30.4.14

बचपन

बचपन फिर से जाग उठा है,
सुख-तरंग उत्पादित करने,
ऊर्जा का उन्माद उठा है ।

वे क्षण भी कितने निश्छल थे,
चंचलता का छोर नहीं था ।
जीवन का हर रूप सही था,
व्यथा युक्त कोई भोर नहीं था ।।१।।

अनुपस्थित था निष्फल चिन्तन,
शान्ति अथक थी, चैन मुक्त था ।
घर थी सारी ज्ञात धरा तब,
दम्भ-युक्त अज्ञान दूर था  ।।२।।
 
व्यक्त सदा मन की अभिलाषा,
छलना तब व्यवहार नहीं था ।
मन में दीपित मुक्त दीप था,
अन्धकार का स्याह नहीं था ।।३।।

अनुभव का अंबार नहीं यदि,
ऊर्जा का हर कुम्भ भरा था ।
नहीं उम्र के वृहद भवन थे,
हृदय क्षेत्र विस्तार बड़ा था ।।४।।

थे अनुपम वे ज्ञानरहित क्षण,
अन्तः अपना भरा हुआ था ।
आज हृदय है खाली खाली,
ज्ञान कोष में अनल भरा है ।।५।।

24 comments:

  1. कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन !!

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  2. "ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी ।
    मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो क़ागज़ की क़श्ती वो बारिश का पानी। "
    जगजीत ने गाया है , पता नहीं क़लाम किसका है ?

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  3. कि बचपन हर गम से बेगाना होता है ़़़

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  4. बचपन के दिन बीतने के साथ ही बहुत कुछ खाली खाली हो ही जाता है....सुन्दर कविता

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  5. -सुंदर रचना...
    आपने लिखा....
    मैंने भी पढ़ा...
    हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 01/05/ 2014 की
    नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
    आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
    हलचल में सभी का स्वागत है...

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  6. http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/04/blog-post_30.html

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  7. हम क्यूँ बड़े हैं ......

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  8. ऐसा था अपना बचपन।
    कैसा था सबका बचपन ।

    ....सफर के दौरान।

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  9. तप से तप कर ...
    जैसे आग में जल कर..
    कंचन निखरता है ...
    वस्तुतः ज्ञान से ही घट भरेगा और मन अनल शांत करेगा ....!!
    सुंदर कविता

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  10. अनुभव का अंबार नहीं यदि,
    ऊर्जा का हर कुम्भ भरा था ।
    नहीं उम्र के वृहद भवन थे,
    हृदय क्षेत्र विस्तार बड़ा था ।।४।।
    gahan sundar abhivaykti .badhai

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  11. निश्छल और निर्झर बचपन।

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  12. आओ खेले बचपन बचपन.. निश्छल बचपन।

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  13. ज्ञान तो आ गया पर मस्ती चली गयी :)

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  14. व्यक्त सदा मन की अभिलाषा,
    छलना तब व्यवहार नहीं था ।
    मन में दीपित मुक्त दीप था,
    अन्धकार का स्याह नहीं था -----

    बचपन का सच ----भावमय और प्रभावपूर्ण रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति

    आग्रह है----
    और एक दिन

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  15. कविता पढ़ कर मन में आया कि तब के बचपन में और अब के बचपन में कितना अंतर आ गया है .

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  16. वाह !! सुबह सुबह इतनी प्यारी कविता !! :)

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  17. थे अनुपम वे ज्ञानरहित क्षण,
    अन्तः अपना भरा हुआ था ।
    आज हृदय है खाली खाली,
    ज्ञान कोष में अनल भरा है ।।५।।

    सही बात है..ज्यादा ज्ञानी होके हम अधिक कुटिल और अमानवीय हो गये हैं। सुंदर रचना।

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  18. वे क्षण भी कितने निश्छल थे,
    चंचलता का छोर नहीं था ।
    जीवन का हर रूप सही था,
    व्यथा युक्त कोई भोर नहीं था ।।१।।
    बचपन के रंग ..... बड़े सुहाने उत्‍कृष्‍ट भावों का संगम

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  19. This is innocent simplicity which is imbued in us always. We know, but don't express due to our conceits. Your words are gem. Regards.

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  20. मन में दीपित मुक्त दीप था,
    अन्धकार का स्याह नहीं था -----

    बचपन का सच - बड़े सुहाने बचपन के रंग

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  21. waah vo bachjpan ke din...
    naa duniya ka gum tha, na rishton ke bandhan...badi khoobsoorat thi vo zindagani :)

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  22. वो कागज की कश्ती , वो बारिश का पानी।

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  23. कोई लौटा दे मेरे बीते हुये दिन

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