27.2.13

वह कविता है

मन की कह दे, वह कविता है,
सब की कह दे, वह कविता है,
निकसे कुछ कुछ अलसायी सी,
अपने में ही सकुचायी सी,
शब्द थाप बन आप खनकती,
रस सी ढलके, वह कविता है।

अपनों का अपनापन जाने,
शब्द-समुच्चय साथ निभाने,
मन गढ़ जाती, सब पढ़ जाती,
क्षत-हत-रत पथ साथ निभाती,
तप्त तवा, बन बूँद छनकती,
भाप बने घन, वह कविता है।

सजती, तन इठलायी, लजती,
लचक उचक बच पग पग धरती,
भावों के घूँघट में छिप कर,
यथाशक्ति अपने में रुक कर,
ओढ़े अद्भुत कान्ति कनक सी,
श्रंगारित तन, वह कविता है।

रोष-कोष, आग्रह अतिरंजित,
दावानल, मन पूर्ण प्रभंजित,
क्रोध सनी, शिव-कंठ बनी वह,
विष धारे, पीड़ा धमनी सह,
शब्द शब्द बस ध्वंस विरचती,
कंपन प्रहसन, वह कविता है।

काल खंड, कंकाल समेटे,
कितने मायाजाल लपेटे,
स्मृति क्षति करती अवरोधित,
भूत भविष्यत सम आरोपित,
पा भावों की छाँह पनपती,
हर क्षण दर्पण, वह कविता है।

एक तरंग रही जो छिटकी,
पथ की संगी, पथ से भटकी,
शब्द धरे, स्थूल हो गयी,
औरों के अनुकूल हो गयी,
मन से निकली, मन की कहती,
शाश्वत विचरण, वह कविता है।

64 comments:

  1. भावों के विभिन्न आयाम समेटे , कभी सरल कभी क्लिष्ट , वही कविता है !
    शानदार !

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  2. कविता की बढ़िया परिभाषा दी है आपने!
    --
    आज के चर्चा मंच पर भी इस प्रविष्टि का लिंक है!

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  3. भरे भाव सबके मन के
    खेले अद्भुत शब्दों संग में
    कभी लजाती कभी बलखाती
    कूदती-फ़ाँदती और शरमाती
    बन्द आँखों से बहती सरिता
    उछल-उछल वह कविता है...

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  4. बोधगम्य शब्दों में कविता की स्निग्धता संप्रेषित हो रही है पांडे साहब .... '.कर दे अभिव्यक्त मन के भावों को
    तृप्त हुए तो कविता है ....'

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  5. कनखियों से देखे वो,
    और मुस्करा दें ,
    बस यही कविता है ।

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  6. "मन की कह दे, वह कविता है,
    सब की कह दे, वह कविता है"-

    यह दो पंक्तियाँ ही काफी हैं। शेष तो इनमें ही समाया है।

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  7. बहुत शानदार

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  8. @
    निकसे कुछ कुछ अलसायी सी,
    अपने में ही सकुचायी सी,


    यकीनन कविता की रचना की शुरुआत एक संकोच से ही होती है और उसके बाद ...

    शब्द थाप बन आप खनकती,
    रस सी ढलके, वह कविता है।

    प्रवीण जी ,
    यह रचना सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है , मधुर , सार्थक और अक्षत !!

    आपका आभारी हूँ कि आप मूड में आ गए !

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    1. आपका आग्रह तो मेरे लिये आदेश ही है, लिखना आवश्यक था। आपको ही सृजन का समर्पण जाता है।

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  9. This comment has been removed by the author.

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    1. This comment has been removed by the author.

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  10. बहुत पहले लगभग इन्हीं भावों पर एक रचना हुई थी, वह आपकी इस कविता को पढ़ याद आ गयी ..

    नहीं द्वेष पाखंड दिखावा ,
    नही किसी से मन में बैर
    जहाँ नही धन का आड्म्बर,
    वहीं रचा जाता है , गीत !

    सरल भाव से सबको देखे,
    करे सदा सबका सम्मान
    निश्छल मन और दृढ विश्वास,
    वहीं रचा जाता है गीत !

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  11. कविता वाही है जो औरों के अनुकूल हो हर व्यक्ति पढ़े तो उसे अपने भावों का बिम्ब दिखे ...
    तभी रचना सफल है ...

    शब्द धरे, स्थूल हो गयी,
    औरों के अनुकूल हो गयी,
    मन से निकली,मन की कहती,
    शाश्वत विचरण,वह कविता है।

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  12. सच है क्या नहीं है, कविता में :), रोमांचित हूँ आपके शब्द चित्रण पर

    काल खंड, कंकाल समेटे,
    कितने मायाजाल लपेटे,
    स्मृति क्षति करती अवरोधित,
    भूत भविष्यत सम आरोपित,

    भावनाओं से जुडी और उत्पन्न हुई हर वक्त, समय को दर्पण दिखाती है , वही कविता है !

    पा भावों की, छाँह पनपती,
    हर क्षण दर्पण,वह कविता है।

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  13. ये सिर्फ एक कविता नहीं , एक कवी ह्रदय से निकली कालजयी वाणी हैं...पड़कर बहुत अच्छा लगा !!!

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  14. मन की कह दे, वह कविता है,
    सब की कह दे, वह कविता है,
    शाश्वत विचरण, वह कविता है।
    वाह! कविता परिभाषित !
    यह कविता है! कालजयी है !
    आज का दिन बन गया !

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  15. an awesome post to start a day with.. :)
    poetry is bliss !!

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  16. ...मजमा लूट लिया साहेब !
    .
    .
    .यह सम्पूर्ण गीत है,अत्युत्तम !

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  17. अति सुंदर ..... सच में ऐसी ही होती है कविता | कविता से जुड़ा सब कुछ समेटता शाब्दिक चित्रण |

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  18. बहुत सुन्दर रचना ...

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  19. लाजवाब ! बेमिसाल !! बहुत दिनों से ऐसा कुछ नहीं मिला था पढने को। अलबत्ता रोज़ दो-चार कवियों से दो चार होते रहे .........

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  20. शब्द खनके
    रस सी ढरके
    मन की कह दे
    सब की कह दे

    वाह! क्या कविता है!! ..कमाल है।

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  21. कविता की सुन्दर व्याख्या,बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति.

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  22. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति ...

    आप भी पधारें
    ये रिश्ते ...

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  23. मन से निकली, मन की कहती,
    शाश्वत विचरण, वह कविता है ..

    बहुत खूब ... कविता को चार चाँद लगाती कविता ... भावमय ... लयात्मकता लिए सुन्दर रचना ...

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  24. दिनांक 28 /02/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  25. "मन की कह दे, वह कविता है,
    सब की कह दे, वह कविता है"-

    बहुत खूब परिभाषित किया है कविता को

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  26. वाह ! कविता के कई आयामों को समेटे एक सुंदर कविता..बधाई!

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  27. वाह क्या कविता है ..एकदम कविता सी
    बहुत ही सुन्दर.

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  28. मन से निकली, मन की कहती,
    शाश्वत विचरण, वह कविता है।
    उत्कृष्ट अभिव्यक्ति ....

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  29. शिव-कंठ बनी वह

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  30. सुन्दर अभिव्यक्ति है यह कविता. मन की वाणी है यह कविता. वाह.

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  31. अति सुन्दर..

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  32. कविता की सम्पूर्ण परिभाषा. अति सुन्दर.

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  33. अति शानदार प्रस्तुति
    Gyan Darpan

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  34. मन प्रसन्न हुआ पढके .

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  35. आपकी पोस्ट 27 - 02- 2013 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें ।

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  36. सच शायद यही कविता है ....

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  37. आप की हर कविता, 'कविता' है। बेहद मनभावन प्रस्तुति !!!

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  38. बिलकुल ठीक कहा आपने। कविता ऐसी ही होती है।

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  39. अद्भुत ...। कविता के बारे में कुछ कहने शब्द ही नही मिल रहे । गद्य ही नही पद्य-रचना में भी ऐसा कौशल चमत्कृत करता है ।

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  40. वह कविता है
    मन की कह दे, वह कविता है,
    सब की कह दे, वह कविता है,
    निकसे कुछ कुछ अलसायी सी,
    अपने में ही सकुचायी सी,
    शब्द थाप बन आप खनकती,
    रस सी ढलके, वह कविता है।
    बहुत ही सुन्दर ढंग से कविता को परिभाषित करती कविता |

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  41. वह कविता है
    मन की कह दे, वह कविता है,
    सब की कह दे, वह कविता है,
    निकसे कुछ कुछ अलसायी सी,
    अपने में ही सकुचायी सी,
    शब्द थाप बन आप खनकती,
    रस सी ढलके, वह कविता है।
    बहुत ही सुन्दर ढंग से कविता को परिभाषित करती कविता |

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  42. कवि को तो कण-कण कविता है!

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  43. शब्द बया कर दें जो मन की, वो कविता है !

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  44. बाँध लिया मन को जिसने वह कविता है ...

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  45. बाँध लिया मन को जिसने वह कविता है ...

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  46. बहुत उत्कृष्ट कविता है !
    latest post मोहन कुछ तो बोलो!
    latest postक्षणिकाएँ

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  47. गेयात्मक, छन्दबद्ध,सुकुमार, मनोहारी कविता।

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  48. मन के भावों की मनोहारी अभिव्यक्त

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  49. काल खंड, कंकाल समेटे,
    कितने मायाजाल लपेटे,
    स्मृति क्षति करती अवरोधित,
    भूत भविष्यत सम आरोपित,
    पा भावों की छाँह पनपती,
    हर क्षण दर्पण, वह कविता है।

    वाह, आनंद आ गया ! बहुत सुन्दर काव्य-कृति है.

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  50. प्रवीण भाई, कविता को बहुत ही सुन्‍दर ढंग से चित्रित किया है आपने, मन में उतर गयी आपकी कविता।

    .............
    सिर चढ़कर बोला विज्ञान कथा का जादू...

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  51. कविता का रूप कलेवर ,नख शिख बखान कर आपने कविता का मानवीकरण कर दिया .कायिक मुद्राएँ इसकी अर्द्धनारीश्वर भी बन बैठीं हैं .श्रृंगार /श्रृंगारित /श्रृंगारिक बढ़िया प्रयोग किये हैं आपने भावानूरूप शब्द .

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  52. कविता का रूप कलेवर ,नख शिख बखान कर आपने कविता का मानवीकरण कर दिया .कायिक मुद्राएँ इसकी अर्द्धनारीश्वर भी बन बैठीं हैं .श्रृंगार /श्रृंगारित /श्रृंगारिक बढ़िया प्रयोग किये हैं आपने भावानूरूप शब्द .

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  53. बिलकुल सही। कविता की सुन्दर व्याख्या।
    सरस, रोचक। छलकती हुई।
    यह कविता है।

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  54. बिलकुल सही। कविता की सुन्दर व्याख्या।
    सरस, रोचक। छलकती हुई।
    यह कविता है।

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  55. शुक्रिया प्रवीण जी मेरी कविता को पसंद करने के लिए
    आपकी ये कविता पढ़ी . बहुत सुन्दर लिखा है .. बधाई स्वीकार करिए
    ज़िन्दगी के कई शेड्स है इसमें. शब्द भावपूर्ण बन पढ़े है . और सच तो यही है कि कविता ऐसी ही होनी चाहिए. .

    विजय
    www.poemsofvijay.blogspot.in

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  56. काल खंड, कंकाल समेटे,
    कितने मायाजाल लपेटे,
    स्मृति क्षति करती अवरोधित,
    भूत भविष्यत सम आरोपित,
    पा भावों की छाँह पनपती,
    हर क्षण दर्पण, वह कविता है-------adbhut--badhai

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  57. Anonymous9/3/13 13:29

    मन से निकली, मन की कहती,
    शाश्वत विचरण, वह कविता है

    kavita ki sachchi paribhasha !

    Manju Mishra
    www.manukavya.wordpress.com

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  58. ये तो कविता की कविता है ....

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