19.8.11

चेहरों का संवाद

बंगलोर में जहाँ मेरा निवास है, उससे बस 50 मीटर की दूरी पर ही है फ्रीडम पार्क। एक पुराना कारागार था, बदल कर स्वतन्त्रता सेनानियों की स्मृति में पार्क बना दिया गया। पार्क को बनाते समय एक बड़ा भाग छोड़ दिया गया जहाँ पर लोग धरना प्रदर्शन कर सकें। यहीं से नित्य आना जाना होता है क्योंकि यह स्थान कार्यालय जाने की राह में पड़ता है। सुबह टहलने और आगन्तुकों को घुमाने में भी यह स्थान प्रयोग में आता है।

लगभग हर तीसरे दिन यहाँ पर लोगों का जमावड़ा दिखता है। कभी पढ़े लिखे, कभी किसान, कभी आँगनवाड़ी वाले, कभी शिक्षक, कभी वकील, और न जाने कितने लोग, समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुये। सुबह से एकत्र होते है, सायं तक वापस चले जाते हैं। पुलिस और ट्रैफिक की व्यवस्था सुदृढ़ रहती है, बस थोड़ी भीड़ अधिक होने पर वाहन की गति कम हो जाती है।

इतना समय या उत्साह कभी नहीं रह पाता है कि उनकी समस्याओं को सुना और समझा जा सके। उन विषयों को समस्यायें खड़े करने वाले और उन्हें सहने वाले समझें, मैं तो धीरे से पढ़ लेता हूँ कि बैनर आदि में क्या लिखा है, यदि नहीं समझ में आता है तो अपने चालक महोदय से पूछ लेते हैं कि कौन लोग हैं और किन माँगों को मनवाने आये हैं। अब तो चालक महोदय हमारे पूछने से पहले ही विस्तार से बता देते हैं।

इस प्रकार समस्याकोश का सृजन होने के साथ साथ, प्रदर्शनकारियों के चेहरों से क्या भाव टपक रहे होते हैं, उनका अवलोकन कर लेता हूँ। कवियों और उनकी रचनाओं में रुचि है अतः वह स्थान पार होते होते मात्र एक या दो पंक्तियाँ ही मन में आ पाती हैं।

कभी व्यवस्था से निराश भाव दिखते है,

जग को बनाने वाले, क्या तेरे मन में समायी,
तूने काहे को दुनिया बनायी?

कभी व्यवस्था का उपहास उड़ाते से भाव दिखते है,

बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था,
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम--गुलिस्तां क्या होगा?

कभी व्यवस्था के प्रति आक्रोश के भाव दिखते हैं,

गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही 
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ।

पिछले तीन दिनों से यहाँ से निकल रहा हूँ, लोग बहुत हैं, युवा बहुत हैं, उनके भी चेहरे के भाव पढ़ने का प्रयास करता हूँ। किन्तु पुराने तीन भावों से मिलती जुलती नहीं दिखती हैं वे आँखें। मन सोच में पड़ा हुआ था। आज ध्यान से देखा तो और स्पष्ट हुआ, सहसा राम प्रसाद बिस्मिल का लिखा याद आ गया। हाँ, उनकी आँखें बोल रही थीं,

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।


75 comments:

  1. आज का युवा पुरानी पीढ़ी से बस यही सुनाता आ रहा है की इस देश का कुछ नहीं हो सकता यहाँ कोई बदलाव नहीं आ सकता सब के सब डरपोक और चोर है वह चुप रहा है क्योकि वो जानता है की ये सारी देन उसी पुरानी पीढ़ी के निराशावादी सोच और कायरता की देन है और आज वही युवा उस पुरानी पीढ़ी को दिखा रहा है की अहिंसा के पुराने फार्मूले पर चल कर भी व्यवस्था को बदला जा सकता है बस हिम्मत होनी चाहिए किन्तु आज भी पुरानी पीढ़ी में उन लोगों की कोई कमी नहीं है जो आज भी युवाओ को अन्ना का फैशन, जवानी का जोश , मीडिया का बढाया हुआ अंध भक्त कह उनके कामो साहस का अपमान कर रही है या शायद उसकी हिम्मत तोड़ कर उनकी नजरो में अपनी इज्जत बचाना चाहता है |

    ReplyDelete
  2. ''सरफ़रोशी की तमन्ना ..अब हमारे दिल में है ...
    देखना है ज़ोर कितना ..बाज़ु-ए- कातिल में है ...''
    कुछ बदलाव बहुत ज़रूरी है ...!!

    ReplyDelete
  3. सार्थक है पार्क की व्यथा!!
    जगह उससे भी अधिक सार्थक है…॥

    कारागार बदल कर स्वतन्त्रता सेनानियों की स्मृति में पार्क।

    ReplyDelete
  4. दुआ है कि चेहरे का संवाद सही हो ...

    ReplyDelete
  5. Anonymous19/8/11 23:41

    yuva peedhi karna to bahut kuch chahti hai par aaj ki prob bhi to ek sawaal hai

    ReplyDelete
  6. डर ये सता रहा हैं की, गर अबकी चुके तो फिर बहुत मुश्किल हैं.

    ReplyDelete
  7. हर नगर में ऐसे स्थान विकसित हो चुके हैं। लेकिन ये व्यवस्था के लिए सेफ्टीवाल्व का काम करते हैं। पर सेफ्टी वाल्व का लाभ व्यवस्था को केवल तब तक मिलता है जब वह इन पर ध्यान दे कर अपनी मरम्मत करता रहता है।
    अंत में एक दिन ऐसा आता है कि मरम्मत से काम नहीं चलता व्यवस्था को बदलना पड़ता है।

    ReplyDelete
  8. बिस्मिल जी का भाव इस समय पूरे देश में तैर रहा है! हम देख रहे हैं,पर जिनको दिखना चाहिए उन्हें नहीं !

    आपका 'फ्रीडम पार्क' प्रतीक के रूप में अच्छा काम कर रहा है,उसकी कोशिश व्यर्थ नहीं जाएगी !

    ReplyDelete
  9. अब फ़्रीडम पार्क जैसे मैदान ही जनता की भावनाओं को उद्वेलित कर सकते हैं, नई क्रांति की शुरूआत है।

    ReplyDelete
  10. एक पूरी भ्रमित पीढ़ी को सच्चा मार्गदर्शक चाहिए था जो अन्ना के रूप में मिल गया लगता है !

    ReplyDelete
  11. चेहरा मन का प्रतिबिम्ब है ....जो हमारे मन में होता है वह इसे बखूबी अभिव्यक्त कर देता है ...बस शर्त है हमारे पास वह दृष्टि हो ....!

    ReplyDelete
  12. अब तो अण्णा की कदर पूरा देश कर रहा है लेकिन यह वही अण्णा थे जिनको रास्ते से हटाने के लिये महाराष्ट्र के सियासी दलों ने न जाने कितनी चालें चली। तब अण्णा का साथ दिया था प्रौढ़ों ने, कुछ उम्रदराज लोगों ने। तब अण्णा को लेकर महाराष्ट्र के टुच्चे राजनीतिक दलों ने अंदाजा भी न लगाया होगा कि अण्णा जैसी हस्ती उनके बीच है। आज वही राजनेता अण्णा के साथ अपने दिखने को लेकर लालायित हैं भले ही अपना चेहरा सुधारने की आड़ में ही सही।

    देश का युवा अब अपने हित अहित बराबर पहचानने लगा है। एक ओर फेसबुक ट्वीटर पर अपने मन की बातें कहता है तो दूजी ओर अण्णा के लिये अपना समर्थन भी जाहिर करता है।

    ReplyDelete
  13. एक बात तो समझ आ गयी कि ड्राईवर बहुत समझदार है।

    ReplyDelete
  14. आशा है यह भाव और संवाद सच्चे निकलें ...... बाकि तो वक्त ही बताएगा ........

    ReplyDelete
  15. true.. that face is the reflection of expressions and it looks like u r good at reading face.
    This post of different facets becomes more beautiful with those verses.
    Awesome read !!!

    ReplyDelete
  16. मैंने तो कल एक सभा में "कर चले हम फ़िदा जान- ओ -तन साथियों " भी सुना था.

    ReplyDelete
  17. आपकी पोस्ट पढ़ने के आब्द और देश और समाज के हालत देख आज आसमान से एक चेहरा झांकता हुआ प्रतीत हो रहा है और उसके चेहरे को पढ़ने पर यह भाव प्रतीत हुआ

    हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में,

    हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

    सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

    मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

    मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

    हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

    ReplyDelete
  18. Praveen Ji , thanx a lot for your comment on my blog.I am grateful to you for regularly encouraging me on my posts. Hope you like the look and feel of my new blog...www.achhikhabar.com

    Thanks :)

    ReplyDelete
  19. चालक अपने मालिक के इशारे जल्दी समझने लगा है

    ReplyDelete
  20. वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
    हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में.......सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है ,देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है .जय अन्ना !जय श्री अन्ना !आभार बेहतरीन पोस्ट के लिए आपकी ब्लोगियाई आवाजाही के लिए
    बृहस्पतिवार, १८ अगस्त २०११
    उनके एहंकार के गुब्बारे जनता के आकाश में ऊंचाई पकड़ते ही फट गए ...
    http://veerubhai1947.blogspot.com/
    Friday, August 19, 2011
    संसद में चेहरा बनके आओ माइक बनके नहीं .
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

    ReplyDelete
  21. बहुत ही बढ़िया तरीके से चेहरे पढ़ें हैं आपने, पर आधे प्रदर्शन तो बस यूं ही होते रहते हैं पर बदलाव के लिये ये सब बहुत ज़रूरी है,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    ReplyDelete
  22. सार्थक संवाद....

    ReplyDelete
  23. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

    ReplyDelete
  24. देखना .... कहीं मैदान और पार्क कम न पड जाएँ .

    ReplyDelete
  25. कहा जाता है ..दिल सच्चा और चेहरा झूठा .. बढ़िया पोस्ट.

    ReplyDelete
  26. अच्छा लगता है...युवाओं का ये जोश..आत्मविश्वास...कुछ कर गुजरने का हौसला देख.....कुछ सकारात्मक परिणाम आने तो चाहियें.

    ReplyDelete
  27. बदलाव बहुत ज़रूरी है .......

    ReplyDelete
  28. यह सब सार्थक हो ...आभार ।

    ReplyDelete
  29. सही बात है हलवाई को क्या मिठाई के स्वाद से :)

    ReplyDelete
  30. badlav ke aasaar hain , bas dekhna hai zor kitna....

    ReplyDelete
  31. मेरी प्रार्थना है, सबको सत्बुद्धि दे भगवान्. युवाओं के मन में चिंगारी सुलग रही है.

    ReplyDelete
  32. युग के युवा
    मत देख दायें और बाएं
    झाँक मत बगलें
    न अपनी आँख कर नीचे
    अगर कुछ देखना है, देख अपने वे वृषभ कंधे
    जिन्हें देता चुनौती, सामने तेरे पड़ा,
    युग का जुआ
    युग के युवा!!

    ReplyDelete
  33. टूटी हुई मुंडेर पर मिट्टी का एक चिराग
    मौसम से कह रहा है तूफां चला के देख...

    ReplyDelete
  34. aap is lekha ke madhyam se jo kahna chahte the aap purntaya safal rahe hain..behad shadar

    ReplyDelete
  35. आज ध्यान से देखा तो और स्पष्ट हुआ, सहसा राम प्रसाद बिस्मिल का लिखा याद आ गया। हाँ, उनकी आँखें बोल रही थीं,
    वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान, हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।

    आप अपनी बातें एक निराले अंदाज में कह जाते हैं.
    लगता है 'क्रान्ति' के बीज बोये जा चुके हैं.

    ReplyDelete
  36. ऐसे स्‍थान लोगों की सामूहिक अभिव्‍यक्ति को सार्वजनिक करने में बडे सहायक होते हैं। विदेश में कहीं 'स्‍पीकर्स कार्नर' की बात एकाधिक बार पढी थी। ऐसे स्‍थान लोगों के लिए 'प्रेशर रीलीज वाल्‍व' का काम भी करते हैं।

    ReplyDelete
  37. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्त किया है चेहरों का संवाद ...

    ReplyDelete
  38. वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
    हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।
    इस शायरी के बाद तो यही कहूँगी आजकल तो सबके दिल में एक ही लहर है कि भ्रष्टाचार से मुक्ति कैसे मिले |
    बहुत सुन्दर लेख आपकी लेखनी बहुत खूबसूरत होती है हमें अच्छी लगती है |हर बात को खूबसूरती से बयान करने का खूबसूरत अंदाज़ |

    ReplyDelete
  39. भाई पाण्डेय जी बहुत अच्छी पोस्ट |अच्छी जानकारी भी मिली

    ReplyDelete
  40. भाई पाण्डेय जी बहुत अच्छी पोस्ट |अच्छी जानकारी भी मिली

    ReplyDelete
  41. कुछ कारगर हल निकल आए तो बात बने .....प्रासंगिक आलेख

    ReplyDelete
  42. सार्थक व् सुन्दर प्रस्तुति .आभार

    BLOG PAHELI NO.1

    ReplyDelete
  43. आज तो लगता है मिक्स्ड मूड है आपका ....शुभकामनायें आपको

    ReplyDelete
  44. अब आ ही जानी चाहिए, दिल की बात जुबान पर.

    ReplyDelete
  45. सर फ्रीडम पार्क ,सबके लिए फ्री है , जो वहा नहीं है उनके लिए भी ! इसीलिए रोब झाड़ने के बाद भी , यह पार्क सभी के चहरे पर एक उदासी ही महसूस करता है !

    ReplyDelete
  46. गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही
    पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ।

    bahut badhiya kahaa Pandeyji aapne!

    ReplyDelete
  47. @इतना समय या उत्साह कभी नहीं रह पाता है कि उनकी समस्याओं को सुना और समझा जा सके।

    आपकी हमारी बात और है, जन प्रतिनिधियों के पास ही कौन सा समय है, जनता की समस्यायें जानने का. आओ, प्रदर्शन करो और चले जाओ, वे तो सिमटे रहेंगे अपने खोल में।

    ReplyDelete
  48. बहुत ही अच्छी जगह है, काश हमारे यहाँ भी ऐसी कोई जगह होती।

    ReplyDelete
  49. स्वतंत्रता उद्यान या आज़ादी बाग़ से फ्रीडम पार्क ज़्यादा मार्केटेबल लगता है...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  50. वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
    हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।
    बस यही तो होता दिख रहा !

    ReplyDelete
  51. ये जो लहर चल पड़ी है, बनी रहे वो सबके मन में, बस यही चाहिए।

    ReplyDelete
  52. इस दुर्योधन की सेना में सब शकुनी हैं ,एक भी सेना पति भीष्म पितामह नहीं हैं ,शूपर्ण -खा है ,मंद मति बालक है जिसे भावी प्रधान मंत्री बतलाया समझाया जा रहा है .एक भी कृपा -चारी नहीं हैं काले कोट वाले फरेबी हैं जिन्होनें संसद को अदालत में बदल दिया है ,तर्क और तकरार से सुलझाना चाहतें हैं ये मुद्दे .एक अरुणा राय आ गईं हैं शकुनियों के राज में ,ये "मम्मीजी" की अनुगामी हैं इसीलिए सरकारी और जन लोक पाल दोनों बिलों की खिल्ली उड़ा रहीं हैं.और हाँ इस मर्तबा पन्द्रह अगस्त से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है सोलह अगस्त अन्नाजी ने जेहाद का बिगुल फूंक दिया है ,मुसलमान हिन्दू सब मिलकर रोजा खोल रहें हैं अन्नाजी के दुआरे ,कैसा पर्व है अपने पन का राष्ट्री एकता का ,देखते ही बनता है ,बधाई कृष्णा ,जन्म दिवस मुबारक कृष्णा ....
    हर गली हर मोड़ पर यह शोर है ,आसमान से लग रही अब होड़ है . ., . ram ram bhai


    कुर्सी के लिए किसी की भी बली ले सकती है सरकार ....
    स्टेंडिंग कमेटी में चारा खोर लालू और संसद में पैसा बंटवाने के आरोपी गुब्बारे नुमा चेहरे वाले अमर सिंह को लाकर सरकार ने अपनी मनसा साफ़ कर दी है ,सरकार जन लोकपाल बिल नहीं लायेगी .छल बल से बन्दूक इन दो मूढ़ -धन्य लोगों के कंधे पर रखकर गोली चलायेगी .सेंकडों हज़ारों लोगों की बलि ले सकती है यह सरकार मन मोहनिया ,सोनियावी ,अपनी कुर्सी बचाने की खातिर ,अन्ना मारे जायेंगे सब ।
    क्योंकि इन दिनों -
    "राष्ट्र की साँसे अन्ना जी ,महाराष्ट्र की साँसे अन्ना जी ,
    मनमोहन दिल हाथ पे रख्खो ,आपकी साँसे अन्नाजी .
    http://veerubhai1947.blogspot.com/
    Saturday, August 20, 2011
    प्रधान मंत्री जी कह रहें हैं .....

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

    ReplyDelete
  53. चहरे के संवाद और एक नई क्रांति......

    ReplyDelete
  54. शुक्रिया भाई साहब आपकी ब्लोगिया दस्तक का .

    ReplyDelete
  55. प्रवीण पाण्डेय जी "जो मेरे लिए कल्याण कारी मार्ग है वही बतलाइये ,आर्थ आज भी यही कृष्ण (किसनउर्फ़ अन्ना )से पूछ रहा है .शुक्रिया आपकी बेशकीमती टिप्पणी के लिए . ,इस दौर में आप लोगों की टिप्पणियाँ ही लिखने की प्रेरणा बनी हुईं हैं .

    रविवार, २१ अगस्त २०११
    सरकारी "हाथ "डिसपोज़ेबिल दस्ताना ".
    http://veerubhai1947.blogspot.com/2011/08/blog-post_5020.html

    ReplyDelete
  56. praveen ji
    bahut hi achhi v sarahniy prastuti
    logo ke chehre par sach ko padh pana jara mushkil hota hai.aapne jis park kia ullekh kiya hai vah ek smriti park ban kar rah gaya hai.
    sabhi ki samsyaon ka samadhan to karna kathin hai par kabhi kabhi koshish se hal nikal hi aate hain.
    ek nye badle yug ke intjaar me
    badhai
    poonam

    ReplyDelete
  57. bas isi badlaav ki laghar ka intejaar tha pichli kai peedhiton ko .ab lahar uthi hai to ummid bhi jagi hai ki kinara mil jaega.....
    समर्थन नहीं कर सकते तो रोकने की प्रवत्ति टाल दो

    थाम लो हाथ से हाथ और विरोधी को ललकार दो

    भारतवासी हो तो भारत का कर्ज उतार दो

    देल्ही नहीं जा सकते तो घर की छत पर ही तिरंगा गाड़ दो
    पर, इस बार कम से कम अपने अन्दर के कायर को मार दो.

    ReplyDelete
  58. आज जिस हालात में देश चल रहा है
    युवा शक्ति को आशावादी सोच के साथ आगे बदते देखना कितना सुखद है देश में पनप रही इन समस्याओं का समाधान भी अब नयी पीढ़ी को करना है सार्थक आलेख के लिए आभार ...
    वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
    हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।
    शुभ कामनाएं !!!

    ReplyDelete
  59. अक्सर ऐसी जगहें इतिहास घड्ती हैं ...

    ReplyDelete
  60. समय बड़ा बलवान होता है .
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !

    ReplyDelete
  61. कुछ-न-कुछ चलता रहता है - संवाद बना रहता है ,
    सबसे जुड़े रहने के लिये बहुत ज़रूरी है .

    ReplyDelete
  62. ...युवाओं का ये जोश..आत्मविश्वास...कुछ कर गुजरने का जनून देख कर अच्छा लगता है .कुछ सकारात्मक कुछ अच्छा ही परिणाम आने चाहियें.ऐसा विश्वास है...

    ReplyDelete
  63. कुछ न कहने की मर्यादा का पालन करते हुए आपने बहुत कुछ कह दिया. शैलेन्द्रजी के गीत में जग को बनानेवाले के बजाय दुनिया बनानेवाले लिखा गया है.

    ReplyDelete
  64. वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
    हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।
    post to hai hi shaandaar us par ye baate ,mano chaar chaand lag gaye .

    ReplyDelete
  65. सरफ़रोशी की तमन्ना ..अब हमारे दिल में है ....

    हर चेहरे पर यही भाव चस्पा हैं आजकल....

    ReplyDelete
  66. हम लोग दिखावे के लोग हैं, आत्म-मुग्ध, आत्म संतुष्ट और कई चेहरों वाले. जब जिस चेहरे की जरूरत हुई, जेब से निकाला और मुंह पर चिपका लिया. कौन सा धरना सही है, कौन सा गलत, पास जाकर ही पता चलता है..

    ReplyDelete
  67. freedon park jaise sthan hona bahut zaroori hai ....
    aaj ke samay mei ek tukda asmaan to mil jata hai per zameen nahi milti... log apni vyatha katha kahan sunayeiin..

    ram leela maidan na sahi ...
    freedom park to hai...
    hame aapko samay na sahi...
    driver ko to hai....

    ReplyDelete
  68. बहुत सटीक प्रस्तुति, सोचने पर विवश करती रचना

    ReplyDelete
  69. आपने सही कहा पर होना तो वही है जो सदियों से होता आया है क्यों की ये भारत की जनता है जिसे कुछ दिखाई नहीं देता बस उसे दिखाना पड़ता है जनता तो वही है जो अन्ना के अनसन से पहले थी क्या ये जनता पहले मर गई थी क्या क्या हुआ था इस जनता को १२५ करोड़ जनता में १ अन्ना ही क्यों निकला १ गाँधी जी क्यों निकले बात वही है की अब कलयुग आज्ञा है अभी तो कुछ हुआ भी नहीं है होना तो बाकि है और होना भी क्या है इस देश में आँखों के अंधे रहते है उस देश की दशा असी होती है फूट डालो राज करो इस समय bhrstachar जसे खाने की कोई वस्तु का नाम है जो खरब हो चुकी है अब उसे फेंकना है अरे मेरे देश वाशियो जागो अब भी कुछ हुआ नहीं है पर इस जनता को कुछ कहना भी बेकार लगता है क्यों की सब अपना पेट पलते नजर आते है किसी को नहीं लगता की ये मेरा भारत है मेरा भारत महँ जेसा नारा लगाने से कुछ नहीं होगा कुछ महान कर्म करो अन्ना के पीछे तो तुम लोग हो पर क्या इस लोक पल बिल से सब कुछ सही हो जायेगा ये नेता लोग सब कुछ छोड़ देगे अरे मेरे भाइयो आज अगर किसी ने किसी को मर दिया है तो उस को जेल होते होते २० साल गुजर जाते है फिर जज बदल जाते है मुंबई बम धामके के आरोपी १ अज भी जेल में है पैर उसको फंसी देने की जगह पोलिस उसकी हिफाजत में लगी है उसकी मेहमान नवाजी कर रही है हर रोज़ उसका मेडिकल होता है लाखो रूपया खर्चा होता है जेसे पोलिश का या सरकार का वो जवाई है कुछ नहीं होने वाला इस देश का और नेताओ का जय जवान जय किशन
    अगर आप मेरी बैटन से सहमत नहीं है तो करपिया मेरे ब्लॉग लिंक पे क्लिक करे और अपनी राय देवे
    दिनेश पारीक
    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

    ReplyDelete
  70. समय के साथ प्रथा और व्यथा दोनों बदल रहे हैं।

    ReplyDelete
  71. दो दिन मैं भी गया था फ्रीडम पार्क..और अगर फिर जाना पड़ा तो आपके घर भी आ धमकते हैं चाय और पकौड़ियों के लिए :)

    ReplyDelete