14.1.12

रघुबीरजी की कथा

रघुबीरजी अपनी पत्नी के साथ अपने घर की बॉलकनी में बैठकर चाय की चुस्कियों का आनन्द ले रहे हैं, घर सोसाइटी की तीसरी मंजिल में है और रघुबीरजी हैं उस सोसाइटी के सचिव। कर्मठ और जागरूक, अन्दर से कुछ सार्थक कर डालने को उत्सुक, हर दिन विश्व को कुछ नया दे जाने का स्वप्न देखकर ही उठते हैं रघुबीरजी। एक युवा के उत्साह और एक वृद्ध के अनुभव के बीच एक सशक्त अनुपात सँजोये है रघुबीरजी का व्यक्तित्व, प्रौढ़ता को भला इससे अच्छा उपहार क्या मिल सकता है?

रघुबीरजी के जीवन में तीन विश्व बसते हैं, तीनों विश्व शताब्दियों के अन्तर में स्थापित, तीनों का मोह बराबरी से समाया हुआ उनके हृदय में, किसको किसके ऊपर प्राथमिकता दें यह निर्णय करना बहुधा उनके लिये ही कठिन हो जाता है। एक विश्व शारीरिक, एक मानसिक और एक आध्यात्मिक है उनके लिये, इन तीन अवयवों की क्षुधापूर्ति की संतुष्टि उनके मुखमंडल से स्पष्ट झलकती है।

पहला और शारीरिक विश्व उनके व्यवसाय का है। उन्नत तकनीकी शिक्षा, मौलिक शोध और सतत श्रम का प्रतीक है उनका व्यवसाय। जीवकोपार्जन के इस स्रोत को सम्यक रूप से सजाकर अब उन्हें अपने शेष दो विश्वों के लिये पर्याप्त समय मिलने लगा है। इस कारण उन्हें बहुधा विदेश यात्रा करनी पड़ती है। तकनीक, वाणिज्य और वैश्विक परिप्रेक्ष्य उनके प्रथम विश्व के अंग हैं और समयरेखा में सबसे आगे खड़े हैं।

दूसरा और मानसिक विश्व उनकी पर्यावरणीय चेतना का है। इस चेतना के कारण वह सोसाइटी के सचिव हुये या सोसाइटी के सचिव होने के बाद उनकी पर्यावरणीय कुण्डलनी जागृत हुयी, ठीक ठीक कहना कठिन है पर उनके पर्यावरणीय प्रयोगों की चाह ने सोसाइटी में कई बार उत्सुकता, भय और सुख की त्रिवेणी बहायी है। नये प्रयोग के बारे में सोचना, उसे क्रमशः कार्यान्वित करना और उसमें आने वाली बाधाओं को झेलना, किसी गठबन्धन सरकार चलाने से कम कठिन नहीं है। अपने परिवेश में घटनाओं का संलिप्त साक्षी बनना उनके दूसरे विश्व का केन्द्रबिन्दु है और समयरेखा में मध्य में अवस्थित है।

तीसरा और आध्यात्मिक विश्व उनके गाँव व संस्कृति की जड़ों से जुड़ाव का है। जिन गलियों में पले बढ़े, जहाँ शिक्षा ली, जिन सांस्कृतिक आधारों में जीवन को समझने की बुद्धि दी और जहाँ जाकर छिप जाने की चाह व्यग्रता के हर पहले क्षण में होती हो, वह उनके जीवन के रिक्त क्षणों से बन्धन बन जुड़ सा गया है। सभ्यता के मानकों में भले ही वह विश्व समुन्नत न हो पर रघुबीरजी के जीवन का स्थायी स्तम्भ है वह विश्व, समयरेखा के आखिरी छोर पर त्यक्त सा।

रघुबीरजी के जीवन में आनन्द बहुत ही कम होता यदि एक भी विश्व उनके जीवन से अनुपस्थित होता। आनन्द इसलिये क्योंकि उन्हें तीनों विश्वों के श्रेष्ठतम तत्व प्राप्त हैं। पहले विश्व के प्रेम की कमी तीसरे विश्व से, तीसरे विश्व के धन और तकनीक की कमी पहले विश्व से, दूसरे विश्व के आलस्य और विरोध से जूझने की शक्ति तीसरे विश्व से और समाधान पहले विश्व से, सब के सब एक दूसरे के प्रेरक और पूरक। तीन विश्वों में एक साथ रहने से उनकी दृष्टि इतनी परिपक्व हो चली है कि उन्हें तीनों की सम्भावित दिशा और उसे बदलने के उपाय स्पष्ट दिखायी देते हैं।

रघुबीरजी, किस विश्व में?
रघुबीरजी के जीवन का यही उजला पक्ष उनकी अधीरता का एकल स्रोत है। समयरेखा में तीन विश्वों की उपस्थिति इतनी दूर दूर है कि उन्हें एक साथ ला पाने की अधीरता बहुधा उनके प्रयासों से अधिक बलवती हो जाती है। अपनी समग्र समझ सबको समझा पाना उनकी ऊर्जा को सर्वाधिक निचोड़ने वाला कार्य है, भाषा और तर्कसूत्र एक विश्व से दूसरे तक पहुँचते पहुँचते अपनी सामर्थ्य खो देते हैं। यही अधीरता रघुबीरजी की कथा का रोचक पक्ष है।

रघुबीरजी थोड़ी थोड़ी मात्रा में हम सबके भीतर विद्यमान हैं, देश तो रघुबीरजी के व्यक्तित्व का भौगोलिक रूपान्तरण ही है, रघुबीरजी के तीनों विश्व इस देश में भी बसते हैं। रघुबीरजी का आनन्द हम सबका आनन्द है और रघुबीरजी की कथा हम सबकी कथा। उनकी हर घटना में आप अपना मन डाल कर देखिये, संभव है कि उनकी कथा आपकी दवा बन जाये।

खैर, रघुबीरजी को बॉलकनी से एक कूड़े का ढेर दिखता है, बिजली के दो खंभों के बीच.......

(रघुबीरजी मेरे लिये एक पात्र नहीं वरन देश और समाज समझने के नेत्र हैं, यह श्रंखला यथासंभव समाज में व्याप्त रोचकता का अनुसरण करने का प्रयास करेगी)


चित्र साभार - http://www.clker.com/clipart-2455.html

76 comments:

  1. शनिवार 14-1-12 को कृपया नयी-पुरानी हलचल पर पधारें .आपकी कोई पोस्ट का लिंक वहां है .

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  2. सर बहुत ही उम्दा पोस्ट |इस लेख के माध्यम से आज के परिवेश ,भागमभाग और व्यक्ति का उहापोह सबकुछ उजागर हो रहा है |

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    1. यह तीन पक्ष सदा ही मानव मन में रहते हैं, भिन्न भिन्न अनुपात में, किस समय क्या प्रबल हो जाये?

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  3. रघुबर कथा मनभावनी जग तारणी :) स्वागतम !

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    1. त्रिविश्वे मनस्थितम् व्यथा, सा रघुबीरस्य कथा..

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  4. श्रृंखला का प्रारम्भ उत्कृष्ट है,जिज्ञासा उंपन्न हो गई अगली कड़ी की,त्रिआयामी व्यक्तित्व के माध्यम से सृष्टि के दर्शन होंगे,प्रतीक्षा......

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    1. घटनायें हमारे आपके परिवेश से ही होंगी, कुछ ऐसी जो हमारे साथ घटित होती हैं।

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  5. ek nayi kadi aur shaandar shuruwat
    keep it up.

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  6. रघुबीर जी को शुभकामनायें ...

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    1. रघुबीरजी तो सदा से ही शुभेच्छाओं की प्रतीक्षा में हैं।

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  7. @रघुबीरजी को बॉलकनी से एक कूड़े का ढेर दिखता है, बिजली के दो खंभों के बीच.....

    बस इसी में समझना चाहता हूँ कि हमारे रघुबीर जी के जीवन की क्या प्राथमिकताएं हैं ?

    आगे की कड़ियों का इन्तेज़ार रहेगा,रघुबीर जी के माध्यम से दुनिया को देखने का !

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    1. प्राथमिकता अपने तीनों विश्वों से समुचित न्याय करने की ही होगी, आशा है...

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  8. श्रेष्ठ शुरूवात की है आपने इस रचना को मोहपाश से निकलना मुश्किल है अगले अंक की प्रतीक्षा रहेगी ही। शब्द थोड़े सरल हो तो शुद्ध हिंदी से महरूम आम आदमी भी इसका पूरा आनंद ले पायेगा।

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    1. आपका सुझाव ध्यान में रखकर बड़ा ही सरल करने का प्रयास करते रहते हैं।

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  9. बहुत बढिया

    मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई…

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  10. वाह प्रवीण जी ,ये रघुवीर जी भिन्न-भिन्न अनुपातों में हम सब में बसे हैं .मानव जीवन का रहस्य इसी में समाया है.तीनो में संतुलन आ जाये तो सार्थक हो जाये सब कुछ !

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    1. रघुबीरजी का मन बारी बारी से तीनों में भटकता है, एक की अधिकता दूसरे में जाने को प्रेरित करने लगती है, यही उनके संतुलन का आधार है।

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  11. रघुवीर जी से मुलाकात अच्छी रही ... आगे जानना चाहूँगी

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  12. जहाँ तीनों विश्व आलिंगनबद्ध होते है वहीं अभिनव मानव का अभ्युदय होता है..

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    1. अभिनव परिस्थितियों के लिये अभिनव व्यक्तित्व रघुबीरजी का।

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  13. रघुबीर जी के बहाने आपने जीवन के विभिन्न संदर्भों को उद्घाटित किया है जी प्रासंगिक बन पड़ा है ...!

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  14. चलिए हम भी ढूंढते हैं रघुबीर जी को अपने अंदर।

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  15. बहुत बढ़िया।
    रोचक और ज्ञानवर्धक होने जा रही है यह श्रृंखला।

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  16. सही बात कि ''रघुबीरजी थोड़ी थोड़ी मात्रा में हम सबके भीतर विद्यमान हैं''.
    आशा है यह लेखमाला अलग-अलग रघुवीरों का दर्शन करा सकेगी.
    स्वागत.

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    1. सब विश्व रह रह कर जागते हैं हम सबके हृदय में, समाज में मान मिलने भर लगे, उनकी उड़ानों को।

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  17. रघुबीरजी थोड़ी थोड़ी मात्रा में हम सबके भीतर विद्यमान हैं, देश तो रघुबीरजी के व्यक्तित्व का भौगोलिक रूपान्तरण ही है, रघुबीरजी के तीनों विश्व इस देश में भी बसते हैं। रघुबीरजी का आनन्द हम सबका आनन्द है और रघुबीरजी की कथा हम सबकी कथा।

    शायद ही किसी ने अपने भीतर बैठे रघुबीरजी पर गौर किया हो...
    लेकिन आपका प्रयास सार्थक है..
    अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा..

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    1. उन्हीं को जगाने का प्रयास करना चाहेगी यह लेखमाला।

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  18. दृष्टि और सोच जरूरी है, फिर रास्‍ते तो बनने ही लगमे हैं.

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  19. रघुवीर जी बने रहें.

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  20. रघुबीरजी थोड़ी थोड़ी मात्रा में हम सबके भीतर विद्यमान हैं, देश तो रघुबीरजी के व्यक्तित्व का भौगोलिक रूपान्तरण ही है, रघुबीरजी के तीनों विश्व इस देश में भी बसते हैं। रघुबीरजी का आनन्द हम सबका आनन्द है और रघुबीरजी की कथा हम सबकी कथा।

    Sach men...

    Neeraj

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  21. फिल्म आनंद का मुरारीलाल और आपके रघुबीर जी!! बहुत कुछ मिलेगा देखने को इनके मार्फ़त!!

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  22. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा... बहुत सुलझी हुई समझ !

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  23. देखतें है हमारे रघुबीर जी कितने प्रवीण जी हो पाते हैं.
    क्यूँ कि प्रवीण जी तो बस प्रवीण जी ही हैं.

    मकर सक्रांति और लोहड़ी कि बधाई और शुभकामनाएँ जी.

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  24. अगली कडी की प्रतीक्षा है।
    मकर सक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  25. जी आपने ठीक कहा, रघुवीर जी हम सबमें से कई में जी रहे हैं, मेरे भी एक मित्र रघुवीर जी हैं, कभी आपसे उन्हें मिलाता हूँ, आपको अवश्य मिलकर अच्छा लगेगा।

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    1. मैं आपके रघुबीरजी के बारे में भी जानना चाहूँगा..

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  26. आगे की कहानी का इंतज़ार रहेगा !

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  27. जी आपने ठीक कहा हम सबके बीच कई रघुवीरजी जैसे अद्भुत व्यक्तित्व हैं। मेरे एक घनिष्ठ मित्र बंगलौर में रहते हैं, वे रघुवीरजी हैं, कभी उनको आपसे मिलाता हूँ।

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  28. रघुवीर जी से मुलाकात अच्छी रही ...आगे का इंतजार रहेगा.. मकर संक्रांति की हार्दिक शुभ कामनाएँ।

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  29. मैंने आज तीसरी बार आपके ब्लॉग को follow किया है ... पता नहीं क्यों पर आपकी पोस्ट की फीड मेरे डैशबोर्ड पर नहीं आ रही है !

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    1. संक्रान्ति के समय गूगल महाराज कुछ संक्रमण की स्थिति में लग रहे हैं।

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  30. ''रघुबीरजी थोड़ी थोड़ी मात्रा में हम सबके भीतर विद्यमान हैं''

    अगली कडी की प्रतीक्षा है,प्रवीण जी

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  31. रघुवीर जी जैसे बहुत से व्यक्तित्व हमारे अस्स पास होते हैं मगर बहुत कम लोग से ही मिलकर हम उन्हें जान पाते हैं बहुत अच्छा लिखा है आपने अगली कड़ी की प्रतीक्षा है

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    1. यह त्रिविमीय चेतना निश्चय ही समग्रता से हम सबके सामने आयेगी..

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  32. रोचक पात्रांश है रघुबीर .मैं भी रघुबीर तू भी ...

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  33. जय हो रघुवीर जी।

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  34. शायद हर व्यक्ति के जीवन में भी रघुवीर जी का कुछ अंश तो होता ही है!

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  35. रघुवीर जी के माध्यम से हर इंसान के मन को झाँका है .. दो खम्बों के बीच कूड़े का ढेर दिख तो रहा है पर यह हटेगा कैसे यही सोचना है ..

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  36. रोचक पात्र है रघुवीर जी,..बहुत सुंदर प्रस्तुति,बढ़िया अभिव्यक्ति
    new post--काव्यान्जलि : हमदर्द.....

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  37. आपकी व्यावहारिक सूझ-बूझ की दाद देनी पड़ेगी, यह रचना आम लोगों के साथ-साथ खास लोगों में भी जगह बना लेगी।

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  38. रघुबीरजी थोड़ी थोड़ी मात्रा में हम सबके भीतर विद्यमान हैं-

    यत्र तत्र सर्वत्र!!

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    1. आप भी हैं रघुबीरजी, आपकी रचनाओं से झलकता है।

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  39. यह लेख पढकर रघुबीर जी जरूर बधाई दे रहे होंगे आपको नए रघबीर को जन्म देने के लिये और सोये रघुबीरों को जगाने के लिये.

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  40. रघुबर क्रिपा कहत नहिं आवै।
    ज्यों गूंगेहि मीठे गुड कौ रस मन ही मन भावै।

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  41. काश! घट घट व्यापें रघुबीर जी...

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    1. सबकी प्रार्थनाओं में यह शक्ति अवश्य आयेगी।

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  42. रघुवीर जी जैसा वास्तविक चरित्र मिलना मुश्किल लगता है वैसे मान लेते हैं |

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    1. बहुत से रघुबीरजी अस्तित्व में आने को तैयार बैठे हैं, संतुलन की कला अनुभव से आ ही जायेगी।

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  43. जीवन के इन तीनों पहलुओं का उन्नयन जीवन को सार्थक बनाता है .

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  44. आपके ब्लॉग का पहला वाक्य पढ़ते ही मैने आवाज़ लगाई "सुमीता क्या आज चाय नही मिलेगी?" अब चाय की चुस्कियों के साथ धूप मे बैठा आपसे रूबरू हो रहा हूँ. बाहर कड़ाके की ठंड है मगर सुहानी धूप खिली है. रघूबीर जी हम सभी के अंदर हैं मगर अलग अलग अनुपात में. जिंदगी अलग अलग आयामों मे सही सामंजस्या बना सकने की कला का ही नाम है. मैं तो अब तक बड़ा ही कच्चा कलाकार साबित हुआ हूँ. आपसे कला के गुर सीखता हूँ. धन्यवाद. ४७ टिप्पणियो के बाद आप मेरे टिप्पणी को देख पायंगे क्या?

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    1. ब्लॉगर के नये उत्तर देने की सुविधा के पूरे उपयोग का मन बनाया है, देर से ही सही पर हर टिप्पणी पर पहुँचेगे अवश्य। रघुबीरजी भी चाय के समय विचारों के सागर में हिंडोलते हैं।

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  45. बहुत सुंदर प्रस्तुति,बढ़िया अभिव्यक्ति| मकर संक्रांति की शुभकामनायें|

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  46. रघुवीर जी जीवन दर्शन के महत्व पूर्ण पहलु को उद्घाटित करते हैं

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  47. दूसरा और मानसिक विश्व उनकी पर्यावरणीय चेतना का है। इस चेतना के कारण वह सोसाइटी के सचिव हुये या सोसाइटी के सचिव होने के बाद उनकी पर्यावरणीय कुण्डलनी जागृत हुयी, ठीक ठीक कहना कठिन है पर उनके पर्यावरणीय प्रयोगों की चाह ने सोसाइटी में कई बार उत्सुकता, भय और सुख की त्रिवेणी बहायी है। नये प्रयोग के बारे में सोचना, उसे क्रमशः कार्यान्वित करना और उसमें आने वाली बाधाओं को झेलना, किसी गठबन्धन सरकार चलाने से कम कठिन नहीं है। अपने परिवेश में घटनाओं का संलिप्त साक्षी बनना उनके दूसरे विश्व का केन्द्रबिन्दु है और समयरेखा में मध्य में अवस्थित है।
    दूसरा और मानसिक विश्व उनकी पर्यावरणीय चेतना का है। इस चेतना के कारण वह सोसाइटी के सचिव हुये या सोसाइटी के सचिव होने के बाद उनकी पर्यावरणीय कुण्डलनी जागृत हुयी, ठीक ठीक कहना कठिन है पर उनके पर्यावरणीय प्रयोगों की चाह ने सोसाइटी में कई बार उत्सुकता, भय और सुख की त्रिवेणी बहायी है। नये प्रयोग के बारे में सोचना, उसे क्रमशः कार्यान्वित करना और उसमें आने वाली बाधाओं को झेलना, किसी गठबन्धन सरकार चलाने से कम कठिन नहीं है। अपने परिवेश में घटनाओं का संलिप्त साक्षी बनना उनके दूसरे विश्व का केन्द्रबिन्दु है और समयरेखा में मध्य में अवस्थित है।

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  48. रघुबीर जी को आपकी कलम से पढ़ना अच्‍छा लगा ...आपका आभार ।

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  49. raghubir ji lajabab prstuti lagi bhutsundar drishtikon mila ....abhar pandey ji.....ap mere blog pr kb darshan denge pandey ji....ab bahut der tk prateeksha ho chuki hai bhai .

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  50. रघुबीरजी थोड़ी हम सबके भीतर विद्यमान हैं,

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  51. सच है। हम सब कहीं न कहीं रघुबीरजी हैं। इसीलिए यह पोस्‍ट अपनी सी लगी।

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  52. Praveen ji
    bahut gahra vishleshan kar diya hai aapne ek samaany si sthiti ka!sochne yogya hai.

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  53. आपकी श्रृंखला के माध्यम से हम भी अपने अंदर के रघुवीर जी को पहचान जाएँ ......

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  54. भीतर भी रघुवीर हैं बाहर भी रघुवीर.

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  55. एक ही इंसान तीन दुनिया लिए हुए और बड़ी बात ये कि तीनो में "कॉमन" बहुत ही कम चीज़ें, एक दम ना के बराबर| बार ये ज़िंदगी है जो बस जिए जाते हैं हम, अपने अपने अंदर अपने अपने रघुबीर लिए हुए|बहुत अच्छा लगा पढ़के, खुद के अंदर तीनों विश्वों को पहचानना शुरू करना है अब!!!!

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  56. बहुत दिनों बाद आना हुआ पहले २ कड़ी पढ़ी तब समझ नही पाई ये है कौन रघुबिर्जी और प्रथम कड़ी पे वो कहानी ले आई बहुत रोचक ढंग से लिखा है आपने बधाई !

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