24.9.19

अभ्यास और वैराग्य - ११

यम का पक्ष सामाजिक है, नियम व्यक्तिगत पक्ष निरूपित करते हैं। सारे यम नियम किसी न किसी प्रकार से एक दूसरे से संबद्ध हैं। एक उपांग विशेष का पालन दूसरे की अवहेलना नहीं हो सकता है। यदि किसी उपांग के पालन में किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति आये तो अन्य उपांगों में उस परिस्थिति का अनुप्रयोग करके समाधान ढूढ़ा जा सकता है। 

सत्य वाणी का विषय है। वाणी विचारों के सम्प्रेषण हेतु है। बोला हुआ हर वाक्य सत्यता की कसौटी में कसा जाता है। व्यवहार की व्यापकता के कारण इसके अनुपालन में उठने वाले संशय अहिंसा की तुलना में कहीं अधिक हैं। आपके बोले हुये वाक्य कोई कब, कैसे और कहाँ उद्धृत कर दे? किस परिप्रेक्ष्य में कहा गया कौन सा वचन किसी भिन्न परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर दे? अनुपस्थित या मौन रहने से भी जटिलता कम नहीं होने वाली क्योंकि बहुधा मौन शब्दों से अधिक बोलता है। पतंजलि ने सत्य की भी व्याख्या या परिभाषा नहीं दी है। व्यासभाष्य के आधार पर ही सत्य को समुचित रूप से समझा जा सकता है।

जैसा मन में हो, वाणी में वही व्यक्त करना सत्य है। वाणी और मन में यथार्थ होना। यह एक सापेक्षिक परिभाषा है, इसमें मन और वाणी के बीच की सापेक्षिता है। तीन सीमायें स्पष्ट निर्धारित हैं। पहली यह कि मन को पूरा व्यक्त कर देना बाध्यता नहीं है, केवल आवश्यकतानुसार। दूसरी यह कि मन में जो है, वह वाह्य जगत से भी मेल खाये, यह भी आवश्यक नहीं है। एक विषय में कईयों के सत्य भिन्न हो सकते हैं, विषय की समझ भिन्न होने के कारण, उस विषय को जिसने जैसा समझा। तीसरा यह कि वाणी में व्यक्त सत्य आचरण में भी परिलक्षित हो, यह भी आवश्यक नहीं। मन में पूर्ण विश्वास होने के बाद भी वांछित गुण आचरण में उतरने में समय लेते हैं, निर्धारित लक्ष्यों में पहुँचने में समय लगता है।

व्यास प्रदत्त परिभाषा सरलतम है। जैसा देखा है, जैसा सुना है, जैसा अनुमान किया है, जैसा मन में हो, वैसा ही व्यक्त करना है। न न्यून, न अधिक, बस पारदर्शी। मन से यथार्थ होने के बाद भी वाणी का आचरण कैसा हो, तभी वह सत्य माना जायेगा, इसके लिये व्यास कुछ सीमायें रखते हैं। वाणी न ठगने वाली हो, न भ्रान्ति पैदा करे, न ज्ञान से रहित हो, सर्वजन उपकार के लिये हो, दूसरों का अहित न करे, उसके कारण हिंसा न हो। यह सब विचार कर बोले जाने पर वाणी सत्य का स्वरूप लेती है।

बहुत ध्यान से देखें तो सत्य के पालन से सरल और कोई उपाय भी नहीं है, सत्य सरलतम है।असत्य केवल आसानी से खुल जाता है, वरन उसे साधने में प्रयुक्त समय और साधन अन्ततः व्यर्थ हो जाते हैं। हम इतने लोगों से बाते करते हैं, इतने वर्षों तक बोलते रहते हैं कि व्यक्तिविशेष या परिस्थितिविशेष पर बोला हुआ असत्य याद रखना असंभव हो जाता है। हर व्यक्ति के प्रति, हर परिस्थिति के प्रति, स्वार्थ, लाभ या अन्य कारण से, भिन्न बोलना। इसमें अथाह ऊर्जा चली जाती है। मन सदा भ्रमित रहता है, याद रखना पड़ता है कि किसके सम्मुख क्या बोला था। सत्य के साथ यदि छल जुड़ा हो तो वह सत्य नहीं है। जो मन में है, उसे वैसे ही बोल देने में कुछ याद नहीं रखना पड़ता है, विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता है। 

असत्य तब पकड़ा जाता है जब आपके द्वारा की गयी दो विरोधाभासी बातें सबके सामने आती हैं, एक व्यक्ति के समक्ष कुछ और दूसरे के समक्ष कुछ और। चाटुकारिता अल्पकालिक चतुरता भले ही हो जाये पर सत्य के उद्धाटन के बाद वह अत्यधिक वैमनस्यकारी हो जाती है। इसीलिये कहा जाता है कि किसी के अनुपस्थिति में किसी की आलोचना कभी मत कीजिये, साहस हो तो सामने कह दीजिये। किसी व्यक्ति के बारे में आपकी अवधारणा कालान्तर में बदल सकती है, जो आपको अच्छा नहीं लगता था अब अच्छा लगने लगा, तब यह असत्य नहीं कहलायेगा।

मन में कुछ अन्य है, पर परिस्थिति देख कर कुछ अन्य कहना। यथार्थ होने पर भी अपने ज्ञान के अनुरूप बोलना। कुछ और प्रश्न हो, उत्तर कुछ और देना। देखा, सुना और अनुमानित का एक भाग ही बतलाना, अर्धसत्य बतलाना। ये सब असत्य की श्रेणी में आते हैं। वाणी कुछ और बोलती है, शरीर कुछ और बोलता है। देख कर पता चल जाता है। आज भी जैसे ही कोई व्यक्ति कार्यालय में आता है, उसकी भाव भंगिमा का संप्रेषण बहुधा उसके मन का सत्य कह जाता है।

वाणी को बाँधना और मन को साधना कठिन है। जब भी आपके साथ कुछ अप्रिय होता है, कोई आपको दुख पहुँचाता है तो मन में एक विचार श्रंखला चलने लगती है, प्रत्युत्तर की। मन में क्या क्या विद्रूपतायें नहीं आती है? उस समय सत्य का अनुपालन कठिनतम हो जाता है। अच्छा है कि उस समय किसी से संवाद न करें। मन सामान्य स्थिति में आने की प्रतीक्षा करें। जब मन उपद्रव पर उतर आये तो मितभाषी हो जाना ही श्रेयस्कर है। अनियन्त्रित और अमर्यादित वाणी क्या से क्या न करा दे, इस जगत में ?

वाणी का व्यवहार कठिन है पर सत्य से अधिक सहायक और कुछ नहीं। अगले ब्लाग में सत्य को कुछ और व्यावहारिक पक्ष।

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