18.1.12

रघुबीरजी और कूड़े का ढेर

चायपान आधुनिक जीवनशैली का अनिवार्य अंग बन चुका है, पहले मैं नहीं पीता था पर उस कारण से हर जगह पर इतने तर्क पीने पड़ते थे कि मुझे चाय अधिक स्वास्थ्यकारी लगने लगी। बहुतों के लिये यह दिन का प्रथम पेय होता है, जापानी तो इसको पीने में पूजा करने से भी अधिक श्रम कर डालते हैं, पर बहुतों के लिये कार्यालय से आने के बाद अपनी श्रीमतीजी के साथ बिताये कुछ एकांत पलों की साक्षी बनती है चाय।

जब चाय की चैतन्यता गले के नीचे उतर रही हो तो दृश्य में अपना स्थान घेरे कूड़े का ढेर बड़ा ही खटकने लगा रघुबीरजी को। यद्यपि बिजली के जिन खम्भों के बीच वह कूड़े का ढेर था वे सोसाइटी की परिधि के बाहर थे, पर जीवन के मधुरिम क्षणों को इतनी कर्कशता से प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ भला मन की परिधि के बाहर कहाँ जा पाती हैं? कई बार वहाँ से कूड़ा हटवाया गया, पर स्थिति वही की वही बनी रही। कहते हैं कि कूड़ा कूड़े को आकर्षित करता है और खाली स्थान और अधिक कूड़े की प्रतीक्षा में रहता है। बिना कायाकल्प कोई उपाय नहीं दिख रहा था, मन में निर्णय हो चुका था, रघुबीरजी कुछ अच्छे पौधे जाकर ले आये, समय लगाकर उन्हें रोपित भी कर दिया, मानसून अपने प्रभाव में था, कुछ ही दिनों में वह स्थान दर्शनीय हो गया, चाय पीने में अब पूरा रस आने लगा रघुबीर जी को।

छोटे कायाकल्पों में बड़े बदलावों की संभावना छिपी रहती है। कहानी यहीं समाप्त हो गयी होती यदि रघुबीरजी को उस संभावना को औरों में ढूढ़ने का कीड़ा न काटा होता। औरों को प्रेरित करने के लिये उन्होने उस स्थान के पहले और बाद के चित्रों को एक साथ रख कर अपनी सोसाइटी के सब सदस्यों को ईमेल के माध्यम से भेजने का मन बनाया। कुछ व्यस्तताओं के कारण वह मेल भेजने में ४-५ दिन की देरी हो गयी, उतना अन्तराल पर्याप्त था, समय को अँगड़ाई लेने के लिये।

जब चार वर्ष पहले उनकी सोसाइटी का निर्माण हुआ था तो जाने अनजाने उसका स्तर पास की सोसाइटी से नीचे था, हर बरसात आसपास का जल सोसाइटी में आकर भर जाता था और कुछ निदान ढूढ़ने का संदेश दे जाता था। हर वर्ष कुछ भागदौड़ और नगरनिगम की अन्यमनस्कता, इतनी छोटी समस्या सुलझाने के प्रति। सिविल सेवा की तैयारी में लगे लड़को के भाग्य की तरह अन्ततः चौथे वर्ष रघुबीरजी को आशा की किरण उस समय दिखायी पड़ी जब वह एक नये अधिकारी से मिलकर आये, संवाद सकारात्मक रहा। पानी को एकत्र कर पाइप के माध्यम से मेनपाइप में जोड़ देने की योजना थी जो मानसून आने के पर्याप्त पहले क्रियान्वित कर दी गयी।

कार्य के सम्पादन के साथ ही लोगों का रघुबीरजी पर विश्वास बढ़ने लगा, परिवेश के उत्साही और पत्रकारी युवक घटनाक्रम में रुचि लेने लगे, यह सब देखकर रघुबीरजी ने भव्य भविष्य के आस की साँस ली जिससे उनका सीना चौड़ा होने लगा। लगा कि मानसून आने के पहले बड़ा महत कार्य सम्पन्न हो गया। कुछ सप्ताह बाद ही, भला हो एक खोजी युवक का, जिसने आकर बताया कि पाइप तो मेनपाइप तक पहुँच गया है पर अभी तक जुड़ा नहीं है और बरसात होने की स्थिति में सारा पानी कीचड़ समेत आ जायेगा, पहले से कहीं अधिक। रघुबीरजी के प्रयासों में पुनः गति आ गयी, पहले तो कई पत्र भेजे, कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अन्ततः अधिकारी से पुनः मिलकर अनुनय विनय की, उसने अगले दिन शेष कार्य करवाने का आश्वासन दे दिया। रघुबीरजी का मन प्रसन्न था, सुखद भविष्य की आस अधिक सुख लाती है, लगे हाथों रघुबीरजी ने कूड़े के स्थान के कायाकल्प की ईमेल भी सबको प्रेषित कर दी।

उस रात बारिश हुयी थी, पाइप से कीचड़ अधिक आ गया था। अगले दिन बड़ी सुबह कार्य आरम्भ हो गया, बुलडोजर कीचड़ साफ करना प्रारम्भ कर चुके थे और पाइप जोड़ने का कार्य दोपहर तक हो जाने की संभावना थी। रघुबीरजी अपना चाय का प्याला ले बॉलकनी में समाचार पत्र पढ़ने लगे। तीसरा पेज खोलते ही उनका दिल धक से रह गया, किसी उत्साही पत्रकार ने नगरनिगम की अकर्मण्यता और रघुबीरजी के प्रयासों पर एक हलचलपूर्ण आलेख छाप दिया था, सचित्र, एक ओर नायक के रूप में रघुबीरजी, दूसरी ओर खलनायक के रूप में नगरनिगम का अधिकारी और बीच में कीचड़ के साथ बिना जुड़े हुये दो पाइप। रघुबीरजी सोच ही रहे थे कि कहीं वह अधिकारी यह समाचार न पढ़ ले, तब तक अधिकारी का क्रोध भरा फोन आ गया, आधे घंटे के अन्दर ही नगरनिगमकर्मी वापस जा चुके थे।

सूरज चढ़ आया था, दोपहर होते होते लोग ईमेल पढ़ चुके थे, उत्सुकतावश बाहर आये तो दृश्य पूर्णतया बदला हुआ था, कायाकल्प हुये कूड़े के स्थान का पुनः कायाकल्प हो चुका था, हरी चादर के ऊपर अभी अभी उलीचे कीचड़ की परत जमी थी, ईमेल में प्रेषित दोनों चित्रों से भयावह थी उस जगह की स्थिति। सोसाइटी का गेट व निकट भविष्य, दोनों ही कीचड़रुद्ध दिख रहे थे।

कहते हैं कि कीचड़ में कमल खिलते हैं पर आज यहाँ पर कीचड़ रघुबीरजी के श्रम-कमलों की लील चुका था, सौन्दर्यबोध सशंकित था, बॉलकनी की चाय कसैली होनी तय थी, सोसाइटी के सदस्यों के आलोचनात्मक स्वर अवसरप्रदत्त शक्ति से सम्पन्न थे। रघुबीरजी पर हार मानने वाले जीवों में नहीं थे, साँस सीने में गहरी भर जाती है, रघुबीरजी की पुनः जूझने की इच्छा बलवती होने लगती है.....

60 comments:

  1. Achha laga ise padhna wo bhee subah 5 baje....chay kee chuskiyan lete,lete!

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  2. जुझारू रघुबीर जी.
    आशीष

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  3. रघुबीरजी चाय के साथ-साथ क्रोध भी पीने लगे,ये अच्छा संकेत है.
    ऐसे कामों में गज़ब की धैर्य-शक्ति चाहिए ,जो उनमें है !

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  4. संवेदना ही व्यक्त कर सकते हैं, रघुबीर जी से।

    और चाय के लिये यही हालत हमारी भी थी, तो चाय पीना ज्यादा श्रेय्स्कर लगा, अब यह हालत है कि अगर काम ज्यादा है और उठने की फ़ुरसत नहीं हो तो हमारे साथीगण चुपचाप चाय बगल में रखकर निकल लेते हैं, हमें पता भी नहीं चल पाता कि कौन चाय रखकर निकल लिया ।

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  5. संवेदना ही व्यक्त कर सकते हैं, रघुबीर जी से।

    और चाय के लिये यही हालत हमारी भी थी, तो चाय पीना ज्यादा श्रेय्स्कर लगा, अब यह हालत है कि अगर काम ज्यादा है और उठने की फ़ुरसत नहीं हो तो हमारे साथीगण चुपचाप चाय बगल में रखकर निकल लेते हैं, हमें पता भी नहीं चल पाता कि कौन चाय रखकर निकल लिया ।

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  6. यह समाज रघुबीर जी जैसे लोगों के मजबूत कंधों पर ही टिका हुआ है।

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  7. अलबर्ट पिंटो कहूँ या मोहन जोशी!! सोच रहा हूँ!!

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  8. ओह नकारात्मकता और सकारात्मकता का भीषण युद्ध .....हार के हार नहीं माने थे रघुबीर जी ....लड़ने से बचना चाह रहे हैं ......जीवन भर लड़ना ही पड़ेगा .....चीज़ों को देखने की ....समझने कि नज़रें जो दी हैं प्रभु ने ....
    कहानी यहीं समाप्त हो गयी होती यदि रघुबीरजी को उस संभावना को औरों में ढूढ़ने का कीड़ा न काटा होता। औरों को प्रेरित करने के लिये उन्होने उस स्थान के पहले और बाद के चित्रों को एक साथ रख कर अपनी सोसाइटी के सब सदस्यों को ईमेल के माध्यम से भेजने का मन बनाया। कुछ व्यस्तताओं के कारण वह मेल भेजने में ४-५ दिन की देरी हो गयी, उतना अन्तराल पर्याप्त था, समय को अँगड़ाई लेने के लिये।
    समय परीक्षा लेता रहेगा ......और हम रघुवीर जी के कार्यकलापों का आनंद लेते रहेंगे .....सीखते भी रहेंगे बहुत कुछ ...
    सार्थक श्रंखला...

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  9. रघुवीर जी जैसे कर्मठ समाज सेवकों के चलते ही शहरी कालोनियां व सोसायटियां रहने लायक बनी हुई है|

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  10. लगे रहिये रघुबीर जी . बहुत बढ़िया ..

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  11. रघुबीर जी की जय हो !
    बिना धैर्य दिखाए रघुबीर जी के प्रयास कहाँ सफल होने वाले ?

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  12. ऐसे रघुबीरों की हर समाज को आवश्यकता है ...!

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  13. बढिया चल रही है रघुवीरजी की कथा।

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  14. व्यवस्था से लड़ना वह भी हमारे देश में , हे राम !

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  15. उस अधिकारी की सोच उस की मानसिक प्रवृत्ति और चेतना को दर्शाती है. यदि अखबार में कुछ गलत छाप दिया गया तो उसका ऐसा वैर-भाव. हद है.

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  16. जूझने के डर से सहन करने वाले समाज ठहर जाते हैं।
    सकारात्मक पोस्ट के लिये आभार। सुप्रभात।

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  17. जूझने के डर से सहन करने वाले समाज ठहर जाते हैं।
    सकारात्मक पोस्ट के लिये आभार। सुप्रभात।

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  18. रघुबीर जी को नमन. शुभकामनाएं. सदैव सफल होते रहें.

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  19. छोटे कायाकल्पों में बड़े बदलावों की संभावना छिपी रहती है।

    jai baba banaras....

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  20. किसी से फायदा लेना अलग बात है ... तारीफ़ से ज्यादातर लोग परहेज रखते हैं .

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  21. रघुवीर जी के उत्साह पर उस पत्रकार का उत्साह ज्यादा प्रभावी निकला - और मीडिया ने अपने कार्य को अंजाम दे दिया .

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  22. रघुबीर जी जैसे व्‍यक्तित्‍व का होना बेहद जरूरी है ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति आपका आभार ।

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  23. रोचक अंदाज,
    सकारात्मक पोस्ट

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  24. कार्यदायी इच्छा सदा बलवती बनी रहे

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  25. मेरे लिए मदिरा पर यही स्थिति रहती है पर मैंने उसे अब तक अपनाया नहीं :) कायाकल्प करनेवाले कर्मठ बहुत कम ही तो होते हैं॥

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  26. चलती रहे कहानी रघुवीर जी की.जरुरत है समाज की.

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  27. आज समाज में रघुबीर जी जैसे ही व्‍यक्तित्‍व की आवश्यकता है..प्रेरित करती पोस्ट..

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  28. एक सशक्त पात्र के माध्यम से उम्दा अभिव्यक्ति |

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  29. रोचक वृतांत

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  30. छोटे कायाकल्पों में बड़े बदलावों की संभावना छिपी रहती है। कहानी यहीं समाप्त हो गयी होती यदि रघुबीरजी को उस संभावना को औरों में ढूढ़ने का कीड़ा न काटा होता। औरों को प्रेरित करने के लिये उन्होने उस स्थान के पहले और बाद के चित्रों को एक साथ रख कर अपनी सोसाइटी के सब सदस्यों को ईमेल के माध्यम से भेजने का मन बनाया। कुछ व्यस्तताओं के कारण वह मेल भेजने में ४-५ दिन की देरी हो गयी, उतना अन्तराल पर्याप्त था, समय को अँगड़ाई लेने के लिये।
    भाई साहब रघुबीर जी से कही मंदिर न सही साईं बाबा की एक तस्वीर ही वहां टंगवा दें फिर देखतें हैं नगर निगम अपनी नाक का मुद्दा कैसे बनाता है .

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  31. जब भी अच्छी व नयी पहल होती है, उसकी चुनौतियाँ भी काफी जटिल पेंचीदी होती हैं।ऐसे में बड़े दृढ़संकल्प की आवश्यकता होती हैं।आशा है रघवीरजी एक कुशल कर्मयोगी की तरह इस कठिन चुनौती का सामना सफलतापूर्वक करने में सफल रहे होंगे।

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  32. जब भी अच्छी व नयी पहल होती है, उसकी चुनौतियाँ भी काफी जटिल पेंचीदी होती हैं।ऐसे में बड़े दृढ़संकल्प की आवश्यकता होती हैं।आशा है रघवीरजी एक कुशल कर्मयोगी की तरह इस कठिन चुनौती का सामना सफलतापूर्वक करने में सफल रहे होंगे।

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  33. हरी चादर के ऊपर अभी अभी उलीचे कीचड़ की परत जमी थी, ईमेल में प्रेषित दोनों चित्रों से भयावह थी उस जगह की स्थिति। सोसाइटी का गेट व निकट भविष्य, दोनों ही कीचड़रुद्ध दिख रहे थे।

    BEJOD LEKHAN

    NEERAJ

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  34. अंततः रघु साहब ही विजयी होंगें ,इंशाल्लाह |

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  35. अंततः रघु साहब ही विजयी होंगें ,इंशाल्लाह |

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  36. Bahut acha laga aapka post padhke baht dino baat!

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  37. bada achcha laga padhkar...aap kii likhne kii style bahut pasanad hai.

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  38. रोचक अंदाज,
    सकारात्मक पोस्ट के लिये आभार...

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  39. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 19- 01 -20 12 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज... जिंदगी ऐसे भी जी ही जाती है .

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  40. एक सशक्त पात्र की सकारात्मक बहुत सुंदर प्रस्तुति,बेहतरीन पोस्ट
    welcome to new post...वाह रे मंहगाई

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  41. धैर्य और सकारात्मक सोच के बिना यह सब संभव नहीं ..... एक बेहतरीन प्रतीकात्मक व्यक्तित्व , सोचने को विवश करता ......

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  42. :-)

    hats off to media...

    बढ़िया लेखन..रोचक भी सार्थक भी..

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  43. सोचने पर विवश करती पोस्ट रघुवीर जी जैसे लोगों की आज सचमुच आवशकता है हमारे समाज को सार्थक कथा...

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  44. Raghu ji ki mehnat rang layegi.

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  45. acchi post
    kafi kuch sikhane ko mila isse
    likhane ki shaili shandar hain aapki
    mere blog par bhi aaiyega

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  46. हवन करने में हाथ इसी तरह जलते होंगे। रघुबीरजी के प्रति सहानुभूति और शुभ-कामनाऍं।

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  47. दिक्कत यह है रघुबीर जी का खून पीने नौ माह बाद कलमाड़ी बाहर आ जातें हैं .वरना रघुबीर जी किसी से कम नहीं है .

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  48. रघुवीर जी उन लोगों में से नहीं जो इन बाधाओं से हार मान लें - और सच्ची लगन अपना उद्द्श्य पूरे किये बिना विश्राम नहीं लेती .

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  49. रघुबीर जी को नमन....सकारात्मक प्रस्तुति

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  50. bahut khoob............

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  51. मित्र रघुवीर जी के प्रयास की सद्भुमिका वहन करने का प्रयाण तो करते हैं पर ,आत्मनिरिक्षण का कार्य विस्मृत हो जाता है ,रघुवीर जी की सद्भावनाओं में अपना निहितार्थ भी ढूंढ़ते तो शायद कचरा समायोजित हो ही जाता ,जो मुनिसिपिलिटी के सहारे है..... सुखद व यथार्थ लेखन ,बधाईयाँ जी /

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  52. बहोत अच्छे ।

    नया हिंदी ब्लॉग

    http://http://hindidunia.wordpress.com/

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  53. स्वांत सुखस्य लेखन .रघुबीर जी प्रतीक्षित हैं .रोचकता बढती जा रही है .आगे क्या होगा ?ऊँट किस करवट बेठेगा ?बेठेगा भी या नहीं .रघुबीर जी का जीवट काबिले तारीफ़ है .हार नहीं मानूंगा ,राड़ नहीं मानूंगा ...

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  54. रघुबीर जी की विजय वाले ई मेल की प्रतीक्षा रहेगी।

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  55. केवल लक्ष्य ही नहीं, पथ भी महत्वपूर्ण है, प्रयास भी।
    रोचक लगा यह प्रकरण रघुबीर जी का।

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  56. रघुवीर जी की कथा सामाजिक कार्यों में आने वाले गतिरोध की पड़ताल के साथ-साथ उत्साही पत्रकारिता पर भी करारा व्यंग्य है।

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  57. आप सही कहते है हम सब के अन्दर रघुबीर जी है लेकिन कुछ में जगे हुए कुछ में सोये हुए. आशा है आपके रघुबीर जी सोये हुओ को जगा देंगे.

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