27.3.21

मित्र - २०

कहते हैं कि किसी दीर्घकालिक संघर्ष को समझना हो तो शतरंज खेलना सीखना चाहिये। अपने पास उपलब्ध शक्ति के अनुसार किस प्रकार आक्रमण और रक्षा की जाती है, यह शतरंज सिखाता है। हर मोहरा अपनी तरह से चलता और मारता है और अन्तिम प्रयास यही रहता है कि अपने राजा को बचाते हुये सामने वाले को मात दी जा सके। यही कारण रहा होगा कि शतरंज जैसा खेल मनोरंजन के साथ साथ राजकुमारों का युद्धकला में प्रशिक्षण भी कराता होगा। गूगल महाराज को पता नहीं कैसे ज्ञात हो गया कि शतरंज हमें भी बड़ा प्रिय है, गाहे बगाहे शतरंज के चर्चित खेल और जटिल चालें हमारे स्क्रीन में ठेलते रहते हैं। शतरंज का कभी गम्भीर प्रशिक्षण लिया नहीं, जो भी सीखा है वह देख देख कर ही सीखा है। 


शतरंज की चालों की समझ तीन स्तरों पर होती है। प्रारम्भिक चालें, मध्यम चालें और अन्तिम चालें। प्रारम्भ में अपना दुर्ग सुरक्षित किया जाता है और सामने वाले की रक्षानीति के अनुसार अपने आक्रमक मोहरे व्यवस्थित किये जाते हैं। मध्य में यह प्रयास रहता है कि किसी तरह बीच के खानों पर अधिकार जमाया जाये, दुर्बल पक्ष पर आक्रमण किया जाये और एक आध मोहरा अधिक मारकर बढ़त ले ली जाये। अन्तिम खेल में बहुत कम मोहरे रहते हैं और खेल की तकनीक पूर्णतया बदल जाती है। तब सामने वाले के पैदल भी वजीर बनने की क्षमता रखते हैं। यदि मध्य खेल में आपको किसी मोहरे की हानि हो गयी तो अन्तिम खेल में उसकी कमी पूरी कर पाना दुष्कर हो जाता है और हार सुनिश्चित हो जाती है।


शतरंज के खिलाड़ियों की क्षमता भिन्न स्तरों पर भिन्न होती है। कोई अन्तिम खेल में अच्छा है तो कोई मध्य खेल में। कोई प्रारम्भ में ही सुरक्षा कर खेल बराबर कराने की सोचता है तो कोई अपनी शक्ति के अनुसार अपने सुदृढ़ स्तर तक ले जाना चाहता है। हर चाल के बाद स्थिति बदलती है, कोई कूटचाल कई चालों के क्रम में अपने आप को खोलती है और कई बार अपने एक मोहरे का बलिदान कर दूसरे पर घातक प्रहार किये जाते हैं। घात प्रतिघात के अनुभव से भरा संघर्ष बड़ा रोचक हो जाता है। इसीलिये संघर्ष की समझ बढ़ाने के लिये शतरंज खेलने की सलाह दी जाती है।


यदि शतरंज से तुलना की जाये तो हमारा भी संघर्ष लम्बा था। निर्णय एक या दो चालों से नहीं वरन कई वर्षों में होना था। हम सब अपनी प्रारम्भिक चालें चल चुके थे। हमारी रणनीति उजागर हो चुकी थी। पिछले प्रशासन को शिथिल समझकर हमने जिस प्रकार अपना दुर्ग खुला छोड़ दिया था वह कई प्रकार से दुर्बल पक्षों से भरा था। उसे पुनः सुरक्षित कर लेना विकल्प नहीं रह गया था, खेल मध्य चालों पर पहुँच चुका था। अब सर्वाधिक प्रभावी रणनीति मध्य खेल में बने रहने की थी और वह भी बिना अधिक मोहरे खोये, जिससे हमको चालें चलने का अवसर मिलता रहे। 


अन्तिम खेल हमारा विकल्प नहीं था, यह समझ हमें कई घटनाओं के बाद आ चुकी थी। छात्रावासियों के लिये अन्तिम खेल अपनी अधिकांश मोहरे और चालों को गँवाकर पकड़े जाना था। इस अन्तिम खेल में हम अत्यन्त दुर्बल थे। इसका एक कारण था। अन्तिम खेल में या तो हम अपनी हार स्वीकार कर अनुशासित हो जायें या न सुधरते हुये उत्पात करते रहें। नहीं सुधरने की स्थिति में उसकी सूचना छात्रावास अधीक्षक घर पर पहुँचा देते थे। हमारे अभिभावकों को छात्रावास अधीक्षक पर हमसे अधिक विश्वास था। इस तथ्य के प्रमाण एक नहीं कई साक्ष्य हैं। कब वह हमारे घर पहुँच जायें या कब फोन कर सत्य बता दें, इस बात का तनिक भी भरोसा नहीं था।


इस संदर्भ में एक कनिष्ठ पुष्पेश के साथ बड़ी ही रोचक घटना घटी। उनके अत्यन्त लघु उत्पातों की सूचना उनके घर पहुँचा दी जाती थी। जब छुट्टी में वह घर जाते थे तो उनको अपने अभिभावकों से सुनना पड़ता था। एक बार लौटकर और खिन्नमना हो उन्होंने छात्रावास अधीक्षक आचार्यजी को यह कह भर दिया कि आप छोटी छोटी बातें तो न बताया करें, माता पिता व्यर्थ ही व्याकुल हो जाते हैं कि लड़का वहाँ पढ़ रहा है कि उत्पात कर रहा है? घर में यह बात भी पहुँचा दी गयी और अगली बार घर में डाँट के साथ कुटाई भी हुयी। इस अन्तिम खेल में निरीह से हमारे कनिष्ठ ने कुछ भी कहना छोड़ दिया और अनुशासित हो चले। हमारे न पढ़ने की, अधिक खेलने की, समय व्यर्थ करने की, झगड़ने की सभी छोटी बड़ी बातें हमारे परिवार को यथासमय और यथामहत्व के साथ पता चलती रहती थीं। 


पकड़े जाना अन्तिम खेल में प्रवेश करने सा था पर वह अन्त नहीं था। क्षमा माँग लेने से या यह विश्वास दिलाने से कि आगे नहीं करेंगे, बात घर तक नहीं पहुँचती थी। ऐसा करने के बाद हम नैतिक और राजनैतिक रूप से दुर्बल हो जाते थे। जब पकड़ लिये गये तो उस प्रकार का काण्ड पुनः करना निर्भीकता की पराकाष्ठा थी, हम पर दृष्टि अधिक तीक्ष्ण हो जाती थी। तब घर पर बात पहुँचना अत्यन्त भावनात्मक विषय हो जाता हम सबके लिये। अन्तिम खेल का यही पक्ष पीड़ा देता था कि जब घर की बात आती थी तो छोटे छोटे अनुशासन के प्यादे वजीर बनने की सामर्थ्य रखते थे। वहीं पर हमारी सारी ऊर्जा अवसान पा जाती थी, हम असहाय हो जाते थे। अतः पकड़े जाना किसी भी रूप में हमारा विकल्प नहीं था। 


मध्य खेल में बने रहने में ही सारा रोमांच था, जिसमें पक्ष प्रतिपक्ष अपनी चालें चलता है, बिना मोहरे गँवाये। यदा कदा हम पकड़े भी गये पर यथासंभव मध्य में बने रहे और खेल पूरे ७ वर्ष चला।

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