर रचना

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  35. श्री सुनील दीपक जी के कथन से पूर्णतया सहमति और यही मेरी टीप मानी जाए ..... ऐसा मेरा अनुरोध है....


    और एक दूसरा निवेदन : nice post के लिए

    संजय अनेजा (मौ सम कौन) को उदृत करना चाहता हूँ : सिर्फ लिंक बेखेरकर जाने वाले महानुभाव कृपा अपना समय बरबाद न करें.

    आप भी टीप बॉक्स के उपर लगा लेवें . ये एक अनुरोध है.

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  36. बेहद गहरे अर्थों को समेटती खूबसूरत और संवेदनशील रचना. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  37. प्रकृति का विनाश कर हम ख़ुद का नाश कर रहे हैं।
    कविता के शिल्प, भाव और भाषा बहुत ही सुंदर लगे।

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  38. बहुत ही अच्छी सोच दर्शाती रचना .....

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  39. सही चेतावनी.....अपनी गलती के प्रति अब भी जागरूक हो जायें तभी कुछ हो सकता है ....

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  40. मानव की पिपासा का कहीं अंत नहीं॥

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  41. भारत में बढ़ती जनसंख्या पर तुरन्त नियन्त्रण नहीं हुआ तो हालात बेकाबू हो जायेंगे, पर अफसोस ऐसा होगा नहीं क्योंकि वोट किसे नहीं चाहिये...

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  42. वाह प्रवीण जी, सोदेश्य उत्तम रचना, आपके शब्दों का चयन बहुत सुन्दर है,आपकी रचना पढ़ कर मुझे अपनी रचना की एक पंक्ति स्मरण हो आयी है,

    "निशब्द शब्द जहर रहा,वन है आज मर रहा"

    प्रकृति के लिए आपकी भावनाओं को व्यक्त करती संवेदनशील रचना..

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  43. संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो,
    जितने अंग विदेह किये हैं,
    प्रकृति अंक में पुनः भरो,

    यह तो मेरे मन की बात है।

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  44. मानव ने पर अंधेपन में,
    अपनी तृष्णा का घट भरने,
    सकल प्रकृति को साधन समझा,
    ढाये अत्याचार घिनौने,

    बहुत सुन्दर भाव .

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  45. आओ ये प्रण लें ..कर्मवीर बने हम सब ..वसुंधरा को सिसकने न दें ..
    सुन्दर प्रस्तुति.

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  46. khubsurat aur sarthak abhivaykti....

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  47. khubsurat aur sarthak abhivaykti....

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  48. धरती चिंतन को इंगित करती .. अनुपम रच है ...

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  49. ''प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित
    हम सब थे भूले मद में,
    भोले थे, हाँ तिरते केवल
    सब विलासिता के नद में।''
    [कामायनी]

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  50. संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो,
    जितने अंग विदेह किये हैं,
    प्रकृति अंक में पुनः भरो,

    इस सच को हम जितनी जल्दी स्वीकार करें उतना ही श्रेयस्कर होगा मानव जाति के लिए !

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  51. आभार पाण्डेय जी |सुन्दर कविता बधाई |

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  52. आभार पाण्डेय जी |सुन्दर कविता बधाई |

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  53. 'संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो,'
    सच है प्रकृति बार -बार संकेत देती है मगर इंसान देख अनदेखा कर देता है..न जाने आने वाले युगों के भविष्य में क्या है?सुनामी/भूकंप..
    इस ज्वलंत विषय पर एक बहुत ही अच्छी कविता.

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  54. ईशावास्यमिदम सर्वं यत्किंचित जगत्यां जगत -
    तेंन त्यक्तानाम भुंजीथा ....
    याद आयी !

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  55. मानव ने पर अंधेपन में,
    अपनी तृष्णा का घट भरने,
    सकल प्रकृति को साधन समझा,
    ढाये अत्याचार घिनौने...

    प्रकृति के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होना आज की महती आवश्यकता है...
    एक जाग्रत करती सुगढ़ रचना...
    सादर....

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  56. किसकी बलि पर किसका बल हम बढ़ा रहे? एक नगर था, तोड़ महलिया बना रहे ।
    हर छोरों से आग बरसती, धरती रह रह आज सिसकती
    सार्थक सन्देश दे रही है यह रचना.......

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  57. बहुत सुन्दर प्रेरक, अनुकरणीय रचना|

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  58. धरती माँ को नमन करते हुए आपकी इस उत्कृष्ट रचना के लिए आपको साधुवाद!!!

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  59. बहुत ही बढ़िया आज से सरोकार रखती हुई रचना,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  60. प्रकृति को साधन समझा,
    ढाये अत्याचार घिनौने,
    संकेतों से प्रकृति बोलती,
    समझो और स्वीकार करो, जितने अंग विदेह किये हैं, प्रकृति अंक में पुनः भरो,
    देखो सब है प्राप्त, पिपासा-फन क्यों फैले? सम्मिलित सभी सृष्टि में, फिर क्यों दंश विषैले? .... prakriti ka sundra matraroopi chitran kar aadmi ko iske prati sachet kar jaagrukta ka yah prayas anukarniya hai...
    saarthak prastuti ke liya aabhar! .

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  61. पर्यावरण संतुलन पर इतनी अच्छी कविता पहली बार पढ़ी है, पूरी तरह सकारात्मक.

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  62. क्या बात है, बहुत सुंदर

    मानव ने पर अंधेपन में,
    अपनी तृष्णा का घट भरने,
    सकल प्रकृति को साधन समझा,
    ढाये अत्याचार घिनौने,

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  63. प्रकृति एक अनुपम धरोहर है इसे सहेज कर रखना ही श्रेयष्कर है

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  64. किसकी बलि पर किसका बल हम बढ़ा रहे?
    एक नगर था, तोड़ महलिया बना रहे ।

    पर्यावरण विनाश पर सही चेतावनी पर हम कहां सबक लेने वालों में से हैं ।

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  65. भावपूर्ण,सच को उकेरती सुन्दर रचना, आभार

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  66. Sabhi ko padhni chahaiye yh kavita aur is dhara ko bachaane ke liye kuch karna chahiye.

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  67. आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं.धरती की चिंता किसी को नहीं.
    _________________
    'पाखी की दुनिया' में भी घूमने आइयेगा.

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  68. प्रवीण पाण्डेय जी अभिवादन -उत्कृष्ट रचना , सुन्दर सन्देश देती ..आइये हम सब मिल प्रण करें धरती को बचाएं अधिक दोहन न करें अनावश्यक ...

    अपनी तृष्णा का घट भरने, सकल प्रकृति को साधन समझा, ढाये अत्याचार घिनौने,
    संकेतों से प्रकृति बोलती, समझो और स्वीकार करो, जितने अंग विदेह किये हैं, प्रकृति अंक में पुनः भरो,

    शुक्ल भ्रमर ५
    बाल झरोखा सत्यम की दुनिया

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  69. पारिस्थिति तंत्रों प्रकृति नटी के संरक्षण संवर्धन संतुलन का आवाहान करती महत्वपूर्ण पोस्ट .

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