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3.4.21

मित्र - २२(कौन है भाई)

बिना अनुमति के बाहर निकलने के पहले कई तैयारियाँ करनी होती थीं। रविवार के दिन सबके पास समय रहता था और अवसर भी। उस दिन बाहर निकलने का प्रयास करने वालों की संख्या अधिक होती थी अतः छात्रावास अधीक्षक की सजगता भी उसी स्तर की होती थी। विद्यालय के दिनों में भी बाहर जाने के लिये सायं के अतिरिक्त कोई और समय नहीं होता था। रात को आठ बजे तक हाट बन्द हो जाते थे अतः उसके बाद जाने का प्रश्न ही नहीं। सायं की पूजा ७३० पर होती थी अतः उसके पहले तक वापस आना होता था। पूजा मे आवश्यक रूप से कोई न कोई रहता था और आपकी अनुपस्थिति प्रश्न खड़े कर सकती थी। ले देकर विद्यालय बन्द होने के तुरन्त बाद से लेकर पूजा प्रारम्भ होने तक का समय मिलता था, लगभग २ घंटे का जो खेलकूद का था।


यदि गूगल मैप से देखेंगे तो विद्यालय की आकृति ऊपर से अर्धचन्द्राकार दिखायी देती है। विद्यालय का द्वार लगभग हर कक्ष से दिखता है, स्पष्ट सा। द्वार से कौन अन्दर आ रहा है, कौन बाहर जा रहा है, इस बात की सूचना सबको रहती थी। इसके अतिरिक्त कोई और द्वार नहीं था। इसके दो अर्थ थे, पहला कि यदि बिना अनुमति लिये निकलना हो तो इस द्वार का उपयोग वर्जित था। पता नहीं विद्यालय छूटने के समय विद्यालयवासियों की भीड़ के साथ तो बाहर जाया जा सकता था पर विद्यालय के वेश में हाट में टहलना उद्धाटन को आमन्त्रित करने सा था। विद्यालय का वेश सदाचार का प्रतीक था और आचार्यों को यह तथ्य बताने वाले शुभचिन्तकों की कमी नहीं थी उस क्षेत्र में। साथ ही इतना समय भी नहीं रहता था कि कमरे में जाकर वेश बदल लें। यदि त्वरित गति से वेश बदल भी लें तो बाहर निकलने वालों के समूह में स्पष्ट दृष्टिगत हो जायेंगे।


दूसरा अर्थ गहरा था। यदि कभी सायं के समय छात्रावास अधीक्षक अपने स्कूटर से इसी द्वार से बाहर जाते या आते थे तो वह सूचना सबको ज्ञात हो जाती थी। पता नहीं छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी को ज्ञात रहता था कि उन पर इतनी दृष्टि एक साथ पड़ रही हैं। उसी समय से हमारी गणना प्रारम्भ हो जाती थी। कई बार के अवलोकन के बाद यह निष्कर्ष निकला था कि वैसे तो आचार्यजी बाहर कम जाते हैं पर जब भी आवश्यक कार्य होने पर जाते हैं, दो घंटे से अधिक लगता है। वही हमारा सर्वोत्तम अवसर था, सुरक्षित कालखण्ड था।


बाहर निकलने के लिये हम अर्धचन्द्राकार के उत्तल भाग पर अन्त में बनी दीवार से लाँघते थे। इसके तीन लाभ थे। पहला यह बिन्दु किसी भी अन्य स्थान से नहीं दिखता था, यहाँ तक कि उसके ऊपर के कक्ष से भी नहीं। दूसरा कि यह एसडी कालेज के क्रीडास्थल की ओर खुलता था और वहाँ से निकल कर भीड़ का भाग हो जाना सरल रहता था। तीसरा कि वहाँ से हाट की ओर सरकने में विद्यालय की ओर नहीं आना होता था। समस्या बस इतनी थी कि इस बिन्दु तक पहुँचने के लिये विशालकक्ष के सामने से होकर जाना होता था जो कि प्रधानाचार्यजी के कार्यालय के सामने था। लगभग १० फीट की दूरी में आप दृष्टि में आ जाते थे पर अन्य विकल्पों की तुलना में यह सर्वाधिक सुरक्षित स्थान था। विशालकक्ष से दीवार तक पहुँचने में वहाँ लगे क्रोटन के बड़े पेड़ बड़े सहायक थे। दीवार लाँघने के लिये अन्दर की ओर दो ईटों का उपयोग होता था जो कि वापस आने के बाद छिपा दी जाती थीं।


ऐसा ही एक अवसर था, हम और अमिताभ बाहर निकल गये। निश्चिन्तता में गपियाते हुये टहले। कल्लू का चाट खायी, एक स्थान पर कड़ाही का दूध पिया और मूँगफली खाते हुये बीच हाट से चले आ रहे थे। दोनों ओर सब्जी की दुकाने  थीं और रास्ता बीच में बस इतना चौड़ा था कि दोनों ओर से एक एक पंक्ति निकल जायें। ऐसी स्थितियों में यदि कोई साइकिल या स्कूटर से भी आ जाये तो हम इस बात के अभ्यासी हैं कि उसके लिये भी रास्ता बना देंगे और उसे निकलवा भी देंगे। हाँ यदि वह साइकिल या स्कूटर खड़ा करके कुछ खरीदने लगा तो केवल एक ही पंक्ति चलेगी, बाधा होगी, मंद गति होगी पर हाट रुकेगा नहीं।


ऐसा ही एक रास्ता था, तनिक अंधकार हो गया था, ठंड थी पर एक स्वेटर की। सामने से एक स्कूटर पूरी लाइट जलाये था। थोड़ा और आगे गये तो भी वह हिला नहीं, बस अपने स्थान पर खड़ा रहा। ऐसे स्थानों पर सामान्यतः लाइट हल्की कर दी जाती है जिससे सामने वाले की आँखों में वह चुँधियाये नहीं। आँखों पर सीधा प्रकाश पड़ने से हम दोनों को यह सूझ भी नहीं रहा था कि उसके बायें से निकलने का स्थान है कि दायें से? बीस-तीस सेकेण्ड तक जब वह स्कूटर फिर भी नहीं हिला तो अमिताभ से न रहा गया, वह सकोप बोला “कौन है भाई”। स्कूटर फिर भी नहीं हिला तो कुछ संशय हुआ कि हो न हो यह प्रकाश हमारे ही चेहरे पर स्थिर हो गया हो। चेहरे पर यह विचार आते ही सारा उल्लास उड़नछू हो गया, शरीर जड़वत हो गया। स्तब्ध स्थिति में आँखे अभी भी लाइट के पीछे के व्यक्ति को पहचानने का प्रयत्न कर रहीं थी।


प्रकाश कम होने पर सबसे पहले लम्बी दाढ़ी दिखायी दी, ऊपर गोल हेलमेट और स्कूटर के दोनों ओर धरती की छूती और धोती लपेटे टाँगें। ऊपर की साँस ऊपर, नीचे की नीचे, अमिताभ पुनः कुछ बोलने को उद्धत था, उसका हाथ पकड़कर फुसफुसाया, “दीपकजी हैं”।


शेष ज्ञात इतिहास रहा। चुपचाप दोनों स्कूटर पर दोनों बैठ गये, वापस सर झुकाये छात्रावास के अन्दर। पूजा में बस यही प्रार्थना करते रहे कि हे हनुमान, आज भक्तों को बचा लो। पूजा मे आचार्यजी भी थे, पर न उन्होंने उस समय कुछ कहा, न कभी बाद में, न घर पर कहा और न किसी और से। पता नहीं चला कि बिना छात्रावास में वापस आये उन्हें कैसे पता कि हम निकले हैं और कैसे हमको बीच हाट मे जा दबोचा। हमारा सारा बु्द्धिकौशल धरा का धरा रह गया। उसके बाद ग्लानि से भरे रहे, बस कहीं बाहर जाने की इच्छा ही नहीं रह गयी।


हमें न दण्ड ने मारा, न उपदेश ने, हम तो आचार्यजी के मौन से मारे गये।

30.3.21

मित्र - २१(प्रभात के अमिताभ)

अमिताभ बहुत अच्छा गाते थे और अभी भी नियमित रूप से किसी एप्प में अपने सुरों की शीतलता बिखेरते रहते हैं। छात्रावास में उनका आना तीन वर्ष बाद हुआ था। संभवतः यह कारण रहा होगा कि उनके अन्दर स्वातन्त्र्य भाव कूट कूट कर भरा था। उनका आत्मविश्वास और साहस संक्रामक था। उनके साथ कई बार बिना अनुमति लेकर बाहर जाने की योजना बनी और उन पर क्रियान्वयन भी हुआ। सारा कुछ तो स्मृति में नहीं रहा पर दो घटनायें जो आचार्यों से संबद्ध थीं, वे स्थायी बस गयी हैं।


संभवतः प्रातः ४३० का समय होगा, जागरण में आधा घंटा शेष था। प्रधानाचार्य के दूत आते हैं और अमिताभ को जगा कर कहते हैं कि प्रधानाचार्य जी बुला रहे हैं। ब्रह्मकाल की सात्विकता पूरे परिसर में फैली थी। गम्भीर विषयों के लिये यही समय सर्वाधिक उपयुक्त होता था। किसी भी दृष्टि से यह प्रताड़ित या दण्डित करने का समय नहीं हो सकता था, उसका समय बहुधा सायं होता था। यह समय संभावनाओं का था। जिनमें कुछ भी समझ सकने की संभावना शेष रहती थी, उन्हें इस समय बुला कर प्रेरित किया जाता था, भावनाओं के उच्च बिन्दुओं पर ठहराया जाता था। जहाँ तक मुझे याद है, पूरे सात वर्षों में केवल एक बार ही मुझे यह सौभाग्य मिला था, संभवतः ११वीं कक्षा में।


प्रधानाचार्यजी के द्वारा बुलाया जाना सम्मान का विषय था। शारीरिक और मानसिक स्तर से सीधे बौद्धिक और आध्यात्मिक स्तर में पहुँच जाने की योग्यता का द्योतक। उनकी चिन्ता का विषय होना और तदोपरान्त उनके चिन्तन में आपके सुधार का उपाय आना, यह दोनों ही पक्ष रहते थे आपको प्रातःकालीन वेला में बुलाने के। शेष समाज की तुलना में आपका स्तर सहसा बढ़ जाता था, आप सामान्य से विशेष हो जाते थे। कभी कभी आपको प्रधानाचार्यजी के स्थान पर जागरण कराने का विशेष कार्य भी मिलता था। वापस लौटकर आपके शब्दों को आदेशों और उपदेशों सा मान मिलता था। दिन भर यह चर्चा का विषय रहता था कि आज किसको बुलाया गया और प्रेरित किया गया। 


अमिताभ को प्रातः बुलाया गया है, समाचार मिलते ही संशय के बादल मन में घुमड़ने लगे। कभी आपके विशेष मित्र को इस प्रकार बुलाया जाये तो करुणा, भय और क्रोध के मिश्रित भाव उमड़ते हैं। करुणा इस बात की कि कहीं आपके मित्र का नाम किसी काण्ड में उद्घाटित तो नहीं हो गया। कहीं उसको इस बात की उलाहना तो नहीं दी जायेगी कि अमिताभ आपसे तो यह अपेक्षित नहीं था। दण्ड का व्यापार तो दण्ड देने के बाद बराबर हो जाता है, सम हो जाता है, पूरा हो जाता है, कुछ शेष नहीं रहता है। उलाहना आदर्श बन कर लटक जाती है। पहले आपको यह विश्वास दिलाया जाता है कि आपको उत्पात नहीं करना था, इस प्रकार आपको सहसा आपके मित्र समूह से च्युत कर दिया जाता है। दूसरा आपको भविष्य में अच्छा करने को प्रेरित किया जाता है। यह प्रेरणा ही बहुत गुरु होकर व्यक्तित्व से लटक जाती है। तब आप न इस विश्व के रहते हो और न ही उस विश्व के, त्रिशंकु से, अधर पर।


भय इस बात का होता है कि कहीं भावावेश में आकर अमिताभ सरकारी गवाह न बन जाये, हमारा नाम भी उजागर न कर दे। सात्विकता में यह अद्भुत गुण होता है कि वह अंगुलिमाल जैसे पापी का मन द्रवित कर सकती है तो अमिताभ हमारी भाँति ही साधारण से उत्पाती भर हैं। क्रोध इस बात के लिये होता है कि कहीं यह सुधर कर वाल्मीकि का पंथ न अपना ले और हम जैसों को अपनी मित्रता से वंचित न कर दे। मित्रों की ऐसी ही स्वार्थपूरित और स्वार्थप्रेरित प्रार्थनायें मित्रों को सुधरने नहीं देती हैं।


आधे घंटे में आशंकाओं के समुन्दर में हम कई बार उतरा चुके थे। मित्र सुधारगृह में गया था, आकर क्या बोलेगा, क्या बतायेगा, सब अनिश्चित था। कहीं ऐसा न हो कि पहचानने से मना कर दे या तुच्छ समझ कर मित्रता तोड़ बैठे। हृदय में संतोष तब हुआ जब अमिताभ वापस आने पर मुस्कुराते हुये मिले और सारा वृत्तान्त सुनाया।


प्रातः सात्विकता के आधिक्य में प्रधानाचार्यजी को संगीत सुनने की प्रेरणा हुयी थी। आजकल हम बहुधा यह सुखद प्रयोग करते हैं पर उस समय मोबाइल या इण्टरनेट का युग नहीं था। छात्रावास में सबसे अच्छा गाने वाले अमिताभ थे, संगीतज्ञों के परिवार से थे और शास्त्रीय संगीत की शिक्षा पा चुके थे। यही कारण रहा होगा कि उन्हें प्रातः स्मरण किया गया। अर्धनिद्रा में और आँख मलते हुये पहुँचने पर जब उनसे यह आग्रह किया गया कि कोई गीत सुनाइये तो उन्हें भी अटपटा लगा होगा। जहाँ तक गायकों के बारे में ज्ञात है, उन्हें एक सहज परिवेश भाता है, प्रतिभा स्वातन्त्र्य से सहज प्रस्फुटित होती है। आग्रह का समय अरुचिकर लगा हो या आग्रह ही आदेशवत लगा हो, उन्होने गीत तो सुनाया पर वह न ब्रह्मकाल के योग्य था, न ही सात्विकता से प्रेरित था और न ही प्रधानाचार्यजी के गाम्भीर्य भाव के साथ सहज बैठता था। गीत था “धूप में निकला न करो रूप की रानी…”। आश्चर्यवत मैने जब पुनः पूछा तब भी अमिताभ ने यही बताया। बस उनको यही कह पाया कि अभिताभ भाई, आप गीत सुना रहे थे कि संदेश दे रहे थे?


अभिताभ के साथ एक और घटना अगले ब्लाग में।

27.3.21

मित्र - २०(संघर्ष और विकल्प)

कहते हैं कि किसी दीर्घकालिक संघर्ष को समझना हो तो शतरंज खेलना सीखना चाहिये। अपने पास उपलब्ध शक्ति के अनुसार किस प्रकार आक्रमण और रक्षा की जाती है, यह शतरंज सिखाता है। हर मोहरा अपनी तरह से चलता और मारता है और अन्तिम प्रयास यही रहता है कि अपने राजा को बचाते हुये सामने वाले को मात दी जा सके। यही कारण रहा होगा कि शतरंज जैसा खेल मनोरंजन के साथ साथ राजकुमारों का युद्धकला में प्रशिक्षण भी कराता होगा। गूगल महाराज को पता नहीं कैसे ज्ञात हो गया कि शतरंज हमें भी बड़ा प्रिय है, गाहे बगाहे शतरंज के चर्चित खेल और जटिल चालें हमारे स्क्रीन में ठेलते रहते हैं। शतरंज का कभी गम्भीर प्रशिक्षण लिया नहीं, जो भी सीखा है वह देख देख कर ही सीखा है। 


शतरंज की चालों की समझ तीन स्तरों पर होती है। प्रारम्भिक चालें, मध्यम चालें और अन्तिम चालें। प्रारम्भ में अपना दुर्ग सुरक्षित किया जाता है और सामने वाले की रक्षानीति के अनुसार अपने आक्रमक मोहरे व्यवस्थित किये जाते हैं। मध्य में यह प्रयास रहता है कि किसी तरह बीच के खानों पर अधिकार जमाया जाये, दुर्बल पक्ष पर आक्रमण किया जाये और एक आध मोहरा अधिक मारकर बढ़त ले ली जाये। अन्तिम खेल में बहुत कम मोहरे रहते हैं और खेल की तकनीक पूर्णतया बदल जाती है। तब सामने वाले के पैदल भी वजीर बनने की क्षमता रखते हैं। यदि मध्य खेल में आपको किसी मोहरे की हानि हो गयी तो अन्तिम खेल में उसकी कमी पूरी कर पाना दुष्कर हो जाता है और हार सुनिश्चित हो जाती है।


शतरंज के खिलाड़ियों की क्षमता भिन्न स्तरों पर भिन्न होती है। कोई अन्तिम खेल में अच्छा है तो कोई मध्य खेल में। कोई प्रारम्भ में ही सुरक्षा कर खेल बराबर कराने की सोचता है तो कोई अपनी शक्ति के अनुसार अपने सुदृढ़ स्तर तक ले जाना चाहता है। हर चाल के बाद स्थिति बदलती है, कोई कूटचाल कई चालों के क्रम में अपने आप को खोलती है और कई बार अपने एक मोहरे का बलिदान कर दूसरे पर घातक प्रहार किये जाते हैं। घात प्रतिघात के अनुभव से भरा संघर्ष बड़ा रोचक हो जाता है। इसीलिये संघर्ष की समझ बढ़ाने के लिये शतरंज खेलने की सलाह दी जाती है।


यदि शतरंज से तुलना की जाये तो हमारा भी संघर्ष लम्बा था। निर्णय एक या दो चालों से नहीं वरन कई वर्षों में होना था। हम सब अपनी प्रारम्भिक चालें चल चुके थे। हमारी रणनीति उजागर हो चुकी थी। पिछले प्रशासन को शिथिल समझकर हमने जिस प्रकार अपना दुर्ग खुला छोड़ दिया था वह कई प्रकार से दुर्बल पक्षों से भरा था। उसे पुनः सुरक्षित कर लेना विकल्प नहीं रह गया था, खेल मध्य चालों पर पहुँच चुका था। अब सर्वाधिक प्रभावी रणनीति मध्य खेल में बने रहने की थी और वह भी बिना अधिक मोहरे खोये, जिससे हमको चालें चलने का अवसर मिलता रहे। 


अन्तिम खेल हमारा विकल्प नहीं था, यह समझ हमें कई घटनाओं के बाद आ चुकी थी। छात्रावासियों के लिये अन्तिम खेल अपनी अधिकांश मोहरे और चालों को गँवाकर पकड़े जाना था। इस अन्तिम खेल में हम अत्यन्त दुर्बल थे। इसका एक कारण था। अन्तिम खेल में या तो हम अपनी हार स्वीकार कर अनुशासित हो जायें या न सुधरते हुये उत्पात करते रहें। नहीं सुधरने की स्थिति में उसकी सूचना छात्रावास अधीक्षक घर पर पहुँचा देते थे। हमारे अभिभावकों को छात्रावास अधीक्षक पर हमसे अधिक विश्वास था। इस तथ्य के प्रमाण एक नहीं कई साक्ष्य हैं। कब वह हमारे घर पहुँच जायें या कब फोन कर सत्य बता दें, इस बात का तनिक भी भरोसा नहीं था।


इस संदर्भ में एक कनिष्ठ पुष्पेश के साथ बड़ी ही रोचक घटना घटी। उनके अत्यन्त लघु उत्पातों की सूचना उनके घर पहुँचा दी जाती थी। जब छुट्टी में वह घर जाते थे तो उनको अपने अभिभावकों से सुनना पड़ता था। एक बार लौटकर और खिन्नमना हो उन्होंने छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी को यह कह भर दिया कि आप छोटी छोटी बातें तो न बताया करें, माता पिता व्यर्थ ही व्याकुल हो जाते हैं कि लड़का वहाँ पढ़ रहा है कि उत्पात कर रहा है? घर में यह बात भी पहुँचा दी गयी और अगली बार घर में डाँट के साथ कुटाई भी हुयी। इस अन्तिम खेल में निरीह से हमारे कनिष्ठ ने कुछ भी कहना छोड़ दिया और अनुशासित हो चले। हमारे न पढ़ने की, अधिक खेलने की, समय व्यर्थ करने की, झगड़ने की सभी छोटी बड़ी बातें हमारे परिवार को यथासमय और यथामहत्व के साथ पता चलती रहती थीं। 


पकड़े जाना अन्तिम खेल में प्रवेश करने सा था पर वह अन्त नहीं था। क्षमा माँग लेने से या यह विश्वास दिलाने से कि आगे नहीं करेंगे, बात घर तक नहीं पहुँचती थी। ऐसा करने के बाद हम नैतिक और राजनैतिक रूप से दुर्बल हो जाते थे। जब पकड़ लिये गये तो उस प्रकार का काण्ड पुनः करना निर्भीकता की पराकाष्ठा थी, हम पर दृष्टि अधिक तीक्ष्ण हो जाती थी। तब घर पर बात पहुँचना अत्यन्त भावनात्मक विषय हो जाता हम सबके लिये। अन्तिम खेल का यही पक्ष पीड़ा देता था कि जब घर की बात आती थी तो छोटे छोटे अनुशासन के प्यादे वजीर बनने की सामर्थ्य रखते थे। वहीं पर हमारी सारी ऊर्जा अवसान पा जाती थी, हम असहाय हो जाते थे। अतः पकड़े जाना किसी भी रूप में हमारा विकल्प नहीं था। 


मध्य खेल में बने रहने में ही सारा रोमांच था, जिसमें पक्ष प्रतिपक्ष अपनी चालें चलता है, बिना मोहरे गँवाये। यदा कदा हम पकड़े भी गये पर यथासंभव मध्य में बने रहे और खेल पूरे ७ वर्ष चला।

23.3.21

मित्र - १९(काण्ड और कौशल)

अनुमति न मिलना, मिलना तो भी कम समय के लिये, यदि कुछ अन्यथा करने का प्रयास तो पकड़े जाना, इस अनुशासनिक कसाव ने हम सबको अनियमित करने के लिये बाध्य किया। एक द्वार बन्द हो जाये तो कई और खुल जाते हैं। जब बालमन ऊर्जा, उत्साह और जिजीविषा से भरा हो तो अवरोध संभावनाओं को जन्म देता है। वह तब जल सा न केवल अवरोध पर सतत प्रहार करता है वरन प्रवाह बदल कर आगे बढ़ जाता है। कठोरता का संदेश स्पष्ट था और प्रत्युत्तर में नये प्रयोगों को आकार लेना था।


पहला प्रयोग था धैर्य की परीक्षा। आक्रमक बने रहने से युद्ध में पहल तो मिलती है पर यदि प्रतिपक्ष बचाव कर ले जाये तो आक्रमण में ऊर्जा क्षय हो जाती है। हमारी क्षुद्र विकल्प पकड़े जा चुके थे, उन पर पुनः दाँव लगाना मूर्खता थी। यदि प्रतिपक्षी हमारे स्तर पर सोच कर बचाव की रणनीति बना सकता है तो हम वैसा ही क्यों नहीं कर सकते थे। यह एक यक्ष प्रश्न था और उसका उत्तर ढूढ़ना प्रतिष्ठा का विषय बन चुका था।


अनुमति माँग कर आप अपना मन्तव्य प्रकट कर देते हैं। मना होने पर यह स्वाभाविक हो जाता है कि आप क्षुब्धमना हो कुछ ऐसा करेंगे जो विद्रोह की श्रेणी में आयेगा, नियमविरुद्ध होगा। आपकी यही मनोदशा आपके आने वाले कृत्यों के बारे में प्रतिपक्षी को एक आभास दे जाती है। यदि आपका व्यवहार इतनी स्पष्टता से व्यक्त हो तो केवल आप पर दृष्टि बनाये रखने ही प्रतिपक्षी का काम चल जाता है। रणनीति और कूटनीति के इस सिद्धान्त को हम सबने समझा और निश्चय किया कि जो भी करना है, बिना अनुमति के ही करना होगा, चुपचाप करना होगा। यदि आप पर संशय नहीं होगा तो आप पर दृष्टि भी नहीं रखी जायेगी। 


एक छात्रावास अधीक्षक के पास कितनी भी तीक्ष्ण बुद्धि हो या अपार ऊर्जा हो, संख्याबल के सामने सब क्षीण हो जाती है। सौ बालकों के ऊपर दृष्टि रखना संभव नहीं है। यदि आप स्वयं दृष्टि में नहीं आना चाहें तो आपके लिये गुप्त रूप से बाहर सरक लेना सरल हो जाता है। कभी कभी सामने वाले को दिग्भ्रमित करने के उत्साह में एक भूल हम कर जाते हैं। संशय न हो, यह दिखाने के प्रयास में हम सहसा अधिक नियमबद्ध हो जाते हैं। सज्जन, सौम्य, मृदुल और अनुशासित छवि उभारने के प्रयास में अभिनय की अति कर जाते हैं। संशय न होने देने का उपक्रम ही संशय उत्पन्न कर देता है। जगजीत सिंह की चर्चित पंक्तियों की तरह “तुम इतना जो मुस्करा रहे हो…”।


काण्ड करने के पहले अज्ञातवास में जाना आवश्यक था, भीड़ में रह कर सामान्य दिखना आवश्यक था, एक दिन का अभिनय नहीं वरन सप्ताहों की सहजता आवश्यक थी। धैर्य यहीं तक पर्याप्त नहीं था, मुख्य कार्य में और अधिक धैर्य रखना होता था। छात्रावास अधीक्षक सामाजिक रूप से भी व्यस्त रहते थे। इस कारण से कई बार उनका परिसर से बाहर जाना होता था। हम इसी प्रतीक्षा में रहते थे कि कब यह अवसर आये और हम अपने काण्ड क्रियान्वित करें। वही समय रहता था छात्रावास की पिछली दीवार लाँघ कर बाहर सरक लेने का।


बड़ी सफलता के लिये छोटी छोटी कई सफलतायें सोपान का कार्य करती हैं। बड़े प्रयोगों को पहले लघु अनुपात में किया जाता है। बड़े प्रयोग असफल न हो जायें, हानि अधिक न हो जाये, इस हेतु त्रुटियों को समूल हटाना होता है। एक छोटी त्रुटि पूरे प्रयास को धाराशायी करने में सक्षम है। यदि तीन चार घंटे बाहर रहने का लक्ष्य पाना था तो लघु प्रयोग एक घंटे से प्रारम्भ करने थे। सूचना तन्त्र, वैकल्पिक उपस्थिति, साक्षी मित्र, काण्ड निष्पादन हेतु सभी का पूर्व उपाय और अभ्यास करना होता था। उस समय मोबाइल का युग नहीं था अतः तात्कालिक सूचना और निर्णय संभव नहीं थे। जो भी योजना होनी थी, पूर्वनियोजित और विस्तृत होनी थी। विकल्पों की श्रेणियाँ, स्तर, किस दशा में क्या करना है, इस सबकी तैयारी करके ही जाना होता था। सबको सम्मिलित नहीं किया जा सकता था, विश्वास एक दो पर ही करना होता था। एक सूत्रधार जो आपकी अनुपस्थिति में आपके हित में कार्य कर सके, एक सहायक जो आकस्मिकता की स्थिति में सब कुछ सम्हाल सके।


कुछ साहसी मित्र थे जो प्रायिकता के सिद्धान्त पर चलते थे, वे अत्यन्त आशावादी थे। उनको लगता था कि योजना और बुद्धि लगाने से कुछ नहीं होगा, यदि करना हो तो निकल जाओ। ऐसे व्यक्ति स्वयं तो भ्रम में रहते हैं और प्रकृति भी उन्हें भ्रम में रखती है, मूर्खता के दलदल में आमन्त्रित करती हुयी। किसी भी नये प्रयास में आशातीत सफलता मिल जाती है, इसे “प्रारम्भिक भाग्य” का सिद्धान्त कहते हैं, प्रकृति आपका उत्साह बढ़ाने का कार्य करती है। बस आपको यह समझना होता है कि आप मेधा के पथ पर बढ़ रहे हैं या मूर्खता के पथ पर। मेरा तब भी यह सिद्धान्त था और अब भी यह सिद्धान्त है कि बिना विधिवत पूर्वयोजना के प्रायिकता भी क्षीण होने लगती है। बिना अभ्यास के कुछ भी सार्थक टिकता नहीं है।


एक दूसरा सिद्धान्त यह था कि जो करना हो करते चलो, जब पकड़े जायेंगे तो दण्ड सह लेंगे, काण्ड-प्रारम्भ से पकड़े जाने के बीच का आनन्द, दण्ड से कहीं अधिक होगा। चार्वाक के उपासकों से प्रेरित यह सिद्धान्त भी हमें स्वीकार्य नहीं था। काण्ड के उत्कृष्ट निष्पादन में जो संतुष्टि का सुख था वह भविष्य में हम सबका स्वातन्त्र्य-अमृत होने वाला था। पकड़े जाने के परिणाम हम सबके लिये भयावह थे। छात्रावास अधीक्षक के पास वह अन्तिम ब्रह्मास्त्र था जिसके आगे हम सब निरुत्तरित थे। अतः पकड़े जाना हमारा विकल्प नहीं था, भले ही योजना में कितनी भी सिद्धहस्तता अर्जित करनी पड़े।


निष्पादन, उद्धाटन और परिणामों की चर्चा अगले ब्लाग में।

20.3.21

मित्र - १८(तुलना और अतृप्ति)

अतृप्ति के मूल में तुलना है। सामान्य से विशेष होने की इच्छा अतृप्ति का कारण बनती है। प्रयत्नों की चेष्टा प्रक्रिया बन जाती है और हम व्यस्त हो जाते हैं। आश्चर्य तब होता है जब विशेष प्राप्त हो जाने के बाद यह रहस्योद्घाटन होता है कि यह विशेष तो उतना विशेष नहीं था। समय और ऊर्जा व्यर्थ हो जाने का दुख होता है, यदि कुछ प्राप्य रहता है तो यह ढाढ़स कि जो चाहा था, पा लिया। क्या चाहा, क्यों चाहा, ये प्रश्न आत्म के लिये अनसुने हो जाते हैं। यह तो बहुत बाद में समझ आया किस अवस्था में किसे विशेष मानना चाहिये। तुलसीदास को जब उस विशेष की समझ याद दिलायी गयी तो रामचरितमानस सा अद्भुत ग्रन्थ लिखा जा सका। हम छात्रावासियों को इसी विशेष को समझाने का प्रयास और हमें अपने ही विशेष मानकर उनको पाने की उत्सुकता, इन्हीं दो धरातलों के मिलने की प्रतीक्षा क्षितिजवत हो गयी, छायायें लम्बी हो गयीं, सूर्य उदास सा स्वयं ही अस्त हो चला, हर दिन। 

स्वातन्त्र्य के लिये हम सबके मन में एक छटपटाहट थी और वह ऐसी ही तुलना पर आधारित थी। इस तुलना में विशेष की प्राप्ति के लिये मन नहीं अकुलाता था वरन सामान्य की प्राप्ति को आत्म उद्धत होता था। जब अधिकांश के पास “वह” हो तो “वह” विशेष नहीं रह जाता है। जब सामान्य भी हाथ में न हो तो मन की पीड़ा वंचितों सी होती है। हम छात्रावासियों की दशा कुछ ऐसी ही थी। अनुराग से इस पक्ष पर विस्तृत चर्चा हुयी तब कहीं जाकर वर्षों के बाद उलझे कारण सुलझ कर सामने आ सके, हम अपने व्यवहार का कारण समझ सके। 

हमारी कक्षा में विद्यालयवासियों की संख्या कहीं अधिक थी। हमारी दृष्टि में उनके पास पर्याप्त स्वतन्त्रता थी। वे ही हमारे नित्य के सम्पर्क बिन्दु थे, वही समाचारों के वाहक थे, कहाँ क्या चल रहा है? जब भी कक्षाओं के बीच में बातचीत चलती थी, उनके द्वारा ही पता चलता था कि कौन सी फिल्म कहाँ लगी है? कई लोग देख भी आते थे और कथानक भी सुनाते थे। यह अनुभव भी कि वापस घर जाते समय कितने आनन्द उठाते हुये भिन्न जगहों पर स्वादिष्ट पकवान खाते थे। इसके बाद भी जो आनन्द शेष रह जाता होगा वह घर पहुँचकर माँ के हाथ का भोजन कर और स्नेह पाकर मिल जाता होगा। हमारे विद्यालय के मित्रों ने एक अतरंगी सा विश्व बना रखा था बाहर का, अपने अनुपात से कहीं बड़ा, कहीं अधिक मनोहर। 

सारा आनन्द केवल विद्यालयवासियों के भाग में था, ऐसा नहीं था। उनको भी लगता होगा कि छात्रावासी अधिक आनन्द में रह रहे हैं। न कोई पढ़ने के लिये पूछने वाला, न कोई विलम्ब से घर आने के लिये डाँटने वाला, मित्रों के साथ चौबीस घंटों का साथ, दिन भर गपियाने का आनन्द, एक उत्सवीय जीवन। मुझे तो कभी विचार नहीं आया पर मनीष ने बताया कि छात्रावासियों की आत्मीयता, एकता, उत्श्रृंखलता और प्रतियोगी परिवेश उनको सदा से ही प्रभावित करता रहा है। 

हमारे इस दिवा स्वप्न का सरल समाधान तो यह था कि सप्ताह में एक दिन बाहर जाकर हम वह संसार देख आते और उसका यथार्थ समझ आते या कुछ ऐसा होता कि छात्रावासी और विद्यालयवासी माह में २-३ दिन एक दूसरे के स्थान पर रह लेते। इतने सरल उपायों के स्थान पर हमें अनुशासन का पाठ पढ़ाया गया, बड़े स्वप्न देखने की प्रेरणा पकड़ायी गयी, बालसमझ के मानस में आदर्शों को ढेला गया। ये सब भी आवश्यक थे, पर समय आने पर। पतंजलि योगसूत्र में कहते भी हैं कि क्रम बदलने से कार्य बदल जाता है। समय के पहले और आवश्यकता से अधिक खाकर अपच हो गयी, जठराग्नि के अभाव में कुछ पचा ही नहीं पाये। जानने और करने की उद्भट आंकाक्षा जगती तो यही सब बुद्धिविकास और जीवनोत्थान के पोषकतत्व हो जाते। अपने विशेषों में उलझे हम विशेष की सार्थकता समझ ही नहीं पाये। साधना में मन कहाँ रमेगा जब मन स्वयं ही सुख साधन जुटाने निकल पड़ा हो। हमें तो सुख की हर परिकल्पना में बाहर के दृश्य सुहाते थे। 

इस मनोदशा का परिणाम यह होता था कि किसी प्रकार बाहर जाकर यदि कल्लू की चाट भी खा आये तो लगता था कि जगत जीतकर लौटे हैं। इसी से प्रेरित थी, किसी भी सायं को या अवकाश के दिन बाहर जाने की उत्कण्ठा। बाहर जाने की अनुमति लेनी होती थी जो कि साधारणतया नहीं मिलती थी। कारण बताने होते थे जाने के। कोई कितने कारण उत्पन्न करेगा अपनी बुद्धि से और कैसे संतुष्ट करेगा छात्रावास अधीक्षक को उसकी आवश्यकता के बारे में? बाल कटाने के लिये माह में एक बार और वह भी निश्चित नहीं, कह दें कि बाल ठीक लग रहे हैं। अनुमति मिले भी तो, वह भी एक घंटे की। सप्ताहों के देखे सपने कहाँ भला एक घंटे में आकार पा पाते हैं? दूसरा कारण था आवश्यक सामान लाने का, कोई पुस्तक या कलम या साबुन। उसमें भी एक घंटे से अधिक नहीं, पास में ही सरस्वती पुस्तक भण्डार था। मित्र से कोई प्रश्न पूछने के लिये? यह बहुत ही दुर्बल कारण था। 

सत्य बताना संभव नहीं था। कहीं खाने जा रहे हैं या फिल्म देखने जा रहे हैं, ये कारण अनुमति मिलने में आधारहीन थे, अर्थहीन थे। भोजन छात्रावास में मिलता ही था और छात्र जीवन में फिल्म से दूर रहना चाहिये, इससे मानसिक प्रदूषण होता है, इति। किसी और कारण से अनुमति लेकर कुछ और कर आने के कई प्रयास हुये भी और पकड़े भी गये। आवश्यक सामान लाने और कार्य निपटाने का समय पूर्वाह्न में होता था, उस समय न कल्लू की चाट का ठेला लगता था और न हीं फिल्म का कोई शो ही प्रारम्भ होता था। वैसे भी एक घंटे की अनुमति लेकर तीन घंटे में वापस आना संशय को उत्पन्न कर देता। इस बाध्यता के कारण कुछ छात्रावासियों ने नियमित फिल्म के पहले चलने वाली छोटी अवधि की अंग्रेजी फिल्में ही निपटा डालीं। 

बाहर का विश्व कुछ तो विद्यालय के मित्रों ने बड़ा बना दिया था, शेष अनुशासन के कठिन नियमों ने। रुद्ध जल सदा ही अवरोध से टकराकर पार पाना चाहता है और जब तक राह नहीं बना लेता उसे आगे की कोई समझ नहीं रहती। हमारी भी वही स्थिति रही, ऊर्जा और समय बस इसी पर व्यर्थ होते रहे। आज उन्हीं घटनाओं का विचार विनोद उत्पन्न कर देता है पर उस समय हम इन्हीं क्रियाओं में गम्भीरतम थे। 

हमारी चिन्तन प्रक्रिया भले ही न समझी जा सकी हो पर हमारे बुद्धिबल की थाह पायी जा चुकी थी। हमारी चालें और बाध्यतायें स्पष्ट हो चली थीं। तू डाल डाल, मैं पात पात, यह मुहावरा जीवन्त हो चला था।

16.3.21

मित्र - १७(दण्ड और संदेश)

उत्पात और दण्ड, दोनों ही अपने अपने संदेश देने का प्रयत्न करते हैं। एक नियत संदेश देने के लिये उत्पात या दण्ड की मात्रा कम रही या अधिक, इस पर सदा ही मतभेद रहा है। उत्पात और दण्ड कितने सफल रहे, यह इस पर निर्भर करता है कि संदेश का परिणाम कितना प्रभावी रहा। यदि उत्पात अपनी स्वतन्त्रता सिद्ध करने के लिये किया गया हो तब दण्ड के साथ नियमों में तनिक ढील हो जाये तो उत्पात सफल रहता है। यदि उत्पात में दण्ड के साथ नियमों में कठोरता कर दी जाये तो उत्पात पूर्ण रूप से असफल। संदेश देने में तो सफल पर प्रभाव छोड़ने में असफल। नियमों में कठोरता कर अनुशासक स्वतन्त्रता को और बद्ध कर देता है। संदेश दो रहते हैं कि उत्पात और स्वतन्त्रता में ढील, दोनों ही स्वीकार्य नहीं हैं। यदि उसके बाद शान्ति हो जाती है तो संदेश सफल रहा और यदि पुनः उत्पात होता है तो संदेशों के कई और चक्र होने शेष हैं इस रण में। किसमें कितनी ऊर्जा रही, किसमें कितना धैर्य रहा, किसमें कितना चातुर्य रहा, इस रोमांच का कथास्थल रहा है हमारा छात्रावास।


छात्रावास के ७ वर्षों में इस विषय में साम्यस्थिति कभी पहुँची ही नहीं। जिस समय छात्रावास अधीक्षक अनुमति देने में सहृदयता दिखाते रहे, उत्पात की आवृत्ति और आवेग कम रहे। जब से नियमों को कड़ा किया गया या उनका अनुपालन सुनिश्चित करने में विशेष प्रयास किया गया, उत्पातों का बुद्धि सौन्दर्य बढ़ता गया।


छात्रावास परिसर में मुख्यतः तीन आचार्य थे जो छात्रावास के दायित्वों से सीधे संबद्ध थे। एक प्रधानाचार्यजी थे जो अनुशासनप्रिय थे। प्रातः उठना हो, पूजा में पहुँचना हो या जो भी गतिविधि लेते थे, उसमें नियमों की प्रयुक्ति सुनिश्चित करते थे। दण्ड देने के लिये उत्पात की सूचना उन तक पहुँचना आवश्यक होता था। उनके सूचना तन्त्र के अवयव अधिक समय तक अपना रहस्य नहीं रख पाये। वे छात्र और सहायक धीरे धीरे उत्पात के क्रियान्वयन की परिधि से बाहर होते गये। गुप्तचर यदि गुप्त न रह पाये तो उसकी दुर्गति बहुत होती है। उनको कभी भी उत्पात में सम्मिलित नहीं किया गया। कई बार उनको नियन्त्रित सूचना पहुँचाने के उपयोग में लाया गया। फिल्म शोले जैसी नाटकीयता तो नहीं पर “सब ठीक चल रहा है का संदेश” उनके माध्यम से ही भेजा जाता था।


प्रधानाचार्यजी का विश्वास था कि शब्द अत्यन्त प्रभावी होते हैं और हम छात्रावासी शब्द सुनकर ही सुधर जायेंगे। उनके उद्बोधनों की ओजस्विता अनुकरणीय है। शब्दों पर नियन्त्रण, वाक्यों का प्रवाह और विषय पर दृष्टि, तीनों सधे हुये चलते हैं और इस सम्मोहन में कब समय निकल जाये, यह पता ही नहीं चलता है। शब्द जितने सक्षम थे, हम उतना सुधरे भी पर “मनसा वाचा कर्मणा” में केवल एक विमा ही पर्याप्त नहीं होती है। मन से और कर्म से हम सब फिर भी उत्पाती बने रहे, बस शब्दातीत हो गये। लब्ध और शब्द में जो जिस समय दिखा, वह स्वीकार कर लिया।


दूसरे आचार्य थे, प्रमुख छात्रावास अधीक्षक। सरल थे, गृहस्थ थे और छात्रावास के लिये अधिक समय नहीं निकाल पाते थे। यदा कदा उनकी उपस्थिति हमारे आदर का विषय थी। तीसरे आचार्य थे जो मुख्यतः हमारी सारी गतिविधियों पर सतत दृष्टि रखते थे और बाहर जाने के लिये या किसी अन्य कार्य को करने के लिये उनकी अनुमति आवश्यक होती थी। प्रथम तीन वर्ष उनके पास भोजनालय का भी दायित्व था। उनकी दोनों दायित्वों में व्यस्तता हमारी स्वतन्त्रता में बाधक नहीं थी। अनुमति देने में अधिक पूछताछ नहीं करते थे, हाँ कारण पुष्ट होना चाहिये। हम लोग हर बार एक नवीन कारण ढूढ़कर लाते थे। उनके समय में हमारी बौद्धिक क्षमता का समुचित विकास हुआ। अति उदारमना होने में उनका यह सिद्धान्त रहा होगा कि अधिक कसने से चूड़ियाँ टूट जाती हैं, समुचित विकास के लिये ढील आवश्यक है। इस ढील का हम सबने अन्यथा बहुत लाभ उठाया।


तीन वर्ष बाद जब परिवर्तन हुआ तो एक के स्थान पर दो आचार्यों को लगाया गया, एक भोजनालय के लिये और दूसरे छात्रावास के लिये। यह वह समय था जब दोनों ही क्षेत्रों में और दोनों ही पक्षों में घर्षण हुआ। भोजन की कथा के बारे में फिर कभी पर छात्रावास में हम लोगों की जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन होना प्रारम्भ हो गया। जिन ढीलों को हम अपना अधिकार माने बैठे थे, जिन पर कभी कोई प्रश्न नहीं करता था, जिन कृत्यों के बारे में किसी को पता नहीं चलता था, वे सारे तत्व विचारणीय हो गये और हम सबकी दशा दयनीय।


छात्रावास सम्हाल पाना सबके बस की बात नहीं है। इसमें समय, ऊर्जा और बुद्धि तीनों ही चाहिये होता है। पहली बार लगा था कि तीनों में ही हमसे कोई आगे चल रहा है। एक के बाद एक ऐसी घटनायें होती गयी, ऐसी स्थानों से लोग टहलते हुये पकड़े गये कि यह समझना कठिन हो गया कि क्या करें, क्या न करें? अनुशासन अपने स्थान पर था पर युवा मन को लगने लगा कि उनकी ऊर्जा को कहीं से चुनौती मिल रही है। योजना का जो स्तर अभी तक हम लोग प्रयोग में ला रहे थे, उससे कहीं सूक्ष्मतर दृष्टि से हम देखे जा रहे थे। जिन दुर्गों में हम निश्चिन्त हो बैठे थे, वे सब एक के बाद एक ढह रहे थे। कौन सा सूचना तन्त्र कार्य कर रहा है, यह समझ नहीं आ रहा था? बात नियमों के कठिन या सरल होने की नहीं रह गयी थी, अब प्रतिष्ठा स्वयं को सिद्ध करने की हो गयी थी। संदेश देने के पहले ही पकड़े जा रहे थे, उत्पात मचाने के पहले ही उद्घाटित हुये जा रहे थे।


रण अब प्रत्यक्ष नहीं रह गया था, रण एक नये स्तर पर पहुँच गया था।

23.1.13

बख्शा तो हमने खुद को भी नहीं है

एक साथी अधिकारी के कार्यालय में बैठे थे, किसी समन्वय के विषय पर बात चल रही थी। एक कर्मचारी आता है, एक बड़ी ग़लती के संदर्भ में, आरोप तय हो चुके थे, दण्ड के बारे में बख्श देने की बात कर रहा था। बातों से लग रहा था कि ग़लती हुयी नहीं है वरन की गयी थी और वह भी अक्षम्य थी। अधिकारी अपनी न्यायप्रियता के लिये जाने जाते थे, अच्छे कर्मचारियों के चहेते और ठीक से कार्य न करने वालों के लिये भयकारक। उनका उत्तर सुनकर मैं दंग रह गया। उन्होने कहा कि कैसे बख्श दें, बख्शा तो हमने खुद को भी नहीं है।

बात सच थी, मैं उन्हें जितना जानता था, स्वानुशासन में कसे किसी भी और व्यक्ति से अधिक अनुशासित, किसी भी समय हो, कैसी भी परिस्थिति हो, कार्य के प्रति और अनुशासन के प्रति कठोर। जो स्वयं के लिये कठिन मापदण्ड निश्चित करता है वही दूसरे के प्रति कठोरता भी दिखा सकता है। अनौपचारिक रूप से पूछने पर बताया कि यदि कर्मचारी का व्यवहार उनके प्रति व्यक्तिगत रूप से अप्रिय होता तो उसे क्षमा करने में उन्हें एक पल भी न लगता। आरोप ऐसा था जो रेलवे के प्रति अप्रिय था, उस दशा में क्षमा कर देना उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर था। व्यक्तिगत जीवन में अत्यन्त सहनशील और अनुशासित व्यक्ति का प्रशासनिक रूप में इतना कठोर व्यवहार देख मन सोचने को विवश हो गया।

दण्ड के बारे में इतिहासों में न जाने कितने उदाहरण बिखरे पड़े हैं। दो छोर हैं, कम आरोप के लिये अधिक दण्ड और अधिक दण्ड को भी क्षमा कर देने का उदारहृदय। इन दोनों छोरों के बीच में सब प्रशासक अपने आप को पाते हैं। प्रशासनिक मानक सदा ही ज्ञात रहे हैं, किस आरोप के लिये कितना दण्ड हो यह बहुत कुछ नियत है, दण्ड कितने प्रकार के हों यह भी नियत है। मानवीय हस्तक्षेप दो ही रूप में आता है। पहला आरोपों को किस परिप्रेक्ष्य में लिया जाये, गलती अनजाने में हुयी या जानबूझ कर की गयी। दूसरा यह कि यदि उसका दण्ड कम रखा जाये तो भविष्य में पुनरावृत्ति की क्या संभावनायें हैं? इस क्षमा के लिये क्या वह कृतज्ञ रहेगा और भविष्य में अधिक मन लगा कर कार्य करेगा?

हर प्रशासक के लिये मानवीय हस्तक्षेप का अर्थ भिन्न होता है। यह दो कारकों पर निर्भर करता है। पहला कि प्रशासक के अन्दर अपने कर्मचारियों को लेकर कितनी आशावादिता शेष है, आशावादी प्रशासक सदा ही एक और अवसर देने को प्राथमिकता देते हैं। दूसरा कि प्रशासक अपने जीवन में स्वयं ही कितने अनुशासित हैं, अधिक अनुशासित उसी तरह का प्रशासन चाहते हैं जो उन्होंने स्वयं पर लागू कर रखा होता है। आशावादिता और अनुशासनप्रियता दोनों ही अलग विमायें हैं, एक प्रमुखतः सामाजिक है, दूसरी प्रमुखतः व्यक्तिगत, पर मानवीय हस्तक्षेप पर इनका प्रभाव मिलाजुला होता है।

अब मित्र अधिकारी का कठोर निर्णय उनकी क्षीण आशावादिता से अधिक प्रभावित था या अनुशासनप्रियता से, यह स्पष्ट कहना कठिन है। अधिक पूछने का अर्थ उनके अर्धन्यायिक अधिकारक्षेत्र में दखल देने जैसा था, पर इस विषय ने स्वयं के बारे में सोचने को प्रेरित अवश्य किया। मेरे कर्मचारी बहुधा जो पीठ पीछे चर्चा करते रहते हैं. वह परोक्ष रूप से देर सबेर पता ही चल जाती है। उनकी राय में मेरा चित्रण कार्य करवाने में कठोर पर कार्य के समय की गयी गलतियाँ क्षमा कर देने में सहदृय प्रशासक के रूप में किया जाता है। सुनकर बहुत अच्छा लगता है, यदि संस्था का कार्य सिद्ध हो रहा है तो दण्ड का क्या महत्व है? सबको ही कम दण्ड दिया है ऐसा भी नहीं है, कई कठोर उदाहरण भी हैं, पर मुख्यतः निर्णयप्रक्रिया में आशावादिता सर चढ़ बोली है।

मुझे ज्ञात है कि दण्ड के विषय में सहृदय हो जाना लगभग १५ प्रतिशत घटनाओं में उल्टा बैठा है या कहें कि क्षमा किये लोगों पर कोई सुधार नहीं हुया और उन्होंने गलतियाँ पुनः की। लगभग ५० प्रतिशत लोगों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा, पर वे नकारात्मकता की ओर भी उद्धत नहीं हुये। पर जिन ३५ प्रतिशत लोगों ने क्षमा का महत्व समझा और अधिक श्रम कर अपनी पुरानी गलतियों को भर दिया, वे मेरे लिये दण्ड प्रक्रिया का आनन्द रहे हैं, दण्ड न देने से ही सुधरने वाले। अनुशासन के मार्ग पर मध्यम और आशावादिता के मार्ग पर उच्च विश्वास सदा ही मेरी निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते रहे हैं।

आशावादिता के निष्कर्ष कई लोगों के लिये १५ प्रतिशत घटनाओं से कहीं अधिक नकारात्मक रहे होंगे। इस प्रतिशत का अधिक होने का अर्थ है, धीरे धीरे आशावादिता से विश्वास उठ जाना। यही सामाजिक और पारिवारिक क्षेत्र में भी लागू होता है, नकारात्मकता की एक घटना किन स्थानों पर किस रूप में सामने खड़ी हो जायेगी, कहना कठिन होता है। किसी घटना को लेकर समाज के स्वर इन्हीें विमाओं के सतरंगे स्वरूप होते हैं, संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में सभी अपने अपने स्थान पर सच भी होते हैं। किसी अपराध के लिये कोई मृत्युदण्ड माँगता है, कोई उन्हें सुधरने देना चाहता है, बिना यह जाने कि उन दोनों का का अर्थ है अपराधी के लिये। अपराधी के लिये इन सब माँगों में सब अपने मन को व्यक्त करते हैं, कि यदि अपराध उनने किया होता तो क्या दण्ड मिलना चाहिये?

बड़े महान होते हैं वे जो स्वयं के लिये तो बड़े कठिन मापदण्ड बनाते हैं पर अन्य को क्षमा करने में बड़े उदार हो जाते हैं, ऐसे लोग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं उनके लिये जिन्हें उन्होने क्षमा किया है। वहीं दूसरी ओर बड़े ही धूर्त होते हैं वे लोग जो स्वयं के लिये तो रीढ़विहीन मापदण्ड बनाते हैं पर दूसरों को कठिनतम दण्ड देने के लिये सदा उद्धत रहते हैं। दूसरी प्रकार के लोग दण्डप्रक्रिया में नकारात्मकता भरने का कार्य बड़ी शीघ्रता से कर डालते हैं, भययुक्त वातावरण बनने में देर नहीं होती तब।

पता नहीं मैं ठीक करता या नहीं, पर संभवतः उस दिन कर्मचारी को क्षमा कर के एक और अवसर देता, कुछ अच्छा करने के लिये, जिससे उसका ग्लानिभाव कम हो जाये। आरोप व दण्ड का भारीपन जीवन में नकारात्मकता न ले आये, उसमें तनिक सहायक बनने का कार्य करता। उस कर्मचारी के आरोप के आधार पर संभावना अवश्य थी कि भविष्य में मेरा निर्णय सही नहीं ठहराया जाता, फिर भी उत्कट आशावादिता से बच पाना कठिन है मेरे लिये भी।

26.9.12

बच्चों का जीवन

'ऐसी क्या चीज है, जो आपको तो नहीं मिलती है पर आपसे उसकी आशा सदैव की जाती है', आलोक ने बच्चों से पूछा। इज्जत या आदर, उत्तर मिलने में अधिक देर नहीं लगी, और बहुत बच्चों ने यह उत्तर दिया। उत्तर सही भी है, बच्चे के दृष्टिकोण से देखें, उससे सदा ही आशा की जाती है कि वह अपने माता-पिता, गुरुजनों और अग्रजों का आदर करे, पर उसे सदा ही अनुशासनात्मक, उपदेशात्मक और प्रताड़ित करते हुये से आदेश मिलते हैं। किसी के जीवन में इसकी मात्रा कम रही होगी, किसी के जीवन में अधिक, पर भूला तो कोई भी नहीं होगा। बच्चों के लिये अन्याय और अनादर भूलना बहुत कठिन होता है। झाँसी प्रवास के समय हमारे पुत्र की पूरी कक्षा को किसी एक की उद्दण्डता के लिये दण्ड मिला, बहुधा शान्त से रहने वाले हमारे सुपुत्र जी इसको पचा नहीं पाये और बहुत क्रोधित हुये। क्रोध तो धीरे धीरे शान्त हो गया पर उनकी स्मृति में उन अध्यापक के प्रति एक निम्न धारणा बन गयी। ऐसी चीजें भूलना कठिन भी होती हैं, जहाँ जहाँ मुझे बिना मेरी भूल के डाँट या मार पड़ी है, वे सारे स्थान, व्यक्ति और घटनायें स्पष्ट याद हैं। बड़े होने के बाद बहुत से अन्याय या तो भूल गया हूँ या क्षमा करता आया हूँ, पर बचपन के नहीं भूलते हैं, न जाने क्यों?

आलोक चित्रकार हैं, मित्र हैं और गोवा में रहते हैं। बच्चों के विषय में अत्यन्त संवेदनशील है और बच्चों के उन्मुक्त विकास के बारे में अद्भुत विचारों से परिपूर्ण भी। जो तथ्य उसको सर्वाधिक कचोटता है कि किस प्रकार हम समाज के रूप में अपनी ही क्षमताओं और संभावनाओं का हनन करते रहते हैं, बचपन से अब तक। हम कैसे अपने बच्चों के प्रति अति अतिसंरक्षणमना हो जाते हैं, उसकी राह की दोनों ओर दीवार बनाते हुये चलते हैं और अपनी इस मूढ़ता को सफलता मानकर प्रसन्न भी हो लेते हैं। आलोक की माने तो बच्चे प्राकृतिक रूप से चित्रकार होते हैं, सबसे अच्छे, उनके हाथ में रंग और ब्रश पकड़ाकर देखिये बस, उनकी अभिव्यक्ति पवित्रतम और सृजनतम होती है। धीरे धीरे वे बड़े हो जाते हैं, उनके ऊपर दायित्वों, कर्तव्यों और आकड़ों का बोझ डाल देते हैं हम सब, बड़ा होते होते वह सारी चित्रकला भूल जाता है।

यद्यपि आलोक बहुत अच्छे चित्रकार हैं पर उन्हें भी लगता है कि बड़े होने के प्रयास में वह थोड़ी बहुत चित्रकला भूल गये हैं। यही कारण है कि उन्हें बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है। पहला कारण यह कि बच्चों के व्यवहार में कोई कृत्रिमता नहीं होती और दूसरा यह कि बच्चों के साथ रहने से हर बार उसे कुछ न कुछ सीखने को मिल जाता है, अपनी चित्रकला के लिये, अपने व्यक्तित्व के लिये। आलोक नियमतः प्रत्येक रविवार सड़क पर रहने वाले या अतिनिर्धनता में जीवन यापन करने वाले बच्चों को चित्रकला सिखाते हैं, एक संस्था के लिये, मुफ्त में। यही नहीं, आलोक उस संस्था के प्रति कृतज्ञ भी रहते हैं क्योंकि उनका कहना है कि हर बार वह उन बच्चों से कुछ सीख कर ही जाते हैं। हम सब पर भी यही नियम लागू होता है, जब कभी भी आपके पास विचारों की कमी हो या विचारों के प्रवाह में स्तब्धता हो, तो बच्चों को देखिये, बच्चों के साथ समय बिताइये, बच्चों से सीखिये।

उपरोक्त प्रश्न, ऐसी ही एक कक्षा के समय पूछा था आलोक ने। प्रश्न अच्छा खासा समझा हुआ था और उत्तर अन्ततः वहीं पर जाना था। बच्चों की तार्किक क्षमता को कमतर समझने की हमारी मानसिकता को झटका तब लगता है जब बच्चे सीधा और अन्तिम उत्तर दे देते हैं। उत्तर इतना सटीक और बहुतायत में मिलेगा, यह आलोक के लिये भी आश्चर्य का विषय था। बच्चों से यह प्रश्न सीधे भी पूछा जा सकता था कि कौन आपको अच्छा लगता है, कौन नहीं। बच्चों के लिये अच्छा लगने या अच्छा न लगने का केवल एक ही मानक है, कि कौन उनके अस्तित्व का आदर करता है या कौन नहीं।

इसके पहले कि इस विषय में प्रतिप्रश्न खड़े हो जायें, इस बात को स्पष्ट कर देता हूँ कि अनुशासन और अनादर में अन्तर है। पारिवारिक अनुशासन आवश्यक है और वह बड़ों को अपने आचरण से स्थापित करना होता है, बच्चों को श्रम का गुण सिखाना हो तो स्वयं भी खटना होता है। अनुशासन का यह स्वरूप आदर के साथ संप्रेषित होता है। कुछ स्वयं न करें और स्वयं को बच्चों को थोप दें, यह अनुशासन तो है पर अनादर के साथ। अनुशासन के अतिरिक्त बहुत से ऐसे निर्णय होते हैं जिनमें हम अपने बच्चों की चिन्तन प्रक्रिया को मान नहीं देते हैं, उनके उत्साह को अपने अनुभव से ढकने का प्रयास करते हैं। निश्चय ही बड़ों ने अधिक जीवन जिया है और उनके अन्दर अपने बच्चों के योगक्षेम की भावना भी अधिक है, पर उस अनुभव से और उस प्यार से बच्चों की निर्णय प्रक्रिया को बल मिले, न कि अनादर।

आलोक बचपन से ही चित्रकार बनना चाहता था, उसे घर में थोड़ा प्रतिरोध और बहुत सहयोग मिला, उसके निर्णय को आदर मिला, उसने अपना जीवन बचपन से ही स्थापित दिशा में बढ़ाया। जब बचपन से ही आपके अस्तित्व को सम्मान मिलता है, लाड़ दुलार से थोड़ा अधिक गंभीर, तो जीवन जीने का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है। निर्णय तो देर सबेर लेने ही होते हैं, यदि आप बचपन में नहीं लेंगे तो बड़े होकर आपका पीछा करेंगे। अपने निर्णय लेने से साहस बढ़ता है। कई मित्रों को जानता हूँ जो अभी भी स्वतन्त्र निर्णय लेने में घबराते हैं, दूसरे का मुँह ताकने लगते हैं। माता पिता के रूप में हम उनके शुभचिन्तक अवश्य हो सकते है, उन्हें अपने अनुभव व ज्ञान के आधार पर समुचित सलाह भी दे सकते हैं, पर निर्णय बच्चों को ही लेने देना हो। अपने लिये निर्णयों में मन खपा देने की ऊर्जा आ जाती है बालमनों के अन्दर।

वहीं दूसरी ओर अपना बचपन देखता हूँ तो निर्णय लेने की सारी स्वतन्त्रता थी, छात्रावास में रहने से निर्णय-प्रक्रिया समय के पहले ही पक गयी। कभी कभी बच्चों से विनोद में पूछता हूँ कि वे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं तो वे उल्टा प्रश्न ही दाग देते हैं, कि आपके पिताजी आपको क्या बनाना चाहते थे? जब कहता हूँ कि मुझे पूरी स्वतन्त्रता थी निर्णय लेने की कि मैं क्या बनना चाहता हूँ, तो उन्हें बड़ा अच्छा लगता है कि घर में बच्चों का अधिकार न हड़पने की परम्परा है। अगला प्रश्न और पेचीदा होता है, कि आपको जब छूट थी और आपने जो चाहा, वह बन भी गये तो अब लैपटॉप के आगे बैठकर लिखते क्या रहते हो? स्मृतियाँ सामने घूम जाती हैं और मैं बच्चों को मन का सच बता देता हूँ।

स्वतन्त्रता थी और मन में इच्छा गणितज्ञ बनने की थी, गहरी रुचि भी थी गणित में, सवालों और अंकों से मित्रता सी रहती थी। यदि और अधिक नहीं सोचता तो निश्चय ही किसी विश्वविद्यालय में गणित की गुत्थियाँ सुलझा रहा होता, अंकों की भाषा विद्यार्थियों को सिखा रहा होता। आईआईटी में प्रवेश भी मिल गया और तब वह समय आया जब यह निर्णय करना था कि अन्ततः क्या करना है? जब निर्णय लेने की स्वतन्त्रता मिलती है तो व्यक्ति समय के पहले ही प्रौढ़ हो जाता है, माता-पिता ने जब बालमन को यह आदर दिया तो बरबस ही मन यह जानने लग गया कि भला माता-पिता क्या चाहते हैं? एक बार उनके मन की जानी तो मन ने निश्चय कर लिया कि सिविल सेवा में जाना है, सफलता मिली और रेलवे में आना हुआ, कार्य में मनोयोग से लगे भी हैं। बहुत पहले से लेखन भी होता था, अब धीरे धीरे लेखन में मन लगने लगा है, अंकों से खेलने वाला बालमन अब शब्दों के अर्थ समझ रहा है, और अब तो यह भी पता नहीं कि अभी अस्तित्व के कितने खोल उतरने शेष हैं?

बच्चों के आँखों में चमक तो आयी पर उसका अर्थ मुझे समझ न आया। उन्हें आलोक की भी कथा ज्ञात है, आलोक ने बचपन में एक निर्णय लिया और उसमें अपना जीवन पहचान भी चुका है। मैं अब भी निर्णयों के कई मोड़ों से होकर निकल रहा हूँ, चल रहा हूँ और स्वयं को चलते देख भी रहा हूँ। बच्चों को ज्ञात है कि उन पर कोई निर्णय थोपा नहीं जायेगा, जब भी लेंगे, जो भी लेंगे, वह उनका अपना निर्णय होगा। उनकी आँखों में कोई निर्णय लेने की शीघ्रता भी नहीं है, वे दोनों ही अभी अपने बचपन का आनन्द उठाने में व्यस्त हैं।

उनके प्रति हमारा व्यवहार अनुशासनप्रद भी रहेगा और आदरयुक्त भी, हमारे हाथ इतने दूर भी रहेंगे कि उन्हें दौड़ने में बाधा न हो और इतने पास भी कि गिरने पर उन्हें सम्हाल सकें।