12.1.13

रोष-नद

हृदय भरता रोष हम किसको सुनायें,
ढूढ़ती हैं छाँह, मन की भावनायें ।।

स्वप्न भर टिकते, पुनः से उड़ चले जाते हैं सारे,
आस के बादल हृदय में, वृष्टि वाञ्छित, सुख कहाँ है ।।

लहर भीषण, विष उफनती, क्रोध में डसने किनारे,
सोचकर क्या हो गयी नत, पुनः बह आयी जलधि में ।।

क्यों नहीं मन शान्त जैसे लहर है स्थित गहन में,
क्यों नहीं मिलता हृदय को एक ऐसा ही किनारा ।।

विकलता अवरोध की बन रोष बढ़ती जा रही है,
काल का निर्णय, नदी को किस दिशा में पंथ प्रस्तुत ।।

जानता, होगा समय का चक्र भी मेरी परिधि में,
नहीं यदि, सुख की असीमित आग फिर किसने जलायी ।।

कोई तो है थपथपाता, व्यग्र हो थकते मनस को,
कोई मन में जीवनी का मार्ग बन कर प्रस्फुरित है ।।

वही बनकर छाँह मन की, रोष नद को पंथ देगा,
बिन सुने ही वेदना को पूर्णतः पहचान लेगा ।।

52 comments:

  1. सघनतम भावनाओं की सुघर अभिव्यक्ति |एक अच्छी कविता |

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  2. प्रवाहमयी सार्थक कविता विचारों को उद्वेलित करती हुयी अपने उद्देश्य में सफल है ....

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  3. मन मंथन करते उद्दगार अंततः आशावादी हो उठते हैं आशा की लौ उसी एक अद्रश्य ,अगोचर सर्वशक्तिमान परम पिता परमेश्वर के ध्यान से प्रज्ज्वलित हो उठती है ,बहुत सार्थक ,अनुपम प्रस्तुति नव वर्ष की बधाइयां

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  4. चिरंतन सत्य की प्यास।
    ईश्वर से प्रार्थना है की यह प्यास सघन हो। ताकि हम मृत्यु से अमृत की ओर बढ़ें।

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  5. चिरंतन सत्य की प्यास।
    ईश्वर से प्रार्थना है की यह प्यास सघन हो। ताकि हम मृत्यु से अमृत की ओर बढ़ें।

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  6. ह्रदय आत्मप्रलाप करता है - कोई तो सुनता है, वरना रास्ते घुप्प लगते

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  7. मन की व्यग्रता और रोष को शब्द दिये हैं .... गहन प्रस्तुति

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  8. भाव और अर्थ की सुन्दर अन्विति सशक्त अभिव्यक्ति .

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  9. अत्‍यन्‍त आहलादित करती भावपूर्ण कविताजंलि।

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  10. उसी थपथपाहट की... जो समझ ले वेदना मन की ... आस है हर दिल में...
    ~सादर!!!

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  11. अतिशय मन का उद्वेलन अन्ततः शान्त हो ही जाता है।

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  12. कभी कभी मन को थपथपाने की जरुरत होती है..सकून के लिए..

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  13. उत्कृष्ट .....मन की व्यग्रता की गहरी अभिव्यक्ति

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  14. प्रस्तुत कविता में काव्य क्षेत्र के विभिन्न शब्दों को असंगत तरीके से प्रयुक्त किया गया है .इन शब्दों से किसी भाव का उद्बोधन नहीं होता .हो सकता है कवि की पीड़ा और विषाद अपने अपने स्तर

    पर

    प्रामाणिक हों किन्तु उनकी प्रामाणिकता अनुपयुक्त शब्दों से धूमिल हो गई है .

    .
    12.1.13

    रोष-नद
    हृदय भरता रोष हम किसको सुनायें,
    ढूढ़ती हैं छाँह, मन की भावनायें ।।

    हृदय में रोष नहीं ज़ज्बात होने चाहिए .भाव अनुभाव होने चाहिए .रोष दिल का दौरा लाएगा।

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    1. सही कहा शर्मा जी ...कुछ अस्पष्ट से भाव, कथ्य एवं कथ्यांकन , तथ्यांकन हैं ...शब्दों व उनके अर्थों व भावों में उचित संयोजन नहीं है....

      हृदय भरता रोष हम किसको सुनायें,
      ढूढ़ती हैं छाँह, मन की भावनायें ।।
      --- यदि ह्रदय में रोष है तो सुनाने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए ..रोष है तो मन की भावनाएं छाँह क्यों ढूंढ रही हैं ...मन में रोष भरने का अर्थ ही है कि अब वह सुनाये बिना नहीं रहना चाहिए ..अन्यथा रोष का कोइ अर्थ नहीं ...

      -- कविता के किसी भी जेनर या खांचे में फिट न होने के वावजूद भी...हाँ ह्रदय के संवेदना पूर्ण भावों के शब्द चित्र तो हैं ही है ...

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  15. ✿♥❀♥❁•*¨✿❀❁•*¨✫♥
    ♥सादर वंदे मातरम् !♥
    ♥✫¨*•❁❀✿¨*•❁♥❀♥✿


    स्वप्न भर टिकते, पुनः से उड़ चले जाते हैं सारे,
    आस के बादल हृदय में, वृष्टि वाञ्छित, सुख कहाँ है ।।

    कोई तो है थपथपाता, व्यग्र हो थकते मनस को,
    कोई मन में जीवनी का मार्ग बन कर प्रस्फुरित है ।।

    वही बनकर छाँह मन की, रोष नद को पंथ देगा,
    बिन सुने ही वेदना को पूर्णतः पहचान लेगा ।।

    बहुत सुंदर ! मन को छूने वाली रचना !

    आदरणीय प्रवीण पाण्डेय जी
    सायास तुकबंदी के बिना शानदार लय और प्रवाह का निर्वहन हुआ है ...
    बहुत बहुत बधाई इस गीत के लिए !


    हार्दिक मंगलकामनाएं …
    लोहड़ी एवं मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर !

    राजेन्द्र स्वर्णकार
    ✿◥◤✿✿◥◤✿◥◤✿✿◥◤✿◥◤✿✿◥◤✿◥◤✿✿◥◤✿

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  16. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (13-12-2013) को (मोटे अनाज हमेशा अच्छे) चर्चा मंच-1123 पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  17. वही बनकर छाँह मन की, रोष नद को पंथ देगा,
    बिन सुने ही वेदना को पूर्णतः पहचान लेगा ।।

    बहुत सुंदर ! मन को छूती रचना !

    recent post : जन-जन का सहयोग चाहिए...

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  18. मन का सहज द्वंद और व्यग्रता को सशक्तता से व्यक्त किया है, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  19. क्यों नहीं मन शान्त जैसे लहर है स्थित गहन में,
    क्यों नहीं मिलता हृदय को एक ऐसा ही किनारा ।।

    ...मन की गहन भावनाओं की बहुत उत्कृष्ट और सशक्त अभिव्यक्ति...

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  20. अनेक विषमताओं के बीच बहते जीवन-प्रवाह की उथल-पुथल में एक सम की खोज निरंतर चलती है-उसे ही पाने की
    चाह अनायास व्यक्त हो जाती है.

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  21. कोई तो सुनता होगा , यही विश्वास जीवनचक्र को बनाये रखता है !

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  22. बिना तुकांत पदों के सुंदर प्रवाहमयी रोष नद

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  23. लहर भीषण, विष उफनती, क्रोध में डसने किनारे,
    सोचकर क्या हो गयी नत, पुनः बह आयी जलधि में ।।

    व्यथित मन का निनाद. बहुत सुंदर.

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  24. ...रोष का नद कभी तो नाद बनकर सुनाई देगा !

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  25. bottle up all in your head..
    n explode it here :)
    #Writing, the best venting machine !!

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  26. किनारे की तरफ छलांगे मारते भाव ... लहरों का नाद ...

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  27. कोई तो है थपथपाता, व्यग्र हो थकते मनस को,
    कोई मन में जीवनी का मार्ग बन कर प्रस्फुरित है ।।

    वही बनकर छाँह मन की, रोष नद को पंथ देगा,
    बिन सुने ही वेदना को पूर्णतः पहचान लेगा ।।
    बहुत सुन्दर !
    New post : दो शहीद
    New post: कुछ पता नहीं !!!

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  28. लोहड़ी और मकर संक्रांति मुबारक .आभार आपकी सद्य टिप्पणियों का .आभार प्रस्तुत रचना के लिए जहां मन की पीड़ा की सांद्रता काव्य क्षेत्र के तमाम शब्दों से आगे निकल गई है .वेदना आगे है

    शब्द पीछे अनुगामी से .

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  29. लोहड़ी औऱ मकर संक्रांति कि शुभकानाएं.....कविता अच्छी है

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  30. बहुत सुन्दर लिखा है... जीवन की उथलपुथल,व्यग्र नद, अवरोधित मार्ग .. और एक सुकून की चाह... आह .. काश की शांति की थपथपाहट मिल जाए जैसे माँ की लोरियाँ ... आपको मकरसक्रांति पर हार्दिक शुभकामनाएं ...

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  31. वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  32. सुन्दर भाव !!!

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  33. सर जी |असीमित इच्छाएं |आप को मकर संक्रांति की शुभकामनाएं |

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  34. मुबारक मकर संक्रांति पर्व .है यह रचना नया रूपकात्मक भेष भरे है , .बढिया बिम्ब

    ,सशक्त अभिव्यक्ति अर्थ और विचार की
    . संक्रांति की मुबारकबाद .आपकी सद्य टिप्पणियों के लिए

    आभार .

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  35. ...कुछ अस्पष्ट से भाव, कथ्य एवं कथ्यांकन , तथ्यांकन हैं ...शब्दों व उनके अर्थों व भावों में उचित संयोजन नहीं है....

    हृदय भरता रोष हम किसको सुनायें,
    ढूढ़ती हैं छाँह, मन की भावनायें ।।
    --- यदि ह्रदय में रोष है तो सुनाने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए ..रोष है तो मन की भावनाएं छाँह क्यों ढूंढ रही हैं ...मन में रोष भरने का अर्थ ही है कि अब वह सुनाये बिना नहीं रहना चाहिए ..अन्यथा रोष का कोइ अर्थ नहीं ...

    -- कविता के किसी भी जेनर या खांचे में फिट न होने के वावजूद भी...हाँ ह्रदय के संवेदना पूर्ण भावों के शब्द चित्र तो हैं ही है ...

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  36. क्यों नहीं मन शान्त जैसे लहर है स्थित गहन में,
    क्यों नहीं मिलता हृदय को एक ऐसा ही किनारा ।।

    बेचैनियां ...ओह

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  37. बाहर से थाप और अन्दर सहलाए कोई...

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  38. भावमय -कोई गाता मैं सो जाता ...याद आयी पंक्तियाँ

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  39. मन में मच रही उथल-पुथल को अपने सही अभिव्यक्ति दी है।

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  40. सर जी मछली जब कांटे में आ जाती है तब वह पानी में ही होती है .कांटे से मुक्त होने के लिए वह मचलती ज़रूर है लेकिन जहां तक पीड़ा का सवाल है निरपेक्ष बनी रहती है मौन सिंह की तरह .मछली के

    पास प्राणमय कोष और अन्न मय कोष तो है ,मनो मय कोष नहीं है .पीड़ा केंद्र नहीं हैं .हलचल तो है चेतना नहीं है दर्द का एहसास नहीं है .शुक्रिया ज़नाब की टिपण्णी के लिए .


    मंगल मय हो संक्रांति पर्व .देश भी संक्रमण की स्थिति में है .सरकार की हर स्तर पर नालायकी ने देश को इकठ्ठा कर दिया है .शुक्रिया आपकी सद्य टिपण्णी का .

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  41. Quite an emotional, heartfelt and intense read.

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  42. ’कोई तो है थपथपाता-------वेदना को पूर्णतय पहचान लेगा’
    यही विश्वास सभी अंधेरों को मिटात है.मन के ज्वार-भाटे
    जीवन के तटों पर सर पटक कर शांत हो ही जाते हैं,नियति है.

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  43. उफनती नदी सा वेग लिए सुन्दर रचना ..

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  44. very appealing creation..

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  45. ऐसी इच है ये ज़िन्दगी मौसम के मिजाज़ सी .कब किस करवट बैठे कोई निश्चय नहीं .आभार आपकी सद्य टिप्पणियों का .आप कहाँ ढूंढ रहें हैं जीवन के बुनियादी सवालों के ज़वाब ?रोष भरे मन में .

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  46. गहरी अभिव्यक्ति मन की व्यग्रता की....आप को मकर संक्रांति की शुभकामनाएं |

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  47. भाव तो निस्‍सन्‍देह सुन्‍दर हैं किन्‍तु छन्‍द शैली में ऐसी अतुकान्‍त रचना सम्‍भवत: पहली ही बार देख/पढ रहा हूँ।

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  48. उद्वेलित अन्तर्द्वन्द का परिचायक बन गयी आपकी ये रचना ......

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