3.4.21

मित्र - २२

बिना अनुमति के बाहर निकलने के पहले कई तैयारियाँ करनी होती थीं। रविवार के दिन सबके पास समय रहता था और अवसर भी। उस दिन बाहर निकलने का प्रयास करने वालों की संख्या अधिक होती थी अतः छात्रावास अधीक्षक की सजगता भी उसी स्तर की होती थी। विद्यालय के दिनों में भी बाहर जाने के लिये सायं के अतिरिक्त कोई और समय नहीं होता था। रात को आठ बजे तक हाट बन्द हो जाते थे अतः उसके बाद जाने का प्रश्न ही नहीं। सायं की पूजा ७३० पर होती थी अतः उसके पहले तक वापस आना होता था। पूजा मे आवश्यक रूप से कोई न कोई रहता था और आपकी अनुपस्थिति प्रश्न खड़े कर सकती थी। ले देकर विद्यालय बन्द होने के तुरन्त बाद से लेकर पूजा प्रारम्भ होने तक का समय मिलता था, लगभग २ घंटे का जो खेलकूद का था।


यदि गूगल मैप से देखेंगे तो विद्यालय की आकृति ऊपर से अर्धचन्द्राकार दिखायी देती है। विद्यालय का द्वार लगभग हर कक्ष से दिखता है, स्पष्ट सा। द्वार से कौन अन्दर आ रहा है, कौन बाहर जा रहा है, इस बात की सूचना सबको रहती थी। इसके अतिरिक्त कोई और द्वार नहीं था। इसके दो अर्थ थे, पहला कि यदि बिना अनुमति लिये निकलना हो तो इस द्वार का उपयोग वर्जित था। पता नहीं विद्यालय छूटने के समय विद्यालयवासियों की भीड़ के साथ तो बाहर जाया जा सकता था पर विद्यालय के वेश में हाट में टहलना उद्धाटन को आमन्त्रित करने सा था। विद्यालय का वेश सदाचार का प्रतीक था और आचार्यों को यह तथ्य बताने वाले शुभचिन्तकों की कमी नहीं थी उस क्षेत्र में। साथ ही इतना समय भी नहीं रहता था कि कमरे में जाकर वेश बदल लें। यदि त्वरित गति से वेश बदल भी लें तो बाहर निकलने वालों के समूह में स्पष्ट दृष्टिगत हो जायेंगे।


दूसरा अर्थ गहरा था। यदि कभी सायं के समय छात्रावास अधीक्षक अपने स्कूटर से इसी द्वार से बाहर जाते या आते थे तो वह सूचना सबको ज्ञात हो जाती थी। पता नहीं छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी को ज्ञात रहता था कि उन पर इतनी दृष्टि एक साथ पड़ रही हैं। उसी समय से हमारी गणना प्रारम्भ हो जाती थी। कई बार के अवलोकन के बाद यह निष्कर्ष निकला था कि वैसे तो आचार्यजी बाहर कम जाते हैं पर जब भी आवश्यक कार्य होने पर जाते हैं, दो घंटे से अधिक लगता है। वही हमारा सर्वोत्तम अवसर था, सुरक्षित कालखण्ड था।


बाहर निकलने के लिये हम अर्धचन्द्राकार के उत्तल भाग पर अन्त में बनी दीवार से लाँघते थे। इसके तीन लाभ थे। पहला यह बिन्दु किसी भी अन्य स्थान से नहीं दिखता था, यहाँ तक कि उसके ऊपर के कक्ष से भी नहीं। दूसरा कि यह एसडी कालेज के क्रीडास्थल की ओर खुलता था और वहाँ से निकल कर भीड़ का भाग हो जाना सरल रहता था। तीसरा कि वहाँ से हाट की ओर सरकने में विद्यालय की ओर नहीं आना होता था। समस्या बस इतनी थी कि इस बिन्दु तक पहुँचने के लिये विशालकक्ष के सामने से होकर जाना होता था जो कि प्रधानाचार्यजी के कार्यालय के सामने था। लगभग १० फीट की दूरी में आप दृष्टि में आ जाते थे पर अन्य विकल्पों की तुलना में यह सर्वाधिक सुरक्षित स्थान था। विशालकक्ष से दीवार तक पहुँचने में वहाँ लगे क्रोटन के बड़े पेड़ बड़े सहायक थे। दीवार लाँघने के लिये अन्दर की ओर दो ईटों का उपयोग होता था जो कि वापस आने के बाद छिपा दी जाती थीं।


ऐसा ही एक अवसर था, हम और अमिताभ बाहर निकल गये। निश्चिन्तता में गपियाते हुये टहले। कल्लू का चाट खायी, एक स्थान पर कड़ाही का दूध पिया और मूँगफली खाते हुये बीच हाट से चले आ रहे थे। दोनों ओर सब्जी की दुकाने  थीं और रास्ता बीच में बस इतना चौड़ा था कि दोनों ओर से एक एक पंक्ति निकल जायें। ऐसी स्थितियों में यदि कोई साइकिल या स्कूटर से भी आ जाये तो हम इस बात के अभ्यासी हैं कि उसके लिये भी रास्ता बना देंगे और उसे निकलवा भी देंगे। हाँ यदि वह साइकिल या स्कूटर खड़ा करके कुछ खरीदने लगा तो केवल एक ही पंक्ति चलेगी, बाधा होगी, मंद गति होगी पर हाट रुकेगा नहीं।


ऐसा ही एक रास्ता था, तनिक अंधकार हो गया था, ठंड थी पर एक स्वेटर की। सामने से एक स्कूटर पूरी लाइट जलाये था। थोड़ा और आगे गये तो भी वह हिला नहीं, बस अपने स्थान पर खड़ा रहा। ऐसे स्थानों पर सामान्यतः लाइट हल्की कर दी जाती है जिससे सामने वाले की आँखों में वह चुँधियाये नहीं। आँखों पर सीधा प्रकाश पड़ने से हम दोनों को यह सूझ भी नहीं रहा था कि उसके बायें से निकलने का स्थान है कि दायें से? बीस-तीस सेकेण्ड तक जब वह स्कूटर फिर भी नहीं हिला तो अमिताभ से न रहा गया, वह सकोप बोला “कौन है भाई”। स्कूटर फिर भी नहीं हिला तो कुछ संशय हुआ कि हो न हो यह प्रकाश हमारे ही चेहरे पर स्थिर हो गया हो। चेहरे पर यह विचार आते ही सारा उल्लास उड़नछू हो गया, शरीर जड़वत हो गया। स्तब्ध स्थिति में आँखे अभी भी लाइट के पीछे के व्यक्ति को पहचानने का प्रयत्न कर रहीं थी।


प्रकाश कम होने पर सबसे पहले लम्बी दाढ़ी दिखायी दी, ऊपर गोल हेलमेट और स्कूटर के दोनों ओर धरती की छूती और धोती लपेटे टाँगें। ऊपर की साँस ऊपर, नीचे की नीचे, अमिताभ पुनः कुछ बोलने को उद्धत था, उसका हाथ पकड़कर फुसफुसाया, “दीपकजी हैं”।


शेष ज्ञात इतिहास रहा। चुपचाप दोनों स्कूटर पर दोनों बैठ गये, वापस सर झुकाये छात्रावास के अन्दर। पूजा में बस यही प्रार्थना करते रहे कि हे हनुमान, आज भक्तों को बचा लो। पूजा मे आचार्यजी भी थे, पर न उन्होंने उस समय कुछ कहा, न कभी बाद में, न घर पर कहा और न किसी और से। पता नहीं चला कि बिना छात्रावास में वापस आये उन्हें कैसे पता कि हम निकले हैं और कैसे हमको बीच हाट मे जा दबोचा। हमारा सारा बु्द्धिकौशल धरा का धरा रह गया। उसके बाद ग्लानि से भरे रहे, बस कहीं बाहर जाने की इच्छा ही नहीं रह गयी।


हमें न दण्ड ने मारा, न उपदेश ने, हम तो आचार्यजी के मौन से मारे गये।

3 comments:

  1. अद्भुत प्रस्तुति लगा दीपक जी मेरे घर के दरवाजे पर खड़े है दरवाजा खुलेगा और करारा तमाचा
    हमारे गालों को सुर्ख करते हुए आगे निकल जाएगा

    ReplyDelete
  2. वाह
    अत्यंत सजीव चित्रण।

    ReplyDelete