2.7.11

एक के बाद एक

एक अँग्रेज़ी फिल्म है, गारफील्ड। गारफील्ड एक बिल्ले का नाम है जो अपने मालिक पर अपना एकाधिकार समझता है। एक दिन उसका मालिक, न चाहते हुये भी, अपनी प्रेमिका के दबाव में ओडी नाम का एक छोटा सा कुत्ता घर ले आता है। एकाधिकार से वंचित गारफील्ड सदा ही किसी न किसी जुगत में रहता है कि किस तरह वह ओडी को घर के बाहर भटका दे। एक दिन वह सफल हो जाता है और ओडी सड़क पर होता है। 


स्वभाववश ओडी सड़क पर एक जाते हुये वाहन के पीछे भागता है। चौराहे पर पहुँचते पहुँचते सामने से एक दूसरा वाहन निकलता है, ओडी उसके पीछे भागने लगता है। अगले चौराहे पर पुनः यही क्रम। भागते रहने की शक्ति होने तक वह यही करता रहता है और जब थक कर बैठता है तब उसे घर की याद आती है। वापस पहुँचने में वह घर का रास्ता भूल जाता है।

फिल्म मनोरंजक मोड़ ले अन्ततः सुखान्त होती है, ओडी को घर लाने में गारफील्ड महोदय ही महत भूमिका निभाते हैं।

ओडी के भटकने के दृश्य पर थोड़ा और विचार करें। एक के बाद एक लक्ष्य, सारे के सारे लक्ष्य ऐसे जो प्राप्त होना संभव नहीं, लक्ष्य प्राप्त होने पर भी कोई लाभ नहीं, इस निरर्थक प्रयास में होश ही नहीं कि कहाँ भाग रहे हैं, भागने में इतने मगन कि राह पर ध्यान ही नहीं, अन्ततः निष्कर्ष, घर से दूर और असहाय।

अब ओडी के स्थान पर स्वयं को रख कर देखिये, अन्यथा मत लीजियेगा क्योंकि मैं स्वयं को ओडी के स्थान पर रख कर समानता का अनुभव कर चुका हूँ। न जाने कितने चौराहे विकल्पों के, पहला लक्ष्य बिना पाये ही निकट से लगते दूसरे लक्ष्य पर दृष्टि, बिना बुद्धि लगाये ऊर्जा का उन्माद, राह की सुधि नहीं, अन्ततः स्वयं से कोसों दूर और स्वयं को ढूढ़ने की आकांक्षा।

ओडी का स्वभाव जो भी रहा हो, क्या हम मनुष्यों को सच में पता नहीं चल पाता कि हमारा स्वभाव क्या है? कौन सा लक्ष्य ग्राह्य है, कौन सा त्याज्य है, गति कितनी अधिक है, मार्ग से कितना भटकाव हो गया है, घर से कितना दूर आ गये हैं, कितना अभी और चलना है, कब तक वापस पहुँचना होगा, कब विश्राम होगा? इनके उत्तर निश्चय ही केन्द्र-बिन्दु से नियन्त्रित सम्पर्क बनाये रखते हैं, पर राह में आये विचारों से भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, लक्ष्य की उपादेयता। क्या लक्ष्य आपके योग्य है, क्या लक्ष्य आपके वर्तमान जीवन-स्तर को और उठाने में सक्षम है?

चरैवेति चरैवेति अनुपालक मन्त्र है, उसमें चलते रहने का संदेश है, पर जीवन में हम कब भागने लगते हैं, पता ही नहीं चलता है और जब तक पता चलता है, हम अपने घर से बहुत दूर होते हैं, स्मृतिभ्रम की स्थिति में, असहाय, अपनेपन में कुछ समय बिताने को लालायित।

गति, ऊर्जा, उपादेयता, सुख आदि के विविध दिशोन्मुखी वक्तव्यों के बीच खड़ा है हमारा जीवन, एक के बाद एक न जाने कितने लक्ष्य सामने से निकले जा रहे हैं और निकला जा रहा है मिला हुआ समय।

इस गतिशीलता में आपका हर निर्णय महत्वपूर्ण है, एक के बाद एक।

58 comments:

  1. इसे इस नजरिये से देख सब कुछ आपबीती सी लगी बातें:

    राह की सुधि नहीं, अन्ततः स्वयं से कोसों दूर और स्वयं को ढूढ़ने की आकांक्षा।

    -चिन्तन में हूँ अब!!

    भागने में इतने मगन कि राह पर ध्यान ही नहीं, अन्ततः निष्कर्ष, घर से दूर और असहाय।

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  2. भागने में इतना मगन की घर का रास्ता ही भूल जाए ....
    हर तरह है बेशुमार आदमी फिर भी तन्हाईओं का है शिकार आदमी !

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  3. सही कहा आपने |
    लक्ष्यों को प्राप्त करने के चक्कर में व्यक्ति कितना खो चूका होता है वह तो चिंतन करने के बाद ही उसे पता चलता है |

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  4. बहुत अच्छा लगा ||

    बधाई |

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  5. लक्ष्य साफ हो तो ही दौड़ना सार्थक होता है।

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  6. मनुष्य का सचमुच अपना भाग्य विधाता है या बस निमित्त मात्र ही ....या
    प्रारब्ध का प्रगटन ही.....ये गुत्थियां कहाँ सुलझी हैं अभी तक ...

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  7. भागेंगे नहीं तो कहेंगे कि घाणी का बैल है, बस एक ही जगह घूमे जा रहा है।

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  8. लोग भाग रहे हैं,लेकिन बिना किसी 'उद्देश्य' के नहीं! मैंने कम समय में ही महसूस है की अधिकांश लोग अर्थ की आकांक्षा में बिना सोचे समझे,आंधी दौड़ का हिस्सा बने हुए हैं !वे यदि जीवन के सुख के लिए ऐसा कर रहे हैं तो इससे तो जीवन का चैन ज़्यादा खो रहा है! बिना सार्थक उद्देश्य के ऐसी दौड़ अंततः अवसाद का कारण बनती है.
    बहुत ही सामयिक और ज़रूरी टिप !

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  9. अब गारफील्ड कैसे देखी जाए ...सुबह सुबह उलझा दिया आपने :-)
    शुभकामनायें !

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  10. पता नहीं मेरे और मेरे जैसे कितने और लोगों की बात आपने कह दी यहाँ..

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  11. सब पता होता है, पर एक धुन रहती है ... और एक ज़िद भी

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  12. सफलता - असफलता मानव की सोच है ....उसे तो बस कर्म करना चाहिए ....अगर लक्ष्य स्पष्ट हो तो भागने में मजा आता हो और ना हो तो फिर जितना चल लो भाग लो कोई लाभ नहीं मिलने वाला ..!

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  13. कई बार तो लोग यही मानने को तैयार नहीं होते कि वो वास्तव में भटक गए हैं. इस सन्दर्भ में पद्म सिंह जी की एक रचना उल्लेखनीय है -

    http://padmsingh.wordpress.com/2010/03/19/%E0%A4%B9%E0%A5%87-%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B0/

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  14. सुन्दर जीवन-दर्शन !

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  15. बस एक इस उम्मीद में, कुछ दिन तसल्ली से कटें|
    खुद अपने से ही - आप, कटता जा रहा हर आदमी|| [मेरी ई किताब से]

    प्रवीण भाई विषय को ढूँढना और फिर बात में से बात निकालना कोई आप से सीखे|

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  16. आपके लेख प्रभावित और प्रेरित करते हैं...

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  17. सजग करता सुन्दर आलेख...

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  18. सबकी आपबीती यही है

    ढूंढने निकले थे उसको और खुद को खो दिया ...

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  19. जीवन में हम कब भागने लगते हैं, पता ही नहीं चलता है और जब तक पता चलता है, हम अपने घर से बहुत दूर होते हैं, स्मृतिभ्रम की स्थिति में, असहाय, अपनेपन में कुछ समय बिताने को लालायित।

    कितना सुंदर चिन्तन ढूंढ लाये आप ......

    गारफील्ड मेरा पसंदीदा कार्टून करेक्टर है.... :)

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  20. गारफील्ड मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है...
    गारफील्ड के बहाने गहन सार्थक चिन्तन....

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  21. आमिर ख़ान ने सही ही गाना बनाया है...

    भाग...भाग...बोस डी के...भाग...भाग...

    वाकई हम सारे ही डी के बोस हैं...

    जय हिंद...

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  22. ओडी के भटकने के दृश्य पर थोड़ा और विचार करें। एक के बाद एक लक्ष्य, सारे के सारे लक्ष्य ऐसे जो प्राप्त होना संभव नहीं, लक्ष्य प्राप्त होने पर भी कोई लाभ नहीं, इस निरर्थक प्रयास में होश ही नहीं कि कहाँ भाग रहे हैं, भागने में इतने मगन कि राह पर ध्यान ही नहीं, अन्ततः निष्कर्ष, घर से दूर और असहाय
    बहुत सही लिखा है ...निरंतर भागना व्यर्थ है ...थोडा रुक कर मनन चिंतन करने से भटकाव नहीं होगा ...!!
    सार्थक प्रस्तुति ...!!

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  23. क्या लक्ष्य आपके योग्य है, क्या लक्ष्य आपके वर्तमान जीवन-स्तर को और उठाने में सक्षम है?
    *लक्ष्य की उपादेयता अगर जीवन में समझ आ जाये तो मंजिल पाना मुश्किल नहीं होता.
    - मार्गदर्शक लेख.

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  24. गहन विचारात्‍मक प्रस्‍तुति ।

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  25. कभी कभी भाग भाग कर ही सही रास्ता पता चलता है |

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  26. लक्ष्यों का अधिकाधिक होना इस भटकाव , और भागम भाग का मूल है

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  27. हम तो डी वी डी लेने जा रहे हैं फिल्म की.

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  28. ये कसक तो हर भागने वाले के मन में रह ही जाती है और इस दौड़ में इतना आगे निकल चुका होता है की चाहने पर भी वापसी कठिन ही है |
    यहाँ ये भी तो प्रश्न उठता है? तरक्की !कैसे हासिल की जाय भागकर या एक जगह खड़े होकर ?
    या तरक्की किसे कहते है ?

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  29. सुन्दर..लाजवाब...जीवन की आपाधापी पर गहराई से विचार करने पर विवश करता आलेख...
    कुछ इसी तरह के विचारों से युक्त लेख अपने ब्लॉग पे आज ही लिखा है..आपके उल्लिखित कथ्य तक पहुँचने का प्रयास किया पर पता नहीं कितना पहुँच सका...आपकी प्रतिक्रिया चाहूँगा...
    आपका स्वागत है- www.filmihai.blogspot.com पर

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  30. ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं सोचा था,बहुत अच्छा,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  31. सर बहुत सुन्दर..चलना ही जीवन है , दौड़ना मौत !

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  32. क्या हम मनुष्यों को सच में पता नहीं चल पाता कि हमारा स्वभाव क्या है? कौन सा लक्ष्य ग्राह्य है, कौन सा त्याज्य है, गति कितनी अधिक है, मार्ग से कितना भटकाव हो गया है, घर से कितना दूर आ गये हैं, कितना अभी और चलना है, कब तक वापस पहुँचना होगा, कब विश्राम होगा?

    आपके आलेख के उपरोक्त शब्द सोचने को बाद्य करते हैं, पर शायद जीवन में जब ये सोचने का समय आता है तब तक काफ़ी देर हो चुकी होती है. लगता है यंत्रवत यह जीवन चलता जा रहा है. शुभकामनाएं.

    रामराम

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  33. सार्थक सन्देश परक लेख प्रवीन जी बधाई निम्न सटीक कहा आप ने
    चरैवेति चरैवेति अनुपालक मन्त्र है, उसमें चलते रहने का संदेश है, पर जीवन में हम कब भागने लगते हैं, पता ही नहीं चलता है और जब तक पता चलता है, हम अपने घर से बहुत दूर होते हैं, स्मृतिभ्रम की स्थिति में, असहाय, अपनेपन में कुछ समय बिताने को लालायित।

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  34. bilkul sahi likha hai aapne hum ek sath kai raste chun leta per lakshya bhool jate hai

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  35. गति, ऊर्जा, उपादेयता, सुख आदि के विविध दिशोन्मुखी वक्तव्यों के बीच खड़ा है हमारा जीवन, एक के बाद एक न जाने कितने लक्ष्य सामने से निकले जा रहे हैं और निकला जा रहा है मिला हुआ समय..

    गहन चिंतन ..लक्ष्य सुनिश्चित हो तो दिशा सही होती है भागने कि पर जब मंजिल का पता नहीं तो निरुद्देश्य भागना भी पड़ता है पता पाने को ..

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  36. जीवन में हम कब भागने लगते हैं, पता ही नहीं चलता है और जब तक पता चलता है, हम अपने घर से बहुत दूर होते हैं, स्मृतिभ्रम की स्थिति में, असहाय, अपनेपन में कुछ समय बिताने को लालायित।
    सार्थक संदेश देती रचना।

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  37. तृष्णा सबको खूब छली
    भाग दौड़ में साँझ ढली
    चाल सम्हल कर चलना प्यारे
    दुर्घटना से देर भली.

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  38. ओडी के लिए हमारे लोकमानस का 'कोल्‍हू का बैल' कैसा?

    कई दिनों बाद ब्‍लॉग पढना षुरु किया और पहली ही पोस्‍ट ने आत्‍म चिन्‍तन, आत्‍म मन्‍थन करने की सलाह दे दी।

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  39. बिल्कुल सही.

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  40. बहुत सही कहा अगर जीवन में लक्ष्य नहीं तो कुछ भी मिल पाना संभव नहीं सिर्फ भागते रहने से लक्ष्य की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती जैसे सिर्फ सपने देखने से सब कुछ नहीं मिल सकता उसके लिए लक्ष्य और मेहनत दोनों जरूरी है | बात को सरलता से कहने सुन्दर अंदाज़ |

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  41. तीर्थ नहीं है केवल यात्रा, लक्ष्‍य नहीं है केवल पथ ही...

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  42. निष्प्रयोजन भागते रहना , और ब्लैक होल्स में समां जाना , जीवन प्रकाश को धुंधला करता है

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  43. आगे तो सबको बढ़ना ही चाहिए, लेकिन पुरानी चीजो को महत्ता को हमेशा याद रखना चाहिए.

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  44. bahut khoob...! ache seekh de aapne iss post k zariye..!

    garfield hume bhi bahut pasand tha bachpan main

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  45. चरैवेति चरैवेति अनुपालक मन्त्र है, उसमें चलते रहने का संदेश है, पर जीवन में हम कब भागने लगते हैं, पता ही नहीं चलता है और जब तक पता चलता है, हम अपने घर से बहुत दूर होते हैं, स्मृतिभ्रम की स्थिति में, असहाय, अपनेपन में कुछ समय बिताने को लालायित।
    जीवन का सत्य यही है. अक्सर यह हम तब समझ पाते हैं जब बहुत देर हो चुकी होती है.

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  46. विचारणीय !!

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  47. हर निर्णय महत्वपूर्ण होता है ... भागते हुवे कभी कभी रुक के सोचना जरूरी होता है ... पर रुकना क्या संभव होता है ..

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  48. बहुत सारगर्भित और प्रेरक प्रस्तुति..सच में आज हम सब भागते भागते अपने घर का रास्ता भूल गये हैं.

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  49. चरैवेति चरैवेति अनुपालक मन्त्र है, उसमें चलते रहने का संदेश है, पर जीवन में हम कब भागने लगते हैं, पता ही नहीं चलता है और जब तक पता चलता है, हम अपने घर से बहुत दूर होते हैं,

    बहुत सच्ची अच्छी बात. आपका लेखन बेजोड़ है.

    नीरज

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  50. हर ओडी को गारफ़ील्ड मिले, हम तो ये दुआ करते हैं।

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  51. हम तो चलते चलते ही यहां पहुंचे हैं।

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  52. good movie and yes one should keep ourselves on his place and should check it.

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  53. बहुत ही अच्छा लिखते हैं आप. अपनी बात रखने का यइ अंदाज़ काफी पसंद आता है...आपकी तुलना सोचने पर विवश करती है.

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  54. सच मच जीवन निकलता जा रहा है बिना लक्ष्य की प्राप्ति के ही |

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  55. waha bahut khub...aaj pahli bar aapko padha.....aapki lekhni man ko bha gayi.......aabhar

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