बंगलोर
में जहाँ मेरा निवास है, उससे बस 50 मीटर की दूरी पर ही है फ्रीडम पार्क। एक
पुराना कारागार था, बदल कर
स्वतन्त्रता सेनानियों की स्मृति में पार्क बना दिया गया। पार्क को बनाते समय एक
बड़ा भाग छोड़ दिया गया जहाँ पर लोग धरना प्रदर्शन कर सकें। यहीं से नित्य आना
जाना होता है क्योंकि यह स्थान कार्यालय जाने की राह में पड़ता है। सुबह टहलने और
आगन्तुकों को घुमाने में भी यह स्थान प्रयोग में आता है।
लगभग हर
तीसरे दिन यहाँ पर लोगों का जमावड़ा दिखता है। कभी पढ़े लिखे, कभी किसान, कभी आँगनवाड़ी वाले, कभी
शिक्षक, कभी वकील, और न जाने कितने लोग, समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुये। सुबह से एकत्र होते है, सायं तक वापस चले जाते हैं। पुलिस और ट्रैफिक
की व्यवस्था सुदृढ़ रहती है, बस
थोड़ी भीड़ अधिक होने पर वाहन की गति कम हो जाती है।
इतना
समय या उत्साह कभी नहीं रह पाता है कि उनकी समस्याओं को सुना और समझा जा सके। उन
विषयों को समस्यायें खड़े करने वाले और उन्हें सहने वाले समझें, मैं तो धीरे से पढ़ लेता हूँ कि बैनर आदि में
क्या लिखा है, यदि नहीं समझ में आता
है तो अपने चालक महोदय से पूछ लेते हैं कि कौन लोग हैं और किन माँगों को मनवाने
आये हैं। अब तो चालक महोदय हमारे पूछने से पहले ही विस्तार से बता देते हैं।
इस
प्रकार समस्याकोश का सृजन होने के साथ साथ, प्रदर्शनकारियों के चेहरों से क्या भाव टपक रहे होते हैं, उनका अवलोकन कर लेता हूँ। कवियों और उनकी
रचनाओं में रुचि है अतः वह स्थान पार होते होते मात्र एक या दो पंक्तियाँ ही मन
में आ पाती हैं।
कभी
व्यवस्था से निराश भाव दिखते है,
जग को
बनाने वाले, क्या तेरे मन में समायी,
तूने
काहे को दुनिया बनायी?
कभी
व्यवस्था का उपहास उड़ाते से भाव दिखते है,
बर्बाद
गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था,
हर शाख
पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा?
कभी
व्यवस्था के प्रति आक्रोश के भाव दिखते हैं,
गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ।
पिछले तीन दिनों से यहाँ से निकल रहा हूँ, लोग बहुत हैं, युवा बहुत हैं, उनके भी चेहरे
के भाव पढ़ने का प्रयास करता हूँ। किन्तु पुराने तीन भावों से मिलती जुलती नहीं
दिखती हैं वे आँखें। मन सोच में पड़ा हुआ था। आज ध्यान से देखा तो और स्पष्ट हुआ, सहसा राम प्रसाद बिस्मिल का लिखा याद आ गया। हाँ, उनकी आँखें बोल रही थीं,
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।