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5.11.19

अभ्यास और वैराग्य - २३

ध्यान के समय ध्येय, ध्याता और ध्यान रहते हैं। ध्येय में भी तीन तत्व रहते हैं, शब्द, प्रत्यय और अर्थ। शब्द उसका नाम है, प्रत्यय उसके बारे में ज्ञान है और अर्थ वह वस्तु या विषय स्वयं। पद शब्द है और पदार्थ उस शब्द का वास्तविक स्वरूप, जो पद को अर्थ दे। लड्डू शब्द है, उसका गोल होना, मीठा होना उसके बारे में ज्ञान है और स्वयं ही लड्डू अर्थ है।

ध्यान के समय हम ध्येय के बारे में प्रत्यय की एकतानता करते हैं। समाधि में यही इतनी गहरी हो जाती है कि उस स्थिति में शेष कुछ न होकर मात्र अर्थ ही रह जाता है। तब न ध्येय रहता है, न शब्द, न प्रत्यय, न ध्याता। न इस बात का भान कि ज्ञान हो रहा, न इस बात का भान कि ध्यान हो रहा है, न उस बात का भान कि मैं ध्यान कर रहा हूँ। सब मिलकर अर्थ में लीन हो जाते हैं। यह समझने में तनिक कठिन लगता है क्योंकि हमारी लौकिक समझ ज्ञान के पर्यन्त नहीं जा पाती है। 

एक लौकिक उदाहरण लेते हैं। जब हम कोई फिल्म देख रहे होते हैं तो कभी कभी किसी पात्र के साथ स्वयं को इतना जोड़ लेते हैं कि उसके भाव हमारे भाव हो जाते हैं। यदि वह कष्ट में होता है तो हमें कष्ट होने लगता है, यदि वह हँसता है तो हम हँस देते हैं। यह वही समाधि की स्थिति है, न फिल्म, न अभिनेता, न हाल, न कुर्सी, न यह भान कि फिल्म देखी जा रही है। न अभिनेता का नाम, न उसका अन्य ज्ञान। बस उसका अर्थ, उसका भाव प्रस्फुट हो जाता है। संभवतः यही आधार रहा होगा जिस पर कश्मीर के उद्भट विद्वान अभिनवगुप्त ने यह सिद्ध किया कि नाट्यशास्त्र में रस की उत्पत्ति चित्त में ही होती है। जिसके कारण रस उत्पन्न होता है, वे बस उद्दीपन मात्र हैं।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः॥३.३॥ सूत्र का एक एक शब्द समाधि का वर्णन कर रहा है। तत् एव अर्थ मात्र निर्भासं स्वरूपशून्यम् इव समाधिः। तत् अर्थात ध्यान की स्थिति में, अर्थ मात्र निर्भासं अर्थात केवल अर्थ का भान, स्वरूपशून्यं अर्थात न स्वयं का ज्ञान, न वस्तु के स्वरूप का ज्ञान। कहा जाता है कि ईश्वर सत, चित और आनन्द स्वरूप है। यदि हम ईश्वर के आनन्द स्वरूप पर धारणा करते हैं, किसी चित्र के माध्यम से या अर्चविग्रह पर देशबंध करके। आँख बन्द करके ध्यान में उतर जाते हैं। ध्यान की स्थिति में ईश्वर के आनन्द स्वरूप के बारे में जो भी हमारा ज्ञान है, उसी के विचार स्मृतिवृत्ति के माध्यम से चित्त में आने लगेंगे, कोई अन्य वृत्ति नहीं। ध्यान करते करते जब केवल ईश्वरीय आनन्द शेष रह जाये और कुछ न रहे, तब समाधि होती है। उस आनन्द का प्रत्ययात्मक स्वरूप प्रत्यक्षात्मक स्वरूप में बदल जाये, ध्येय के स्वभाव से सब प्रकाशित हो जाते, वह समाधि है।

शब्द नहीं रहा, ज्ञान भी नहीं रहा, बस अर्थ रहा। मुझे ज्ञान हो रहा है, इस बात का ज्ञान भी न रहा, अर्थ के अतिरिक्त कुछ और न रहा, अर्थ मात्र निर्भास रहा। ध्याता और ध्यान का बोध नहीं रहा। ध्येय में शब्द का और उसके ज्ञान का भी ज्ञान न रहा है, सब अर्थ में लीन हो गया।

कई व्याख्या हैं। परमात्मा के आनन्द स्वरूप का ध्यान, अभी तीनों हैं, परमात्मा, आनन्द स्वरूप और ध्यान। जब केवल आनन्द रह जाता है, कुछ और नहीं, तो समाधि है। गवेषणा की दृष्टि से देखें, तो समाधि में खोज समाप्त हो जाती है। ध्यान में गवेषणा चलती रहती है, मन में उसके चित्र बनते रहते हैं, प्रत्ययात्मकता बनी रहती है, यह ऐसा होगा, वैसा होगा, यह आकार होगा इत्यादि। जब वह वस्तु प्रत्यक्ष मिल जाती है तो गवेषणा समाप्त हो गयी, यह स्वरूपशून्य की परिभाषा है। स्वरूपशून्य की दो और परिभाषा भी हैं, ध्याता के स्वरूप से शून्य और ध्यान के स्वरूप से शून्य। व्यास किन्तु प्रत्ययात्मक स्वरूप से शून्य होने की बात करते हैं। क्या था, कैसा था, उन सबसे शून्य हो जाना। जब वस्तु आ जायेगी, प्रत्यक्ष हो जायेगा, तब समाधि है। ध्येय स्वभाव आवेश को समाधि कहते हैं। समाधि पिछले ७ अंगों का प्रतिफल है।

धारणा, ध्यान और समाधि की यात्रा को यदि समग्र रूप से देखें तो यह एक प्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष की यात्रा है। धारणा में जो प्रत्यक्ष था वह अन्य वृत्तियों, अन्य प्रत्ययों से आच्छादित था। जब ध्यान के द्वारा अन्य वृत्तियों को हटाया और उसी के बारे में ज्ञानवृत्तियों को समेटा तो शेष सब आच्छादन हट कर वस्तु का परिपूर्ण प्रत्यक्ष हुआ, यह समाधि की स्थिति है।

समाधि की अनुभूतित इस परिभाषा को जानने से, वस्तुओं और उनके ज्ञान के बारे में कुछ तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं। पहला यह कि सारा घटनाक्रम चित्त में हो रहा है और समाधि आने पर अर्थ चित्त में ही प्रस्फुटित होता है। हम इन्द्रियों से वस्तु का प्रत्यक्ष अवश्य करते हैं पर उसकी संरचना और स्वरूप चित्त में ही बनता है। रस आदि भी चित्त में ही उदित होते हैं। देखा जाये तो एक पूरा का पूरा वही संसार बसता है चित्त में भी। यत्मुण्डे तत्ब्रह्माण्डे, इस पर व्याख्या फिर कभी। जो हम जानते नहीं, वह हमारे लिये हैं भी नहीं। उसी वस्तु को बाहर देखने से उसको उन सबसे जोड़कर देखते हैं जो कि उससे मुख्यतः असम्बद्ध हैं। उन्हीं वस्तुओं को धारणा, ध्यान और समाधि के माध्यम से देखते हैं तो वह दर्शन सम्यक परिप्रक्ष्य में होता है, संबंध अर्थपूर्ण होता है, सही दृष्टा के परिप्रेक्ष्य में होता है।

दूसरा तथ्य यह कि जानने की सीमा से भी आगे है, होने की सीमा। ज्ञान से विज्ञान की यात्रा। विषय में समाधिस्थ होकर इतना उतर जाते हैं कि उस समय केवल अर्थ रहता है, केवल विषय रहता है, केवल वस्तु रहती है, ज्ञान की इससे परे भला और क्या सीमा होगी?

तीसरा तथ्य यह कि समाधि अन्त नहीं वरन प्रत्यक्ष का प्रारम्भ है, ज्ञान का प्रारम्भ है। समझने की ऐसी प्रक्रिया है जो सघन है, सान्ध्रित है, सम्पूर्ण है। इस प्रक्रिया से स्थूल, सूक्ष्म, आत्म आदि विषयों का परिचय होता है, प्रज्ञा आती है, ज्ञान से समझ और भी प्रकाशित हो जाती है, अस्पष्टता से स्पष्टता आ जाती है। अन्त में जब प्रत्ययात्मकता की परिपक्वता आती है, कुछ और जानना शेष नहीं रहता है, तब परवैराग्य के आने पर ऋतम्भरा प्रज्ञा आती है, सत्य को प्रभासित करने वाली प्रज्ञा।

सही ज्ञान का प्रस्फुटन हमें सही कर्म करने को प्रेरित करता है। योगः कर्मषु कौशलम्। जो अधिक जानता है वह अधिक कुशल भी है।


अगले ब्लाग में संयम की प्रक्रिया।

26.7.19

मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा

पतंजलि योग सूत्र के प्रथम पाद समाधिपाद के ३३ वें सूत्र में है यह उल्लेख। कुल १९६ सूत्रों में संकलित यह दर्शन, अन्य आधुनिक दर्शनों की भाँति बुद्धिविलास या शब्द-मृगालजाल नहीं अपितु एक करणीय और अनुभवजन्य प्रक्रिया है। योग के बारे में जितने लोगों से बात की, कुछ को छोड़कर शेष सभी की जानकारी या तो अपरिपूर्ण पायी या एकपक्षीय । वह तो भला हो कि विगत कुछ वर्षों से योग जैसे संस्कृति-रत्न को समुचित प्रचार व मान मिला है नहीं तो योग मात्र कुछ कठिन और जटिल शरीर-मुद्राओं के रूप में जनमानस में प्रचलित था। मेरे लिये और मेरे जैसे अनेकों भारतीयों के लिये कारण एक ही था कि कभी भी हमने मूल पाठ करने का प्रयत्न ही नहीं किया। और जब अन्ततः अर्धज्ञान से विक्षिप्त हो मूलपाठ करना पड़ा तब लगा कि हमें बचपन से संस्कृत क्यों नहीं पढ़ायी गयी, ऐसे रत्नों के बारे में क्यों नहीं बताया गया। केवल १९६ सूत्र, एक दिन से भी कम समय लगता, यदि संस्कृत आती होती या कोई बताने वाला रहता। न मिले अवसरों के बारे में, शिक्षा पद्धति के बारे में, संस्कृति और संस्कृत के बारे में फिर कभी चर्चा।

बीच से सूत्र प्रारम्भ करने से संदर्भरहित स्थिति उत्पन्न होने का भय है अतः प्रथम से ३२ वें सूत्र तक का सारांश रख देना उचित रहेगा। चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। तब दृष्टा अपने स्वरूप में आता है अन्यथा वह वृत्तियों के सारूप्य रहता है। वृत्तियाँ ५ हैं, प्रमाण, विपर्याय, विकल्प, निद्रा, स्मृति। अभ्यास और वैराग्य से वह निरोध आता है। अपनी स्थिति पर यत्नपूर्वक बने रहना अभ्यास है, इन्द्रिय विषयों से वितृष्णा वैराग्य है। प्रकृतिलय और विदेह अभ्यास व वैराग्य की परिपक्व स्थितियाँ है, इनके लिये समाधि सहज है। शेष सबको श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञापूर्वक योग सिद्ध करना होता है। या ईश्वर की शरणागति से यह शीघ्र सिद्ध हो जाती है। ईश्वर क्लेश, कर्म, विपाक व आशय से रहित और पुरुषविशेष है। वह सर्वज्ञ, सबका गुरू व काल से अवच्छेद है। ओंकार उसका नाम है। ओंकार जपने से ईश्वर का भाव आता है जिससे ९ चित्तविक्षेप सह ५ विघ्न नष्ट हो जाते हैं।

तत्पश्चात पतंजलि चित्तविक्षेप रोकने हेतु अन्य उपायों की चर्चा करते हैं। एकतत्व अभ्यास चित्त को सप्रयास एक तत्व पर बार बार लगाने को कहते हैं। दूसरा उपाय इस लेख का शीर्षक है। सुखी, दुखी, पुण्यात्मा व पापात्मा से क्रमशः मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा का भाव रखने से चित्त शुद्ध होता है। चित्त को साधने के वर्णित उपाय मुख्यतः आध्यात्मिक, बौद्धिक या शारीरिक  स्तर पर हैं। यह उपाय सामाजिक स्तर पर कार्य करता है। योग को पूर्णतः व्यक्तिगत या आन्तरिक प्रक्रिया मान लेना एक संकुचित दृष्टि है। योग की व्याप्ति पूर्ण है। योगः कर्मषु कौशलम् । श्रीकृष्ण इस तथ्य को उच्चारित करते हैं कि कर्मों में कौशल योग से ही है।

समाज में रहने के कारण कई वाह्य कारक हमें जाने अनजाने प्रभावित करते रहते हैं। किससे किस प्रकार का व्यवहार करना है, यह प्रश्न सदा ही उठता रहता है। सबके प्रति सम व्यवहार न संभव है और न ही उचित। विवेक के अनुसार निर्णय लेना पड़ता है। निश्चय ही स्थितिप्रज्ञता में भौतिक विभेद चित्त को प्रभावित नहीं करते होंगे पर उस स्थिति तक पहुँचने के पहले हमें चित्त को स्थिर करना आना चाहिये, नीर-क्षीर विवेक होना चाहिये। उल्लिखित उपाय समाज से अधिक स्वयं के कलुष दूर करने में सहायक होते हैं।

राग, ईर्ष्या, परापकार, असूया, द्वेष और अमर्ष। ये ६ कालुष्य हैं जो सामाजिक संबंधों को प्रभावित करते हैं। सुख की अनुभूति को पुनः पाने की लालसा राग है। दुख की अनुभूति को पुनः न आने देने की भावना द्वेष है। किसी की प्राप्ति या उपलब्धि पर उसे स्वयं न पाने की वेदना ईर्ष्या है। परिस्थितियाँ मनोनकूल न होने से किसी का अहित करने का भाव परापकार है। किसी के गुण को अन्य दोष आरोपित कर छोटा दिखाने की प्रवृत्ति असूया है। किसी के अपजानजनक वचनों को सुन विचलित हो जाना या सहन न कर पाना अमर्ष है।

सुखी को देखकर मुख्यतः अपने राग या ईर्ष्या के भाव जागृत होते हैं। उसके प्रति मित्रता का भाव रखने से उसकी उपलब्धियों व प्रयासो के प्रति आदर का भाव आता है और आपके राग व ईर्ष्या क्रमशः प्रसन्नता व उत्साह में बदल जाते हैं। किसी दुखी को देखकर उसकी मूर्खताओं पर क्रोध आता है और स्वयं उससे भागने का विचार उत्पन्न होता है। करुणा की भावना क्रोध को सहयोग और सहायता में बदल देती है। पुण्यात्मा को देख कर प्रथमतः असूया होता है। उसकी महानता को छोटा करने का प्रयास हम करने लगते हैं। वह ज्ञानी है किन्तु अभिमानी है, वह तो अपनी प्रतिष्ठा के लिये ही दान करता है। इस प्रकार के निर्णय देकर से हम प्रकारान्तर से स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने का प्रयत्न करते हैं। मुदिता का भाव, अच्छे कार्यों को देख कर प्रसन्नता का भाव हमारी तुच्छता को ढेर कर देता है और अच्छे कार्य करने वाले के उत्साह का कारण भी बनता है। इसी प्रकार पापात्मा को देखकर उसके प्रति द्वेष या अमर्ष के भाव न रखते हुये उपेक्षा से उसे महत्वहीन बना देना उचित है। इस बात पर सार्थक चर्चा हो सकती है कि पापात्मा को दण्ड या पीड़ा मिलनी चाहिये। जो सक्षम हैं और जो व्यवस्था के दायित्व में हैं, वे उसको देंगे भी। पर उसके पहले ही पापात्मा द्वारा मचाये उत्पात में शाब्दिक रूप से सम्मिलित हो जाने से उसकी मानसिकता और ध्येय, दोनों ही पुष्ट होते हैं। अतःउन्हें उपेक्षित करना ही उचित है।

शान्तचित्त न केवल समाधि जैसे आध्यात्मिक ध्येयों में सहायक है वरन सामान्य जीवन के कार्यों में अथाह ऊर्जा का स्रोत है। मुझे तो ये चार उपाय योग के व्यवहारिक और करणीय प्रक्रिया के अंगरूप में स्वीकार्य हैं। आपके चित्त की वृत्ति क्या है?