6.3.21

मित्र - १४

जिस समय छात्रावास में आये थे, लगभग १०० छात्रावासी और १० कक्ष थे जो ७ वर्षों बाद बढ़कर क्रमशः १३० और १२ हो गये। इनमें से दो कक्ष बड़े थे, शेष कक्षों में प्रत्येक में ९ छात्र रहते थे। एक कक्षप्रमुख होता था, जो मुख्यतः १२वीं कक्षा का होता था, शेष कनिष्ठ कक्षाओं से, लगभग हर कक्षा से एक। दो या तीन ऐसे छात्र होते थे जिनको अपने कक्ष में अपनी कक्षा के मित्र मिल जाते थे, अन्यथा सबके लिये कक्ष का स्वरूप एक अनुशासनात्मक व्यवस्था की तरह था। सबको अपने सभी कार्य करने होते थे और यह सुनिश्चित रखने का दायित्व कक्षप्रमुख का होता था। कक्ष में झाड़ू लगाने का कार्य क्रम से आता था। एक दण्ड विधान था कि यदि झाड़ू नहीं लगायी या ठीक से नहीं लगायी तो अगले दो दिन लगानी पड़ती थी। 

प्रातः जागरण का कार्यक्रम व्यवस्थित रूप से होता था। प्रारम्भ के दिनों में प्रधानाचार्यजी स्वयं उठाने आते थे। वह कक्षप्रमुख या कक्ष के किसी अन्य उत्साही को उठा देते थे और उसका कार्य रहता था शेष सबको उठाना। जैसे ही पहले कक्ष से जागरण प्रारम्भ होता था आने वाले कक्षों को आहट लगने लगती थी और धीरे धीरे वह आहट एक स्पष्ट कोलाहल का स्वर ले लेती थी। आहट पर आँख खुलने पर लगता था कि अभी ५ मिनट और हैं, एक झपकी ली जा सकती है। एक बार आपके कक्षप्रमुख को उठा दिया उसके बाद भी लगता था कि शेष ७ को पहले उठाया जाये, उसके बाद उनका क्रम आये। आशा के ये दो कालखण्ड भले ही कुछ मिनटों के होते थे पर इनमें चुरायी हुयी नींद बहुमूल्य होती थी। 

नहीं उठने के या देर से उठने के छोटे मोटे बहाने स्वीकार्य नहीं थे। हाथ, पाँव, पेट, नाक आदि की पीड़ा प्रत्यक्ष प्रमाण के अभाव में असिद्ध थी। इन पीड़ाओं के अनुमान लगाने के साधन नहीं थे और आपके वचन शब्द प्रमाण माने जाये, आप उस स्तर के आप्त नहीं थे। सर्वाधिक प्रमाणिक ज्वर माना जाता था। उठने की इच्छा नहीं होने पर मन स्वयं से ही प्रश्न करता कि जरा जाँच लो, कहीं ज्वर तो नहीं है। जाड़े में रजाई से शरीर निकालने पर वैसे ही गरमाता है, उससे स्वयं को ज्वर का भ्रम हो जाये पर कक्षप्रमुख को नहीं होता था। यहाँ पर कक्षप्रमुख का ७ वर्ष का अनुभव बड़ा काम आता था। वैसे भी यदि आप अस्वस्थ न हों तो उसका बहाना बना कर छात्रावास में लेटे रहना सर्वाधिक उबाऊ कार्य होता था। आप पर इतने प्रतिबन्ध लग जाते थे कि बहाना भय से भाग जाता था। हिलने डुलने की मनाही, बाहर टहलने पर प्रतिबन्ध, भोजन के लिये खिचड़ी, खेलकूद मना, दो बार आचार्यों का आगमन और पूछताछ। आपका पुराना इतिहास भी टटोला जाता था कि कहीं यह स्वभावतः तो अस्वस्थ नहीं पड़ जाते हैं। आधे घंटे की नींद के लिये कोई इतना झंझट क्यों मोल ले भला? 

प्रारम्भ में तो थोड़े बहुत बहाने फिर भी चल जाते थे, पर जब से आचार्य दीपकजी को छात्रावास अधीक्षक बनाया गया तब से प्रातः समय से उठ जाना ही श्रेयस्कर था। अस्वस्थ होने की स्थिति में वह कई बार आकर कक्ष में झाँक जाते थे। आप अगर लेटे लेटे ऊब कर टहलने लगे तो टोक देते थे और पुनः लेटने का संकेत देते थे। सायं होने पर चिकित्सक के पास ले जाना प्रारम्भ कर दिया। बच्चों को सुई से डर लगता था, उसी डर से छोटे मोटे ज्वर तो अपने आप ही ठीक हो जाते थे। यदि कोई बहाना बना कर चिकित्सक के पास जाने की निडरता दिखा भी दें तो वहाँ पहुँच कर उतने ही उच्च स्तर का अभिनय भी करना होता था, नहीं तो पकड़े जाने की पूरी संभावना रहती थी। अब आधे घंटे की अतिरिक्त नींद के लिये इतने यत्न कौन करे? 

उठने के पश्चात सबको विशालकक्ष में एकत्र होना होता था, आधे घंटे के अन्दर, वहाँ प्रवचन होता था, सदाचार की बातें बतायी जाती थी, प्रातःस्मरणीय विचार संप्रेषित किये जाते थे। मुझे आज तक इसका कारण समझ नहीं आया। आधे घंटे के अन्दर सब दीर्घशंका से निवृत्त नहीं हो सकते थे, जब उठने में इतनी मानसिक बाधा हो तो अन्य नित्यकर्मों में कितनी होगी? यदि एक बार मान लिया कि सब आदर्शवत व्यवहार करें तो इतने शौचालय नहीं थे कि सब निवृत्त हो सके। लगभग ९ छात्रों पर एक शौचालय होता था। कई बार तो ऐसा होता था कि आप क्रम में खड़े हैं और आधे घंटे के बाद आपका समय आया, तो उस समय आप क्या करेंगे? एक बड़ी उहापोह की स्थिति रहती थी, किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति, निर्णय के विकट क्षण। यदि आप समय से विशालकक्ष नहीं पहुँचे तो आपको प्रधानाचर्यजी के सामने प्रस्तुत होने का निर्देश मिल जायेगा और आदर्श आचरण न करने के लिये इतना लज्जित होना पड़ेगा कि उसके सामने सारे दुख सहनीय हो जायें। 

देखा जाये तो जागरण के तुरन्त बाद निर्णय कई चरणों में लेना होता था। पहला कि उठना है कि नहीं? यदि नहीं उठना है तो क्या बहाना बनाना है? क्या एक बार उठकर पुनः सोने का अवसर मिल सकता है, यदि कक्ष से सब चले गये हों? यदि उठ गये तो निवृत्त होने जायें या रोक कर रखे? यदि रोक कर रखा या दबाव न आये तो क्या वह और आधे घंटे तक सहन किया जा सकता है? यदि निवृत्त होने गये और जगह नहीं हो तो वापस विशालकक्ष जायें या प्रतीक्षा करें? यदि क्रम आने के समय में विशालकक्ष में उपस्थित होने का समय हो जाये तो कहाँ जायें? यदि निर्णय रुक जाने का लिया तो जब बुलाया जायेगा तो क्या उत्तर देंगे? क्या बार बार वही उत्तर देने से पकड़ तो नहीं जायेंगे। ऐसे न जाने कितने प्रश्नों पर प्रथम आधे घंटे में निर्णय लेना होता था। दिन का प्रारम्भ निर्णयशास्त्र के प्रायोगिक अध्याय से होती था। 

अन्ततः होता यही था कि १५-२० छात्र नहीं आते थे और उसका उत्तर देने का भार कक्षप्रमुख पर आता था। शेष में आधे बिना निवृत्त हो आ बैठते थे। इस वर्ग ने कई बार विशालकक्ष में अशोभनीय और अवर्णनीय स्थिति उत्पन्न कर दी थी। एक तिहाई तो शाल या चद्दर कान तक ओढ़कर झपकी मार लेते थे। ठंड के समय दरी पर बैठने से नीचे से तापमान असहनीय हो जाता था और छात्र जड़वत हो जाते थे। ऐसी स्थिति में सामान्य विश्व ही नहीं भाता है, आदर्श कहाँ से सुहायेगा। ऐसी स्थिति में प्रवचन कितना ग्राह्य हो पाता होगा? विशालकक्ष से वापस आने के बाद घटनाक्रम सहसा गतिशील हो जाता था। उस समय थोड़ी नींद मार लेने के विचार तब से काल कवलित हो गये जब से दीपकजी उस समय भी निरीक्षण करने आने लगे। 

एक स्पष्टीकरण - ये तथ्य दृष्टाभाव से लिखे है। सर्वघटित तथ्यों में पात्रों का विशेष महत्व नहीं रहता है। मैं उठने के बाद निर्णय प्रक्रिया के किन अंगों को वरीयता देता था, इस विषय में मौन रहना उचित है।

14 comments:

  1. छात्रावास के जीवन की यादों को बहुत जीवंत रूप में लिखा है । अच्छी प्रस्तुति ।

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  2. आभार, यादें विस्मृत हो जायें, उससे पहले समेट लेना श्रेयस्कर है।

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  3. अद्भुत

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  4. अत्यंत सजीव चित्रण

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  5. Praveen bhai......aapki lekhan tulna se pare hai...... really proud upn you

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    1. लिख पा रहा हूँ, इतना ही आनन्दमयी है।

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  6. सर चरण स्पर्श आपको और आपकी लेखनी को मेरा प्रणाम आपके आशीर्वाद तले मेरी नौकरी की शुरुआत हुई और आपके जैसा अधिकारी जो सही अर्थों में गार्जियन को परिभाषित करता है मिलना असम्भव है आपके रूप अनेक हैं सहीं रूप में आप ही हमारे स्तम्भ हो जितने सटीक और यथार्थ रूप से आपने लिखा बेहद शानदार आपको प्रणाम

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    1. आप सबके ही कारण झाँसी मंडल अपनी पूरी क्षमता से कार्य कर पाया और सम्प्रति कर रहा है। हार्दिक शुभकामनायें।

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  7. बहुत सुंदर लिख रहे हो, मित्र । बस यह शृंखला ऐसे ही चलती रहे । पं दीनदयाल विद्यालय में पढ़ा तो नहीं, लेकिन इतने सारे मित्र रहे हैं तो सबसे कुछ नया कुछ सुनता रहा हूँ, खासकर नीरज जी से ।
    ...दीपक राजे जी का स्मरण हो आया । वह मेरे चाचा जी के गहरे मित्र रहे हैं । याद आता है की अक्सर वह छात्रावास के बीमार छात्रों की दिखाने के लिए आते थे, अपने स्कूटर में बैठाकर ।

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    1. नीरज जी ने ही डाँटा और उकसाया है लेखन के लिये। http://www.praveenpandeypp.com/2010/12/blog-post_25.html
      दीपकजी ने तो पूरे छात्रावास को ही गोद ले लिया था। सबकी सतत चिन्ता।

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  8. .. लेकिन भाई, हर बार यह स्पष्टीकरण क्यों ? हम तो यही समझते हैं की बचपन होता ही है शरारतों भरा ! कभी हम शरारतें करतें हैं और कभी हमसे हो जाती हैं । अपनी हों या दूसरों की, जब याद आतीं हैं तो अपनी ही लगतीं हैं । दृष्टा का भाव तिरोहित हो जाता है ।

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    1. अपराधबोध? संभवतः। आगे वह सब भी बतायेंगे जिनमें स्वयं भाग लिया है।

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