हृदय भरता रोष हम किसको सुनायें,
ढूढ़ती हैं छाँह, मन की भावनायें ।।
स्वप्न भर टिकते, पुनः से उड़ चले जाते हैं सारे,
आस के बादल हृदय में, वृष्टि वाञ्छित, सुख कहाँ है ।।
लहर भीषण, विष उफनती, क्रोध में डसने किनारे,
सोचकर क्या हो गयी नत, पुनः बह आयी जलधि में ।।
क्यों नहीं मन शान्त जैसे लहर है स्थित गहन में,
क्यों नहीं मिलता हृदय को एक ऐसा ही किनारा ।।
विकलता अवरोध की बन रोष बढ़ती जा रही है,
काल का निर्णय, नदी को किस दिशा में पंथ प्रस्तुत ।।
जानता, होगा समय का चक्र भी मेरी परिधि में,
नहीं यदि, सुख की असीमित आग फिर किसने जलायी ।।
कोई तो है थपथपाता, व्यग्र हो थकते मनस को,
कोई मन में जीवनी का मार्ग बन कर प्रस्फुरित है ।।
वही बनकर छाँह मन की, रोष नद को पंथ देगा,
बिन सुने ही वेदना को पूर्णतः पहचान लेगा ।।