13.7.21

सात चक्र - व्यवहार


योगसूत्र और गीता में योग की तीन परिभाषायें मिलती हैं।

  1. योगः चित्तवृत्ति निरोधः (योगसूत्र १.२)- योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
  2. समत्वं योग उच्यते (गीता २.४८) - समत्व योग कहलाता है।
  3. योगः कर्मषु कौशलम् (गीता २.५०) - योग कर्मों में कुशलता है।


इसके अतिरिक्त सांख्यदर्शन “पुरुष का प्रकृति से स्वयं को पृथक कर अपने स्वरूप में स्थित होने” को योग कहता है। यह परिभाषा “तब दृष्टा अपने स्वरूप में अवस्थित होता है (तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् - योगसूत्र १.३)” के जैसी ही है। बस प्रकृति से पुरुष(दृष्टा, स्वयं) को पृथक करने की विधि “चित्त की वृत्तियों का निरोध” है। अपने स्वरूप में स्थित होने के बाद आत्मा की क्या स्थिति होती है, उस पर योगसूत्र मौन है। यद्यपि गीता उस स्थिति का भी वर्णन करती है पर वह प्रकरण वर्तमान विषय की परिधि के बाहर है।


उपरोक्त तीन कथन हमें योगपथ पर जीवन निर्वाह करने की विधि बताते हैं। प्रथम कथन उस स्थिति को बताता है जहाँ पर आपको पहुँचना है, वह साध्य है। द्वितीय कथन उस समत्व मनःस्थिति को बताता है जिसमें रह कर साध्य तक पहुँचना है। तृतीय कथन उस मनःस्थिति में किये कर्मों के परिणाम को बताता है, कुशलता को परिभाषित करता है।  तीनों ही कथन एक दूसरे से भिन्न नहीं है। जहाँ प्रथम कथन योग का सैद्धान्तिक पक्ष बताता है, शेष दो कथन योग के व्यवहारिक पक्ष को स्पष्ट करते हैं। समुचित मनःस्थिति से कर्मों में कुशलता आयेगी और दोनों अन्ततः चित्त की वृत्तियों के निरोध में सहायक होंगे।


तीनों कथनों के परस्पर सम्बन्धों का विश्लेषण अत्यन्त रोचक है। पहला तो एक स्पष्ट संदेश है कि कर्मों में प्रवृत्त होना ही पड़ेगा। “सकल पदारथ है जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।” बिना कर्म किये मन की अवस्थाओं को निष्पत्ति नहीं मिलेगी। योगपथ पर पलायन की मानसिकता स्वीकार्य नहीं है, वर्तमान का सामना करना होगा, स्मृतियों और कल्पना को भी निभाना होगा, ज्ञान प्राप्त करना होगा और कर्म में प्रवृत्त भी होना होगा।


योग जहाँ एक ओर कर्मों में प्रवृत्त होने के लिये उकसा रहा है वहीं दूसरी ओर उनमें पसर जाने के लिये मना भी कर रहा है। कर्म करिये पर निस्पृह भाव से, सम्यक ज्ञान पाकर, राग-द्वेष के बिना, ममत्व के भाव से विलग और स्वयं को असीमित और कालातीत मानकर। बिना इसके समत्व कहाँ से आयेगा? “शीतोष्ण सुखदुःखदा”, सुख दुख को शीत और ऊष्ण सा ग्रहण करने का भाव, उसी प्रकार सहन करने का भाव। जिस प्रकार हम अत्यधिक सर्दी और गर्मी से विचलित नहीं होते, सहते हैं और अपने कार्यों में लगे रहते हैं, ठीक उसी प्रकार कर्म करने को कहती है गीता। बिना समत्व के कर्मों में कुशलता नहीं आती, संतुलन आवश्यक है। विचलित न हो जायें, निर्णय प्रक्रिया प्रभावित न हो जाये, उसके लिये दृढ़ होना आवश्यक है। बिना सहे, बिना अभ्यास किये, बिना दृढ़ हुये समत्व कहाँ से आयेगा?


योग की व्याख्या में जायेंगे तो वैज्ञानिक रूप से इस प्रक्रिया को समझाया गया है, पर वह उसका सैद्धान्तिक पक्ष है, गीता उसे कर्म में अनुवादित कर उसका व्यवहारिक पक्ष बताती है। योग के अनुसार कोई भी कर्म या विचार अपनी छाप छोड़ जाता है, इसे संस्कार कहते हैं। यह संस्कार कितने गहरे और व्यापक हैं, यह इस पर निर्भर करेगा कि आपने किस संलग्नता और संलिप्तता से उसे निष्पादित किया है। वह आपका अंग बन जाते हैं और आपके भविष्य को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। वह आपके चिन्तन का अंग बन जाते हैं और स्मृति में आने का अधिकार रखते हैं। यथोचित वातावरण में वे संस्कार प्रकट हो जाते हैं। बचपन में मिले अच्छे संस्कार बड़े बड़े प्रलोभनों से बचा लेते हैं, भटकने से बचा लेते हैं। वहीं दूसरी ओर कुसंगति में मिले बुरे संस्कार पापकर्म में प्रवृत्त कर देते हैं।


योग में साध्य स्थिति में पहुँचने के लिये सारे संस्कार क्षीण होना आवश्यक है, अच्छे और बुरे दोनों ही। यदि ऐसा नहीं होता है तो चित्त में वृत्तियाँ उत्पन्न होंगी और आप कर्म में प्रवृत्त होंगे। यदि मान लिया कि समत्व भाव में रहने से नये संस्कार नहीं बन रहे हैं, पर उन संस्कारों का क्या, जो जन्म जन्मान्तर से हमारे सूक्ष्म शरीर में चिपके हैं और हमारे जन्मों का कारण हैं? योग के अनुसार ऋतम्भरा की स्थिति में पहुँचने से उन सारे कर्मबन्धनों का स्वतः ही नाश हो जाता है और हम मुक्त हो जाते हैं। उस समय हम कैवल्य की स्थिति में पहुँच जाते हैं, कैवल्य इसलिये कि उस समय हमारे पास भूत का कोई भार नहीं होता है, हम अपने स्व में स्थित होते हैं।


गीता योग के इसी सिद्धान्त के व्यवहारिक पक्ष को समझाती है। कृष्ण को योगेश्वर इसीलिये कहा जाता है कि उन्हें योग की सूक्ष्मताओं में एक सिद्धहस्तता थी। जीवन में, समाज में, व्यवहार में कैसे योग निभायें, उसे बड़े ही सरल, सुग्राह्य और स्पष्ट रूप से व्याख्यायित करती है गीता। योगसूत्र के सिद्धान्त समझने के बाद गीता पढ़ना आवश्यक है। भक्ति, ज्ञान और कर्ममार्ग की भिन्नता और एकता, दोनों में ही व्यवहारिक सारल्य दिखाती है गीता। कर्मफल के साथ क्या करना है, क्यों करना है, कैसे करना है, किस भाव से करना है? कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म कैसे देखना है? दृष्टिभेद से किस प्रकार सृष्टिभेद हो जाता है? न जाने कितनी गहन सूक्ष्मताओं से भरी है गीता। हर बार पढ़िये और जितनी सामर्थ्य हो, जितनी मन की चेतना हो, उतने रत्न निकाल लाइये।


इस परिप्रक्ष्य में मेरा अनुभव और मेरी प्रार्थना यही है कि योगसूत्र और गीता को साथ साथ पढ़ा जाये। योग के सैद्धान्तिक और व्यवहारिक पक्ष को साथ साथ समझा जाये। कर्म, ज्ञान और भक्ति को साथ साथ जिया जाये। दृष्टि और सृष्टि के साम्य को सकल विश्व के साथ निभाया जाये।


सात चक्रों में बढ़ने के लिये, काल की कलाओं को समझने के लिये, स्मृति और कल्पना में साम्य बिठाने के लिये, गीता को आत्मसात करने की आवश्यकता है, अपने अनुसार व्यवहार में लाने की आवश्यकता है, प्रक्रियागत सरलीकरण की आवश्यकता है। प्रक्रिया के कुछ पक्ष समझेंगे अगले ब्लाग में।

10.7.21

आँखों के दो तारे तुम

 

आत्म-अधिक हो प्यारे तुम,

आँखों के दो तारे तुम ।

 

रात शयन से प्रात वचन तक, सपनों, तानों-बानों में,

सीख सीख कर क्या भर लाते विस्तृत बुद्धि वितानों में,

नहीं कहीं भी यह लगता है, मन सोता या खोता है,

निशायन्त तुम जो भी पाते, दिनभर चित्रित होता है,

कृत्य तुम्हारे, सूची लम्बी, जानो उपक्रम सारे तुम,

आँखों के दो तारे तुम ।१।

 

कहने से यदि कम हो जाये उत्श्रंखलता, कह दूँ मैं,

एक बार कर यदि भूलो तो, चित्त-चपलता सह लूँ मैं,

एक कान से सुनी, बिसारी, दूजे से कर रहे मन्त्रणा,

समझा दो जो समझा पाओ, हमको तो बस मन की करना,

अनुशासन के राक्षस सारे, अपने हाथों मारे तुम,

आँखों के दो तारे तुम ।२।

 

पैनी दृष्टि, सतत उत्सुकता, प्रश्न तुम्हारे क्लिष्ट पहेली,

समय हाथ में, अन्वेषणयुत बुद्धि तुम्हारी घर-भर फैली,

कैंची, कलम सहज ही चलते, पुस्तक, दीवारें है प्रस्तुत,

यह शब्दों की चित्रकारिता या बल पायें  भाषायें नित,

जटिल भाव मन सहज बिचारो, प्रस्तुति सहज उतारे तुम,

आँखों के दो तारे तुम ।३।

 

अनुभव सब शब्दों में संचित, प्रश्नों के उत्तर सब जानो,

स्वतः सुलभ पथ मिलते जाते, यदि विचार कोई मन में ठानो,

मुक्त असीमित ऊर्जा संचित, कैसे बाँध सके आकर्षण,

चंचल चपल चित्त से सज्जित, रूप बदलते हर पल हर क्षण,

उलझे चित्रण, चंचल गतियाँ, घंटों सतत निहारे तुम,

आँखों के दो तारे तुम ।४।

 

बादल बन बहती, उड़ती है, कहीं बिचरती मनस कल्पना,

और परिधि में सभी विषय हैं, सजती जीवन-प्रखर अल्पना,

अनुभव के अम्बार लगेंगे, बुद्धिमता के हार सजेंगे,

अभी लगे उत्पातों जैसे, उत्थानों के द्वार बनेंगे,

सीमाओं से परे निरन्तर, बढ़ते जाओ प्यारे तुम,

आँखों के दो तारे तुम ।५।


(पहले मानसिक हलचल में लिखी थी, स्मृति में पुनः उतर आयी)


8.7.21

सात चक्र - प्रक्रिया

 

ऊर्जा के चक्रों में क्रमिक गतिमय होना कोई क्षणिक उपलब्धि नहीं है, इसके लिये निश्चित रूप से एक प्रक्रिया में निहित हो क्रमशः बढ़ना पड़ता है। अपने स्वरूप में स्थित हो, शरीर, मन और काल के आवरण से विमुक्त, अपने आराध्य की चेतना से जुड़ जाना योग है। योग को समझने के लिये दो ग्रन्थ पढ़ने आवश्यक हैं, योगसूत्र और भगवद्गीता। जहाँ योगसूत्र में विषय को एक व्यवस्थित क्रम देते हुये संक्षिप्त किया गया है और प्रक्रिया को बौद्धिक आधार दिया गया है वहीं भगवद्गीता में उसके व्यवहारिक पक्षों को विस्तार से व्यक्त किया गया है। तुलना की जाये और लगभग चार सूत्रों को एक श्लोक के बराबर रखा जाये तो भगवद्गीता का आकार योगसूत्र का लगभग १५ गुना होगा। यह होने पर भी योगसूत्र में कोई भी सिद्धान्त न्यून नहीं है और भगवद्गीता में कोई भी व्याख्या योगसूत्र से असम्बद्ध नहीं है।


पहले भगवद्गीता पढ़ी। उस समय आत्मा, कर्म, जन्म आदि के न जाने कितने सिद्धान्त समझ में आये पर कई प्रकार के योगों का वर्णन मन दिग्भ्रमित कर गया। जब कई मार्ग दिये हो, कई भेद वर्णित हों तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इसमें आपके लिये कौन सा है? लगा कि पढ़ते पढ़ते एक चौराहे पर पहुँच गये और जब तब अपनी प्रकृति का ज्ञान नहीं होगा तब तक पता नहीं चलेगा कि कौन सा मार्ग अपनाना है? अनुभवहीनता के उस प्रारम्भिक काल में यह एक कारण रहा कि प्रगति गतिमय नहीं रही। आपको अपनी प्रकृति कौन बतायेगा? आयुर्वेद को ही देखें तो समुचित दिनचर्या, ऋतुचर्या और जीवनचर्या अपनाने के लिये आपको यह जानना आवश्यक हो जाता है कि आपकी प्रकृति कफ है, या पित्त, या वात? जानना कठिन होता है पर शरीर, मन आदि के लक्षणों से अपनी प्रकृति समझ आ जाती है।


कौन से योग में प्रवृत्त हों, यह जानना और भी कठिन है। भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, राजयोग, निष्कामयोग आदि, इनमें कौन सा मार्ग अपनायें? बिना स्वयं को जाने किस मार्ग में प्रवृत्त हो जायें? यह यक्ष प्रश्न सदा ही सामने उपस्थित रहा। कभी कभी अध्ययनकाल में जब कठिन प्रश्न सामने रहता था तो बहुधा मन नैराश्य से उटच जाता था। पर नैराश्य भी अधिक समय तक नहीं टिकता था, जैसे ही तनिक ऊर्जा आती थी, नया विचार कौंधता था पुनः उस प्रश्न से जूझने का मन बन जाता था। प्रवृत्ति-निवृत्ति के इस असमञ्जस में युवावस्था का पर्याप्त समय निकल गया।


कभी अपनी मेधा पर विश्वास होता था और लगता था कि ज्ञानयोगी बन सकते हैं। कभी अत्यधिक उछाह और ऊर्जा कर्मयोग में प्रवृत्त कर देती थी। कभी अनुराग होता था तो कभी वैराग्य। कभी असहायता और आश्रयता प्रबल हो जाती थी और भक्तियोग के अतिरिक्त कोई और मार्ग नहीं समझ आता था। विकल्पों के न जाने कितने हिचकोले खाकर वर्षों बाद भी वहीं का वहीं मिलता था जीवन। यह तो समझ आ गया था कि संशय स्वयं की समझ में है, सिद्धान्त में नहीं। पंथ एक ही है, तीन नहीं। व्यक्ति की क्षमता के अनुसार, काल या परिस्थिति के अनुसार कुछ भेद अवश्य है जो समझ नहीं आ रहा था।


जीवन तात्कालिकताओं में व्यस्त हो गया। जब समय मिला तो पुनः अभिरुचि जागृत हुयी। गीता पढ़ी, कुछ नयी दृष्टि प्राप्त हुयी पर उपरोक्त विषय में स्पष्टता नहीं आयी। यह दैवयोग ही कहा जायेगा कि उस दिन मुख्यालय में एक बैठक समय के पहले ही सम्पन्न हो गयी, समय था पर पढ़ने के लिये कोई पुस्तक नहीं थी। गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर गीताप्रेस के स्टाल के सामने पठनीय सामग्री ढूढ़ रहा था कि पतंजलि योगसूत्र की पतली सी पुस्तक पर दृष्टि पड़ी। पढ़ना प्रारम्भ किया और वापस घर (बनारस) पहुँचते पहुँचते एक बार पढ़ना हो गया, हिन्दी अनुवाद के साथ। एक अद्भुत आनन्द आया, ज्ञान की सहज स्पष्टता पर। 


इसके पहले अन्य भारतीयों की भाँति अपनी संस्कृति के बारे में पढ़ा अवश्य था, गर्व भी था पर कोई यदि गहरे प्रश्न कर बैठे तो उसका उत्तर नहीं था। यद्यपि शास्त्र मूल रूप से पढ़े नहीं थे, कुछ एक को छोड़कर। जो पढ़े थे, वह भी हिन्दी अनुवाद तक सीमित थे। कुल मिलाकर जो ज्ञान था वह अत्यन्त सीमित और परिधि पर ही रहने वाला था। भीतर जाने का न कभी प्रयत्न नहीं किया था और कोई खींच ले तो उस पर चर्चा करने का आत्मविश्वास भी नहीं था।


पता नहीं क्यों पर उस दिन योग के सूत्र मस्तिष्क में एक के बाद एक उतरते चले गये। अगले एक माह में वह पुस्तक दो बार और पढ़ी। मन नहीं भरा, तब संस्कृत का एक एक सूत्र समझ कर पुनः पढ़ी। तब लगने लगा कि मेरी वर्षों की प्रतीक्षा, अधर में लटके संशय को इस प्रकार ही निष्पत्ति मिलनी थी। जिस समय योग के सूत्र पढ़े उस समय गीता के श्लोक सहायक रहे। आनन्द तब आया जब योगसूत्र की प्रारम्भिक समझ के बाद गीता पढ़ना प्रारम्भ किया। ऐसा लगा कि हाथ में कोई चाभी है और जिससे एक एक श्लोक के रहस्य स्वतः खुलते जा रहे हैं।


पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा हुआ कि गीता का पारायण करने वाले अन्य साधकों के साथ भी ऐसा होता है। आजकल प्रबन्धन के प्रशिक्षण में गूढ़ तत्वों को समझने के लिये एक विशेष समस्या को उदाहरण के रूप में लेते हैं और उसे प्रबन्धन के सिद्धान्तों के माध्यम से सुलझाते हैं। स्थिति विशेष में प्रयुक्त होने से सिद्धान्त स्पष्ट होते जाते हैं। मुझे लगता है कि गीता में पतंजलि योगसूत्र के सारे के सारे सिद्धान्तों का प्रयोग बताया है। जिस समस्या पर सिद्धान्त प्रयुक्त हुये हैं, अर्जुन के समान दिग्भ्रम लगभग सभी के जीवन में आते हैं। योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन की समस्या के उदाहरण से योगसूत्र के सिद्धान्तों को स्पष्ट कर दिया है।


योगसूत्र और गीता को परस्पर परिप्रेक्ष्य में समझना एक अद्भुत अनुभव रहा है। सैद्धान्तिक पक्ष स्पष्ट होने से उन पर व्यवहार करना सरल हो गया है। अभ्यास और वैराग्य पर आधारित इस समझ को पूर्व में एक ब्लाग श्रृंखला के माध्यम से व्यक्त किया था। हर बार पढ़ने से वही शब्द और गहरे जाकर पैठ जाते हैं।


मन से सम्बन्धित योग के व्यवहारिक पक्ष अगले ब्लाग में।

6.7.21

सात चक्र - स्थिति

 

सात चक्रों की अवधारणा संभवतः भारतीय सिद्धान्त पक्ष का सर्वाधिक चर्चित तत्व है। शरीर में स्थित ऊर्जा के ये चक्र न केवल शरीर को अध्यात्म से जोड़ते हैं वरन भूत, भविष्य और वर्तमान से होते हुये कालातीत अवस्था तक पहुँच जाते हैं। शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की भिन्न अवस्थाओं को भी ये चक्र विश्लेषित करते हैं। योग हो, तन्त्र साधना हो, बौद्धपंथ हो, आधुनिक मनोविज्ञान हो, प्राच्य और पाश्चात्य के सभी मत मानसिक संरचना को इसी सिद्धान्त से समझने का प्रयत्न करते हैं। समझ में थोड़ा बहुत अन्तर काल और विकास के कारण है। साथ ही अपने पंथ के अन्य सिद्धान्तों से संयोजन के प्रयास में इसके मूलभूत स्वरूप में न्यूनतम छेड़छाड़ दृष्टव्य है।


संलग्न चित्र में चक्र, उनके स्थान, सम्बद्ध काल, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक लक्षण दिखाये गये हैं। इन्हें पूरा समझ पाना किसी योगी के लिये ही संभव है पर कुछ आधारभूत तथ्य इसे क्रमशः खोलने में सहायक होंगे।


प्रथम दो चक्र समझ आते हैं, वे क्रमशः भूत और भविष्य से सम्बद्ध हैं। अन्तिम दो भी स्पष्ट हैं, वे वर्तमान और कालातीत अवस्था को व्यक्त करते हैं। मध्य में स्थित शेष तीन काल की व्यापित अवस्थाओं के परिचायक हैं। व्यापित काल अवस्थायें बन्धनकारी लग सकती है। प्रारम्भिक स्थितियों में ऐसा होता भी है, ऊर्जा बट जाती है। कालान्तर में इनमें साम्य आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं होगा तो हमारा विकास नहीं होगा, हम उसी चक्र में अटके रहेंगे। विकास से हम ऊपरी चक्रों में क्रमशः बढ़ते जाते हैं और पहले अपने अन्दर, फिर परिवार में, फिर समाज में और अन्ततः सकल विश्व में एक संतुलित स्वरूप देख पाते हैं। ऊर्जा, साम्य, विकास और संतुलन को यह क्रम लगभग हर विषय में प्रयुक्त होता है।


मध्य के ये तीन चक्र बद्धता और उन्मुक्तता के बीच के संक्रमण की स्थिति है, बद्धता भूत और भविष्य की, उन्मुक्तता वर्तमान की। बद्धता सब कुछ अपने में समेट लेने की, उन्मुक्तता सब में व्याप्त हो जाने की। स्वाभाविक है कि इस यात्रा में परिश्रम अधिक करना पड़ता है, समय अधिक लगता है। जहाँ होड़ लगी थी, प्रतियोगी मानसिकता थी, वहाँ साम्य बिठाना पड़ता है। बन्धन से बाहर आने के क्रम में चित्र में इंगित गुण विकसित होते हैं। बन्धन से बाहर आने का प्रयास ही उन गुणों को जीवन में परिवर्धित करते हैं जो विस्तारमना होते हैं। यह तब तक संभव नहीं है जब तक हम भूत और भविष्य को संतुलित रूप में वर्तमान के साथ नहीं रखते हैं। एकता, समग्रता में विस्तार की आवश्यकता है। विस्तार तीनों कालों का, विस्तार तीनों कालों के परस्पर प्रभाव का।


अन्ततः वर्तमान ही सब कुछ है। यदि वर्तमान को जी लिया और बिना कुछ बोझ लिये आगे बढ़ गये तो काल की बन्धनकारी प्रवृत्ति भी कम रहेगी। यदि वर्तमान को पूर्णता से नहीं जिया, निष्कर्ष तक नहीं पहुँचाया तो वह अतृप्त रहेगा और आगत काल में अपना भाग माँगेगा। यही संभवतः कर्मफल का सिद्धान्त है। बिना क्लेष के जी पाना, बिना अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश के जी पाना।


आपका जीवन ऊर्जा के इन सात चक्रों में कहीं न कहीं रहेगा ही। मन में उत्पन्न विचार किसी न किसी चक्र का भाग रहेगा ही। निम्न चक्र प्रारम्भ में जागृत रहते हैं पर बिना उनको पार किये, बिना उन पर ध्यान दिये, बिना उनको निष्कर्ष पर पहुँचाये विकास संभव भी नहीं है। विकास के प्रारम्भिक चरणों में प्राथमिकता वही है। बिना उन आवश्यकताओं को पूर्ण किये हुये संतुलन और एकाग्रता की बात करना हास्यास्पद है। पर उन आवश्कताओं में कितना समय दें, यह प्रश्न सदा ही बना रहता है। उनको यथोचित समय और ऊर्जा देकर ही आगे बढ़ा जा सकता है, नहीं तो अवसर पाकर वे पुनः भड़केंगी। इन आवश्यकताओं का एक मूलभूत नियत स्तर बनाकर रखना ही होता है। शरीर और परिवेश की सुरक्षा, खाने को भोजन, रहने को घर, जीवकोपार्जन, भविष्य का चिन्तन, सन्तति का क्रम, आधार का निर्माण करना ही पड़ता है।


यदि प्रथम चक्र में ही अटक गये, उसी में सारा समय व्यतीत कर दिया, उसी में निमग्न हो गये, उसी में सुख ढूढ़ने लगे तो मान लीजिये कि आपने सारी संभावनाओं को नकार दिया है। एक दिन मन भर जायेगा, काल में सबका अवरोह आता है, सुख के अनुभव का भी। बार बार एक ही विषय सुख देना बन्द कर देता है। तब कहाँ जायेंगे, तब ऊपर के चक्रों में जाने का मन तो करेगा पर आपके पास न ऊर्जा रहेगी और न ही समय। निःशब्द, निर्व्यक्त, निरुपाय आप जीवन से प्रयाण कर जायेंगे। काल की कला से बाहर आना है तो कालातीत तो होना ही पड़ेगा।


धर्म रक्षित अर्थ और काम के प्रयास मोक्ष तक ले जाने की सामर्थ्य रखते हैं। धर्मविहित अर्थ समाज के द्वेष का कारण बनता है और धर्मविहित काम समाज की निन्दा का। वाल्मीकि रामायण में राम के मुख से निकले ये शब्द असमञ्जस की किसी भी स्थिति से बाहर निकाल लाते हैं और एक सहज सा साम्य प्रकट कर देते हैं। वैशेषिक भी जीवन के दो ध्येय कहता है, एक अभ्युदय औऱ दूसरा निःश्रेयस। एक भौतिक श्रेष्ठता तो दूसरा सर्वोत्तम तक की यात्रा, एक के बाद एक चक्रों से होते हुये, ऊर्ध्वमना हो।


सात जन्म, मन की सात अवस्थायें, काल की सात कलायें, सात चक्र, ये सब अन्ततः एक बिन्दु पर अपनी निष्पत्ति पा जाते हैं। इन सात चरणों की यात्रा के व्यवहारिक पक्ष अगले ब्लाग में।

3.7.21

खजुराहो

 

उपेक्षित जड़ प्रस्तरों पर,

कल्पना-घट पूर्ण भरकर ।

मूर्तिकारों के करों से,

सकल ही सौन्दर्य छलका ।।१।।

 

बलवती किस प्रेरणा से,

सुघट अंगों को बनाया ।

मात्र प्राणों की कमी है,

मूर्तियाँ बस चल पड़ेंगी ।।२।।

 

दृष्टिगोचर भित्तियों पर,

मनुज का उत्कर्ष विस्तृत ।

अन्त्य का निष्काम चित्रण,

कला की संज्ञा रही है ।।३।।

 

मन विषय उद्विग्नता पर,

डालकर शीतल फुहारें ।

मूर्तिमय सौन्दर्य निर्मल,

मन व्यथा को तृप्त करता ।।४।।

 

है मधुर श्रृंगार तेरा,

दीप्त मन की सत्वता से ।

जगत में होवे प्रकीर्णित,

अर्थ जन जन में मधुर का ।।५।।

 

दुख यही, उद्देश्य जो था,

नहीं सफलीभूत होता ।

दृष्टियाँ सापेक्ष तुझपर,

तिक्त छिन्नित वासना से ।।६।।
























चित्र साभार - https://www.thepublic.in/

1.7.21

सात जन्म - क्रम


ऊर्जा, साम्य, विकास और एकता की विमाओं में भूत, भविष्य और वर्तमान को कैसे साधा जाये, यह जीवन का मूल प्रश्न हो जाता है। साथ ही ढेर सारे और भी अनुप्रश्न उठते हैं, जिनका निवारण आवश्यक हो जाता है। जो प्रश्न हमारे हैं वही प्रश्न हमारे पूर्वजों के भी थे। जब जीवन की आपाधापी से कुछ समय निकाल कर अपने पूर्वजों के साथ बैठता हूँ तो दो भाव उमड़ते हैं। एक भाव होता है अगाध आदर का। अद्भुत मेधा, अद्भुत चिन्तन, अद्भुत उहा और विचारों का एक व्यवस्थित क्रम। दूसरा भाव होता है, आनन्द के अतिरेक में उनसे लिपट जाने का। गर्व होता है, मन करता है कि साँस रोके रहूँ और उस गर्वानुभूति को जाने ही न दूँ। प्रश्न घुमड़ते हैं, जब तक उत्तर नहीं पा जाता मन, अतृप्ति बनी रहती है। उत्तर पाते ही आनन्द की रेख पूरे अस्तित्व में तड़ित तरंगा सी समा जाती है।


उनके लिखे हुये में और हमारे समझे हुये में बस प्रत्यक्ष का अन्तर होता है। उन्होंने समस्त ज्ञान का प्रत्यक्ष किया होता है, एक प्रक्रिया में उतर कर। योग के सम्यक अनुपालन से और ध्यान, धारणा और समाधि से होते हुये जब तथ्य उद्भाषित होते हैं तब व्यक्त शब्द आप्त द्वारा प्रत्यक्ष किये गये ज्ञान की सामर्थ्य पा जाते हैं। हमें वही ज्ञान अनुमान से प्राप्त होता है और शब्द रूप में सहज उपलब्ध है। यही कारण है कि शाब्दिक ज्ञान जानने के बाद भी उसका मर्म समझने में हमें वर्षों लग जाते हैं। अनुभव बहुत कुछ सिखाता है, शब्दों में पड़ा ज्ञान, श्लोकों में निहित शिक्षा, सूत्रों में क्रमबद्ध पिरोया ज्ञान अपने आप को धीरे धीरे व्यक्त करने लगता है।


जीवन को जानने और समुचित निभाने के लिये ऊर्जा, साम्य, विकास और एकता की विमाओं को समझना आवश्यक है। किस प्राथमिकता और क्रम में ऊर्जा लगायी जाये, किस प्रकार विपरीतता में साम्य स्थापित किया जाये, किस प्रकार आवश्यक विकास लब्ध हो और अन्ततः किस प्रकार समग्रता से आन्तरिक और वाह्य विश्व में एकत्व संस्थापित किया जाये? पिछले ब्लाग में देखा कि भूत, भविष्य और वर्तमान में भटकता मन ऊर्जा खींचता है, पहले क्या कर्म निष्पादित हों? क्या धरें और क्या तजें? धरना भविष्य का द्योतक है, तजना भूत का, यथास्थिति वर्तमान की। किसको कितना महत्व दिया जाये कि सब संतुलित चले? तब संतुलन की स्थिति में किस प्रकार गति हो? तब किस प्रकार गतिमय जीवन के सम्बन्धों में तदात्म्य स्थापित हो, अन्य जीवों के साथ, प्रकृति के साथ, स्वयं की इन्द्रिय, मन, बुद्धि और आत्मा के साथ।


जब क्रिया का एक मात्र अवसर वर्तमान ही है, जो भी करना होगा वर्तमान में ही करना होगा। स्मृति भी वर्तमान के क्षण में आयेगी, कल्पना भी वर्तमान के क्षण ही आयेगी, ज्ञान भी वर्तमान में प्राप्त होगा और कर्म भी वर्तमान में ही सम्पादित होंगे। स्मृति और कल्पना के साथ न्याय करने के लिये ज्ञान आवश्यक है, आगे बढ़ने के लिये कर्म आवश्यक है। वर्तमान को सही प्रकार से निभाना जिसे आ गया, उसे जीवन जीने की कला का मर्म भी आ गया।


विकास क्रमिक है। समग्र में क्रमशः शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास। हर अंग का अपना क्रमिक विकास। स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ें, नीचे से ऊपर बढ़ें, वाह्य से अन्दर बढ़ें तो शारीरिक स्तर पर ही, सुरक्षा, प्रजनन, पाचन, संचालन, संप्रेषण, संतुलन से होते हुये स्थैर्य आता है। मानसिक स्तर पर इन्द्रिय सुख, प्रसन्नता, व्यापकता, समर्पित प्रेम, स्वतन्त्रता, शुद्धता होते हुये अस्तित्व की अनुभूति होती है। बौद्धिक स्तर पर स्थायित्व, रचनात्मकता, मौलिकता, सहृदयता, उन्मुक्त विचार, दृश्य चेतना से होते हुये एकता स्थापित होती है। इसी प्रकार आध्यात्मिक स्तर पर अस्मिता, उत्सुकता, विकास, समर्पण, विशिष्टता, प्रज्ञा के मार्ग से ऋतम्भरा प्रतिष्ठित होती है।


आपको यह तथ्य निश्चय ही रोचक लगेगा कि प्रत्येक अंगों के विकासक्रम में सात ही चरण दिये गये हैं। सात की यह अवधारणा जिसे मैंने सात जन्मों के प्रश्न से ढूढ़ने का प्रयास किया था और क्रमशः काल और मन की गति से सम्बद्ध करने का प्रयास किया था, वह अवधारणा सात ऊर्जा चक्रों में अपनी निष्पत्ति पा जाती है।


शरीर में सात ऊर्जा चक्र माने गये हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार। नाड़ियों की संरचना में तन्त्रिका तन्तुओं के संगमस्थल ऊर्जा के केन्द्र माने गये हैं। समग्रता और निर्बाध रूप से जीने के लिये आवश्यक है कि इनमें ऊर्जा प्रवाहित होनी चाहिये। जहाँ पर यह प्रवाह बाधित हो जाता है, हम अस्तित्व के उसी बिन्दु पर अटक जाते हैं, ऊपर नहीं बढ़ पाते हैं। न केवल ये चक्र हमारी मानसिक गति से सम्बद्ध हैं वरन काल से भी जुड़े हैं। किस समय किसको प्राथमिकता देनी है, साम्य का स्तर क्या हो, ऊपर कैसे बढ़े और अन्ततः एकत्व कैसे आये, इसका एक अद्भुत विवरण इस प्रकरण में मिलता है।


ऊर्जा, साम्य, विकास और एकता की यात्रा है, इन चक्रों में क्रमशः ऊपर बढ़ना। जानेंगे इसके विश्लेषित रहस्य अगले ब्लाग में।

29.6.21

सात जन्म - मन

 

मन है तो गति करेगा, स्वाभाविक है। कहाँ तक गति करेगा? जहाँ तक उसकी सामर्थ्य है। कब किस काल में रहेगा, क्या पता? क्यों नहीं हमें सारी स्मृतियाँ एक साथ याद आती हैं? क्यों नहीं हमारा सारा जीवनकृत्य स्मृतियों में परिणित हो जाता है? क्या वह कारण है जो स्मृति विशेष को आकर्षित करता है? क्या कुछ होता है उन घटनाओं में जो वे स्मृति बन इतने गहरे चिपक जाती हैं? और क्या होता है उन घटनाओं में जो होती तो विशेष हैं पर स्मृति में नहीं आती हैं या कहें कि काल में कवलित हो जाती हैं।


मन की गति विशिष्ट है। वह एक पल स्मृतियों में जीता है, दूसरे पल कल्पना में, तीसरे पल वर्तमान को समझता है और चौथे पल कर्म में ध्यानस्थ हो जाता है। विश्लेषण करें कि कितने समय किस काल में रहा मन? और जिस काल में भी रहा, अन्य कालों से कितना प्रभावित रहा मन? जब सुख और दुख उसी मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता से व्यक्त हों, जब मन की गति जीवन के दिशा और दशा बदलने में सक्षम हो, जब भविष्य अनिश्चित हो और निर्णय अंधकूप के निष्कर्षसम हों, तो मन की गति के आधारभूत नियम जानना आवश्यक हो जाता है। यदि हम दृष्टा हैं तो कौन मन की यह गति नियन्त्रित कर रहा है? यदि कोई और नियन्त्रण में है तो सुख और दुख हमारे भाग में क्यों?


बड़ा असहाय सा लगता है जब दृष्टा मन के आन्दोलनों को झेल रहा होता है। तब मन न जाने कौन सी स्मृति सामने लाकर रख दे और आपको पुनः भयग्रस्त कर दे। सफलता की निर्मल आस को पुरानी असफलता की निर्मम स्मृतियों से ध्वस्त कर दे। एक पुरानी चोट की स्मृति आपके वर्तमान को अतिसावधान कर जाये। स्मृति में पड़ा एक छल का प्रकरण स्वस्थ परिवेश के प्रति भी अविश्वास उत्पन्न कर दे।


यदि हम अपनी स्मृतियों से इतने बद्ध हैं, या इतने प्रभावित हैं, या इतने प्रताड़ित हैं, तो हम क्या वह हो पा रहे हैं जो हमें उस परिस्थिति में होना चाहिये? वर्तमान की स्मृतियों पर अतिनिर्भरता निश्चय ही भविष्य के लिये भी उचित नहीं है। यदि ऐसा है तो निश्चय ही हम एक पूर्वनिर्धारित जीवन जी रहे हैं। तब वह कल्पनाशीलता कहाँ से आयेगी। सृजन के साथ यह अन्याय होगा कि कल्पनाशीलता सुप्तप्राय हो जाये। तब क्या हम पशुवत नहीं हो जायेंगे?


कल्पनाशीलता के लिये आवश्यक है कि स्मृतियाँ बाधक न हों, अपितु साधक हों। स्मृतियों की अधिकता और प्रबलता दोनों ही बाधक होने की संभावना रखती हैं। साधक स्मृतियाँ प्रबल हों और बाधक निर्बल, तभी कल्पना प्रखर हो सकेगी। कल्पनाशीलता ही क्यों, वर्तमान में सामान्य रूप से कार्य करने के लिये भी स्मृतियों के उछाह का समुचित निस्तारण आवश्यक है।


तब एक सहज सा प्रश्न उठ सकता है कि अच्छा जीवन तो वह होता है जिसमें ढेर सी स्मृतियाँ हों। इसी मानसिकता में हम स्मृतियाँ बनाते रहते हैं, समेटते रहते हैं, इस तथ्य से सर्वथा अनभिज्ञ कि यही एक दिन बोझ बन जायेंगी, एक पग भी आगे नहीं बढ़ने देंगी, बद्ध कर लेंगी।


कभी कभी स्मृतियों की इस आधिपत्य से हम विद्रोह कर बैठते हैं। कष्टमय भूत को भुलाकर, मार्ग के विरुद्ध एक नये मार्ग पर हठ करके बढ़ जाते हैं। भूत से यह बलात विलगता आपको स्वतन्त्र करने के स्थान पर और भी क्षीण कर देती है। पहली इसलिये कि आप अपनी गति और मति के विरुद्ध जाते हैं जिससे आपको सामान्य से कहीं अधिक ऊर्जा लगती है, साथ ही आपका निर्मित आधार आपके काम नहीं आता है। दूसरी इसलिये कि भूत से बलात विलगता आपको अपने भूत से और भी बद्ध कर देती है।


जहाँ स्मृति का तांडव भय उत्पन्न करता है, आपको आवश्यकता से अधिक सावधान, संचय और उपक्रम एकत्र करने में लगा देता है, कल्पना का भी विषादपूर्ण योगदान कम नहीं है। कल्पना के द्वारा निर्मित आगत की आकृति और उसे पूर्ण करने की चिंता। भविष्य की चिंता में डूबा अस्तित्व व्यर्थ ही ऊर्जाहीन हो जाता है। आश्चर्य है कि यह दुख भूत के भय की तुलना में कई गुना होता है। जहाँ भूत में घटित घटना एक ही होती हैं, कल्पनाजनित संभावित भविष्य कई प्रकार के हो सकते हैं। हर संभावित भविष्य में जाकर उसे पूर्ण करने या न कर पाने की चिंता में हमारे द्वारा प्राप्त मानसिक दुख कई गुना बढ़ जाता है, शारीरिक पीड़ा के तुलना में तो सैकड़ों गुना। क्योंकि बहुत कुछ संभव है कि असफलता की संभावित परिस्थितियाँ आयें ही नहीं। 


भूत के भय और भविष्य की चिंता, दोनों ही मिलकर वर्तमान को अस्तव्यस्त करने की क्षमता रखते हैं। बहुधा हम जीवन इसी उठापटक में निकाल देते हैं और वर्तमान पर तनिक भी ध्यान नहीं देते हैं। वर्तमान पर क्षिप्त विक्षिप्त सी प्रतिक्रिया परिस्थितियों को और भी प्रतिकूल कर देती है और तब लगता है कि जीवन में सब कुछ हमारे नियन्त्रण से बाहर चला गया।


वर्तमान हमारे लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण है। स्मृति में कोई घटना जायेगी कि नहीं इसका निर्धारण वर्तमान से ही होगा। भविष्य पीड़ासित होगा कि नहीं, इसका भी निर्धारण वर्तमान से होगा। इस तथ्य के विपरीत हम वर्तमान को दोनों ही ओर से खो देते हैं। संभवतः यही हमारे जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना है।


भूत, भविष्य और वर्तमान को साधने का क्रम अत्यन्त रोचक है। ऊर्जा, साम्य और एकता के पथ पर सध कर जाना पड़ता है। जानेंगे अगले ब्लाग में। 

26.6.21

जन्म अयोध्या पाते राम

 

आकांक्षा बन आते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम।


दशरथ नृप हितरत कर्मलीन,

पालित जन सुतवत सुख नवीन,

हा! रहे स्वयं पर पुत्रहीन,

हा! आगत क्या आश्रय विहीन?

रामराज्य उत्कर्ष निभाने, दशरथ के घर आते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।१।।


कौशल्या का रहा व्यस्त मन,

जगें राम, जागें सुख के क्षण,

प्रमुदित दिनभर निशा विगतश्रम,

मन्थर गति बढ़ता पालन क्रम,

मन्त्रमुग्ध माँ कौशल्या को, ठुमुक ठुमुक हरषाते राम।

जन्म अयोध्या पाते राम ।।२।।


काकभुसुण्डि बने छत प्रस्तर,

युगों प्रतीक्षा, भजन निरन्तर,

एक दृश्य बस पूर्ण हृदय भर,

विहग बाँह दौड़ें करुणाकर,

अथक चक्र, तकते आनन्दित, जब जब धरती आते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।३।।


विश्वामित्र हृदय नित चिन्तन, 

मख, भविष्य का सुनते क्रन्दन,

अस्त्र शस्त्र कर किसको अर्पण, 

बन पाये जो असुर निकन्दन,

अनुज सहित निर्भय तत्पर हो, गाधिपुत्र-पथ जाते राम, 

जन्म अयोध्या पाते राम ।।४।।


गौतम नारी, छलित अहल्या,

त्यक्त और अभिशप्त दंश पा,

एकल पथ पर चले विपथगा,

नयन काष्ठवत, दृश्य द्वार का,

युगों रही शापित जड़वत जो, दुर्लभ मुक्ति दिलाते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।५।।


जनक चित्त झकझोरे चिन्ता,

वीरहीन जग, करी प्रतिज्ञा,

बिटिया के सम, वरण उसी का,

ताने शिवसायक प्रत्यन्चा,  

जनकसुता आश्रय, कर गहने, हर्षित मिथिला जाते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।६।।


कैकेयी के दो वर घातक,

निर्गत किस मति शब्द विनाशक,

दशरथ ध्वस्त पड़े पीड़ांतक,

रीति रहे या प्रीति प्रकाशक, 

वन जाने को प्रस्तुत होते, रघुकुल मान बढ़ाते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।७।।


हा! निषाद मन दुख अपार यह,

विकट काल निर्मम प्रहार यह,

वन कष्टों को किस प्रकार सह,

रहे उमड़ता दुर्विचार यह,

चित्रकूट तक साथ लिवाते, जाते गले लगाते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।८।।


भरत विदग्ध, नहीं बस में मन,

आत्मग्लानि लज्जा सम्मुख जन,

पिता स्वर्ग में, राम गये वन,

माता, यह सब तब किस कारण,

चित्रकूट स्थिर कर देते, भरत सहज समझाते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।९।।


शबरी देखे प्रेम पगी सी,

दृष्टि राममुख, मुग्ध खगी सी,

सुख सागर के तट ठिठकी सी,

क्या न भर लूँ, रही ठगी सी,

जूठें बेर हाथ ले खाते, शेष विश्व बिसराते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।१०।।


हनुमत हृदय धरे करुणाकर,

कब से करें प्रतीक्षा पथ पर,

स्वामी हित नित विकट रूप धर,

शत्रु पक्ष बरसे प्रलयंकर,

हेतु सेतु आश्वासित सीता, सुत हनुमत अपनाते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।११।।


बालि अनुज सुग्रीव प्रताड़ित,

राज, मान, भार्या, हित वंचित,

भागे, नापे विश्व चतुर्दिक,

ऋष्यमूक पर रहे सुरक्षित,

मित्रधर्म के मानक रचते, अपहृत सकल दिलाते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।१२।।


व्यथित विभीषण, भ्राता मदमत,

नहीं कहीं कुछ भी विधि सम्मत,

दुर्मति सियाहरण अति विकृत,

अपमानित हत, प्रनतपाल नत,

सौंप विजित साम्राज्य विभीषण, धर्म ध्वजा फहराते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।१३।।


रावण भीषण, प्रकट दम्भ था,

पथ अधर्मगत, बल प्रचण्ड पा,

आर्त उच्चरित, करुण क्रन्द हा!

त्रास हरे भय विकल वृन्द का,

अधम पतित गर्वित मुण्डों पर, विशिख वृष्टि बरसाते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।१४।।


माता बैठी सगुन मनावे,

काग बतावे, सुत-सुधि लावे,

वर्ष चतुर्दश प्यास बुझावे,

सोहति मूरति अँखियन आवे,

सब मन साधे, सबहिं विराजे, अवधपुरी आ जाते राम,

जन्म अयोध्या पाते राम ।।१५।।