14.6.14

बहुधा

अथक चिन्तन में नहाया,
सकल तर्कों में सुशोभित,
अनवरत ऊर्जित दिशा की प्रेरणा से,
बहुधा बना व्यक्तित्व मेरा ।

चला जब भी मैं खुशी में गुनगुनाता,
ध्येय की वे सुप्त रागें,
अनबँधे आवेश में आ,
मन तटों से उफनते आनन्द में,
क्षितिज तक लेती हिलोरें ।

14 comments:

  1. " तत्त्वमसि ।" तुम भी वही हो , जो मैं हूँ ।

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  2. आप आकर चले भी गए।

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  3. सुन्दर रचना...

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  4. लेता है मन हिलोरें ....

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  5. बहुत बढिया...

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  6. सुन्दर रचना !!

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  7. सुंदर प्रस्तुति...

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  8. उत्कृष्ट भाव संयोजन लिए गहन अभिव्यक्ति

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  9. सुन्दर अर्थ और भाव लयताल की रचना।

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  10. आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (29-06-2014) को ''अभिव्यक्ति आप की'' ''बातें मेरे मन की'' (चर्चा मंच 1659) पर भी होगी
    --
    आप ज़रूर इस चर्चा पे नज़र डालें
    सादर

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