उन्मादित
सब जीव, वृक्ष भी,
अन्तरमन
भी और दृश्य भी,
एक
व्यवस्था परिचायक है,
अह्लादित
हैं ईश, भक्त भी,
रहें
विविध सब, पर मिल रहतीं,
भाँति
भाँति की संरचनायें,
एक
सृष्टि बन उतरी, फैलीं,
परम ईश
की विविध विधायें,
नहीं
अधिक है, नहीं कहीं कम,
जितनी
जीवन को आवश्यक,
सहज रूप
में स्वतः प्राप्त सब,
प्रकृति
पालती रहे मातृवत,
धरती
माँ सी, रहती तत्पर,
वन, नद, खनिज अपार सजी है,
तरह तरह
के पशु पक्षी हैं,
पुष्प, वृक्ष, फल, शाक सभी हैं,
महासंतुलन
सब अंगों में,
एक दूजे
के प्रेरक, पूरक,
रहें
परस्पर सुख से बढ़ते,
सब जीते
हैं औरों के हित,
मानव ने
पर अंधेपन में,
अपनी
तृष्णा का घट भरने,
सकल
प्रकृति को साधन समझा,
ढाये
अत्याचार घिनौने,
संकेतों
से प्रकृति बोलती,
समझो और
स्वीकार करो,
जितने
अंग विदेह किये हैं,
प्रकृति
अंक में पुनः भरो,
देखो सब
है प्राप्त, पिपासा-फन क्यों फैले?
सम्मिलित
सभी सृष्टि में, फिर क्यों दंश
विषैले?
किसकी
बलि पर किसका बल हम बढ़ा रहे?
एक नगर
था, तोड़ महलिया बना रहे ।