29.6.11

सृजन कठिनतम

आज के परिवेश में जब विश्व सिकुड़ कर सपाट होता जा रहा है, विभिन्न क्षेत्र दूसरे क्षेत्रों को अपने अनुभव से लाभान्वित करने को उत्सुक हैं, पुष्ट सिद्धान्तों का प्रयोग निर्बाध रूप से सकल विश्व को ढाँक रहा है, नित नयी ज्ञान संरचनायें उभर कर स्थापित हो रही हैं, विचारों का प्रसार सीमाओं का आधिपत्य नकार चुका है, इस स्थिति में सृजन कठिनतम होता जा रहा है।

जब सुधीजनों के ज्ञान का स्तर बहुत अधिक हो तो सृजन भी बड़ा आहार चाहता है। उसके लिये यह बहुत ही आवश्यक है कि कई विषयों का ज्ञान हो सृजनात्मकता के लिये। इतिहास साक्षी है, जितने भी बड़े सृजनकर्ता हुये हैं, किसी भी क्षेत्र में, उनके ज्ञान का विस्तार हर क्षेत्रों में पाया गया है। सृजन की यह विशालता उसे कठिन बना देती है।

जो साधारण जीवन नहीं जीना चाहते हैं, उन्हें सृजन बड़ा प्रिय होता है। जिन्हें जीवन को समय की तरह बिताना अरुचिकर लगता है, उन्हें सृजन बड़ा प्रिय होता है। जो बनी बनायी राहों से हटकर कोई नया मार्ग ढूढ़ना चाहते हैं, उन्हें सृजन बड़ा प्रिय होता है। ऐसा क्या है उस सृजनशीलता में जो हमारे सर चढ़कर बोलने लगता है और हम सुविधाजनक जीवनशैली छोड़कर उन क्षेत्रों में उतरना चाहते हैं जहाँ अभी तक कोई पहुँच नहीं पाया है।

सृजन हार न मानने का नाम है। वर्तमान को स्थायी न मान अपने पुरुषार्थ के सहारे उस वर्तमान को प्रवाह दे देना सृजन है। किसी कार्य की इति ही उस पर होने वाले सृजन का आरम्भ होती हैगतिशीलता का सारथी बन सृजन कभी विश्व को स्थिर नहीं बैठने देता है

अब देखिये न, बहुधा ऐसा होता है कि हम जिन विषयों पर लिखने का विचार करते हैं, उस पर न जाने कितना साहित्य लिखा जा चुका होगा। फिर भी हमको लगता है कि कहीं न कहीं कुछ छूटा हुआ है। हम उस रिक्तता को भरने का प्रयास करते हैं सृजन से। समग्रता और एकाग्रता, ये दो गुणवत्ता के प्रखर मानक हैं। जब हमारी सृजन-दिशा समग्रता को ध्यान में रख कर होती है तब हमारे सृजन-प्रयास उस समग्रता को और भी गूढ़ बना देते हैं। एकाग्र मनन ही सृजन-प्रक्रिया को निखारता है और अन्ततः समग्रता को पोषित करता है।

कभी कभी आश्चर्य होने लगता है कि इन सृजनशील विचारों का स्रोत क्या है? जिस स्तर पर हम जीवन जीते हैं, सृजन उसके कहीं ऊपर के स्तरों पर निर्माणाधीन रहता है। आपको कभी कभी विश्वास ही नहीं होता है कि यह विचार आपके मन से उत्पन्न हुआ है। यह सोच कर बैठें कि आज सृजन करना है तो रात निराशा भरी होती है। बस अपने ज्ञानकोषों को ढीला और खुला छोड़ ध्यान की अवस्था में बैठ जायें, न जाने कौन देवदूत अपना कोष उसमें लुटा जायेगा।

सृजन निश्चय ही आपके परिवेश को या कहें तो सकल विश्व को एक नवीनता प्रदान करता है। परिवर्तन मानव मन को सुहाता है, सृजन उस परिवर्तन का कारक बनता है। सृजन हमारी मानसिक क्षुधा का नेवाला है, यदि सृजन नहीं रहेगा तो सब नीरस हो जायेगा। सृजन हमारी सुख उपासना को और भी रुचिकर बना देता है।

विश्व के कठिनतम मार्ग में प्रशस्त सृजन के समस्त अग्रदूतों को मेरा नमन।

54 comments:

  1. सच कहा आपने.....सृजन हार न मानने का नाम है। सृजनशीलता की सोच कुछ नए मार्ग खोजने का उत्साह और विश्वास जगाती है..... सृजन का यह क्रम यूँ ही चलता रहे ......

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  2. सृजन हार नहीं मानने का नाम है ...सृजन की विशालता उसे कठिन बना देती है ...
    सत्य ही !

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  3. बिना कोर-कांटे का तटस्‍थ विश्‍लेषण.
    चाक-चौबंद रह कर अभ्‍यास किए मार्ग पर, निर्धारित लक्ष्‍य की ओर बढ़ा जा सकता है.
    सृजन का बीज तो अनायास ही प्रस्‍फुटित होता है.

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  4. सृजन की समस्त विशेषताओं को समेट लिया है आपने अपने लेख में..! साधुवाद

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  5. सचमुच सृजन बिना जीवन में नीरसता आ जायेगी. एक सुन्दर चिंतन प्रवीण जी.
    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    http://meraayeena.blogspot.com/
    http://maithilbhooshan.blogspot.com/

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  6. सृजन एक अतृप्त तृषा है जो कल्पना और यथार्थ के धरातल से सतत उर्जा प्राप्त करती ही रहती है.इसकी दिशा भी सदा नव-निर्माण- उन्मुख होती है.सृजन ब्रह्मस्वरूप प्रक्रिया है जो नूतनता को जन्म देती है.

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  7. एक त्वरित सुझाव (कहीं भूल न जाऊं! )
    आपकी यह निबंध शैली मन मोहती है....आनन्दित करती है -इनका एक गैर आभासीय संकलन बेहद जरुरी है -
    दूसरे ,आपने सही कहा सृजन की प्रेरणा अक्सर दैवीय ही होती है ..मनुष्य तो निमित्त बन जाता है ..मगर जो निमित्त बनता है वह भी चयनित होता है उसी दैवीयता द्वारा ....नवाचार की भी सूझ अक्सर कौंधती सी है ....
    कभी कभी शायर भी खीजता है तो कह पड़ता है -
    गजल के शेर कहाँ रोज रोज होते हैं !
    ...और नवीनता की आकंठ चाह ही तो नव -सृजन का आधार बनती है ..

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  8. जब तक सृजन है तब तक जीवन है ! कमाल का लिखते हैं प्रवीण भाई ! शुभकामनायें आपको !

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  9. सृजनशीलता की सोच कुछ नए मार्ग खोजने का उत्साह और विश्वास जगाती है ||

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  10. सृजनशीलता मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है . सुँदर आलेख के लिए आभार .

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  11. सृजन है तो हम है
    आभार

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  12. सृजन हमारी मानसिक क्षुधा का नेवाला है, यदि सृजन नहीं रहेगा तो सब नीरस हो जायेगा। सृजन हमारी सुख उपासना को और भी रुचिकर बना देता है।

    अच्छा चिंतन मंथन ...

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  13. बहुत ही प्रेरणादायी लेख सच कहा अपने समग्रता और एकाग्रता, एवं कभी न हार मानने से ही सृजनशीलता का उद्भव होता है ...

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  14. एक सुन्दर लेख और स्वस्थ चिंतन, मात्र एक बात पर थोडा असहमत हूँ.
    "जब सुधीजनों के ज्ञान का स्तर बहुत अधिक हो तो सृजन भी बड़ा आहार चाहता है।"

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  15. ज्ञान का स्तर बहुत अधिक हो तो सृजन भी बड़ा आहार चाहता है।... bilkul sach

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  16. "यह सोच कर बैठें कि आज सृजन करना है तो रात निराशा भरी होती है। बस अपने ज्ञानकोषों को ढीला और खुला छोड़ ध्यान की अवस्था में बैठ जायें, न जाने कौन देवदूत अपना कोष उसमें लुटा जायेगा"

    वाह...कितनी बढ़िया बात कही है आपने...आपको पढना एक ऐसा अनुभव है जिस से गुजरने को बार बार दिल करता है...आपके ब्लॉग से मैं कभी खाली हाथ नहीं लौटा...कुछ न कुछ गाँठ में बाँधने को हमेशा मिला है...एक सृजन शील व्यक्ति ही इसतरह की पोस्ट लिख सकता है.

    नीरज

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  17. सच है सृजन के बाद ही पूरकता का अनुभव होता है।

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  18. सृजनशीलता पर बिल्‍कुल सही एवं सार्थक प्रस्‍तुति ।

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  19. bahut dino baad aaj aapke post padhne, utna he accha lga jitna pehle lgta tha :)

    bahut khoob

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  20. एकाग्रता और समग्रता दोनों अभ्यास के साथ सृजन के मार्ग प्रशस्त करती है

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  21. सृजन बिना जीवन अधूरा है।

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  22. बहुत अच्छा, सारंर्भित लेख...सचमुच, सृजन मन को समृद्ध करता है.

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  23. सही है..आप ऐसे विषय को लेते हैं और उस पर तार्किक बातें रखते हैं। बहुत सुंदर

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  24. सृजन क्षमता ...बहुत महत्त्व पूर्ण होती है

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  25. सच कहा आपने.....सृजन हार न मानने का नाम है। सुन्दर चिन्तन्।

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  26. आज सृजन के राह में सबसे बरी बाधा है हर सृजन का उद्देश्य मानवता के विकाश के मूलभूत आधार सत्य,न्याय,ईमानदारी व नैतिकता के प्रसार-प्रचार से भटककर सिर्फ पैसों व व्यवसायिक सफलता पर केन्द्रित हो जाना....आज असल सृजनकर्ता को बेबकूफ व निकम्मा समझा जाता है जबकि मुकेश अम्बानी जैसे धनपशुओं व शरद पवार जैसे कुकर्म के नए नए सृजनकर्ता आज देश की सत्ता को बना या बीगार कर भारत भाग्य विधाता बने हुए हैं...ऐसे में अब सृजन करने का या सोचने का मन ही नहीं करता....अब तो सिर्फ एक ही सृजनकर्ता सफल माना जाता है जो लोभ,लालच व पैसों की हवस के लिए किसी भी तरह पैसों का सृजन कर लेता है...? आज हर परिवर्तन पैसों की भूख पे आकर केन्द्रित हो गयी है....इंसानियत व मानवता के विकाश आधारित परिवर्तन अब मुश्किल है....

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  27. बढ़िया चिंतन....

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  28. सर बहुत सुन्दर ..सृजन कल्याणकारी होनी चाहिए ! बम का गोला भी एक इसी सृजन का नमूना है !

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  29. सृजनशीलता ही जीवन है..आपकी लेखन शैली कमाल की है.

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  30. sach me...........:)
    aapke post normally gyan ki khaan hoti hai..!

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  31. प्रवीण भाई एक बार फिर पते की बात चिपका गये ब्लॉग पर| सही है, उत्तरों से डरेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे|

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  32. बस एक बार कागज पेन ले कर बैठना होता है दृढ़ निश्चय के साथ, बाकी काम तो माँ शारदे खुद करती हैं| छन्द की ए-बी-सी-डी तक न जानने वाले कवि-कवियत्रियों के प्रयासों को देख कर यह विश्वास और भी प्रबल हुआ है|

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  33. सृजन के बारे में मैं यही कह सकता हूँ कि इतिहास को छोड़ दिया जाये तो मुख्यतः सृजन कल्पना या अनुभव के आधार पर मूर्त रूप लेता है.कल्पना और अनुभव द्वारा किये गए सृजन का अपना-अपना महत्त्व है.कई बार हम किसी विषय पर कुछ कहना चाहते हैं लेकिन उसके सारे सिरे नहीं मिलते,जबकि कई बार हम तुरत ही सविस्तार अपने को उड़ेल देते हैं.अनुभव को सृजित करना इस नाते आसान है जबकि कल्पना में अतितिक्त रचनात्मकता की दरकार होती है !

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  34. सृजन की इस रोचक राह पर चार कदम साथ चलवाने के आभार सहित...

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  35. सृजनशीलता मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है| धन्यवाद|

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  36. सृजन के भाव मनुष्य के मन में निरंतर उठते रहते हैं, जिसे वह विभिन्न माध्यमो से मूर्त रूप देता है, कलम, कुंची,छेनी हथौड़ा या अन्य.

    प्रत्येक काल परिस्थितियों में सृजन जारी रहता है.
    आभार प्रवीण भाई.

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  37. आप बडा सृजन कर लीजिए हम तो छोटे में ही बेहाल हैं :)

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  38. कितनी सुंदर भाषा मे आपने बात कही है मन प्रसन्न हो गया सृजन अपने आप मन मे पल्लवित हो जाता है उसे विस्तार करने के लिये दिमाग अवश्य लगाया जाता है किंतु उतपन्न अपने ही आप होता है

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  39. यह सृष्टि सृजन का अनवरत क्रम है और मानव इसकी सर्वाधिक कुशल रचना.प्रकृति में सृजनका क्रम थमा कि जड़ता आई और मनुष्य में भी.

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  40. सृजन हार ना मानने का नाम है. एक दम सत्य.

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  41. @ बहुधा ऐसा होता है कि हम जिन विषयों पर लिखने का विचार करते हैं, उस पर न जाने कितना साहित्य लिखा जा चुका होगा।

    अब देखिए ना, आज के डेट में आउट ऑफ फ़ैशन हो चुके गांधी जी पर सृजन करने में लगा हूं, जिस पर आज तक हजारों कृतियां लिखी जा चुकी होंगी।
    लेकिन आपके शब्दों में “सृजनशीलता हमारे सर चढ़कर बोलने लगा है” कमेंट (प्रोत्साहन) मिले न मिले हमारा “सृजन हार न मानने का नाम है।” क्योंकि हमको लगता है कि “हमको लगता है कि कहीं न कहीं कुछ छूटा हुआ है।” इसलिए मन की बात कहूं तो “सृजन हमारी मानसिक क्षुधा का नेवाला है, यदि सृजन नहीं रहेगा तो सब नीरस हो जायेगा।”
    कुल मिला कर यह कहना चाह रहा था कि जिस मनःस्थिति में आज कल सृजन कर रहा था, उसमें दुविधा में था कि आगे बढ़ू या नहीं। अब दुविधा इस आलेख को पढकर दूर हो गई है और जब “कठिनतम मार्ग” मार्ग पर चल ही पड़ा हूं तो मुड़ कर क्या देखना!

    ***** बहुत अच्छी पोस्ट! फ़ाइव स्टार वाली।

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  42. Sach hai...srujansheel wyaktee haar nahee manta...lekin kabhi,kabhi gahan udasi ke karan srujan sheelta dhundali zaroor ho jatee hai.

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  43. सृजनशील नये अविषाकार भी करता हे, ओर जिन्दगी मे हमेशा आगे ही बढता हे, बहुत सुंदर लेख लिखा आप ने

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  44. bahut achchi baat likhi hai aapne. dhanyawad. srijan na ho to bas maran hi reh jayega.

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  45. सृजनशीलता ही जीने का सही मायने है..उत्तम आलेख...

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  46. बहुत अच्छा लेख है| और सृजन होता ही रहना चाहिए |

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  47. बहुत ही सार्थक चिंतन...

    जितना वॄहद सॄजन,निश्चित रूप से उतना बड़ा सॄजनकार रहा होगा । ऐसे लोगों के मस्तिष्क की भूख
    बहुत बड़ी होती है..तभी ऐसे बड़े सॄजन हो पाते हैं ।

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  48. srijan ki khubsoorti ko bayan karta behad khubsoorat aalekh...anant shubhkamnayen..

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  49. जो साधारण जीवन नहीं जीना चाहते हैं, उन्हें सृजन बड़ा प्रिय होता है। जिन्हें जीवन को समय की तरह बिताना अरुचिकर लगता है, उन्हें सृजन बड़ा प्रिय होता है। जो बनी बनायी राहों से हटकर कोई नया मार्ग ढूढ़ना चाहते हैं, उन्हें सृजन बड़ा प्रिय होता है।

    बिलकुल ठीक बात लिखी है ....अपना नजरिया रखने वाले व्यक्ति को सृजन बहुत प्रिय होता है ...अपनी सोच को अपने शब्द देने वाले व्यक्ति को सृजन प्रिय होता है ...
    सार्थक लेख.

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  50. सर्जन का आधार 'सत्यम,शिवम,सुन्दरम' ही
    होना चाहिये.क्यूंकि,वास्तविक सर्जनकर्ता तो एक परमात्मा ही है.और सभी तो निमित्तमात्र हैं.
    हृदय में वही विचारों को प्रस्फुटित करता रहता है.

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  51. 'जो साधारण जीवन नहीं जीना चाहते हैं, उन्हें सृजन बड़ा प्रिय होता है।'
    या कहिये जो अधिक सृजनात्मक होते हैं उनका जीवन सामान्य [साधारण] कहाँ रह पाता है.
    .........
    एक अनूठा विषय.

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  52. परिवर्तन मानव मन को सुहाता है, सृजन उस परिवर्तन का कारक बनता है। सृजन हमारी मानसिक क्षुधा का नेवाला है, यदि सृजन नहीं रहेगा तो सब नीरस हो जायेगा। सृजन हमारी सुख उपासना को और भी रुचिकर बना देता है।

    और सृजन का आनन्द आपको विभोर कर देता है ।
    हमेसा की तरह एक सुलझा हुआ आलेख ।

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  53. सहमत हूँ. सृजन जीवन को सार्थक बनता है.

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