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13.7.21

सात चक्र - व्यवहार


योगसूत्र और गीता में योग की तीन परिभाषायें मिलती हैं।

  1. योगः चित्तवृत्ति निरोधः (योगसूत्र १.२)- योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
  2. समत्वं योग उच्यते (गीता २.४८) - समत्व योग कहलाता है।
  3. योगः कर्मषु कौशलम् (गीता २.५०) - योग कर्मों में कुशलता है।


इसके अतिरिक्त सांख्यदर्शन “पुरुष का प्रकृति से स्वयं को पृथक कर अपने स्वरूप में स्थित होने” को योग कहता है। यह परिभाषा “तब दृष्टा अपने स्वरूप में अवस्थित होता है (तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् - योगसूत्र १.३)” के जैसी ही है। बस प्रकृति से पुरुष(दृष्टा, स्वयं) को पृथक करने की विधि “चित्त की वृत्तियों का निरोध” है। अपने स्वरूप में स्थित होने के बाद आत्मा की क्या स्थिति होती है, उस पर योगसूत्र मौन है। यद्यपि गीता उस स्थिति का भी वर्णन करती है पर वह प्रकरण वर्तमान विषय की परिधि के बाहर है।


उपरोक्त तीन कथन हमें योगपथ पर जीवन निर्वाह करने की विधि बताते हैं। प्रथम कथन उस स्थिति को बताता है जहाँ पर आपको पहुँचना है, वह साध्य है। द्वितीय कथन उस समत्व मनःस्थिति को बताता है जिसमें रह कर साध्य तक पहुँचना है। तृतीय कथन उस मनःस्थिति में किये कर्मों के परिणाम को बताता है, कुशलता को परिभाषित करता है।  तीनों ही कथन एक दूसरे से भिन्न नहीं है। जहाँ प्रथम कथन योग का सैद्धान्तिक पक्ष बताता है, शेष दो कथन योग के व्यवहारिक पक्ष को स्पष्ट करते हैं। समुचित मनःस्थिति से कर्मों में कुशलता आयेगी और दोनों अन्ततः चित्त की वृत्तियों के निरोध में सहायक होंगे।


तीनों कथनों के परस्पर सम्बन्धों का विश्लेषण अत्यन्त रोचक है। पहला तो एक स्पष्ट संदेश है कि कर्मों में प्रवृत्त होना ही पड़ेगा। “सकल पदारथ है जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।” बिना कर्म किये मन की अवस्थाओं को निष्पत्ति नहीं मिलेगी। योगपथ पर पलायन की मानसिकता स्वीकार्य नहीं है, वर्तमान का सामना करना होगा, स्मृतियों और कल्पना को भी निभाना होगा, ज्ञान प्राप्त करना होगा और कर्म में प्रवृत्त भी होना होगा।


योग जहाँ एक ओर कर्मों में प्रवृत्त होने के लिये उकसा रहा है वहीं दूसरी ओर उनमें पसर जाने के लिये मना भी कर रहा है। कर्म करिये पर निस्पृह भाव से, सम्यक ज्ञान पाकर, राग-द्वेष के बिना, ममत्व के भाव से विलग और स्वयं को असीमित और कालातीत मानकर। बिना इसके समत्व कहाँ से आयेगा? “शीतोष्ण सुखदुःखदा”, सुख दुख को शीत और ऊष्ण सा ग्रहण करने का भाव, उसी प्रकार सहन करने का भाव। जिस प्रकार हम अत्यधिक सर्दी और गर्मी से विचलित नहीं होते, सहते हैं और अपने कार्यों में लगे रहते हैं, ठीक उसी प्रकार कर्म करने को कहती है गीता। बिना समत्व के कर्मों में कुशलता नहीं आती, संतुलन आवश्यक है। विचलित न हो जायें, निर्णय प्रक्रिया प्रभावित न हो जाये, उसके लिये दृढ़ होना आवश्यक है। बिना सहे, बिना अभ्यास किये, बिना दृढ़ हुये समत्व कहाँ से आयेगा?


योग की व्याख्या में जायेंगे तो वैज्ञानिक रूप से इस प्रक्रिया को समझाया गया है, पर वह उसका सैद्धान्तिक पक्ष है, गीता उसे कर्म में अनुवादित कर उसका व्यवहारिक पक्ष बताती है। योग के अनुसार कोई भी कर्म या विचार अपनी छाप छोड़ जाता है, इसे संस्कार कहते हैं। यह संस्कार कितने गहरे और व्यापक हैं, यह इस पर निर्भर करेगा कि आपने किस संलग्नता और संलिप्तता से उसे निष्पादित किया है। वह आपका अंग बन जाते हैं और आपके भविष्य को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। वह आपके चिन्तन का अंग बन जाते हैं और स्मृति में आने का अधिकार रखते हैं। यथोचित वातावरण में वे संस्कार प्रकट हो जाते हैं। बचपन में मिले अच्छे संस्कार बड़े बड़े प्रलोभनों से बचा लेते हैं, भटकने से बचा लेते हैं। वहीं दूसरी ओर कुसंगति में मिले बुरे संस्कार पापकर्म में प्रवृत्त कर देते हैं।


योग में साध्य स्थिति में पहुँचने के लिये सारे संस्कार क्षीण होना आवश्यक है, अच्छे और बुरे दोनों ही। यदि ऐसा नहीं होता है तो चित्त में वृत्तियाँ उत्पन्न होंगी और आप कर्म में प्रवृत्त होंगे। यदि मान लिया कि समत्व भाव में रहने से नये संस्कार नहीं बन रहे हैं, पर उन संस्कारों का क्या, जो जन्म जन्मान्तर से हमारे सूक्ष्म शरीर में चिपके हैं और हमारे जन्मों का कारण हैं? योग के अनुसार ऋतम्भरा की स्थिति में पहुँचने से उन सारे कर्मबन्धनों का स्वतः ही नाश हो जाता है और हम मुक्त हो जाते हैं। उस समय हम कैवल्य की स्थिति में पहुँच जाते हैं, कैवल्य इसलिये कि उस समय हमारे पास भूत का कोई भार नहीं होता है, हम अपने स्व में स्थित होते हैं।


गीता योग के इसी सिद्धान्त के व्यवहारिक पक्ष को समझाती है। कृष्ण को योगेश्वर इसीलिये कहा जाता है कि उन्हें योग की सूक्ष्मताओं में एक सिद्धहस्तता थी। जीवन में, समाज में, व्यवहार में कैसे योग निभायें, उसे बड़े ही सरल, सुग्राह्य और स्पष्ट रूप से व्याख्यायित करती है गीता। योगसूत्र के सिद्धान्त समझने के बाद गीता पढ़ना आवश्यक है। भक्ति, ज्ञान और कर्ममार्ग की भिन्नता और एकता, दोनों में ही व्यवहारिक सारल्य दिखाती है गीता। कर्मफल के साथ क्या करना है, क्यों करना है, कैसे करना है, किस भाव से करना है? कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म कैसे देखना है? दृष्टिभेद से किस प्रकार सृष्टिभेद हो जाता है? न जाने कितनी गहन सूक्ष्मताओं से भरी है गीता। हर बार पढ़िये और जितनी सामर्थ्य हो, जितनी मन की चेतना हो, उतने रत्न निकाल लाइये।


इस परिप्रक्ष्य में मेरा अनुभव और मेरी प्रार्थना यही है कि योगसूत्र और गीता को साथ साथ पढ़ा जाये। योग के सैद्धान्तिक और व्यवहारिक पक्ष को साथ साथ समझा जाये। कर्म, ज्ञान और भक्ति को साथ साथ जिया जाये। दृष्टि और सृष्टि के साम्य को सकल विश्व के साथ निभाया जाये।


सात चक्रों में बढ़ने के लिये, काल की कलाओं को समझने के लिये, स्मृति और कल्पना में साम्य बिठाने के लिये, गीता को आत्मसात करने की आवश्यकता है, अपने अनुसार व्यवहार में लाने की आवश्यकता है, प्रक्रियागत सरलीकरण की आवश्यकता है। प्रक्रिया के कुछ पक्ष समझेंगे अगले ब्लाग में।

8.7.21

सात चक्र - प्रक्रिया

 

ऊर्जा के चक्रों में क्रमिक गतिमय होना कोई क्षणिक उपलब्धि नहीं है, इसके लिये निश्चित रूप से एक प्रक्रिया में निहित हो क्रमशः बढ़ना पड़ता है। अपने स्वरूप में स्थित हो, शरीर, मन और काल के आवरण से विमुक्त, अपने आराध्य की चेतना से जुड़ जाना योग है। योग को समझने के लिये दो ग्रन्थ पढ़ने आवश्यक हैं, योगसूत्र और भगवद्गीता। जहाँ योगसूत्र में विषय को एक व्यवस्थित क्रम देते हुये संक्षिप्त किया गया है और प्रक्रिया को बौद्धिक आधार दिया गया है वहीं भगवद्गीता में उसके व्यवहारिक पक्षों को विस्तार से व्यक्त किया गया है। तुलना की जाये और लगभग चार सूत्रों को एक श्लोक के बराबर रखा जाये तो भगवद्गीता का आकार योगसूत्र का लगभग १५ गुना होगा। यह होने पर भी योगसूत्र में कोई भी सिद्धान्त न्यून नहीं है और भगवद्गीता में कोई भी व्याख्या योगसूत्र से असम्बद्ध नहीं है।


पहले भगवद्गीता पढ़ी। उस समय आत्मा, कर्म, जन्म आदि के न जाने कितने सिद्धान्त समझ में आये पर कई प्रकार के योगों का वर्णन मन दिग्भ्रमित कर गया। जब कई मार्ग दिये हो, कई भेद वर्णित हों तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इसमें आपके लिये कौन सा है? लगा कि पढ़ते पढ़ते एक चौराहे पर पहुँच गये और जब तब अपनी प्रकृति का ज्ञान नहीं होगा तब तक पता नहीं चलेगा कि कौन सा मार्ग अपनाना है? अनुभवहीनता के उस प्रारम्भिक काल में यह एक कारण रहा कि प्रगति गतिमय नहीं रही। आपको अपनी प्रकृति कौन बतायेगा? आयुर्वेद को ही देखें तो समुचित दिनचर्या, ऋतुचर्या और जीवनचर्या अपनाने के लिये आपको यह जानना आवश्यक हो जाता है कि आपकी प्रकृति कफ है, या पित्त, या वात? जानना कठिन होता है पर शरीर, मन आदि के लक्षणों से अपनी प्रकृति समझ आ जाती है।


कौन से योग में प्रवृत्त हों, यह जानना और भी कठिन है। भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, राजयोग, निष्कामयोग आदि, इनमें कौन सा मार्ग अपनायें? बिना स्वयं को जाने किस मार्ग में प्रवृत्त हो जायें? यह यक्ष प्रश्न सदा ही सामने उपस्थित रहा। कभी कभी अध्ययनकाल में जब कठिन प्रश्न सामने रहता था तो बहुधा मन नैराश्य से उटच जाता था। पर नैराश्य भी अधिक समय तक नहीं टिकता था, जैसे ही तनिक ऊर्जा आती थी, नया विचार कौंधता था पुनः उस प्रश्न से जूझने का मन बन जाता था। प्रवृत्ति-निवृत्ति के इस असमञ्जस में युवावस्था का पर्याप्त समय निकल गया।


कभी अपनी मेधा पर विश्वास होता था और लगता था कि ज्ञानयोगी बन सकते हैं। कभी अत्यधिक उछाह और ऊर्जा कर्मयोग में प्रवृत्त कर देती थी। कभी अनुराग होता था तो कभी वैराग्य। कभी असहायता और आश्रयता प्रबल हो जाती थी और भक्तियोग के अतिरिक्त कोई और मार्ग नहीं समझ आता था। विकल्पों के न जाने कितने हिचकोले खाकर वर्षों बाद भी वहीं का वहीं मिलता था जीवन। यह तो समझ आ गया था कि संशय स्वयं की समझ में है, सिद्धान्त में नहीं। पंथ एक ही है, तीन नहीं। व्यक्ति की क्षमता के अनुसार, काल या परिस्थिति के अनुसार कुछ भेद अवश्य है जो समझ नहीं आ रहा था।


जीवन तात्कालिकताओं में व्यस्त हो गया। जब समय मिला तो पुनः अभिरुचि जागृत हुयी। गीता पढ़ी, कुछ नयी दृष्टि प्राप्त हुयी पर उपरोक्त विषय में स्पष्टता नहीं आयी। यह दैवयोग ही कहा जायेगा कि उस दिन मुख्यालय में एक बैठक समय के पहले ही सम्पन्न हो गयी, समय था पर पढ़ने के लिये कोई पुस्तक नहीं थी। गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर गीताप्रेस के स्टाल के सामने पठनीय सामग्री ढूढ़ रहा था कि पतंजलि योगसूत्र की पतली सी पुस्तक पर दृष्टि पड़ी। पढ़ना प्रारम्भ किया और वापस घर (बनारस) पहुँचते पहुँचते एक बार पढ़ना हो गया, हिन्दी अनुवाद के साथ। एक अद्भुत आनन्द आया, ज्ञान की सहज स्पष्टता पर। 


इसके पहले अन्य भारतीयों की भाँति अपनी संस्कृति के बारे में पढ़ा अवश्य था, गर्व भी था पर कोई यदि गहरे प्रश्न कर बैठे तो उसका उत्तर नहीं था। यद्यपि शास्त्र मूल रूप से पढ़े नहीं थे, कुछ एक को छोड़कर। जो पढ़े थे, वह भी हिन्दी अनुवाद तक सीमित थे। कुल मिलाकर जो ज्ञान था वह अत्यन्त सीमित और परिधि पर ही रहने वाला था। भीतर जाने का न कभी प्रयत्न नहीं किया था और कोई खींच ले तो उस पर चर्चा करने का आत्मविश्वास भी नहीं था।


पता नहीं क्यों पर उस दिन योग के सूत्र मस्तिष्क में एक के बाद एक उतरते चले गये। अगले एक माह में वह पुस्तक दो बार और पढ़ी। मन नहीं भरा, तब संस्कृत का एक एक सूत्र समझ कर पुनः पढ़ी। तब लगने लगा कि मेरी वर्षों की प्रतीक्षा, अधर में लटके संशय को इस प्रकार ही निष्पत्ति मिलनी थी। जिस समय योग के सूत्र पढ़े उस समय गीता के श्लोक सहायक रहे। आनन्द तब आया जब योगसूत्र की प्रारम्भिक समझ के बाद गीता पढ़ना प्रारम्भ किया। ऐसा लगा कि हाथ में कोई चाभी है और जिससे एक एक श्लोक के रहस्य स्वतः खुलते जा रहे हैं।


पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा हुआ कि गीता का पारायण करने वाले अन्य साधकों के साथ भी ऐसा होता है। आजकल प्रबन्धन के प्रशिक्षण में गूढ़ तत्वों को समझने के लिये एक विशेष समस्या को उदाहरण के रूप में लेते हैं और उसे प्रबन्धन के सिद्धान्तों के माध्यम से सुलझाते हैं। स्थिति विशेष में प्रयुक्त होने से सिद्धान्त स्पष्ट होते जाते हैं। मुझे लगता है कि गीता में पतंजलि योगसूत्र के सारे के सारे सिद्धान्तों का प्रयोग बताया है। जिस समस्या पर सिद्धान्त प्रयुक्त हुये हैं, अर्जुन के समान दिग्भ्रम लगभग सभी के जीवन में आते हैं। योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन की समस्या के उदाहरण से योगसूत्र के सिद्धान्तों को स्पष्ट कर दिया है।


योगसूत्र और गीता को परस्पर परिप्रेक्ष्य में समझना एक अद्भुत अनुभव रहा है। सैद्धान्तिक पक्ष स्पष्ट होने से उन पर व्यवहार करना सरल हो गया है। अभ्यास और वैराग्य पर आधारित इस समझ को पूर्व में एक ब्लाग श्रृंखला के माध्यम से व्यक्त किया था। हर बार पढ़ने से वही शब्द और गहरे जाकर पैठ जाते हैं।


मन से सम्बन्धित योग के व्यवहारिक पक्ष अगले ब्लाग में।

31.8.19

अभ्यास और वैराग्य - ४

योग एक प्रायोगिक प्रक्रिया है और भगवतगीता योग की व्याख्या प्रायोगिक दृष्टिकोण से करती है। कर्तव्य, आत्मा, स्थितिप्रज्ञ, कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि न जाने कितने विषय हैं जिन पर कृष्ण अर्जुन के भ्रम दूर करते हैं। आधुनिक अभिभावकों द्वारा गीता आदि शास्त्रों का अध्ययन न करने देने के पीछे एक बड़ा भ्रम और भय यह भी है कि इसे पढ़कर कोई सब कुछ त्याग कर सन्यासी न हो जाये। हास्यास्पद ही है कि जिस ग्रन्थ का निष्कर्ष निराश अर्जुन को युद्ध करने के लिये प्रेरित करना था वह कर्मरहित सन्यास के बारे में कैसे उपदेशित कर सकता है।

योग का सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि यह पलायनवादियों को कर्म हेतु प्रेरित करता है। वैराग्य के पहले अभ्यास आता है। अभ्यास और वैराग्य साथ साथ चलते हैं, एक संतुलन के साथ। बिना वैराग्य के अभ्यास दिशाहीन होता है और बिना अभ्यास के वैराग्य आधारहीन। वैशेषिक दर्शन में भी दो ध्येय माने गये हैं, अभ्युदय और निःश्रेयस। अभ्युदय भौतिक उन्नति है और निःश्रेयस वह श्रेष्ठता जिसके पश्चात कुछ और पाना शेष नहीं रहता है। यदि इन्हें चारों पुरुषार्थों में समझा जाये तो अभ्युदय धर्म पोषित अर्थ व काम है और निःश्रेयस मोक्ष है। अभ्युदय ही निःश्रेयस की भूमि है और निःश्रेयस की छाया में अभ्युदय सम्यक रूप से रह पाता है। दोनों एक दूसरे पर आश्रित है, भोग व अपवर्ग के समान ही। 

वैशेषिक पर चर्चा फिर कभी पर एक बात तो निश्चित रूप से सत्य है कि भारतीय दर्शन न तो कर्तव्यों से भागना सिखाता है और न ही सन्यास या वैराग्य के नाम पर कर्महीनता को पोषित या प्रेरित करता है। ईशोवास्योपनिषद से प्रेरित भारतीय मानस तो तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा पर आस्था रखता है, त्यागपूर्वक भोग। आश्चर्य होता है कि जिन सिद्धान्तों को हम सामान्य रूप से परस्पर विरोधी मानते हैं, वे सह अस्तित्व में कैसे रह लेते हैं। हम आगे देखेगें कि अभ्यास और वैराग्य भी एक स्तर पर एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं, पर योग के दिशापटल पर एक दूसरे के पूरक सिद्ध होते हैं।

कार्य होने पर उन्माद और कार्य न होने पर विषाद। इस प्रकार का ‘निष्कर्ष चिन्तन’ कार्य के प्रति हमारे निष्पक्ष प्रयासों में संशय उत्पन्न करता है। अत्यधिक लगाव के बाद जब कार्य नहीं होता है तो दुख भी अत्यधिक होता है, पर बिना लगाव के कार्य होता भी तो नहीं है। पुनः विरोधी सिद्धान्त। इन दोनों में संतुलन का भाव उत्पन्न कर पाना ही समत्व है, योग है। कृष्ण कहते भी हैं कि समत्वं योग उच्यते (२.४८) - कार्य होने या न होने में सम भाव ही समत्व कहलाता है।। योगः कर्मसु कौशलम् (२.५०) - योग कर्मों में कुशलता है। योग निश्चय ही हमें कर्म में प्रेरित होने को कहता है, पर संतुलित मनःस्थिति के साथ या यदि योग की भाषा में कहा जाये तो स्थितिप्रज्ञता के साथ।

श्रीकृष्ण निश्चय ही लीलारूप थे, अवतारपुरुष थे, पर इस महिमामण्डन में हम उस पक्ष को उपेक्षित कर जाते हैं जिसने जनमानस को सर्वाधिक प्रभावित किया। भक्ति के भाव में हम अतिरेक बह जाते हैं और उनके गुणों को देख ही नहीं पाते हैं। मेरी दृष्टि में श्रीकृष्ण का महानतम उपहार योग को जनसामान्य और कर्मसामान्य में ढाल कर प्रस्तुत करना है। सुनने में और पढ़ने में, भाषा की दृष्टि से भगवतगीता सरलतम ग्रन्थों में से एक है। सरल शैली में योग जैसे जटिल विषय को जिस कुशलता से रखा गया है, वह अद्वितीय है, कृष्ण जैसे योग के महापुरोधा द्वारा ही संभव है। गीता सबको अपने तरह से समझ आती है और संभवतः वे सारे पंथ अपने निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। यही कारण है कि गीता में जितने श्लोक नहीं हैं, उससे अधिक उसकी टीकायें हैं।

योग घर के एकान्त में कुछ समय बिताने वाली प्रातःचर्या नहीं है, यह जीवन को अद्भुत बनाने की कला है। हर कर्म में जब योग झलकने लगता है, सारे व्यक्तित्व में तब आनन्द छलकने लगता है। योग का आयाम श्रीकृष्ण के अपने जीवन में चतुर्दिक परिलक्षित था। स्नेह और बिछोह, ममत्व और समत्व, अभ्यास और वैराग्य। श्रीकृष्ण ने जीवन को जिस प्रवाह रूप में जिया, योगमार्गियों को उससे अधिक अनुकरणीय और भला क्या हो सकता है। कर्मसु कौशलम् और समत्वं का और बड़ा उदाहरण भला कौन हो सकता है। जो विषय हम भावनाओं में जीते हैं और बद्ध पड़े रहते हैं, उन्हीं विषयों में कृष्ण के निर्णय स्पष्ट छाप लिये रहते हैं, सबको झंकृत कर देते हैं। चाहे मथुरा छोड़कर द्वारका बसाना हो या कौरवों के महारथियों को महागति तक पहुँचाना हो। हम अच्छे बने रहने की बाध्यता में कष्ट सहते रहते हैं, पर कृष्ण की दृष्टि अपनाने से सब सहज हो जाता है, सब प्रवाहमय हो जाता है। यही तो योग की दृष्टि है।

अगले ब्लाग में अभ्यास और वैराग्य से संबंधित ४ सूत्र।