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27.2.13

वह कविता है

मन की कह दे, वह कविता है,
सब की कह दे, वह कविता है,
निकसे कुछ कुछ अलसायी सी,
अपने में ही सकुचायी सी,
शब्द थाप बन आप खनकती,
रस सी ढलके, वह कविता है।

अपनों का अपनापन जाने,
शब्द-समुच्चय साथ निभाने,
मन गढ़ जाती, सब पढ़ जाती,
क्षत-हत-रत पथ साथ निभाती,
तप्त तवा, बन बूँद छनकती,
भाप बने घन, वह कविता है।

सजती, तन इठलायी, लजती,
लचक उचक बच पग पग धरती,
भावों के घूँघट में छिप कर,
यथाशक्ति अपने में रुक कर,
ओढ़े अद्भुत कान्ति कनक सी,
श्रंगारित तन, वह कविता है।

रोष-कोष, आग्रह अतिरंजित,
दावानल, मन पूर्ण प्रभंजित,
क्रोध सनी, शिव-कंठ बनी वह,
विष धारे, पीड़ा धमनी सह,
शब्द शब्द बस ध्वंस विरचती,
कंपन प्रहसन, वह कविता है।

काल खंड, कंकाल समेटे,
कितने मायाजाल लपेटे,
स्मृति क्षति करती अवरोधित,
भूत भविष्यत सम आरोपित,
पा भावों की छाँह पनपती,
हर क्षण दर्पण, वह कविता है।

एक तरंग रही जो छिटकी,
पथ की संगी, पथ से भटकी,
शब्द धरे, स्थूल हो गयी,
औरों के अनुकूल हो गयी,
मन से निकली, मन की कहती,
शाश्वत विचरण, वह कविता है।

19.8.11

चेहरों का संवाद

बंगलोर में जहाँ मेरा निवास है, उससे बस 50 मीटर की दूरी पर ही है फ्रीडम पार्क। एक पुराना कारागार था, बदल कर स्वतन्त्रता सेनानियों की स्मृति में पार्क बना दिया गया। पार्क को बनाते समय एक बड़ा भाग छोड़ दिया गया जहाँ पर लोग धरना प्रदर्शन कर सकें। यहीं से नित्य आना जाना होता है क्योंकि यह स्थान कार्यालय जाने की राह में पड़ता है। सुबह टहलने और आगन्तुकों को घुमाने में भी यह स्थान प्रयोग में आता है।

लगभग हर तीसरे दिन यहाँ पर लोगों का जमावड़ा दिखता है। कभी पढ़े लिखे, कभी किसान, कभी आँगनवाड़ी वाले, कभी शिक्षक, कभी वकील, और न जाने कितने लोग, समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुये। सुबह से एकत्र होते है, सायं तक वापस चले जाते हैं। पुलिस और ट्रैफिक की व्यवस्था सुदृढ़ रहती है, बस थोड़ी भीड़ अधिक होने पर वाहन की गति कम हो जाती है।

इतना समय या उत्साह कभी नहीं रह पाता है कि उनकी समस्याओं को सुना और समझा जा सके। उन विषयों को समस्यायें खड़े करने वाले और उन्हें सहने वाले समझें, मैं तो धीरे से पढ़ लेता हूँ कि बैनर आदि में क्या लिखा है, यदि नहीं समझ में आता है तो अपने चालक महोदय से पूछ लेते हैं कि कौन लोग हैं और किन माँगों को मनवाने आये हैं। अब तो चालक महोदय हमारे पूछने से पहले ही विस्तार से बता देते हैं।

इस प्रकार समस्याकोश का सृजन होने के साथ साथ, प्रदर्शनकारियों के चेहरों से क्या भाव टपक रहे होते हैं, उनका अवलोकन कर लेता हूँ। कवियों और उनकी रचनाओं में रुचि है अतः वह स्थान पार होते होते मात्र एक या दो पंक्तियाँ ही मन में आ पाती हैं।

कभी व्यवस्था से निराश भाव दिखते है,

जग को बनाने वाले, क्या तेरे मन में समायी,
तूने काहे को दुनिया बनायी?

कभी व्यवस्था का उपहास उड़ाते से भाव दिखते है,

बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था,
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम--गुलिस्तां क्या होगा?

कभी व्यवस्था के प्रति आक्रोश के भाव दिखते हैं,

गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही 
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ।

पिछले तीन दिनों से यहाँ से निकल रहा हूँ, लोग बहुत हैं, युवा बहुत हैं, उनके भी चेहरे के भाव पढ़ने का प्रयास करता हूँ। किन्तु पुराने तीन भावों से मिलती जुलती नहीं दिखती हैं वे आँखें। मन सोच में पड़ा हुआ था। आज ध्यान से देखा तो और स्पष्ट हुआ, सहसा राम प्रसाद बिस्मिल का लिखा याद आ गया। हाँ, उनकी आँखें बोल रही थीं,

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।


14.8.10

फूलों का मुस्कराना

जब भी भावों को व्यक्त करने के लिये माध्यमों की बात होती है, फूलों का स्थान वनस्पति जगत से निकल कर मानवीय आलम्बनों की प्रथम पंक्ति में आ जाता है। प्रकृति के अंगों में रंगों की विविधता लिये एक यही उपमान है, शेष सभी या तो श्वेत-श्याम हैं या एकरंगी हैं। फिल्मों में भी जब कभी दर्शकों को भावों की प्रगाढ़ता सम्प्रेषित करनी हो तो फूलों का टकराना, हिल डुल कर सिहर उठना, कली का खिलना आदि क्रियायें दिखाकर निर्देशकगण अपनी अभिव्यक्ति की पराकाष्ठा पा जाते हैं। कोई देवालय में, कोई कोट में, कोई गजरे में, कोई पुष्पगुच्छ में और कोई कलाईयों में लपेट कर फूलों के माध्यम से अपने भावों को एक उच्च संवादी-स्वर दे देते हैं। प्रेमीगण रात भर न सो पाने की उलझन, विचारों की व्यग्रता, मन व्यक्त न कर पाने की विवशता और भविष्य की अनिश्चितता आदि के सारे भाव फूलों में समेटकर कह देना चाहते हैं। भावों से संतृप्त फूलों के गाढ़े रंगों को समझ सकने में भी दूसरे पक्ष से आज तक कभी कोई भूल होते नहीं देखी है हमने।

अब भावों की भाषा को सरल बनाते रंग बिरंगे संवाहकों को कोई कैसे केवल सौन्दर्यबोध की श्रेणी में ही रख देने की भूल कर सकता है। फूल पा कर भाव समझ लेना आपकी योग्यता भले न हो पर भाव न समझ पाना मूर्खता व संकट-आमन्त्रण की श्रेणी में अवश्य आ जायेगा। एक बार जब सुबह उठने पर अपने सिरहाने पर रखे गुलदस्ते पर कुछ फूल रखे पाये तो बड़ा अच्छा लगा। हम बिना भाव पढ़े सौन्दर्यबोध में खो गये। दिनभर के रूक्ष पारिवारिक वातावरण में सायं होते होते अपनी भूल समझ में आ गयी। बंगलोर आने के बाद घर मे हुये पहले फूल के बारे में अपने हर्षोद्गार व्यक्त न करना घातक हो सकता था, इसका अनुमान लग गया हमें। दिनभर मानसिक उत्पात के बाद उत्पन्न हुयी बिगड़ी स्थिति को अन्ततः फूलों ने ही सम्हाला हमारे लिये। यदि विश्वास न हो तो आप भी प्रयोग कर के देख लें।

बंगलोर की जलवायु बड़ी मदिर बनी रहती है, वर्षभर। यहाँ के विकास में, जनमानस के स्वभाव में और कार्य का माहौल बनाये रखने के अतिरिक्त फूलों के उत्पादन में भी इसी जलवायु का महत योगदान है। संसार भर में पाये जाने वाले सभी फूलों का उत्पादन कर उनके निर्यात के माध्यम से यहाँ की अर्थव्यवस्था को एक सुदृढ़ भाग प्रदान करता है यहाँ का फूल-व्यवसाय। यहाँ की संस्कृति में फूलों का उपयोग हर प्रकार के धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठानों में बहुतायत से होता है। महिलाओं के सौन्दर्य प्रसाधन का अभिन्न अंग है, फूलों का गजरा।

यहाँ के जीवन में फूलों की सर्वमान्य उपस्थिति का एक उच्चारण है यहाँ पर होने वाली वार्षिक पुष्प प्रदर्शनी। पूरे देश से आये फूलों का अप्रतिम व सुन्दरतम प्रदर्शन। गत रविवार हमारे सौभाग्य की कड़ी में एक और अध्याय जुड़ गया जब सपरिवार इस प्रदर्शनी को देखने का अवसर मिला। सुबह शीघ्र पहुँचने से बिना अधिक प्रतीक्षा किये देखने को मिल गया क्योंकि वापस आते समय सैकड़ों की संख्या में नगरवासी टिकटार्थ खड़े थे। मन के कोमल भावों की सुन्दरतम अभिव्यक्ति के वाहकों की प्रदर्शनी न केवल दृष्टि के लिये अमृतवत थी वरन भीनी भीनी सुगन्ध मन को दूसरे लोकों में ले जाने में सक्षम प्रतीत हो रही थी।

मन पूर्णतृप्त था, उपकार फूलों का, जीवन के रंगों में घुल जाते रंग,भावों को कहते अपनों के संग।

आप प्रदर्शनी में दिखाये कुछ दृश्य देखें और अगली बार जब भी कोई फूल दिखे, उसमें छुपाये और सहेजे भावों को पढ़ने का यत्न अवश्य करें।