8.9.10

पीड़ा कह दो

जीवन में विधि ने लिख डाले, कुछ दुख तेरे, कुछ मेरे हैं,
जीना संग है, फिर क्यों मन में, एकाकी भाव उकेरे हैं ।
ढालो शब्दों में, बतला दो, पीड़ा आँखों से जतला दो,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।१।

भटके हम दोनों मन-वन में,
पर बँधे रहे जीवन-क्रम में,
बन प्राण मिला वह जीवन को,
घर तेरा है, सज्जित कर लो ।
क्यों सम्बन्धों के आँगन में, अब आशंका के डेरे हैं,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।२।

निश्चय ही जीवन को हमने,
पाया तपते, मन को जलते,
क्यों पुनः बवंडर बन उठतीं,
मन भूल गया स्मृतियाँ थीं ।
आगन्तुक जीवन-सुख-रजनी, क्यों चिंता-स्याह घनेरे हैं,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।३।

अति शुष्क हृदय है, यदि सुख की,
आकांक्षा रह रहकर उठती,
मन में क्यों दुख-चिन्तन आये,
मिल पाये नहीं जो सुख चाहे ।
अर्पित कर दूँगा सुख जो भी, आमन्त्रण से मुँह फेरे हैं,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।४।

क्यों मन, आँखें, उद्विग्न, भरी,
पड़ती छाया आगत-दुख की,
पहले क्यों शोक मनायेंगे,
दुख आयेंगे, सह जायेंगे ।
तज कातरता निश्चिन्त रहो, मेरी बाहों के घेरे हैं,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।५।

यहीं बसेरा हम दो कर लें,
जीवन-घट, सुख लाकर भर लें,
और परस्पर होकर आश्रित,
सुख-आलम्बन बन जायें नित ।
जीवन छोटा, संग रहने को, पल मिले नहीं बहुतेरे हैं,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।६।



अर्चना चावजी की सुझायी धुन पर गाने को दुस्साहस किया है। थोड़ा सुन लें।

71 comments:

  1. Bahut sunder aur aapki awaaz mein aapki kavita aur bhi achchi lagti hai. Shubhkaamnayen!

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  2. वाह!! बहुत उम्दा रचना और वैसा ही पठन..आनन्द आ गया. अब तो आप गा कर ही पेश किया करो..बहुत बेहतरीन रही प्रस्तुति!

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  3. ... बेहतरीन !!!

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  4. जैसा कि सब कह रहे है...उम्दा प्रस्तुति ...और आवाज ने तो चार चाँद लगा दिया ....

    आप तो हिंदी के एक तारे हो और ईश्वर से शुभकामना है कि आप ऐसे ही चमकते रहें ...

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  5. पठन रंजन श्रवण रंजन द्विगुणित मनोरंजन -

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  6. आगन्तुक जीवन-सुख-रजनी, क्यों चिंता-स्याह घनेरे हैं,


    मत्रमुग्ध हूँ मैं इतने ही पर...तन्द्रा में लौटूं तो कुछ और कहूँ :)

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  7. "यहीं बसेरा हम दो कर लें,
    जीवन-घट, सुख लाकर भर लें,
    और परस्पर होकर आश्रित,
    सुख-आलम्बन बन जायें नित"
    बहुत सुन्दर रचना. इससे अधिक कुछ कहने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं.

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  8. सुनने में ज्यादा मजा आया... आसान लगा..

    बहुत सुन्दर...

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  9. जीवन में विधि ने लिख डाले, कुछ दुख तेरे, कुछ मेरे हैं,
    जीना संग है, फिर क्यों मन में, एकाकी भाव उकेरे हैं ।
    ढालो शब्दों में, बतला दो, पीड़ा आँखों से जतला दो,
    मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।१।
    और

    यहीं बसेरा हम दो कर लें,
    जीवन-घट, सुख लाकर भर लें,
    और परस्पर होकर आश्रित,
    सुख-आलम्बन बन जायें नित ।
    जीवन छोटा, संग रहने को, पल मिले नहीं बहुतेरे हैं,
    मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।६।
    रचना की एक एक पंम्क्ति दिल को छू गयी मगर ये पँक्तियाँ लाजवाब हैं। बधाई और आशीर्वाद।

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  10. बहुत खूबसूरती से आपने अपने आवाज़ में गाया है अपनी कविता को...बहुत अच्छी लगी आपकी कविता और ये पेशकश

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  11. बेहद सुन्दर और भावप्रवण गीत्………………अगर गाया जाता तो और कमाल करता।

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  12. अर्पित कर दूँगा सुख जो भी, आमन्त्रण से मुँह फेरे हैं,
    मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।४।

    वाह,लाजवाब !

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  13. सुन्दर कविता और उम्दा कविता पाठ

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  14. वाह बेहतरीन पठन आनंद आया.

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  15. बहुत खुब सुरत कविता जी ओर आवाज ने तो सच मै सोने पर सुहाग कर दिया. धन्यवाद

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  16. क्यों मन, आँखें, उद्विग्न, भरी,
    पड़ती छाया आगत-दुख की,
    पहले क्यों शोक मनायेंगे,
    दुख आयेंगे, सह जायेंगे ।
    तज कातरता निश्चिन्त रहो, मेरी बाहों के घेरे हैं..

    वाह ... मज़ा आ गया .. लगता है जैसे कोई मधुर गीत हो ... पढ़ते पढ़ते छन्द मय हो गये ...
    बहुत सुंदर आशावादी बोल ... दुक्खों को सहना ही जीवन है ...

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  17. जीवन में विधि ने लिख डाले, कुछ दुख तेरे, कुछ मेरे हैं,
    जीना संग है, फिर क्यों मन में, एकाकी भाव उकेरे हैं ।

    तबियत खुश हो गई ... सुन्दर प्रस्तुति....आभार.

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  18. आपकी आवाज नहीं आ रही थी | कविता बहुत बढ़िया है |

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  19. बहुत सुंदर कविता .....आपके स्वर भी सुंदर हैं

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  20. प्रवीणजी
    बहुत सुन्दर रचना हर पंक्ति लाजवाब और माधुर्य मयआवाज के साथ पठन|
    छा गये है आज तो आप |
    आभार

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  21. वाह !!
    आप इतनी गंभीर कविता भी लिखते हैं !!
    बहुत बधाई !!

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  22. अति शुष्क हृदय है, यदि सुख की,
    आकांक्षा रह रहकर उठती,
    मन में क्यों दुख-चिन्तन आये,
    मिल पाये नहीं जो सुख चाहे ।
    अर्पित कर दूँगा सुख जो भी, आमन्त्रण से मुँह फेरे हैं,
    मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।

    Praveen ji,
    bahut khubsurat aur bhavpoorna panktiyan likhi hain apne...padh kara achchhaa laga.
    Shubhkamnayen.
    Poonam

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  23. एक ही शब्द है मेरे पास 'बेहतरीन'

    और कुछ कहना इस रचना से मिलने वाले आनंद को कम करना होगा और इसकी सुंदरता को आंकने का दुस्साहस करने वाली बात होगी.

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  24. धन्यवाद .....आपने गाया......बधाई...मुझे बहुत अच्छा लगा..

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  25. क्यों मन, आँखें, उद्विग्न, भरी,
    पड़ती छाया आगत-दुख की,
    पहले क्यों शोक मनायेंगे,
    दुख आयेंगे, सह जायेंगे ।
    तज कातरता निश्चिन्त रहो, मेरी बाहों के घेरे हैं,
    मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।५


    बहुत सुन्दर गीत मन के भावों से ओत प्रोत ...सुन कर आनंद आ गया ....मन को छूती सी प्रस्तुति

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  26. आवाज़ और शब्द दोनों ही दिल को छूने वाले है।
    अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई। आगे भी ऐसे दुस्साहस करते रहें
    शुभकामनायें।

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  27. बाप रे, इतनी कड़ी हिन्दी कविता लिखते हैं आप!

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  28. कविता के रूप में आपकी पर्सनैलिटी का यह अलग अंदाज़ बहुत अच्छा लगा...

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  29. बहुत खूबसूरत कविता लगी।
    पैरा ४ एवम ५ विशेष रूप से अच्छे लगे।
    ऐसे दुस्साहस और भी होते रहें तो अच्छा लगेगा:)

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  30. हम पहिले भी कहे हैं कि हमको तुलना पसंद नहीं है..लेकिन कभी कभी मन लोभ सम्बरन नहीं कर पाता है...कबिता पढकर सब्द के जादू से तो हम मोहित हो गए,लेकिन जब सस्वर पाठ सुने तब लगा कि कबिबर नीरज का कबिता पाठ सुन रहे हैं... प्रवीन जी अति सुंदर!!

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  31. suna aur pasand bhi aaya, samet aapki awaz ke. aap kyn nahi vocal blog ke baare me sochte.......

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  32. सुनने वाला वर्जन ज्यादा अच्छा लगा. बेहतरीन !

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  33. बहुत सुन्दर गीत। जिसे बहु-आयामी की परिभाषा न पता हो उसे आपके ब्लॉग का पता देना चाहिये।

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  34. जीवन में विधि ने लिख डाले, कुछ दुख तेरे, कुछ मेरे हैं,
    जीना संग है, फिर क्यों मन में, एकाकी भाव उकेरे हैं ।
    ढालो शब्दों में, बतला दो, पीड़ा आँखों से जतला दो,
    मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।१।
    Bahut hee sunder prastuti Praween ji

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  35. praveen ji..shbdon ka chayan utkrisht hai..too gud!

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  36. क्यों मन, आँखें, उद्विग्न, भरी,
    पड़ती छाया आगत-दुख की,
    पहले क्यों शोक मनायेंगे,
    दुख आयेंगे, सह जायेंगे ।
    तज कातरता निश्चिन्त रहो, मेरी बाहों के घेरे हैं,

    जीवन से भरी रचना। पढना तो सुखकर है ही, सुनना उससे भी ज्यादा सुखकर है। निश्चित ही इसमें मनोरंजन के अलावा भी बहुत कुछ है। बधाई।

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  37. .
    बहुत बेहतरीन प्रस्तुति!
    .

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  38. यहीं बसेरा हम दो कर लें,
    जीवन-घट या मरघट के फेरे हैं :)

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  39. @ Anjana (Gudia)
    बहुत धन्यवाद उत्साहवर्धन का।

    @ Udan Tashtari
    गाना गाने का हौसला तो आपसे ही आया है। जब तक आपको भाता रहेगा, यह बन्दा गाता रहेगा।

    @ 'उदय'
    बहुत धन्यवाद उत्साहवर्धन का।

    @ राम त्यागी
    इस गीत तो गाने के लिये कितनी मुलैठी खायी है, आपको क्या मालूम। गीत की पीड़ा हृदय में भले ही न उतरी हो, गले में अवश्य उतर गयी।

    @ Arvind Mishra
    भारी स्वरों को सुनना, भारी शब्दों को पढ़ना, उस पर भी प्रसन्नता। बड़ी भारी पड़ी होगी आपको।

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  40. आप की रचना 10 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

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  41. सुन्दर प्रस्तुति।

    यहाँ भी पधारें :-
    No Right Click

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  42. पता है...ढूंढें कोई शब्द नहीं मिल रहा जिसमे बाँध अपने भावों को टिपण्णी रूप में यहाँ रख सकूँ...

    चिरंजीवी भव...

    ऐसे ही लिखते रहें....बहुत बहुत सुन्दर !!!!

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  43. भटके हम दोनों मन-वन में,
    पर बँधे रहे जीवन-क्रम में,
    बन प्राण मिला वह जीवन को,
    घर तेरा है, सज्जित कर लो ।
    क्यों सम्बन्धों के आँगन में, अब आशंका के डेरे हैं,
    मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।२।बहुत अच्छा लिखा है। आभार।

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  44. @ Avinash Chandra
    जीवन-सुख-रजनी में स्वप्न देखते देखते कई बार तो हम भी खो जाते हैं। बहुत धन्यवाद आपका।

    @ P.N. Subramanian
    आशीर्वाद बरसाने का आभार।

    @ रंजन
    आपने गाने को प्राथमिकता दे भविष्य में और सुनने का न्योता दे दिया है।

    @ निर्मला कपिला
    पहले लग रहा था पता नहीं कि सुधीजनों की क्या प्रतिक्रिया होगी। आशीर्वादात्मक शब्द सुनकर संबल बढ़ गया।

    @ abhi
    अपनी आवाज़ का अन्दाज़ स्वयं को नहीं होता है, पर औरों को भी भायेगी, इसका इतना विश्वास नहीं था।

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  45. @ वन्दना
    इतने दिन की मेहनत के बाद गाया है, हाँ संगीत भी दिया जा सकता है, किसी को पकड़ना पड़ेगा इसके लिये भी।

    @ पी.सी.गोदियाल
    आप कविगणों को अच्छा लगा, सीना फूल गया।

    @ rashmi ravija
    बहुत धन्यवाद।

    @ shikha varshney
    पता नहीं पढ़ना सरल है कि सुनना। अब तो पुनः गाने के लिये उत्साह बढ़ गया।

    @ राज भाटिय़ा
    बहुत धन्यवाद आपका।

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  46. @ दिगम्बर नासवा
    भविष्य के भय की अग्नि में वर्तमान क्यों तिरोहित किया जाये।

    @ महेन्द्र मिश्र
    आप जैसे कविमना प्रसन्न हो गये, कविता धन्य हो गयी।

    @ नरेश सिह राठौड़
    बहुत धन्यवाद आपका।

    @ अर्चना तिवारी
    सुर सुझाया हुआ है पर भाव लिखने वाले ही हैं स्वर में।

    @ शोभना चौरे
    आपका आशीर्वाद ही पर्याप्त है मन प्रसन्न रखने के लिये। आभार।

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  47. @ संगीता पुरी
    दो व्यक्तियों के संग रहने में ये भाव तो प्राकृतिक रूप से ही टपकेंगे। अस्तित्व तो संगमना का है।

    @ JHAROKHA
    बहुत धन्यवाद आपका। मुझे आशा नहीं थी की आशीर्वाद का निर्झर बह निकलेगा।

    @ अनामिका की सदायें .....
    आपकी कवितायें पढ़कर मुझे भी उसी गहराई में उतरने का अनुभव होता है।

    @ Archana
    गाने की सारी प्रेरणा तो आप हैं, अतिशय धन्यवाद।

    @ संगीता स्वरुप ( गीत )
    बहुत धन्यवाद आपका।

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  48. @ डॉ. मोनिका शर्मा
    दुस्साहस के आगे की स्थिति उत्पात की ही होती है।

    @ काजल कुमार Kajal Kumar
    पर आप तो इस पर भी कार्टून बना सकते हैं।

    @ महफूज़ अली
    पहले थोड़ी व्यक्तिगत सी लगी थी पोस्ट करने के लिये पर मुझे लगा कि आप में से बहुतों के भाव इस प्रकार के उदार होंगे अपने जीवन साथी के लिये। यही कारण रहा कि पोस्ट कर दिया।

    @ मो सम कौन ?
    बहुत धन्यवाद आपका। 5वाँ मुझे भी सबसे अच्छा लगता है।

    @ चला बिहारी ब्लॉगर बनने
    आपकी तुलना के बाद नीरज जी के कई पाठ सुने, सुनकर आनन्द आ गया। उनके चरण तक पहुँचने में ही मुझे बहुत समय लगेगा।

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  49. @ Sanjeet Tripathi
    एक बार गाने में ही गले ने बहुत दाँय मचायी। ब्लॉग प्रारम्भ किया तो गला महाराज विद्रोह कर देंगे।

    @ अभिषेक ओझा
    वाह, तब भविष्य में और सुनने को तैयार रहिये।

    @ Smart Indian - स्मार्ट इंडियन
    हमारे आयाम तो मानसिक व्यायाम तक ही सीमित हैं। गले को हिला कर तुर्रम खाँ बनने का दुस्साहस किया है, आप लोगों को पसन्द भी आ गया। आभार।

    @ Mrs. Asha Joglekar
    बहुत धन्यवाद आपका।

    @ Parul
    बहुत धन्यवाद आपका।

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  50. @ विनोद शुक्ल-अनामिका प्रकाशन
    जब भी मैं अपनी यह रचना पढ़ता हूँ, सहजीवन की प्रेरणा और प्रखर हो जाती है।

    @ ZEAL
    बहुत धन्यवाद आपका।

    @ cmpershad
    नया आयाम इस कविता के लिये।

    @ अनामिका की सदायें ......
    बहुत धन्यवाद।

    @ Kirtish Bhatt, Cartoonist
    बहुत धन्यवाद।

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  51. @ सत्यप्रकाश पाण्डेय
    बहुत धन्यवाद।

    @ रंजना
    निश्चय ही और अच्छा लिखना होगा, आपके आशीर्वाद का मान जो रखना है।

    @ शोभा
    बहुत धन्यवाद आपका।

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  52. प्रवीण जी नमस्कार! आपकी कविता मेँ शब्दोँ का चयन बहुत ही सटीक हैँ। लाजबाव हैँ आपकी रचना। और आवाज ने तो जादु कर दिया। आभार! -: VISIT MY BLOG :- जब तन्हा होँ किसी सफर मेँ ............... गजल को पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ। आप इस लिँक पर क्लिक कर सकते हैँ।

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  53. अद्भुत लिखा है प्रवीण जी.

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  54. आगन्तुक जीवन-सुख-रजनी,
    क्यों चिंता-स्याह घनेरे हैं
    बहुत सुन्दर
    रचना की एक एक पंम्क्ति दिल को छू गयी कविता पाठ वाह,लाजवाब

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  55. सुंदर कविता और उतना ही प्रभावशाली कविता पाठ... दिनकर, प्रसाद जैसी कविता लग रही है..

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  56. @ Dr. Ashok palmist blog
    बहुत धन्यवाद आपका।

    @ Shiv
    आपको किसी को अद्भुत की संज्ञा देना, उस विषय पर दो बार सोचने पर विवश करता है। समझ नहीं आता कि आत्ममुग्ध हो जाऊँ या यह सोचूं कि क्या छूट गया हो अभिव्यक्ति में।

    @ रचना दीक्षित
    बहुत धन्यवाद आपका।

    @ arun c roy
    प्रसाद,निराला व दिनकर के साहित्यिक छाँव में लिखना सीखा। उन वटवृक्षों की एक पत्ती बन हरा भरा रहूँ, यही उपलब्धि रहेगी मेरे लिये।

    @ Harsh
    बहुत धन्यवाद।

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  57. सच पूछिए,जो आँखें कह देती हैं,कर देती हैं वह दूसरा कोई नहीं कर सकता !

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  58. @ संतोष त्रिवेदी ♣ SANTOSH TRIVEDI
    आँखों की भाषा भावमयी होती है।

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  59. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 14 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  60. क्यों मन, आँखें, उद्विग्न, भरी,
    पड़ती छाया आगत-दुख की,
    पहले क्यों शोक मनायेंगे,
    दुख आयेंगे, सह जायेंगे ।
    तज कातरता निश्चिन्त रहो, मेरी बाहों के घेरे हैं,
    मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।५।

    बहुत सुंदर भाव-
    और सुंदर लेखन -
    शुभकामनाएं

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  61. अपनी रचना वटवृक्ष के लिए भेजिए - परिचय और तस्वीर के साथ
    '
    ye wali aur aap jo chahen-
    rasprabha@gmail.com per

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  62. बहुत्त खूब

    दुख आयेंगे, सह जायेंगे ।
    तज कातरता निश्चिन्त रहो, मेरी बाहों के घेरे हैं,
    मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिक-दृग-नीर बिखेरें हैं।५।

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  63. @ संगीता स्वरुप ( गीत )
    बहुत धन्यवाद आपका।

    @ anupama's sukrity !
    हार्दिक धन्यवाद।

    @ रश्मि प्रभा...
    पता नहीं इस सम्मान योग्य हूँ कि नहीं?

    @ anitakumar
    बहत धन्यवाद।

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  64. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 04- 08 - 2011 को यहाँ भी है

    नयी पुरानी हल चल में आज- अपना अपना आनन्द -

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  65. आज रचना पुनह पढ़ी और आपका गायन भी सुना ...दोनों में ही ह्रदय के भाव पूर्ण रूप से मुखरित हो रहे हैं ....!!
    बहुत सुंदर भाव..!!

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  66. बहुत खूबसूरत और सहभागिता भरे कोमल भाव .....

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  67. यहीं बसेरा हम दो कर लें,
    जीवन-घट, सुख लाकर भर लें,
    और परस्पर होकर आश्रित,
    सुख-आलम्बन बन जायें नित ।

    बेहद खूबसूरती से पिरोई दिल को छू जाने वाली रचना.
    सादर,
    डोरोथी.

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  68. आपकी इस कविता से मुझे आपही ने परिचित कराया,पढ़कर मन अभिभूत हुआ जिये शब्दों में अभिव्यक्त करना मेरे लिये संभव नहीं। आपकी अनुमति से आपकी इस पोस्ट का लिंक अपने फेसबुक ग्रुप चिंतन पर भी डाला है

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  69. Anonymous20/9/12 18:32

    God bless you Friend, After a long long time gone thru some emotional heart touching lines.... Got relaxed and recharged... Keep writing, ur orating power is superb...
    Regds
    Gyanendra Bhaskar

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