23.2.13

अनिश्चितता का सिद्धान्त

कोई आपसे पूछे कि आप किसी विशेष समय कहाँ पर थे, स्मृति पर जोर अवश्य डालना पड़ेगा पर आप बता अवश्य देंगे। आप यदि स्वयं याद नहीं रखना चाहते तो मोबाइल का जीपीएस आपका पूरा भूगोल आपको बता देगा, कब कहाँ पर थे और कितने समय के लिये थे। हर हिलने डुलने योग्य वस्तुओं में हमने ट्रैकर लगा रखा है, पार्सेल, ट्रेन, सैटेलाइट, ग्रह, हर किसी की वर्तमान स्थिति हमें पता चल जाती है, वह भी पूरी निश्चितता से।

विज्ञान ने जहाँ निश्चितता की ओर इतनी लम्बी छलांग मारी है, तो आप भी शीर्षक पर आश्चर्य करेंगे। जैसे जैसे हम स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हैं, अनिश्चितता बढ़ती जाती है। एक ग्रह की स्थिति हम सैकड़ों वर्ष पीछे से लेकर सैकड़ों वर्ष आगे तक बता सकते हैं पर सूक्ष्मतम कण की स्थिति बताने में अनिश्चितता आ जाती है।

वस्तुओं की भौतिक स्थिति पता करने में दो साधनों का योगदान रहता है, एक यन्त्र जिससे हम नापते हैं और दूसरा प्रकाश जिसके माध्यम से हम उस वस्तु को देखते हैं। यन्त्र की क्षमता हमारी सीमा निश्चित कर देती है, एक फुटा जिसमें मिलीमीटर तक के खाँचे बने हों उससे आप माइक्रॉन स्तर के आकारों को नहीं माप सकते हैं। इसी प्रकार जिस वस्तु पर आप प्रकाश या कोई और तरंग नहीं भेज सकते, उसकी स्थिति भी नहीं मापी जा सकती है। यन्त्र की भौतिक माप एक सीमा तक ही साथ देती है, उसके बाद तरंगों और अन्य भौतिक सिद्धान्तों का ही सहारा रहता है, किसी भी वस्तु की स्थिति मापने में।

प्रकाश भी एक प्रकार के सूक्ष्मकणों से बना है, जिन्हें फोटॉन कहते हैं। ये भारहीन कण हैं और इनमें केवल ऊर्जा ही होती है। ये जहाँ भी गिरते हैं, अपनी ऊर्जा स्थानान्तरित कर नष्ट हो जाते हैं। उस ऊर्जा से एक दृश्य तरंग उत्पन्न होती है जिसकी सहायता से हम उस वस्तु को देख पाते हैं। वही ऊर्जा ऊष्मा में भी परिवर्तित हो उस वस्तु का तापमान भी बढ़ा देती है। अन्य सूक्ष्मकण, जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन आदि का आकार इतना कम होता है कि वे फोटॉन के समकक्ष हो जाते हैं। जैसे ही फोटॉन उन पर पड़ते हैं, उनकी स्थिति तो पता चल जाती है पर ऊर्जा स्थानान्तरित हो जाने के कारण उसका संवेग (गति का मापक) बदल जाता है।

अब समस्या यहीं आती है, जब दृष्टा दृश्य को प्रभावित करने लग जाये तो निष्पक्षता विलीन हो जाती है। जिस फोटॉन से हम किसी की स्थिति जान पाते थे, वही स्थिति को बदल देते हैं। इस स्थिति से बचने के लिये बड़े बड़े पार्टिकल एक्सेलेटर बनाये गये, जिसमें चुम्बकीय क्षेत्रों के माध्यम से इन कणों को नियन्त्रित किया गया और उनका अध्ययन किया गया। इस तकनीक से दृश्य को प्रभावित करने की संभावनायें न्यूनतम हो गयीं। फिर भी देखा गया कि इन कणों को नापने में अनिश्चितता कम नहीं हुयी। क्वांटम भौतिकी में इस तथ्य को अनिश्चितता का सिद्धान्त कहा जाता है और इसके गणितीय रूप को प्रतिपादित करने का श्रेय श्री हाइजनवर्ग को जाता है। इसका कारण कण के मूल में उपस्थित एक विशेष गहनता है। पर यदि सहज रूप में समझा जाये तो इसके पीछे एक द्वन्द्व छिपा है, अणु और तरंग का, कभी वह अणु हो जाता है और कभी सुविधानुसार तरंग। उसके कुछ गुण अणु से संबद्ध हैं और कुछ गुण तरंग से। अनिश्चितता का प्रमुख आधार यही द्वन्द्व प्रकृति है।

कुछ सिद्धान्त सार्वभौमिक होते हैं, अनिश्चितता का सिद्धान्त भी उनमें से एक है। एक छोटे से कण से लेकर यह पूर्ण प्रकृति पर आच्छादित है। यदि वृहत्तर दृष्टिकोण से देखा जाये तो कोई भी अनिश्चितता उपरिलिखित तीन कारणों से ही आती है, सीमित क्षमता के कारण, तन्त्र में संलिप्तता के कारण और द्वन्द्व के कारण। निर्णय इन तीनों अनिश्चितताओं से प्रभावित होते हैं और बहुधा उल्टे हो जाते हैं। किसी के बारे में समुचित ज्ञान होने के बाद भी हमारे निर्णयों में स्पष्टता इसीलिये नहीं आ पाती क्योंकि हम स्वयं भी उसमें लिप्त होते हैं। हमारा लिप्त होना निष्कर्षों को वैसे ही बदल देता है जैसे कि फोटॉन किसी कण का संवेग। निर्लिप्त होकर निर्णय लेना तो तब हो पायेगा जब हमें ज्ञात होगा कि हमें निर्लिप्त होकर निर्णय लेना होगा अन्यथा उसमें अनिश्चितता आने का भय है। एक बार निर्लिप्त हो भी गये पर किस घटना को तथ्यात्मक रूप में लें, किसे भावनात्मक रूप में लें, किसे भौतिकता से नापे किसे आध्यात्मिकता से नापें। किसी भी घटना को उठा कर देख लें, किसी भी निर्णय को परख लें, अनिश्चितता के तीन स्तरों पर उसमें कुछ न कुछ शेष रहा होगा।

अनिश्चितता घातक क्यों है? यह तब तक घातक नहीं है, जब तक हम निश्चित हैं कि हमारी समझ में अनिश्चितता है। यह घातक तब हो जाती है जब हमारा विश्वास अनिश्चितता को मानने से मना कर दे। निश्चितता का विश्वास दंभ जगाता है और उसी में हम डूबे रहते हैं, बिना कारण जाने। जब ज्ञात होता है कि हम अनिश्चितता की परिधि में हैं तो बदलाव की संभावना भी बनी रहती है, वह लचक भी बनी रहती है जो जीवन जीने के लिये आवश्यक है।

तीन प्रश्न बहुत ही सहज उठ सकते हैं। पहला यह कि यदि किसी विषय में हमें पूर्ण ज्ञान नहीं है या हमारी क्षमता नहीं है कि पूर्ण ज्ञान जाना जा सके, तो क्या उस विषय में निर्णय लेना या चिन्तन करना बन्द कर दिया जाये। बिल्कुल ही नहीं, जिस समय जितना ज्ञान आगे बढ़ने को पर्याप्त है, उसी आधार पर बढ़ा जा सकता है पर इस मुक्त मानसिकता से कि राह में जो भी अनुभव मिलेगा उसे हम संचित ज्ञान का अंग बनायेंगे। संभवतः यही कारण है कि लोग अन्त तक भी सीखने की लालसा में बने रहते हैं, क्योंकि पूर्णज्ञान तो कहीं है भी नहीं। यदि ऐसा है तो कपाट बन्द कर जीवन क्यों जिया जाये?

दूसरा प्रश्न यह कि यदि निर्लिप्त भाव में जीने लगें तो किसी विषय का चिन्तन ही क्यों करें या उससे संबंधित निर्णय ही क्यों लें? अपने लिये नहीं पर दूसरों के लिये निर्लिप्त होने का लाभ है। बहुधा देखा गया है कि लोग दूसरों से सलाह लेते हैं, उनकी राय जानना चाहते हैं। यह संभवतः उसलिये कि और लोग आपकी समस्या में उतने लिप्त नहीं होंगे जितने आप स्वयं। कोई न कोई ऐसा क्षेत्र रह जाता है जिस पर प्रकाश नहीं डाला जा सकता, ठीक वैसे ही जैसे दिया के नीचे का स्थान अन्धकार में रहता है। निर्लिप्त होने को सदा ही एक गुण माना गया है क्योंकि इससे सत्य और अधिक परिमार्जित होकर सामने आता है।

तीसरा यह कि कब पता चले कि हमें भौतिकता में जीना है या कब आध्यात्मिकता में? कब कल्पना में जियें और कब उसे शब्दों में उतार दें? जो निर्णय स्वयं को शरीर मानकर लिये हैं, मानसिक और बौद्धिक स्तर में उनका क्या प्रभाव होगा? यह प्रश्न हर स्तर पर उठता है कि हम क्या हैं, स्थूल या तरंग? स्वयं को एक ओर मानने से दूसरी ओर पथच्युत हो जाने का भय बना रहता है। यह अनिश्चितता तो सदा ही बनी रहेगी, प्रकृति ने हमें बनाया ही ऐसा है। हम उड़ना चाहते हैं तो याद आता है कि हममें भार है, सुख में अधिक डूब जाते हैं तो पता चलता है कि अपने दुख का कारण भी साथ लिये डूबे हैं। यही तो जीवन का द्वन्द्व है, यही अनिश्चितता है, यही प्रकृति की गति है और उसमें बिद्ध यही हमारी मति है।

हमें तो अपनी अनिश्चितता में डोलने में भी सुख मिलता है, आप कहीं ऐंठे तो नहीं बैठे हैं?

72 comments:

  1. हम भी अनिश्चितता के सिद्धान्त का पूरा लाभ उठा रहे हैं. :)

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  2. गति मति का द्वंद्व.

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  3. ज्ञानवर्धक

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  4. बहुत खूब क्या बात है आनंद आगया
    मेरी नई रचना
    खुशबू
    प्रेमविरह

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  5. बहुत बढ़िया जानकारी

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  6. मेरे बूते से बाहर है समझ पाना :)

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  7. पढ़ कर सोचना पड़ेगा !

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  8. ...तकनीक और दर्शन का मेल....काजल भाई के साथ हूँ !

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  9. ये उहापोह तो जीवन से जुड़ी है ..... कभी कभी अनिश्चितता जीवन सरल कर देती है और कभी स्वयं को ही नहीं सुहाती.....

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  10. nishchit roop se anishchitta ka ye siddhant bada rochak hai...

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  11. बहुत-बहुत अच्छा लगा ये लेख. क्वांटम भौतिकी मुझे बहुत रुचिकर लगती है. एक बार बहुत पहले इस पर रवि सिन्हा सर के चार लेख पढ़े थे. ये हाल था कि उस त्रैमासिक पत्रिका के अगले अंक की बेचैनी से प्रतीक्षा रहती थी. विज्ञान दर्शन हमें बहुत कुछ सिखाता है. मुझे हमेशा यही लगता है कि हमारे भारतीय दार्शनिकों ने जितना अध्ययन परलोक का किया, उसका बीस प्रतिशत भी भौतिकी में किया होता, तो हम आज कहीं और होते.
    खैर, ये तो आप पहले ही कह चुके हैं कि सब कुछ अनिश्चित है. यही चीज़ क्वांटम फिज़िक्स को इतना रुचिकर बनाती है. ये बहुत हद तक हमारे मन की तरह है. जितनी सूक्ष्म उतनी अनिश्चित.
    मुझे आपके द्वारा निकाले गए ये निष्कर्ष बहुत सही लगे-
    "यदि वृहत्तर दृष्टिकोण से देखा जाये तो कोई भी अनिश्चितता उपरिलिखित तीन कारणों से ही आती है, सीमित क्षमता के कारण, तन्त्र में संलिप्तता के कारण और द्वन्द्व के कारण। निर्णय इन तीनों अनिश्चितताओं से प्रभावित होते हैं और बहुधा उल्टे हो जाते और ये भी-
    "अनिश्चितता घातक क्यों है? यह तब तक घातक नहीं है, जब तक हम निश्चित हैं कि हमारी समझ में अनिश्चितता है। यह घातक तब हो जाती है जब हमारा विश्वास अनिश्चितता को मानने से मना कर दे। निश्चितता का विश्वास दंभ जगाता है और उसी में हम डूबे रहते हैं, बिना कारण जाने। जब ज्ञात होता है कि हम अनिश्चितता की परिधि में हैं तो बदलाव की संभावना भी बनी रहती है, वह लचक भी बनी रहती है जो जीवन जीने के लिये आवश्यक है।"
    यही बात मेरे पिताजी अज्ञान के विषय में कहा करते थे कि "ज्ञान का अभाव घातक नहीं है, बल्कि ज्ञान के अभाव का ज्ञान न होना अधिक घातक है" एक अज्ञानी जो यह जानता है कि वह अज्ञानी है उस ज्ञानी से कहीं अधिक श्रेष्ठतर स्थिति में है, जो ये समझता है कि वह सब कुछ जानता है (जिसे आपने निश्चितता कहा है) वह अज्ञानी है क्योंकि यह नहीं जानता कि विश्व में कोई भी व्यक्ति ऐसा हो ही नहीं सकता जो सब कुछ जानता हो. ऐसा बहुत कुछ होता है, जो वह नहीं जानता और जब ये समझता है कि वह पूरब ज्ञानी है तो उसकी ज्ञान प्राप्ति की सम्भावना समाप्त हो जाती है. उसका विकास अवरुद्ध हो जाता है.
    इसीलिये पिताजी कहते थे कि 'ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयत्नरत रहो, जीवन बहुत छोटा है."

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    1. भारतीय दर्शन में ही भौतिकी का जन्म हुआ है. परमाणु का सिद्धान्त ऋषि कणद ने प्रतिपादित किया। आवश्यकता खोजने की है।

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  12. दिनांक 24 /02/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  13. यही तो जीवन का द्वन्द्व है, यही अनिश्चितता है, यही प्रकृति की गति है और उसमें बिद्ध यही हमारी मति है।

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  14. बहुत ही गहन चिंतन भरा आलेख

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  15. बढ़िया जानकारी...

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  16. praveen ji ,vaigyanik gyan se bharpoor aapke aalekh me se bahut thoda hi palle pada bas ek bat samjh me aayi ki vigyan ne bahut see aisee vastuien bana dee hain jisse ham apni yaddasht taza rakh sakte hain .kintu hame itna pata hai ki ham yadi apne kisi kam ko kisi mahtvapoorn pal se jod lete hain to hame sab yad rahta hai ..सराहनीय अभिव्यक्ति आभार सही आज़ादी की इनमे थोड़ी अक्ल भर दे . आप भी जानें हमारे संविधान के अनुसार कैग [विनोद राय] मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन] नहीं हो सकते

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  17. ज्ञान पाने की कोई सीमा होती नहीं है..होनी भी नहीं चाहिए ..जो मिलता जाए बटोरते चलो..संचित करते चलें ..यही जीवन का ध्येय होना चाहिए ..अनिश्चितता में जीना सबसे बेहतर है.
    पूर्ण ज्ञानी कौन हुआ है /हो सका है आज तक?

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  18. ufffff......itta gehen gyan to sir k upar se nikle ja raha hai.....kahan hindi manch jahan sahity se related lekh milte hain aur kahan ye physics/chemistry/math ki baaaaaaaaateen.......:(.......:)

    aapki mehnat bahut acchhi aur gehen soch deti hai.

    shukriya.

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  19. भावनात्‍मक ठहराव और लगाव....अनूठा

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  20. बेहद ज्ञानवर्धक एवं विचारात्‍मक प्रस्‍तुति ...
    आभार सहित

    सादर

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  21. विज्ञान ओर आध्यात्मिक मिश्रित पोस्ट ... कुछ कुछ समझ आई कुछ कुछ ऊपर से निकल गई ....

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  22. पाल खोलकर चलना ही सही है अन्यथा भंवर कहीं भी चपेट में ले लेती है .

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  23. बहुत ही गहन चिंतन भरा आलेख बेहद ज्ञानवर्धक एवं विचारात्‍मक प्रस्‍तुति।

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  24. शुक्रिया इस बढ़िया प्रस्तुति का आपकी टिपण्णी का .

    स्थूल स्तर पर तो आप धूमकेतु के सही समय पर लौट आने की सटीक भविष्य वाणी कर सकते हैं जैसे हेली के धूमकेतु के प्रागुक्ति कर देते हैं .लेकिन सूक्ष्म अव -परमाणुविक स्तर पर यह भविष्य

    कथन गिर जाता है .कारण स्वयं पदार्थ की द्वैत प्रकृति है -

    कण या तरंग .बुनियादी स्तर पर अभी तो यह भी जाना जाना बाकी है ,वह क्या चीज़ है कण है जो द्रव्य की मूलभूत कणिकाओं को भार (द्रव्यमान ,मॉस )प्रदान करता है या तरंग .वह कथित गॉड

    पार्तिकिल

    अभी पूरी तरह गिरिफ्त में ,प्रेक्षण ही में नहीं आया है .

    इसी अनिश्चितता पर खीझते हुए आइन्स्टाइन ने कहा था -ईश्वर पांसे नहीं खेलता है .God does not play dice.

    द्रव्य की मूलभूत कणिकाओं की अवस्थिति का सटीक बोध आकाश काल में नहीं हो सकता .संभावना व्यक्त की जा सकती है गृह मंत्री की तरह -फलां जगह विस्फोट हो सकता है ,कहाँ होगा इसका

    कोई निश्चय नहीं . कई मर्तबा तो

    जिन्हें हम कण समझते हैं वह अति अल्प काल के लिए ही प्रगटित हो विलुप्त हो जाते हैं .पानी ,केरा, बुदबुदा सा ही होता है इनका अस्तित्व .स्थिति इन कणों की उस तरह होती है जैसे कोई कार हो

    जो ट्रायल के दौरान ही फेक्ट्री के गेट पर क्रेश हो जाए .

    सूक्ष्म अन्वेषण पर बोध होता है -ये कण थे ही नहीं प्रायिकता की तरंगें थीं .इन तरंगों के पेकिट में कण भी था कहीं ,यहाँ ,वहां ,कहाँ ,कोई निश्चय नहीं रहता है .प्रायिकता ही अभिव्यक्त हो पाती है .

    हममें से कितने ही खुद को दिग्विजयसिंह मान बैठे हैं।बड़बोला पन कुछ बूझने ही नहीं देता .भौन्पियाते रहते हैं हम लोग . प्रवक्ता बने इसके उसके .

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  25. aapki har post behtareen hoti hai.. ek aur shaandaar aalekh..

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  26. आज की ब्लॉग बुलेटिन ऐसे ऐसे कैसे कैसे !!! मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  27. बहुत बढ़िया जानकारी.. आभार..

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  28. ज्ञान और विज्ञानं की कोई सीमा नही,जितना ज्ञान ग्रहण करते जाओ विज्ञानं की खोज बढ़ती जायगी,,,,

    Recent post: गरीबी रेखा की खोज

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  29. अनिश्चितता का नाम जीवन है और द्वंद भी है. जब द्वंद खत्म होगा तब अनिश्चितता जायेगी, तब तक बिना ऐंठे इसमें बहना ही ज्यादा सुरक्षित लगता है.

    रामराम.

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  30. हममे से अधिकांश तो किसी न किसी अनिश्चितता का शिकार हैं ही इसे आज की परिस्थिति का ही दोष माना जा सकता है कि जीवन में हर जगह अनिश्चितता ही दिखाई दे रही है
    उम्दा लेख

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  31. आपने तो आज हीजेन्बर्ग सिद्धांत ,श्रादिन्जर तरंग इक्स्वेशन आदि सभी की याद दिला दी .... :-)

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  32. बिल्कुल ऐंठे नहीं बैठे हैं, रिलैक्स होकर बैठे हैं :)

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  33. अनिश्चितिता के सिद्धांत के परिपेक्ष्य में जीवन का मूल्यांकन बहुत कुछ सोचने को विवश करता है.

    सुंदर विचारणीय आलेख.

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  34. जो कुछ होना है वो निश्चित है ॥लेकिन क्या होना है वो हम नहीं जानते इसलिए अनिश्चित की सी स्थिति रहती है .... और मन द्वंद्व से घिरा ... गहन विचार प्रस्तुत करता लेख

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  35. अनिश्चितता का बौध निश्चितता की ओर जाने के लिए चालक बल का कार्य करता है

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  36. बेह्तरीन प्रस्तुति

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  37. अनिश्चतता जीवन का एक पहलु है।

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  38. आपकी टिपण्णी हमें प्रासंगिक बनाए रहती है ,ऊर्जित करती है .शुक्रिया आपका तहे दिल से .

    अनिश्चयता का सिद्धांत द्रव्य की बुनियादी कणिकाओं के स्तर पर अति मुखर हो जाता है .पता चलता है पड़ताल करने पर जिन्हें हम बुनियादी समझतें हैं वह अपने से लघु रूपों से बनें हैं .न वह

    बुनियादी हैं न कण हैं प्रायिकता की तरंगें हैं .

    प्रोटोन ,न्युट्रोन तो एक ही कण की दो प्रावस्थायें हैं ,परमाणु के केंद्र में .कभी "ये" कभी "वह" .और ये अपने से भी लघु रूप क्वार्क्स से बनें हैं .यही हाल मीसोन कनों का है मीसोन बोले तो बीच के कण

    इलेक्त्रों से भारी प्रोटोन से हलके .कौन कण कब कहाँ है ?इसका कोई निश्चय नहीं .कब का निश्चय कहाँ में अनिश्चय को बढ़ा देता है .जीवन भी ऐसा ही है यहाँ कब क्या हो जाए इसका कोई निश्चय

    नहीं .सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं .शुक्रिया प्रवीण जी आपकी टिपण्णी का .यह जो ट्रांस फेट है बहरूपिया है ,हाड्रोजनयुक्त तेल भी यही है .हाईद्रोजनीकरण तेल की ,तेल से बने बेकरी उत्पादों

    की भंडारण अवधि बढ़ा देता है .धमनियों की दीवारों से चिपक जाता है उन्हें अन्दर से खुरदरा बना देता है .

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  39. This comment has been removed by the author.

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  40. The equation was given by Earle Hesse Kennard. Heisenberg only put forth a heuristic principle.

    And observer effect is NOT part of uncertainty principle, rather it is something inherent to all wave-like systems - and have nothing to do with the measuring apparatus.

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    1. जी, यही कहा है, शब्दशः

      ....इस तकनीक से दृश्य को प्रभावित करने की संभावनायें न्यूनतम हो गयीं। फिर भी देखा गया कि इन कणों को नापने में अनिश्चितता कम नहीं हुयी। क्वांटम भौतिकी में इस तथ्य को अनिश्चितता का सिद्धान्त कहा जाता है और इसके गणितीय रूप को प्रतिपादित करने का श्रेय श्री हाइजनवर्ग को जाता है। इसका कारण कण के मूल में उपस्थित एक विशेष गहनता है। पर यदि सहज रूप में समझा जाये तो इसके पीछे एक द्वन्द्व छिपा है, अणु और तरंग का...

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  41. अनिश्चितता और आकस्मिकता - जीवन को रोचक और सक्रिय बनाए रखनेवाले कारकों में ये दो कारक उल्‍लेखनीय हैं।

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  42. सच निसार संसार में निश्च्चित कुछ नहीं .. बहुत बढ़िया भौतिक चिंतन ....दिमाग के पट खोलती सुन्दर प्रस्तुति..

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  43. शुक्रिया आपकी ताज़ा टिपण्णी के लिए इस बेहतरीन रचना के लिए .

    बेहतरीन विमर्श चल रहा है अनिश्चयता के सिद्धांत पर .जब आप किसी कण की आकाश में अवस्थिति का बोध करते हैं तब उसी अनुपात में एक अनिश्चितता सम्बद्ध काल के प्रति हो जाती है .

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  44. इस अनिश्चितता में थोड़ी से निश्चिंतता रहता है की आपका आलेख पढ़ कर दिल खुश हो ही जायेगा , विज्ञान और दर्शन का खूबसूरत गठबंधन।

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  45. निश्चितता का विश्वास दंभ जगाता है और उसी में हम डूबे रहते हैं, बिना कारण जाने।
    भैया हम तो इस विशाल ब्रह्माण्ड के छोटेसे कण है और अनिश्चितता को मान कर चलते हैं ।

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  46. अनिश्चितता में जीवन का रस है।

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  47. This is not due to imprecise measurements. Technology is advanced enough to hypothetically yield correct measurements. The blurring of these magnitudes is a fundamental property of nature.

    Click on this button to hear Heisenberg explaining his uncertainty principle. (.au, 176 kb)

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    1. निश्चय ही, यन्त्रों की क्षमता और दृष्टा का संलिप्त होना अनिश्चितता को प्रभावित करता है, पर यह सब दूर होने पर भी अनिश्चितता बनी रही। उसे क्वांटम भौतिकी ने गणितीय रूप दिया, हाइसनबर्ग के सिद्धान्त के रूप में। कारण रहा अणु और तरंग प्रकृति का द्वन्द्व।

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  48. The observer becomes part of the observed system.

    The notion of the observer becoming a part of the observed system is fundamentally new in physics. In quantum physics, the observer is no longer external and neutral, but through the act of measurement he becomes himself a part of observed reality. This marks the end of the neutrality of the experimenter. It also has huge implications on the epistemology of science: certain facts are no longer objectifiable in quantum theory. If in an exact science, such as physics, the outcome of an experiment depends on the view of the observer, then what does this imply for other fields of human knowledge? It would seem that in any faculty of science, there are different interpretations of the same phenomena. More often than occasionally, these interpretations are in conflict with each other. Does this mean that ultimate truth is unknowable?

    The results of quantum theory, and particularly of Heisenberg's work, left scientists puzzled. Many felt that quantum theory had somehow "missed the point". At least Albert Einstein did so. He was an outspoken critic of quantum mechanics and is often quoted on his comment regarding the Uncertainty Principle: "The Old One (God) doesn't play dice." He also said: "I like to believe that the moon is still there even if we don't look at it." In particular, Einstein was convinced that electrons do have definite orbits, even if we cannot observe them. In a conversation with Heisenberg he said:

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  49. A conversation between Einstein and Heisenberg.

    Heisenberg: "One cannot observe the electron orbits inside the atom. [...] but since it is reasonable to consider only those quantities in a theory that can be measured, it seemed natural to me to introduce them only as entities, as representatives of electron orbits, so to speak."

    Einstein: "But you don't seriously believe that only observable quantities should be considered in a physical theory?"

    "I thought this was the very idea that your Relativity Theory is based on?" Heisenberg asked in surprise.

    "Perhaps I used this kind of reasoning," replied Einstein, "but it is nonsense nevertheless. [...] In reality the opposite is true: only the theory decides what can be observed."

    (translated from "Der Teil und das Ganze" by W. Heisenberg)

    We can easily see the rift between Einstein's intuitive and Heisenberg's empirical approach. Although Einstein's argumentation appears tricky, it is clear that he believes in a reality independent of what we can observe, which is in essence the view of realism. Kant's "thing in itself" comes to mind. - In contrast, Heisenberg believes that reality is what can be observed. If there are different observations, there must be different realities, which depend on the observer. Insofar Heisenberg can be regarded as an advocate of philosophical idealism, which states that the objects of perception are identical with the ideas we have about them. The idealist view denies that any particular thing has an independent real essence outside of consciousness.

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  50. Is the moon still there when nobody is looking at it?

    The two philosophies seem incompatible at first. Heisenberg is in good company with famous contenders of idealistic positions, such Plato, Schopenhauer, and Husserl, but so is Albert Einstein. If we take Heisenberg's view for granted, strict causality is broken, or better: the past and future events of particles are indeterminate. One cannot calculate the precise future motion of a particle, but only a range of possibilities. Physics loses its grip. The dream of physicists, to be able to predict any future event in the universe based on its present state, meets its certain death.

    If we regard reality as that which can be observed by all, we have to find that there is no objective movement of an electron around the nucleus. This viewpoint would imply that reality is created by the observer; in other words: if we take Heisenberg literally, the moon is not there when nobody is looking at it. However, we must consider the possibility that there is a subatomic reality independent of observation and that the electron may have an actual trajectory which cannot be measured. The moon may be there after all. This conflict is the philosophical essence of the Uncertainty Principle.

    Relativity and quantum theory are inconsonant up to the present day, despite great efforts in creating a unified theory capable of accommodating both views. After having published his papers on Relativity, Einstein dedicated the rest of his life to working on such a unified field theory, yet without success. The physicists who followed his lead developed a new model called string theory during the 1970s and 1980s. String theory was successful to some extent in providing a mathematical model that integrates the strong and the weak nuclear forces, electromagnetism, and gravitation. In spite of this, it cannot yet be called a breakthrough, because (1) the theory has not been corroborated thoroughly by observational evidence; and (2) there is not one, but five competing string theories. The latter point has recently been addressed by M-theory, a theory that unites existing string theories in 11 dimensions.

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  51. The Zen of Quantum Theory.

    We shall leave the problem of theoretical unification to the physicists and instead briefly consider a philosophical unification of Relativity and quantum theory. Is this possible? Contemplating the subatomic realm seems like a Zen exercise. The nuclear reality embodies duality and multiplicity, such as is evident in the complicated structure of atoms and particles. It transgresses the narrow world of opposites. We have to realise that in spite of the different parts and components, the subatomic world in actuality is an undivided whole, where the boundary between the observer and the observed is blurred. Object and subject have become inseparable, spatial and temporal detachment is an illusion. When the American physicist J.R. Oppenheimer (1902-1967) describes the structure of probability clouds, he almost sounds like a Zen Master: "If we ask, whether the position of the electron remains the same, we have to say no. If we ask, whether the position of an electron changes with the course of time, we have to say no. If we ask, whether the electron is in a state of rest, we have to say no. If we ask, whether the electron is in motion, we have to say no."

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    1. बहुत ही रोचक चर्चा दो धुरन्धरों के बीच।

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  52. यदि किसी विषय में हमें पूर्ण ज्ञान नहीं है या हमारी क्षमता नहीं है कि पूर्ण ज्ञान जाना जा सके, तो क्या उस विषय में निर्णय लेना या चिन्तन करना बन्द कर दिया जाये

    एक पहलू तो वह है जो आपने बताया, कि पूर्ण ज्ञान तो किसी के पास है ही नहीं। एक अन्य पहलू यह भी है कि यदि किसी विषय में ज्ञान नहीं है और उस विषय में चिन्तन नहीं किया गया तो ज्ञान आएगा कैसे? फ्रॉम द हैवन्स एक प्रकाश चमका और पूर्ण सृष्टि का ज्ञान व्यक्ति में घर कर गया - ऐसा या तो किस्से कहानियों में होता है अथवा बड़े/छोटे पर्दे पर, वास्तविक जीवन में नहीं! ;)

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    1. अमितजी, चिन्तन तो बन्द नहीं किया जा सकता है, यदि ऐसा होता तो अनिश्चितता के बारे में लोग अपना संशय क्यों उद्घाटित करते? हाँ एक बार यह पता चल जाये कि कितनी निश्चितता से नापा जा सकता है और कितना नापा जा सकता है तो जीवन आसान अवश्य हो जाता है।

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    2. जीवन और आसान? मेरे ख्याल से तो जितना ज्ञान बढ़ता जाता है व्यक्ति उतना अधिक चिन्तन करता है, और उतना ही अधिक जीवन जलेबी होता जाता है। उदाहरणार्थ, आज से १०० वर्ष पहले लोगों का जीवन आज के मुकाबले काफ़ी सरल होता था।

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  53. ब्लॉगर.कॉम का कमेंट सिस्टम थोड़ा दुखी सा है, सबसे बड़ी समस्या यह है कि टिप्पणी के बाद आने वाली टिप्पणियों का पता नहीं चलता। यदि आप ऑल्टरनेट देखने के पक्ष में हों तो मैं Intense Debate ( http://intensedebate.com/ ) का सुझाव दूँगा। इसी तरह Disqus भी है, Livefyre और फेसबुक कमेंट्स उतने अच्छे उपाय नहीं हैं।

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    1. Intense debate सच में intense लग रहा है।

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    2. इसी ब्लॉग पर टिप्पणी बक्से के नीचे Subscribe by email पर क्लिक कीजिए टिप्पणी के बाद आने वाली टिप्पणियों का पता चलता रहेगा

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    3. प्रवीण जी बस लगा डालिए, अब एक सप्ताह बाद टिप्पणी जाँचने की सुध आई कि देख लें कोई उत्तर आया कि नहीं, अन्यथा पता नहीं चलता टिप्पणी के उत्तर का। :)

      पाबला जी, सबस्क्राइब वाला बक्सा गूगल में लॉगिन किए लोगों के लिए होता है कदाचित्‌, मैं यहाँ टिप्पणी करते हुए गूगल में लॉगिन नहीं किए हुए हूँ। :)

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  54. कल्पना और यथार्थ के बीच झूलता जीवन ...
    गहन सारगर्भित आलेख ......

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  55. अनिश्चितता, उत्सुक बनाये रखती है

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  56. अनिश्चितिता ही तो जीवन को रोमांचक और गतिशील बनाए रखती है...बहुत सारगर्भित आलेख...

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  57. अनिश्चय और अस्थायी -पन जीवन का आवश्यक तत्व है .प्रकृति में भी यह नियम है अपवाद नहीं यही सौन्दर्य तत्व है जो पल प्रतिपल बदले .

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  58. उत्तम चिन्तन!!

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  59. बस एक पंक्ति :
    " नारी बीच सारी है कि सारी बीच नारी है ,
    नारी ही की सारी है कि सारी ही की नारी है । "

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  60. /// हमें तो अपनी अनिश्चितता में डोलने में भी सुख मिलता है



    कभी-कभी तो हमें भी अनिश्चितता में डोलने में मज़ा आता है, अजीब सी हालात होती है दिल की।

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