30.10.10

नगर भ्रमण

छोटे नगरों का चरित्र भी उस एक अकेली सड़क जैसा सम्यक होता है जिसके किनारे वह बसा होता है। छोटा नगर, सीमित आवश्यकताये, सरल जीवन शैली। एक सड़क पकड़ लीजिये, बायें या दायें मुड़ जाईये और पहुँच गये आप अपने गन्तव्य तक। बड़े नगर में सड़कों का जाल बिछा रहता है और उसी से मेल खाता जीवन और अनुभवों का उलझाव।

बंगलोर जैसे बड़े नगर में एक छोर से दूसरे छोर पहुँचने में दो घंटे  तक का समय लग जाता है। वैसे तो मुख्य सड़क से ही चलना श्रेयस्कर होता है, आप रास्ता नहीं भूल सकते हैं। जब मुख्य सड़कें रास्ता न भूलने वालों से भर जाती हैं और पूरा यातायात कछुये की गति पकड़ लेता है तब उन मुख्य सड़कों को जोड़ने वाली उपसड़कें बहुत काम आती हैं। सड़क-जाल के ज्ञाता ड्राइवर उस समय अपना प्रवाह उपसड़कों पर मोड़ लेते हैं और नगरीय चक्रव्यूह भेदते हुये गन्तव्य तक पहुँच जाते हैं। सभी मुख्य सड़कें एक-मार्गी हैं पर उपसड़कें द्विमार्गी हैं।

हमारे ड्राइवर महोदय जब वाहन चलाते हैं तो उनके मन में कितनी गणनायें चलती रहती हैं, इसका अनुमान नहीं होता है हमें। सामने का धीरे बढ़ता यातायात, अगला यातायात सिग्नल कहाँ आयेगा, पहली वह सड़क जहाँ से मुड़ा जा सकता है उपसड़कों पर, एक-मार्गी रास्तों का ज्ञान और मस्तिष्क में बसा पूरे बंगलोर का मानचित्र, इन सबके सुसंयोग ने कभी विलम्बित नहीं होने दिया हमें, अभी तक।

एक बार जब न रहा गया तो हम पूछ बैठे कि इतने रास्ते कैसे याद रह पाते हैं, इतने बड़े बंगलोर में। जो वाहन अधिक चलाते हैं, उनके उत्तर भिन्न हो सकते हैं पर यह उत्तर वैज्ञानिक लगा। मोड़ पर बने भवनों का एक चित्र सा बना रहता है मन में, उसी से दिशा मिलती रहती है। किन्ही और चिन्हों की आवश्यकता ही नहीं है। बहुत समय तक तो यह विधि सुचारु चली पर पिछले कुछ वर्षों से समस्या आ रही है। कारण उन कोनों के भवनों का पूर्ण कायाकल्प या उनके स्थान पर किसी और ऊँचे भवन का निर्माण हो जाना है। जिस गति से बंगलोर का विकास या निर्माण कार्य हो रहा है, यह भ्रम संभव है।

बहुत दिनों के बाद वाहन-कला का एक और गुण समझ में आया कि उस रास्ते से तीव्रतम पहुँचा जा सकता है जिस पर कम से कम यातायात सिग्नल मिलें। कैसे यातायात सिग्नलों को छकाते हुये, उपसड़कों में घूमा जा सकता है, यह बड़ा रुचिकर प्रकल्प हो सकता है।

कभी कभी जब यातायात धीरे धीरे बढ़ता है और उपसड़कों की सम्भावना भी नहीं रहती है तो किस प्रकार से विभिन्न लेन बदलकर बहुमूल्य एक घंटा बचाया जा सकता है, यह कर दिखाना भी एक कला है। इस कलाकारी से कई बार समय बचा कर सार्थक कार्यों में लगाया गया है।

गाने चलते रहते हैं, कभी किशोर, कभी मुकेश, कभी रफी या कभी नये। अवलोकन के क्रम को थोड़ा विश्राम मिल जाता है संगीत से।

छोटे नगर के भ्रमण में भला कहाँ से मिल पायेगा इतना अनुभव। नगर भ्रमण जब एक पोस्ट में नहीं सिमट पाया तो अन्य अनुभव तो अध्यायवत हो जायेंगे बड़े नगरों में।

27.10.10

अब अपने कपड़े धोना है

किसी से आपको अपने शारीरिक बल की तुलना करनी है, उसके द्वारा निचोड़े कपड़े को निचोड़ें, यदि कुछ जल निकले तो जान लीजिये कि आपका बल अधिक है। बचपन में यह एक साधन रहता था खेल का और बल नापने का। कुछ दिन पहले पुत्र महोदय को हमसे शक्ति प्रदर्शन की सूझी तो यह प्रकरण याद आया, साथ ही यह भी याद आया कि पहले अपने कपड़े हम स्वयं ही धोते थे।

स्वयं नहाना सीखने के कुछ दिन बाद ही हाथ में पहलवान साबुन हुआ करता था और अपने छोटे वस्त्रों को धोने का उत्तरदायित्व भी। नहाने के पहले बनियाइन, शर्ट, हॉफ पैण्ट और नहाने के बाद शेष वस्त्र। हाथों का व्यायाम, शीतल जल से स्नान और अन्त में बल परीक्षण। वस्त्र भी इतना प्यार पा प्रसन्न, उसी दिन सूख कर अगले दिन शरीर ढक लेने को प्रस्तुत। दो जोड़ी वस्त्रों में कटता, बढ़ता जीवन। अतिरिक्त वस्त्र वर्षा या अन्य अवसरों में ही प्रयोग में आ पाते थे।

छात्रावास में सारे कपड़ों को बाहर से धुलवाने की सुविधा थी पर धुलाई का पैसा बचाने के लिये, कम वस्त्रों से काम चलाने के लिये और शरीर का स्वास्थ्य बनाने के लिये कपड़ों से हमारा आत्मीय सम्बन्ध बना रहा। चद्दरें ही दी जाती थीं धुलने के लिये पर यदि रौ में आ जाते तो किसी रविवार को उनको भी धो डालने का उत्साह था हम लोगों में। हम मित्रों के लिये कपड़े धोते धोते लन्तरानी मारने का समय सबसे आनन्द देने वाला होता था, वहाँ अनुशासन की बयार नहीं पहुँच पाती थी। आई आई टी में भी हम अपनी मस्ती में अपने कपड़े धोते रहे, किसी उपसंस्कृति में बहे बिना।

विवाह कुछ पाने और बहुत कुछ खो जाने का नाम है। जहाँ एक ओर कपड़ों के प्रति हमारी आत्मीयता का गला घोंट कर उसे वाशिंग मशीन में डाल दिया गया वहीं दूसरी ओर रहा सहा समय नौकरी खा गयी। व्यस्तता और सुख के नाम पर उन लघु-विनोदों की तिलांजलि दे बैठे हम। अब तो वॉशिंग मशीन के अन्दर, कभी हमारे हाथों का स्नेह-स्पर्श पाये कपड़े, अनमने से धुलते और निचुड़ते रहते हैं। कपड़े की संख्या बढ़ जाने से, उनके प्रति रही सही आत्मीयता भी बँट गयी।

बंगलोर में अब कपड़ों की धुलाई एक बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है। स्वयं अपने हाथों से धोने की बात तो दूर, आई टी के महाशयों के पास इतना भी समय नहीं है कि वाशिंग मशीन में ही धोकर प्रेस कर लें। सुबह पति देव निकलते हैं, पत्नी, बच्चे, कपड़े और समान की सूची लेकर। सबको एक एक कर छोड़ते हुये और सायं पुनः सबको एक एक कर लेते हुये।

बंगलोर में कार्यरत विलेज लॉन्ड्री सर्विस के सर्वेसर्वा और भारतीय प्रबंधन संस्थान से निकले श्री अक्षय मेहरा से जब इस क्षेत्र की संभावनायें सुनी तो गांधी और विनोबा जैसे नेताओं को न पालन करने वाले महान जन समूह की शक्ति और उस पर आधारित अर्थतन्त्र का आभास हुआ। वर्धा के आश्रमों की अपना कार्य स्वयं करने की परम्परा बंगलोर में ढहती दिखी।

अभी कुछ दिन पहले रेलवे के कार्य से एक कपड़े धोने वाली कम्पनी में गया, अन्तर्राष्ट्रीय मानकों और गुणवत्ता को पछाड़ती उस कम्पनी में एक शर्ट की धुलाई 200 रु में होती है। मेरे बचपन का कार्य जब इतना मँहगा हो गया है तो सोचता हूँ कि अपने कपड़े अब ढंग से धोऊँ अन्तर्राष्ट्रीय मानकों से और अपने शारीरिक और आर्थिक स्वास्थ्य को एक और अवसर प्रदान करूँ।

23.10.10

वर्धित सर्वम् स वर्धा – 3

कभी कल्पना करता हूँ कि जीवन में यदि एक स्थान पर ही रहा होता तो कितना कम जान पाता समाज को, देश को, मानवता को। पुस्तकें बहुत कुछ सिखाती हैं पर प्रत्यक्ष अनुभव एक विशेष ही स्थान रखता है जीवन में। यदि वर्धा नहीं जाता तो ब्लॉगरों के व्यक्तित्व मात्र, उनके चित्रों तक ही सीमित रहते, एक ज्ञान भरी पुस्तक की तरह। गांधीजी के आश्रम को बिना देखे उस अनुशासन की कल्पना करना असंभव था जिस पर सत्याग्रह के सिद्धान्त टिके हुये थे।

गांधीजी के प्रथम सत्याग्रही का आश्रम भी वर्धा में ही है, नदी किनारे। गांधी के प्रश्नों का उत्तर भी वहीं मिलना था संभवतः। शब्दों से अधिक कर्म को महत्व देने की जीवटता जिसके अथक अनुशासन का परिणाम रही उसके आश्रम देखने का संवेदन मन में गहरा बैठा था। दधीचि-काया, अन्तरात्मा में वज्र सा आत्मविश्वास, सर्वजन के प्रति पूर्ण वात्सल्य का भाव, शारीरिक-श्रम निर्मित तन, फक्कड़ स्वभाव और नाम विनोबा भावे।

विनोबा का नाम हमारे मन में भूदान आन्दोलन की स्मृतियाँ उभार लाता हैं। जिस देश मे व्यक्तियों को अपनी भूमि से असीम लगाव हो, उस देश में भूदान-यज्ञ विनोबा के योगदान को वृहद-नाद सा उद्घोषित करता है। दस लाख एकड़ भूमि का दान भारत के इतिहास में अद्वितीय था, स्वतःस्फूर्त और मानव की सहृदयता से प्रेरित। यह एक महामानव के मन से प्रारम्भ हुआ और एक जन-आन्दोलन में बदल गया।

हम में से बहुतों को यह ज्ञात न हो कि भूदान आन्दोलन 13 वर्ष चला और इस काल में 70,000 किमी की पदयात्रा की, विनोबा ने। भारत के हर कोने में जन जन के मन में रच बस गया, वह खाँटी भारतीय स्वरूप। जन-सैलाब इस भूदान के महात्मा के दर्शन व अगवानी हेतु खड़ा रहता था और अपने क्षेत्र में अनवरत उनके संग रहता था। नये क्षेत्र में नये समूह, नयी आशा, नया उत्साह मिलता और पृथ्वी अपने महापुत्र को स्वदान का आशीर्वाद बरसाती रहती।

देश को देखने और समझने का इससे अच्छा माध्यम क्या हो सकता है भला? भारतीयता पर ज्ञान के अध्याय उघाड़ चुके विद्वानों का ज्ञान, विनोबा के सम्मुख सदा ही नगण्य रहेगा।

हमारा ज्ञान पुस्तकीय अधिक है, समस्याओं पर हमारी दृष्टि सीमित है और कल्पनाओं के खग अवसर पाते ही हमारे बौद्धिक परिवेश में उड़ने लगते हैं। प्रत्यक्ष जाकर देखने से पता लगता है कि हम कितना कम जानते हैं, वस्तुस्थिति के बारे में।

आश्रम में उनकी पदयात्रा में संग रहे श्री गौतम बजाज जी से भेंट हुयी। उनसे संस्मरण सुनते सुनते कब सायं हो गयी, पता नहीं चला। यदि ट्रेन पकड़ने की बाध्यता न होती तो रात के भोजन तक वह संस्मरण-नद बहती रहती। उनकी आत्मकथा की पुस्तक से वह कमी संभवतः पूरी न हो पाये, पर भविष्य में भारत-भ्रमण के माध्यम से ज्ञानवर्धन का योग मेरे भाग्य में बना रहे, यही ईश्वर से प्रार्थना है।


वर्धति भारत ज्ञानम्, वर्धति कर्म प्रमाणम्, स वर्धा।

इति वर्धा कथा।

20.10.10

वर्धति सर्वम् स वर्धा - 2

ब्लॉगरों से संक्षिप्त पर स्नेहमयी भेंट के पश्चात जब चला, तब मन प्रसन्नचित्त था, वातावरण में शीतलता थी और मार्ग के दोनों ओर बिखरी हरियाली नयनों को आनन्द प्रदान कर रही थी। पता नहीं क्यों, पर जैसे जैसे सेवाग्राम स्थिति गांधी आश्रम की ओर बढ़ रहा था, मन में व्यग्रता और हृदयगति बढ़ रही थी। आज जो प्रश्न मुझसे पूछे जाने वाले थे, गांधी के प्रतीकों द्वारा, उनका उत्तर नहीं था मेरे पास। बिना कुछ भेंट लिये कैसे कोई जाता है अपने प्रिय के पास? मैं जा रहा था निरुत्तर। मुझे बहुत पहले से ज्ञात था कि यह क्षण मेरे जीवन में एक न एक दिन आयेगा अवश्य पर मैंने इस प्रश्न का उत्तर यथासम्भव नहीं ढूढ़ा। रीते हाथ जाने की व्यग्रता थी मन में और वर्षों तक गांधी से आँख न मिलाने की कायरता भी।

आश्रम सहसा ही आ गया, बिना किसी गुम्बदीय भौकाल के। जिस देश में जीवित आत्माओं के महिमा मण्डन में कुबेर के हाथों नहाने का प्रचलन हो, उस तुलना में अव्यक्त सा लगा आधुनिक भारतीय इतिहास के मर्म का निवासस्थल। मेरी व्यग्रता सहसा ढल गयी, स्थान का प्रभाव था संभवतः। राजनीति के कई शलाका पुरुषों को 1934 से 1948 के बीच ऐसी ही शान्ति मिल जाया करती होगी इस आश्रम में घुसते ही।

कुटिया में घुसते ही पर, बहुत ही करुण स्वर में गांधी जी ने मुझसे वह प्रश्न पूछ ही लिया। प्रश्न बहुत सरल था और मुझे पहले से ज्ञात भी। क्या मेरे देश के लोग सत्य और अहिंसा को अभी भी समझते हैं? राजनीति तो तब भी स्वार्थतिक्त थी और आज भी होगी, पर कहीं मेरे नाम का दुरुपयोग तो नहीं कर रहे हैं, आज के नेता?


मैं क्या कहता, आँख नम किये स्तब्ध सा खड़ा रहा अपने ही स्थान पर, किवाड़ पर मले हुये कड़वे तेल से अधिक आँखों को रुलाने वाले थे उत्तर। अपनी वृद्धावस्था से हिलने में असमर्थ उस निराश मुख के पीछे दुख का सागर हिलोरें ले रहा था। 76 वर्ष पहले वायसरॉय द्वारा लगाये गये फोन से अभी तक केवल समस्या के समाधान के लिये प्रार्थनायें ही तो आयी हैं, मेरे सत्य और अहिंसा के संदेशे को तो सदा ही म्यूट में ही रखा है सबने। मेरे अश्रु यह कह कर टपकने नहीं दिये कि यदि अश्रु टपक गये तो आँखों से इनका खारापन चला जायेगा। आज या तो अन्याय हो रहा है या अन्याय सहा जा रहा है, प्रतिकार न मेरी विधि से हो रहा है और न ही उन क्रान्तिकारियों की विधि से, जिनसे मेरा सैद्धान्तिक मतभेद रहा है। मैं कुछ सोचकर अश्रु पी गया।

सोचा, यदि सुबह ही यहाँ आ गया होता तो देश के सजग औऱ निर्भय ब्लॉगर बन्धुओं से इस प्रश्न का उत्तर पूछता। समय की कमी ने जीवन का क्रम तोड़ मरोड़ कर रख दिया है, जीने के समय मरने सी हड़बड़ी और मरने के समय शान्ति से जीने की उत्कट चाह।

गांधीजी और कस्तूरबा की सरल और अनुशासित जीवनचर्या का साक्षात दर्शन कर, अपनी पत्नी से विनोदवश पूछा कि यहाँ पर रह पाओगी, इस प्रकार का जीवन। पत्नी, जो थोड़ा आर्थिक सम्पन्न परिवार से है, का उत्तर भी आईना दिखाता हुआ सपाट था। हाँ, यदि आप गांधीजी की तरह रह सकते हो तो। गांधीजी के आदर्शों का पालन करने का दम्भ भरते हुये और ज्ञान बाटते हुये नेताओं को ऐसे उत्तर क्यों नहीं मिल पाते? क्यों नहीं इस बात पर सहमति बनती है कि किसी भी व्यक्ति के लिये गांधीजी का नाम और आदर्श का उपयोग करने की पहली शर्त उस प्रकार का जीवन व्यतीत करना है जिससे गांधीजी के विचारों को दृढ़ता व परिपक्वता मिली थी।

64 वर्ष की आयु में गांधी जी वर्धा स्थित इस आश्रम में रहने आये थे। आज मेरे देश की स्वतन्त्रता को भी 64वाँ वर्ष लगा है, उसे भी वर्धा के आश्रम जैसे सरल, अनुशासित और कर्मशील जीवन जीने को कौन प्रेरित करेगा?

वर्धति गांधी कर्मम्, वर्धति गांधी मर्मम्, स वर्धा।

16.10.10

वर्धति सर्वम् स वर्धा - 1

गांधीजी, विनोबा भावे और हिन्दी, इन तीनों का प्रेम मेरे आलस्य पर विजय पा चुका था, जब मैंने स्वयं को वर्धा हिन्दी विश्वविद्यालय के सभागार में खड़ा पाया। परिचय की प्रक्रिया में सारे ब्लॉगरों को उनके चित्र के सहारे पहचान लेने का विश्वास उस समय ढहने लगा जब त्रिविमीय आकृतियाँ स्मृति को धुँधलाने व उलझाने लगीं। चित्र में सजे मुखमण्डल सजीव रूप में और भी आकर्षक, सहज व भावपूर्ण लगे। चित्रों का सीमित संप्रेषण तब तक स्मृति पटल से नहीं हटा, जब तक बार बार देख कर यह निश्चय नहीं कर लिया कि, हाँ, यही अमुक ब्लॉगर हैं। पीछे चुपचाप बैठ कर मुलक मुलक के कई बार, बाल-सुलभ फिर भी उन्हें देखता ही रहा।

विचित्र सा लग रहा था। बौद्धिक परिचय था पहले से, पोस्टों के माध्यम से, साक्षात उपस्थिति में उनकी कई पोस्टों के शीर्षक उछल उछल कर आँखों के सामने आ रहे थे। बौद्धिक से शारीरिक ढलान में लुढ़कने के बाद जब संयत हुआ तब लगा कि इन महानुभावों के बीच स्वयं को पाना किसी महाभाग्य से कम नहीं है।
 
तल्लीनता में विघ्न तब आया जब सिद्धार्थ जी ने मेरे द्वारा कुछ विचार व्यक्त करने की सार्वजनिक घोषणा कर दी, वह भी बिना बताये। घर्र घर्र हो रही गाड़ी यदि सहसा पाँचवें गियर में डाल दी जाये तो जो प्रयास उसे सम्हालने में लगेंगे, वही प्रयास मुझे हृदयगति को सामान्य करने में लग रहे थे। विषय पर तब तक ध्यान ही नहीं दिया था, बड़े पोस्टर पर आचार-संहिता लिखा देख, विचार भी भाग खड़े हुये क्योंकि विचार तो सदा ही आवारगी-पसन्द रहे हैं। मैं तो ब्लॉगर दर्शन करने आया था, आचार-संहिता से दूर दूर का सम्बन्ध नहीं रहा, कभी भी।

यद्यपि सभाओं को सम्बोधित करने का अनुभव रहा है पर यशदीपों के सामने खड़ा, जुगनू सा टिमटिमाता, कौन सा ज्ञान उड़ेल दूँ, नहीं समझ में आ रहा था। जब घटनाओं का प्रवाह गतिशील हो, नदी का ही उदाहरण सूझता है, वही बहा कर जब मंच से उतरा तभी वास्तविकता में पुनः लौट पाया।

सभी ब्लॉगरों से बात करने का अवसर मिला जो संक्षिप्त ही रहा। अनीता कुमार जी के अतिरिक्त किसी से पहले का परिचय नहीं था अतः मुख्यतः कुशलक्षेम व ब्लॉग की प्रविष्टियों के सम्बन्ध में ही चर्चा हुयी। चर्चा भोजन के समय भी चलती रही जिससे भोजन और भी सुस्वादु हो गया था। तत्पश्चात शेष दो प्रेम-दायित्वों का निर्वाह करने निकल पड़ा।

हिन्दी के प्रति समर्पित योद्धाओं से मिलकर, साहित्य के प्रति मेरी आस्था का बल बढ़ा है। हिन्दीवर्धन में यह सम्मेलन एक सशक्त हस्ताक्षर सिद्ध होगा। सभी की अनुभूति उनकी लेखनी को और प्रबल बनायेगी और साहित्यसंवर्धन भी होगा। आयोजकों, विशेषकर कुलपति महोदय व सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी के प्रयासों को अतिशय साधुवाद, इस उत्कृष्ट आयोजन के लिये जिसकी विषयान्तर उपलब्धियाँ कहीं अधिक रहीं।

हिन्दी सम्मानम् वर्धति स वर्धा।

किसी व्यक्तित्व को कुछ पंक्तियों में व्यक्त करना कठिन है पर अपने अवलोकन को न कहना उनके प्रति अपराध माना जा सकता है अतः सबके नाम सहित लिख देता हूँ। न्यायालय की भाँति पूर्ण निर्णय सुरक्षित रख रहा हूँ, व्यक्तिगत भेंट के बाद ही निर्णय बताया जायेगा। अतः आप सभी बंगलोर आमन्त्रित हैं।



अनीता कुमार
देवीरूपा, संयत, गरिमा,
ब्लॉग जगत की एक मधुरिमा
अजित गुप्ता
अब तक तो गाम्भीर्य दिखा है,
एक प्रफुल्लित हृदय छिपा है
कविता वाचक्नवी
हिन्दी-महक, बयार लिये,
परदेशी बन प्यार लिये
रचना त्रिपाठी
आवृत गांधी खादी,
एकल ही संवादी
गायत्री शर्मा
मेधा-अर्जित आस,
रूपमयी-विश्वास
अनूप शुक्ल
मौज लेने में अपरिमित आस्था,
उसी रौ में सुना डाली दास्ता
विवेक सिंह
हाथ कैमरा, झोंके फ्लैश,
विद्वानों से क्योंकर क्लैश
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
दिवस दो काँधों सकल ब्लॉगिंग टिकी,
जी गये पल, पर जरा भी उफ नहीं की
डॉ महेश सिन्हा
देखकर स्मित सी मुस्कान,
उड़न छू परिचय का व्यवधान
हर्षवर्धन त्रिपाठी
उद्यमिता की बात कही,
सब सुधरेंगे, देर सही
संजीत त्रिपाठी
एक कुँवारा इस शहर में,
मिला उसे दोपहर में
यशवन्त सिंह
जो विचार मन में आयेगा,
यहीं अभी वाणी पायेगा
अविनाश वाचस्पति
कलमाडी की कृति अद्भुत,
पर ब्लॉगिंग में मजा बहुत
जय कुमार झा
स्वच्छ व्यवस्था करे विधाता,
हम घूमेंगे लिये पताका
रवीन्द्र प्रभात
मन बसी परिकल्पना,
शब्द दिखते अल्पना
संजय बेगाणी
छोटा तन, गुजरात बसा,
हिन्दी का विश्वास बसा
सुरेश चिपलूनकर
तिक्त शब्द, भीषण संहार,
हृदय किन्तु विस्तृत आकार
विनोद शुक्ल
निज आह्लादित, शान्त, सुहृद-नर,
है अनामिका विजयित पथ पर
जाकिर अली रजनीश
जहाँ ब्लॉग और हिन्दी वर्धित,
दिख जाते रजनीश समर्पित
अशोक कुमार मिश्र
हम पहले थे मिले नहीं,
भाव किये संवाद कहीं
प्रियन्कर पालीवाल
परिचय में संवाद सिमटकर,
थे वर्धा में एक प्रियन्कर
शैलेष भारतवासी
परिचय दृष्टि रहा बनकर,
है भविष्य-आशा तनकर
वन बिहारी बाबू
हम सम्मेलन में उन्मत थे,
आप व्यवस्था में उद्धृत थे
आलोक धन्वा
हुआ हमारा मेल नहीं,
सुना आप संग रेल रही
विभूति नारायन राय
गूँज रहा बस एक संदेशा,
ब्लॉगिंग में ही लक्ष्मण-रेखा
रवि रतलामी
गोली मारो, जियो कलन्दर,
मायावी हो घूम घूम कर
पवन दुग्गल
बच के रहना बाबा जी,
उत्श्रंखल मन बाधा जी
श्रद्धा पाण्डेय
लख ब्लॉगिंग की मदमत धार,
संग रहीं बनकर पतवार
प्रवीण पाण्डेय
जिन्दगी अलमस्त हो,
चुपचाप बहना चाहती है

13.10.10

वक्तव्यों के देवता

शब्दों को जीकर दिखला देने से आपकी वाणी, पता नहीं, कितना कुछ बोलने से बच जाती है। चित्र शब्दों से कई गुना दिखा देते हैं, चरित्र शब्दों से कई गुना सिखा देते हैं। इतिहास साक्षी है कि महापुरुषों को यह तथ्य भलीभाँति ज्ञात था और यही कारण रहा होगा कि पूरे इतिहास में किसी भी प्रेस कांफ्रेंस के बारे में कोई भी प्रमाण नहीं मिलता है। आज तो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये आपको शब्दों का आधार लेना पड़ेगा, हो भी क्यों न, चित्र व चरित्र देखने का समय कहाँ है किसी के पास? श्रेष्ठता के मानक वक्तव्यों में ही छिपे हैं और उन मानकों को सर्व प्रचारित करते फिर रहे हैं, वक्तव्यों के देवता।

कोई समस्या हो, कोई विजय ध्वनि हो, कोई निन्दा प्रकरण हो या कोई तथ्य बाँटना हो, वक्तव्य देकर कार्य की इतिश्री हो जाती है। उस क्षेत्र से सम्बद्ध ख्यातिप्राप्त या सत्तासीन व्यक्ति का वक्तव्य उस विषय पर अन्तिम प्रमाण स्वीकार कर लिया जाता है। तर्कशास्त्र में शब्द प्रमाण की प्रभुता को सर्वत्र प्रतिपादित करते फिर रहे हैं स्वनामधन्य, वक्तव्यों के देवता। प्रत्यक्ष या अनुमान भी नतमस्तक हो खड़े हो जाते हैं जब ये देवता उस बारे में अपनी वाणी के स्वर खोल देते हैं। हमारी आस्था भी इतनी परिपक्व हो गयी है कि हमें भी गरीबों की गरीबी में 9 प्रतिशत की वृद्धि दर देख प्रसन्नता होने लगती है।

समाचार पत्रों की विवशता है या पाठकों की रसिकता, कोई भी समाचार बिना वक्तव्य पूरा ही नहीं लगता है। हर सामाचार के अन्त में एक पुछल्ला लगा रहता है वक्तव्यों का, अन्तिम अर्ध्य के रूप में, वक्तव्यों के देवताओं के द्वारा। बिना 'बाइट' किसी टेलीविज़नीय समाचार को सत्यता का प्रमाण पत्र नहीं मिलता। जब तक प्रसिद्धिप्राप्त देवगण अपना सौन्दर्यमुखीय व्यक्तित्व कैमरा के सामने प्रदर्शित नहीं कर लेते हैं, समाचार को नैसर्गिक निष्पत्ति नहीं मिल पाती है। तब जो भी शब्द उनके आभामण्डल से टपक जाये, सत्य की संज्ञा से पूर्ण हो जाता है।

भारत वैसे ही देवताओं की विविधता व अधिकता से ग्रस्त और त्रस्त है, उस पर नये दैवीय प्रतीकों का उदय। इस युग में हमारी बुद्धि को विकसित करने का और कोई उपाय मिले न मिले, पर इन वक्तव्यों को समझ सकने का प्रयास बुद्धि के विकास के लिये नितान्त प्रभावी हो सकता है। वक्तव्यों के प्रवाह से जल निकाल कर चर्चा में उड़ेलना और समय पड़ने पर प्रतिद्वन्दी के वक्तव्यों से उसी को भिगो देना बौद्धिक श्रेष्ठता के पर्याय हो गये हैं। देवता समुद्रमंथन में अमरत्व को प्राप्त हो चुके हैं पर ये आधुनिक कुलीन अपने विषवमन करने के गुण से सहस्त्र सर्पों को निष्प्रभ करने की क्षमता रखते हैं।

वक्तव्यों की अधिकता से उनका मूल्य कम होने लगा है। कोई अब उन पर विश्वास ही नहीं करता। चन्द्रकान्ता सन्तति के पात्रों से भी अधिक काल्पनिक हो गयी है उनकी छवि। क्या करें? किसको अवकाश पर भेजा जाये? वक्तव्यों को या उनके देवताओं को?

शब्दों को जीकर दिखलाने वालों के बारे में कब जानेगे हम?

"दुनिया को शास्त्र की भूख नहीं, आस्थापूर्वक की हुई कृति की आवश्यकता है।" - महात्मा गांधी

9.10.10

बात तो बस शुरुआत करने की है

आप के मन में कोई योजना है। आप प्रारम्भ करना चाहते हैं। दुविधा है कि अभी प्रारम्भ करें या थोड़ा रुककर कुछ समय के बाद। संशय में हैं आपका मन क्योंकि दोनों के ही अपने हानि-लाभ हैं।


अभी करने से समय की हानि नहीं होगी पर क्रियान्वयन के समय ऐसी समस्यायें आ सकती हैं जिन पर आपने पहले भलीभाँति विचार ही नहीं किया हो। ऐसा भी हो सकता है कि समस्यायें इतनी गहरी हों कि आपकी योजना धरी की धरी रह जाये।

वहीं दूसरी ओर भलीभाँति विचार करने के लिये समय चाहिये। जितना अधिक आप विचार करेंगे,  भावी बाधाओं को उतना समझने में आपको सहायता होगी। आप विस्तृत कार्ययोजना बनाने लगते हैं पर जब तक कार्य प्रारम्भ करने का समय आता है तो बहुत संभावना है कि कोई अन्य व्यक्ति उस विचार पर कार्य प्रारम्भ कर चुका हो या परिस्थितियाँ ही अनुकूल न रहें। आपका विचार और उससे सम्बन्धित बाज़ार आप के हाथ से जा चुका होगा।

आपका क्या निर्णय होगा? यह एक ऐसा निर्णय है जिस पर आपके कार्य की सफलता निर्भर करती है।

मूलतः दो प्रश्न हैं। किसी कार्य को प्रारम्भ करने का कौन सा समय सर्वोत्तम है? और कितना समय उपलब्ध है हमारे पास निर्णय के लिये?

मन में किसी नयी योजना का विचार आना एक दैवीय संकेत है और बिना समय गँवाये उस पर तत्परता से हानि-लाभ का विश्लेषण प्रारम्भ कर देना चाहिये। किसी भी विचार को लिखकर रख लेने से और विचारों के प्रवाह में स्थान दे देने से सम्बन्धित विचार द्रुतगति से आने लगते हैं। उनको लिखते जायें और अन्य पक्षों पर चिन्तन का मार्ग खोल दें। आधार जब इतना सुदृढ़ हो जाये कि मन को सन्तोष सा होने लगे तो मान लीजिये कि कार्य प्रारम्भ करने का समय आ गया है।

विचार प्रक्रिया यदि बहुत लम्बी चलने दी तो केवल बौद्धिक प्रकल्प बन कर रह जायेगी आपकी योजना। फल के पकने के बाद से टपकने तक का समय होता है हमारे पास। इसी कालखण्ड में निर्णय लेना पड़ता है हमें। प्रकृति इससे अधिक समय नहीं देती है फल तोड़ने को। आप को कैसा लगेगा कि आप जिस पके फल को तोड़ने के लिये डाल पर चढ़ने का श्रम कर रहे हैं, वह टपक जाये और कोई और उसका लाभ उठा ले। इस तरह के उदाहरणों से उद्योगों का इतिहास भरा पड़ा है।

तैयारी इसे ही कहते हैं कि पकने से टपकने तक के समय में हमारी बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक क्षमता इतनी अधिक हो कि हम फल तोड़ सकें। इसको ही संभवतः भाग्य कहते हैं। हममें से लगभग सभी ने कभी न कभी या तो समय के पहले फल तोड़ लिया या उसे टपक जाने दिया।

तैयारी पूरी रखी जाये, खिड़की सबके लिये कभी न कभी खुलती ही है।

एप्पल व पिज्जा हट का उदाहरण तो यह बताता है कि यदि आप के मन में योजना आयी है तो प्रारम्भ कर ही दें। आये विचार का को सम्मान दें, हो सकता है पुनः न आये।

6.10.10

आवारा हूँ

कुछ शब्द स्मृतिपटल पर स्थायी रूप से विराजमान हो जाते हैं, विशेषकर जब उनके साथ कोई घटना सम्बद्ध हो। बचपन, दस वर्ष से कम की आयु, एक दिन विद्यालय के बाद घर यह सोच कर नहीं आया कि अभी घर में माताजी और पिताजी को आने में देर है। मित्र के साथ नदी किनारे निकल गया, रेतीले किनारे, छोटे छोटे पत्थर नदी में डब्ब डब्ब फेंकता रहा। नदी की धार में बालसुलभ प्रश्नों की श्रंखला डुबकी लगा लेती थी पुनः सूखने के पहले। समय चुपके से कई घंटों सरक गया। सायं घर पहुँचता हूँ, कुछ कहता उसके पहले पड़ा चेहरे पर एक सन्नाट झापड़ और शब्द सुनाई पड़ा, आवारा हो गया है। आँख में बसी नदी आँख से पुनः बाहर आ गयी। माँ ने दौड़कर चिपटा लिया, समझाती रही, बहुत देर तक। हाथ पकड़ भैया के दुख भी बाँटने के प्रयास में छोटे भाई-बहन। पिता की व्यग्रता, पिछले चार घंटे से, पूरे नगर को जा जा कर टटोल डाला, अनर्थ की सम्भावनायें मन में बार बार। उस समय तो समझ नहीं आया कि व्यग्रता दोषी है या आवारगी, बस आवारा शब्द एक पूरी घटना बन स्मृति से चिपक गया।

तब से अब तक आवारगी और व्यग्रता एक दूसरे के विरोधी से लगते हैं।

जब भी कोई विचार, व्यक्ति या घटना घेरने का प्रयास करती है, छिपा हुआ आवारा जाग जाता है। पहले मुझे लगता था कि इस तरह का उन्मुक्त दिशाहीन भ्रमण, सड़कों पर, कल्पना पर, दृष्टिपथ पर, यह एक अभिरुचि है और इसे पाले जाने की आवश्यकता है। स्वयं से साक्षात्कार करने पर यह लगने लगा कि मेरी यथासंभव न हिलने की अजगरीय प्रवृत्ति में आवारगी कहाँ से आ गयी? देर से सही पर पता लग गया है कि बन्धनों की व्यग्रता मे छिपा है, मेरी आवारगी का स्रोत।

टीशर्ट, जीन्स, स्पोर्ट्स जूते और उन्मुक्तता पहन, काले चश्में में मन के भाव छिपा, विचार प्रक्रिया को रिसेट मोड पर वापस ला, कोई भी अवधि सीमा न रख, सरक लेता हूँ घर से। 5-6 किमी निष्प्रयोजनीय भ्रमण सड़कों पर, मॉल में, पार्क में, कॉफी की दुकान में, नितान्त अकेले, अपने भूत से विलग, भविष्य से विलग, वर्तमान को धोखा देते, किसी से कोई बात ऐसे ही अकारण, दिशाहीन, अन्तहीन, ध्येयहीन। न किसी को प्रसन्न रखने की बाध्यता, न किसी को दुख देने का मन, मैं और मेरी आवारगी, समय से उचटी, अपने में रमी। दृश्य रोचक हैं तो मुख में स्मित मुस्कान, दृश्य कटु हैं तो तनिक संवेदनीय खेद। पुनः चार घंटों के बाद घर में, अब कोई आवारा नहीं कहता है। दृष्टि से पर पढ़ लेता हूँ, ये नहीं सुधरेंगे। बच्चों को लगता है कि अब इतने हुड़दंग के बाद थोड़ा पढ़ते हुये प्रतीत हुआ जाये।

राजकपूर के गाने भाते हैं, आवारा हूँ, जीना इसी का नाम है, जूता है जापानी। मन कुछ पहचाना सा पा जाता है, उस फिल्मीय आवारगी में। बिली जोयेल भाता है, वी डिन्ट स्टार्ट द फायर, इन द मिडिल ऑफ द नाइट। संस्कृतियों से परे आवारगी आधार ढूढ़ने लगती है, बन्धनों को तोड़ने लगती है, व्यग्रता के बन्धनों को।

वैचारिक आवारापन, बौद्धिक आवारापन, दैनिक आवारापन, सब के संग जीवन के अंग बन गये हैं, व्यग्रता से जूझने को तत्पर। अब आवारापन में बँधता जा रहा हूँ, पुनः बन्धन। दवा दर्द बन रही है। आवारगी से बाहर कैसे आऊँ, या पड़ा रहूँ दिशाहीन, जीवनपर्यन्त।

2.10.10

तुलसी वाला राम, सूरदास का श्याम


जितनी बार भी राम का चरित्र पढ़ा है जीवन में, आँखें नम हुयी हैं। कल मेरे राम को घर दे दिया मेरे देशवासियों ने, कृतज्ञतावश पुनः अश्रु बह चले। धार्मिक उन्माद के इस कालखण्ड में भी सदैव ही मेरे राम मुझे दिखते रहे हैं, त्याग में, मर्यादा में, शालीनता में, चारित्रिक मूल्यों में। पृथु(पुत्र जी) के बाल्यकाल में मुझे तुलसी वाले राम और सूरदास के श्याम अभिभूत कर गये थे और लेखनी मुखरित हो चली थी।


मन्त्र-मुग्ध मन, कंपित यौवन, सुख, कौतूहल मिश्रित जीवन ।

ठुमक ठुमक जब पृथु तुम भागे, पीछे लख फिर ज्यों मुस्काते ।

हृद धड़के, ज्यों ज्यों बढ़ते पग, बाँह विहग-पख, उड़ जाते नभ ।

विस्मृत जगत, हृदय अह्लादित, छन्द उमड़ते, रस आच्छादित ।।

तेरे मृदुल कलापों से मैं, यदि कविता का हार बनाऊँ ।

मन भाये पर, तुलसी वाला राम कहाँ से लाऊँ ।।१।।


सुन्दर गीतों में बसता जो, बाजत पैजनियों वाला वो ।

छन्दों का सौन्दर्य स्रोत बन, तुलसी का जीवन-आश्वासन ।

अति अनन्द वह दशरथ-नन्दन, ब्रम्हविदों का मन जिसमें रम ।

कोमल सा मुखारविन्दु जो, कौशल्या-सुत आकर्षक वो ।

कविता का श्रृंगार-पूर्ण-अभिराम कहाँ से लाऊँ ।

मन भाये पर, तुलसी वाला राम कहाँ से लाऊँ ।।२।।

 

चुपके चुपके मिट्टी खाना, पकड़ गये तो आँख चुराना ।

हर भोजन में अर्ध्य तुम्हारा, चोट लगी तो धा कर मारा ।

भो भो पीछे दौड़ लगाते, आँख झपा तुम आँख बताते ।

कुछ भी यदि मन को भा जाये, दे दो कह उत्पात मचाये ।।

तेरे प्यारे प्यारे सारे कृत्यों से यदि छन्द बनाऊँ ।

मन भाये पर, सूरदास का श्याम कहाँ से लाऊँ ।।३।।

 

घुटनहिं फिरे सकल घर आँगन, ब्रजनन्दन को डोरी बाँधन ।

दौड़ यशोदा पीछे पीछे, कान्हा सूरदास मन रीझे ।

दधि, माखन और दूध चुराये, खात स्वयं, संग गोप खिलाये ।

फोड़ गगारी, दौड़त कानन, चढ़त कदम्ब, मचे धम-ऊधम ।।

ब्रज के ग्वाल-ग्वालिनों का सुखधाम कहाँ से लाऊँ ।

मन भाये पर, सूरदास का श्याम कहाँ से लाऊँ ।।४।।

29.9.10

नखरे सहने का गुण

कुछ लोगों की सहनशक्ति अद्भुत होती है। उनका अन्तस्थल इतना गहरा होता है कि छोटी मोटी हलचल कहाँ खो जाती है, पता ही नहीं चलता है। वाक्यों की बौछार हो या समस्या का प्रहार, मुखमण्डल में प्रखर साम्य स्थापित। उनसे इतना सीखता रहा जीवन भर कि अब तो दर्पण के सामने खड़े होकर स्वयं को पहचान नहीं पाता हूँ। जीवन जीने में वह गुण अधिक प्रयोग हुआ हो या न हुआ हो पर एक क्षेत्र में यह गुण सघनता से उपयोग में आया है, वह है नखरे सहने में। अब तो बड़े बड़े नखरे पचा ले जाता हूँ, बिना तनिक भी विचलित हुये। 

सहजीवन की एक कला है, यह नखरे सहने का गुण। कभी बच्चों के, कभी उनकी माँ के, कभी समाज के कर्णधारों के, कभी यशदीप के तारों के। यह अपार सहनशक्ति यदि जल बन सागर में प्रवाहित हो जाये तो केवल मनु ही पुनः बचेंगे, वह भी हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, भीगे नयनों से प्रलय-प्रवाह देखते हुये। 

जब तक हमारी नखरे सहने की कुल क्षमता, नखरे करने वालों की क्रियाशीलता से अधिक रहती है, परिवेश में शान्ति बनी रहती है। जैसे ही सहनशक्ति क्षरित होने लगती है, हुड़दंग मचने लगता है। दो कार वाले सम्पन्न जीव, बेकार सी बात के लिये, साधिकार द्वन्दयुद्ध में उद्धृत दिखाई दे जायेंगे। परिवेशीय संतुलन का यह विशेष गुण शान्तिप्रिय जनों की अन्तिम आशा है, जीवन में स्थायित्व बनाये रखने के लिये। अभ्यास मात्र से यह गुण कितना भी बढ़ाया जा सकता है। अपने अपने जीवन में झाँककर देखिये तो आपको यह तथ्य सिद्ध होता दिख जायेगा।

नखरे सहने का गुण पर इतना परमहंसीय भी नहीं है। प्रेम के समय नखरों को क्षमता से अधिक सहन करने का क्रम अन्ततः किसी विस्फोट के रूप में निकलता है। नेताओं के नखरे पाँच वर्षों बाद सड़कों पर निरीह खड़े दिखते हैं। नखरे न केवल सह लेना चाहिये वरन उसे पचा भी ले जाना चाहिये, सदा के लिये। जो नहीं पचा पाते हैं, विकारग्रस्त होने लगते हैं, धीरे धीरे। इस गुण को या तो कभी न अपनायें या अपनायें तो उस पर कोई सीमा न रखें। बस सहते जायें नखरे उनके, एक के बाद एक, निर्विकार हो।

नखरे सहने के गुण में प्रवीणता पाने के लिये नखरे करने वालों की भी मनोस्थिति समझना आवश्यक है। अपने एक गुण के आधार पर पूरा व्यक्तित्व ढेलने के प्रयास को नखरे के रूप में मान्यता प्राप्त है। यदि प्रेमी बहुत सुन्दर हो तो उसके विचार, उसके परिवार, उसके बनाये अचार, सभी की प्रशंसा आपका कर्तव्य है। एक भी क्षेत्र में बरती कोताही का प्रभाव व्यापक और त्वरित होता है। यदि कोई बड़ा नेता बन गया, किसी भी कारण से, तो उसके व्यवहार का अनुकरण और उसके प्रति बौद्धिक समर्पण दोनों ही आपके लिये आवश्यक है। व्यक्तित्व के प्रति पूर्ण समर्पण ही नखरे सह लेने की योग्यता का आधार स्तम्भ है।

आत्मज्ञान जहाँ एक ओर आपकी सहनशक्ति बढ़ाता है वहीं दूसरे पक्ष की क्रियाशीलता कम भी करता है। भारत में आत्मज्ञानी साधुओं और गृहस्थों की अधिक संख्या, विश्वशान्ति के प्रति हमारी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं।

नखरे सहने में और मूर्खता करने में कुछ तो अन्तर हो। नखरे सहते सहते स्वयं ही कश्मीर बना लेना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? नखरे सहने की राह सदा ही मूर्खता के गड्ढों से बचा कर रखें, हम सब। कभी न कभी तो दो टूक उत्तर का भी स्थान हो हमारे वचनों में।

25.9.10

जाति क्या है?

बड़ा सरल प्रश्न है। इस पर जब इतना कहा जा चुका है, इस पर जब इतना सहा जा चुका है, तब पूछने का औचित्य? राजनीति में जाना है या समाज को बाटने की एक नयी विधि का श्रेय लेना है? नहीं, तब क्या बौद्धिकता में खुजली हो रही है जो इतना विवादास्पद विषय उठा रहे होयह एक ऐसा शब्द है, जिसे सुन बहुतों की भृकुटियाँ तन जाती हैं पर मेरा वचन है, कुछ भी ऐसा न लिखने का, जिससे किसी को ठेस पहुँचे।

मेरे परम मित्र हैं, श्री लक्ष्मण सिंह। उनके पिताजी न्यायिक सेवा में ऊँचे पदस्थ रहे, घर में सुसंस्कृत संस्कार। सेवा की अनिवार्यताओं के कारण आम समाज से थोड़ा अलग रहा उनका प्रारम्भिक जीवन। युवक होने तक जाति जैसे किसी शब्द के सम्पर्क में नहीं आयी उनकी विचारधारा। उन्हें अटपटा लगना तब प्रारम्भ हुआ, जब जाति जैसी उपाधि के नाम पर समाज की ऊर्जा को कई दिशाओं में भटकते देखा। मेरा अनुभव भले ही कमलपत्रवत न रहा हो पर मुझे भी सदैव ही जाति के प्रसंग पर चुप रहना श्रेयस्कर लगा है। पता नहीं आज क्यों लिखने की ऊर्जा जुटा पा रहा हूँ?
  
कोई भी ऐसी विचारधारा जिसमें बाटने के बीज छिपे हों, लक्ष्मण सिंह जैसे व्यक्तियों को दुख देगी।

तब क्या विविधतायें न हों जगत में?

विविधतायें हों, उनकी नग्नता न हो। विविधतायें भी शालीन स्वरूप धरे रह सकती हैं।

समृद्धि के समय विविधतायें बाग में खिले हुये पुष्पों की भाँति होती हैं, सबका अपना महत्व, सबकी अपनी प्रसन्नता। जब संसाधन कम पड़ते हैं और विपत्ति आती है, तब यही अन्तर शूल की भाँति हृदय में चुभने लगता है। किसी की उपलब्धि को उसको दी हुयी उपाधि से जोड़कर देखा जाने लगता है, उसी उपाधि को अपने कष्ट का कारण बनाकर विचार प्रक्रिया में रोपित कर दिया जाता है। अपने दुख का कारण अपने भीतर न ढूढ़कर दूसरे की उपाधियों में ढूढ़ने का प्रयत्न होने लगता है। समूह बनने लगते हैं, उनकी स्तुतियाँ होने लगती हैं, अपना तुच्छ भी उनके श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर लगता है।

जो भी पौराणिक कारण हो पर हर समूह की अपनी स्वस्थ परम्परायें होती हैं और अपने हिस्से की दुर्बलतायें। विकासशील समूह अपनी दुर्बलताओं की निर्मम बलि देकर आगे बढ़ते जाते हैं और मानसिक, बौद्धिक व आर्थिक रूप से सुदृढ़ होते जाते हैं। जो उन्मत्त रहते हैं अपने इतिहास के महानाद से, उन्हे भविष्य की पदचाप नहीं सुनाई पड़ती है और समय के चक्र में उनके क्षरित शब्द ही गूँजते रहते हैं।

हमें यदि आपस में लड़ने का बहाना चाहिये तो दसियों कारण उपस्थित हैं। भाई भाई पर घात लगाये बैठे हैं। लड़ाके शेर मेमनों को किसी न किसी विधि से लील ही जायेंगे। हमें यदि अपनी विविधता संरक्षित रखनी है तो आपत्ति काल में उसे सुरक्षित रख, कौरव व पाण्डव न बन, 105 बन खड़े हों। होना यह चाहिये कि विपत्ति के समय हमें अपनी समानतायें उभारनी चाहिये, विपत्ति से जूझने के लिये। जब देश डूबा हो, समाज रुग्ण हो, तब भी हमें यदि अपने समूह का गुणगान करने का समय मिल जाये तो आश्चर्य होना चाहिये। जीत के बाद जब विजयोत्सव मनेगा, तब अपनी परम्पराओं के अनुसार आनन्द मनायेंगे हम सब, अपने अपने इष्ट पूजेंगे हम सब।

उद्गार एक कविता के माध्यम से बहा है,

नर-नारी की मान-प्रतिष्ठा, पाने नित अधिकार लड़ रही,
भाषा लड़ती, वर्ण लड़ रहे, बुद्धि विषमता ओर बढ़ रही ।
देश, प्रदेश, विशेष लड़ रहे, भौहें सकल प्रकार चढ़ रहीं,
नयी, पुरातन पीढ़ी, पृथक विचार, घरों के द्वार लड़ रही ।

धर्म लड़े, बन हठी खड़े हैं, उस पर भी अब जाति लड़ी है,
देखो तो किस तरह मनुज की, लोलुपता हर भाँति लड़ी है ।।

22.9.10

चार प्रभातीय अध्याय

वैवाहिक जीवन की सीमायें आपको बहुत अधिक बहकने नहीं देती हैं, किसी भी दिशा में। जब मुझे अपने मानसिक ढलान को रोकने के 21 दिवसीय प्रयास सफल होते दिख रहे थे, श्रीमती जी की आपत्ति, सीमा बना कर ठोंक दी गयी। आप तो स्वयं युवा होते जा रहे हैं, पर मेरा क्या? क्या करना है? सुबह सुबह टहलने चलते हैं फ्रीडम पार्क, साथ साथ, नित चार चक्कर, कुल 4 किलोमीटर, बस केवल 21 दिन के लिये। इतने निश्चय व आत्मविश्वास के सम्मुख मेरी कई व्यस्ततायें और तर्क ध्वस्त हो गये।

जब तेज चलने वाले को, किसी का साथ देने के लिये धीरे धीरे चलना पड़े तो शाऱीरिक व्यायाम तो असम्भव ही है पर मानसिक व्यायाम में कहाँ के पहरे लगे हैं? पिछले कई दिनों में चार चक्करों के मंथन में विचारणीय अवलोकन जन्म ले रहे हैं। आज सब के सब साथ में उपस्थित थे। आईये, एक एक कर के देखते हैं।

पार्क के बाहर ही एक खुले मैदान में टेन्ट लगा है। पर्युषण पर्व पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रवचन सुन रहे हैं। बाहर विविध प्रकार के व्यंजन मेजों पर सजे हैं, भण्डारे की तैयारी है। उन पर अलिप्त सी दिखने वाली संलिप्त दृष्टि डाल कर पार्क में टहलना प्रारम्भ कर देता हूँ। पहले चक्कर में श्रीमती जी की महत्वपूर्ण सी लगने वाली कई बातों पर हाँ, हूँ तो किया पर मन उसी भण्डारे पर टिका रहा। सुबह सुबह प्रवचन का इतना कैलोरिफिक उत्सव?

दूसरे चक्कर के प्रारम्भ में ही एक युवा युगल दिखता है, अविवाहित क्योंकि उनके चेहरे पर भविष्य को लेकर असमंजस स्पष्ट था। पिछले कई दिनों से नित अपनी समस्याओं के भँवर में डूबते उतराते दिख रहे हैं दोनों। प्रेम विवाह के इस उबड खाबड़ रास्तों से हम तो बचे रहे पर सुबह सुबह उन्हें वहाँ देख दो विचार ही मन में आये। पहला, घर में क्या बोल कर आते होंगे, संभवतः स्वास्थ्य बनाने। दूसरा, कितने भाग्यशाली हैं कि रात में एक दूसरे को स्वप्नों में निहार कर सुबह पुनः उसे मूर्त रूप देने में लग जाते हैं।

तीसरे चक्कर में एक विदेशी दिखते हैं, दौड़ लगा रहे हैं। यहाँ किसी बैठक में आये होंगे क्योंकि उन्हे पहली बार ही देखा है। दिन प्रारम्भ करने के पहले शरीर पर ध्यान देना एक गुणवत्तापूर्ण जीवन का पर्याय है। उन्हें देख कर हमारी भी दौड़ने की इच्छा बलवती हुयी पर तुरन्त अपनी भूमिका का भान होता है और हम अपनी चाल ढीली कर पुनः मानसिक व्यायाम में उतर जाते हैं। सुबह की दो विभिन्न गतियों पर मन बहुत देर तक खिंचा रहा।

चौथे चक्कर में, पाँच लड़कियों को देखता हूँ, पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ, सप्ताहान्त को छोड़कर। निश्चय ही आसपास के किसी कॉलेज से होंगी। कॉलेज खुलने से पहले का समय पार्क की शीतल हवा में व्यतीत करती हैं और कहीं बेंच पर बैठ कर या तो बातें करती हैं या कोई पुस्तक पढ़ती हैं। प्राकृतिक वातावरण में और सुबह की ग्राह्य वेला में समय का सुन्दर उपयोग। मुझे भी पुस्तक पढ़ना अच्छा लगता है सुबह सुबह पर श्रीमती जी के सामने उस विषय पर दी टिप्पणी व दिखायी गयी उत्सुकता घातक हो सकती थी अतः अन्यत्रमना से प्रतीत होते हुये टहलते रहे।

कारसेवा कर वापस आते समय तक भंडारा प्रारम्भ हो चुका था। कई पकवान दिख रहे थे। कदम ठिठके, सोचा कि घुल मिल लेते हैं क्योंकि चेहरे से पूरी तरह अहिंसक और निर्लिप्त जैनी लग रहे थे। आशाओं को अर्धांगिनी का समर्थन न मिलने से अर्धमना होकर रह गये।

घर पर पाँचवाँ अध्याय प्रतीक्षा में था।

ब्लॉगिंग का। हमें तो आपका ही सहारा है।

18.9.10

कटी पतंग से इश्किया तक

चालीस वर्षों में एक पीढ़ी दूसरी में पदोन्नति पा जाती है पर नहीं भुलाये जा पाते हैं वह अनुभव व भावनायें जो हम जी आये होते हैं। बहुत से गुदगुदा जाने वाले क्षणों में हमारे प्रेम की अवधारणा कहीं न कहीं छिपी रहती है। किसी व्यक्ति विशेष के लिये प्रेम की यह अवधारणा भले ही न बदले पर समाज में आया बदलाव भी आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता है। 1970 से 2010 तक, ये बदलाव क्या रंग लाये हैं, यदि देखना चाहें तो आपको मैं टहला लाता हूँ।

कटी पतंग नामक फिल्म आयी थी 1970 में। एक विधवा(कटी पतंग) के प्रति उमड़ता नायक का प्रेम व्यक्त होता है, एक गीत के माध्यम से। राजेश खन्ना आशा पारिख को नाव में बिठा कर ले जा रहे हैं और गा रहे है "जिस गली में तेरा घर न हो बालमा, उस गली से हमें तो गुज़रना नहीं"। पूरा गीत सुने तो भाव निकलेगें पूर्ण समर्पण व एकनिष्ठता के। आज भी जब कोई युवा नायिका वह गीत सुनती है तो स्वयं को सातवें आसमान में पाती है, जबकि वही गीत सुनकर युवा नायक स्वयं को सात कारागारों में घिरा पाता है।

इस वर्ष एक फिल्म आयी, इश्किया। इसमें भी एक विधवा के प्रति नायकों का प्रेम उमड़ता है, एक दूसरे गीत के माध्यम से। नसीरुद्दीन शाह व अरशद वारसी विद्याबालन को देख गाना गाते हैं "डर लगता है तनहा सोने में जी, दिल तो बच्चा है जी"। इस गीत के बोल दिल की असंतुलित, बच्चासम और कुछ भी कर जाने की प्रवृति पर केन्द्रित हैं। इस गाने को सुन भले ही नायिकायें उतना सहज न अनुभव करें पर नायकगण अपनी उन्मुक्तता दिल के बच्चेपन पर न्योछावर कर बड़ा स्वच्छन्द अनुभव करते हैं।

जिन्होने अपनी युवावस्था में कटी पतंग आधारित प्रेम अवधारणा अपनी मानसिकता में सजायी है, उन्हें इश्किया के विचार भाव छिछोरापन लगेंगे, वहीं आज की पीढ़ी को कटी पतंग जैसा समर्पण सम्पूर्ण-मूर्खता लगती है।

1970 में मेरा जन्म नहीं हुआ था और 2010 में हम प्रेम के अवस्था को पार कर गृहस्थी में बँधे हैं। इस प्रकार हम तो कोई भी छोर नहीं पकड़ पाये। पर कुछ वयोवृद्ध व कुछ उदीयमान ब्लॉगर अब तक इस पोस्ट की तह तक पहुँच चुके होंगे और करने के लिये टिप्पणी भी सोच ली होगी। उन्हीं का प्रकाश, प्रेम के इस अन्धतम में जी रहे हम अल्पज्ञों का ज्ञान बढ़ा पायेगा। कुछ व्यक्तित्व जो प्रेमजगत के अत्याधिपति हैं, निश्चय ही अल्पज्ञों के मार्गदर्शन में स्वतः आगे आयेंगे।

पता नहीं कि कौन सा सच आपके हृदय की धड़कन है?

आपके प्रेम की अवधारणा जिस पर भी ठीक उतरती हो आप वह गाना सुन लीजिये। दोनों के ही सुर उतने ही उखड़े हैं जितना इस काल में प्रेम पर विश्वास। मेरे गाने के पूर्व दुस्साहस को सराहने का फल मात्र है यह श्रवण। अपना बढ़ना बन्द करने के प्रयास में मैंने कुछ दिन पहले ये दोनों गीत मंच से गाये थे। जब गीत चयन कर रहा था तब यह आशा नहीं थी कि मैं प्रेम के दो छोरों में, सारे सुनने वालों को बाँधने का प्रयास कर रहा हूँ।


जिस गली में तेरा घर न हो बालमा


दिल तो बच्चा है जी

15.9.10

धन घमंड अब गरजत घोरा

मुझे कई दिनों से एक बात कचोट रही थी कि किसी धनवान का धन उसकी सामाजिकता को किस तरह प्रभावित करता है? स्वयं का अनुभव मध्यमवर्गीयता का प्रबल आस्वादन मात्र ही रह पाया। कई धनवान मित्र हैं पर धन को लेकर न मेरी जिज्ञासा रही और न ही उनका खुलापन। किसी धनाढ्य से उसके धन के बारे में पूछना थोड़ा आक्रामक सा प्रतीत होता है और धनाढ्य का स्वयं ही बता देना उस परिश्रम को एक सार्वजनिक स्वरूप दे देना होगा जिससे वह धन अर्जित किया गया है।

धन को साधन के रूप में स्वीकार करने से तो यह लगता है कि धन की मात्रा बढ़ने से सामाजिकता भी बढ़नी चाहिये। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो होता विपरीत ही है। धन के द्वारा लोगों का सामाजिक विस्तार सिकुड़ते ही पाया है।

और अधिक धन की आकांक्षा समय की उपलब्धता कम कर देती है जिससे सम्बन्ध सिकुड़ने लगते हैं। अधिक धन का होना व्यक्ति को समाज की एक विशेष श्रेणी में खड़ा कर देता है, जहाँ पर सामाजिकता कम और दिखावा अधिक होता है। धन चले जाने का या माँग लिये जाने का भय भी धनवान को अन्य वर्गों से दूर रखता है। इन तीन संभावित कारणों के बारे में जब किसी उत्तर पर नहीं पहुँच पाया तो निर्मम हो एक से यह प्रश्न पूछ ही बैठा।

"क्या आपको लगता है कि यदि कोई आपसे बात करने आता है तो उसे केवल आपके धन में रुचि है?"  प्रश्न रूक्ष और आहत करने वाला था और मैं उत्तर की अपेक्षा भी नहीं कर रहा था। असहज उत्तर मिला कि नहीं, ऐसा नहीं है। जो भाव शब्द छिपाना चाह रहे थे, मुखमण्डल ने उन्मुक्तता से बिखेर दिये। ऐसा नहीं है कि धनाढ्य के अतिरिक्त, धन का उल्लेख किसी और को विचलित नहीं करता है। मध्यमवर्गीय के मन में यदि धन घुल गया तो उसका, उसके परिवार का और उसके समाज का विस्तार उस धनाक्त मानसिकता में तिरोहित हो जाता है। निर्धन के लिये तो सदैव ही धन एक चाँद सितारे के उपमानों से कम नहीं है जीवन में।

कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय,
वा खाये बौराय जग, वा पाये बौराय।

जब पहली बार पढ़ा था यह दोहा तो उतना जीवन्त नहीं लगा था यमक अलंकार का यह उदाहरण। अनुभव के मार्गों में पर इस दोहे को नित्य जीवन पाते देखा है। बौराने की स्थिति में सम्बन्धों का भार उठाना बड़े झंझट का कार्य लगता हो संभवतः। बौराने की स्थिति में सामाजिकता के विस्तार की बात तो दूर, समाज पर ही भार बन जाता है व्यक्ति।

स्वयं का अनुभव इस जीवन में मिल पाये, इतनी प्रतीक्षा न कर पाऊँगा, उत्तरों के लिये। किसी लक्ष्मीपति से इस प्रश्न का उत्तर मिले तो अवश्य बताईयेगा। लक्ष्मीवाहनों से इस विषय पर चर्चा कर अब अपना समय व्यर्थ नहीं करूँगा। आपके लिये भी यही सलाह है।

11.9.10

खबर पक्की है, दुर्दशा जारी है

रेलवे का कलेवर आपको बाहर से सरकारी दिख सकता है पर किसी मल्टीनेशनल की भाँति हमारे अन्दर भी लाभ हानि का भाव कुलबुलाता रहता है। जहाँ पिछले वर्षों की तुलना में उच्च प्रदर्शन प्रसन्नता देता है वहीं निम्न प्रदर्शन उन कारणों का पता लगाने को प्रेरित करता है जो प्रगति में बाधक रहे। वैसे तो हर विभाग के मानक आँकड़े भिन्न हैं पर अन्ततः निष्कर्ष आर्थिक आकड़ों से आँके जाते हैं।

बात झाँसी मण्डल की है, आज से दो वर्ष पहले की। वाणिज्य विभाग का मुखिया होने के कारण एक बैठक में पर्यवेक्षकों के साथ विभिन्न खण्डों की आय पर परिचर्चा कर रहा था। पिछले वर्ष की तुलना में कम आय दिखाने वाले एक दो पर्यवेक्षकों की खिचाई हुयी। उसके बाद प्रफुल्लित मन से लाभ देने वाले खण्डों पर दृष्टि गयी तो झाँसी-महोबा-बाँदा-मानिकपुर खण्ड की आय में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि थी। सड़कों की बुरी स्थिति व बसों का तीन-चार गुना किराया कारण तो थे पर ऐसी स्थिति तो कई वर्षों से थी। कुछ अवश्य ही अलग कारण था इस वर्ष। पर्यवेक्षक से पूछने पर आशा थी कि वह अपने प्रयासों के विशेष योगदान की स्तुतियाँ गायेगा पर जब उस संवेदनशील ने बोलना प्रारम्भ किया तो उसके नयन आर्द्र थे और गला रुद्ध। वार्ता का सार यह था।

इस वर्ष गाँव के गाँव दिल्ली और पंजाब की ओर पलायन कर रहे हैं। केवल वृद्ध रह गये हैं घरों की रखवाली के लिये। पशुओं को छोड़ दिया गया है अपना चारा ढूढ़ने को, इस आशा में कि वे स्वयं को जीवित रख सकेंगे पालकों के वापस आने तक। दिल्ली में नये निर्माण में व पंजाब में खेतों में काम मिलने का आसरा है इनको। खेत धूप की तीव्रता सह सह चटक चुके हैं। न कोई गुड़ाई करने वाला, न उन पर बनी मड़ैया से उन्हें ममतामयी दृष्टि से निहारने वाला, न बैलों के गले बँधे घुँघुरुओं की छन-छन, न पेड़ के नीचे कोई सूखी रोटी प्याज-नमक के साथ खाने वाला। जमीन के लिये जान लेने और देने की बातें करने वाले, अपनी अपनी जमीन को त्यक्तमना छोड़ पलायन कर गये हैं। पिछले दो वर्षों से आँखें आसमान पर टिकाये रहने से थक गये निवासी अपने लिये नयी छत ढूढ़ने समृद्धदेश चले गये हैं। जल स्तर भी मुँह मोड़ पाताल में समा गया। तालाब कीचड़ का संग्रहालय बन गये हैं।

उल्लिखित खण्ड उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश को दसियों बार काटता है। मानचित्र पर लकीर खीचते समय तो कई बारीकियों के कारण खिचपिच मचा चुके लोग, यहाँ के निवासियों की दुर्दशा को मानसूनी कारण का कफन उढ़ा चुके हैं। आल्हा ऊदल की नगरी और तालों का नगर कहे जाने वाले महोबा में जब पानी के टैंकरों से पानी लूटने में हत्यायें होते देखता हूँ तो सारा अस्तित्व ही सिहर उठता है। यही स्थिति रही तो गाँव के साथ साथ नगर भी त्यक्त हो जायेंगे। जब तक दुर्दशा रहेगी, आय में वृद्धि रहेगी। जब दुर्दशा पूर्ण होगी तब न कोई जाने वाला रहेगा और न ही कुछ आय होगी।

बढ़ी हुयी आय के पीछे एक समग्र दुर्दशा देखकर मन चीत्कार कर उठा। कुछ बोल नहीं सका, आँख बन्द कर बैठा रहा। मेरे स्वभाव से परिचित सभी पर्यवेक्षक भी बिना कुछ बोले कक्ष से चले गये। घर आकर बिना कुछ खाये ही भारी पलकें नींद ले आयीं।

कल कई ब्लॉगरों की संस्तुति पर "पीप्ली लाइव" देखने गया तो दो वर्ष पुराना घाव पुनः हरा हो गया। अपने बुन्देलखण्ड में वीरों के रक्तयुक्त इतिहास को अश्रुयुक्त भविष्य में परिवर्तित होते देख मन पुनः खट्टा हो गया।

कल झाँसी बात की, उस खण्ड की आय पूछी, आय अब भी बढ़ रही है।

आप भी दो आँसू टपका लें। खबर पक्की है, दुर्दशा जारी है।

8.9.10

माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं


जीवन में विधि ने लिख डाले, कुछ दुख तेरे, कुछ मेरे हैं,

जीना संग है, फिर क्यों मन में, एकाकी भाव उकेरे हैं ।

ढालो शब्दों में, बतला दो, पीड़ा आँखों से जतला दो,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।१।।

 

भटके हम दोनों मन-वन में,

पर बँधे रहे जीवन-क्रम में,

बन प्राण मिला वह जीवन को, 

घर तेरा है, सज्जित कर लो ।

क्यों सम्बन्धों के आँगन में, अब आशंका के डेरे हैं,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।२।।

 

निश्चय ही जीवन को हमने,

पाया तपते, मन को जलते,

क्यों पुनः बवंडर बन उठतीं,

मन भूल गया स्मृतियाँ थीं ।

आगन्तुक जीवन-सुख-रजनी, क्यों चिंता-स्याह घनेरे हैं,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।३।।

 

अति शुष्क हृदय है, यदि सुख की,

आकांक्षा रह रहकर उठती,

मन में क्यों दुख-चिन्तन आये,

मिल पाये नहीं जो सुख चाहे ।

अर्पित कर दूँगा सुख जो भी, आमन्त्रण से मुँह फेरे हैं,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।४।।

 

क्यों मन, आँखें उद्विग्न, भरी,

पड़ती छाया आगत-दुख की,

पहले क्यों शोक मनायेंगे, 

दुख आयेंगे, सह जायेंगे ।

तज कातरता निश्चिन्त रहो, मेरी बाहों के घेरे हैं,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।५।।

 

यहीं बसेरा हम दो कर लें, 

जीवन-घट, सुख लाकर भर लें,

और परस्पर होकर आश्रित, 

सुख-आलम्बन बन जायें नित ।

जीवन छोटा, संग रहने को, पल मिले नहीं बहुतेरे हैं,

मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरे हैं ।।६।।