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24.7.22

वयं राष्ट्रे जागृयाम


नाद निनाद, सतत उत्थान,

वयं राष्ट्रे जागृयाम।


गति में शक्ति, शक्ति में मति हो,

आवश्यक जो, लब्ध प्रगति हो,

रेल हेतु हो, राष्ट्रोन्नति हो,

नित नित छूने हैं आयाम,

वयं राष्ट्रे जागृयाम।


सहज समेटे, जन मन जोड़े,

भाषा, भूषा अन्तर तोड़े,

अथक अनवरत हर क्षण दौड़े,

रेल राष्ट्र का है अभिमान,

वयं राष्ट्रे जागृयाम।


रेख उकेरे, लौह-गंग सी,

चहुँ दिश बहती, जल तरंग सी,

आह्लादित, कूकी उमंग की,

रेल राष्ट्र का नवल विहान,

वयं राष्ट्रे जागृयाम।


महाकाय, घन, किन्तु व्यवस्थित,

अपनी सीमाओं में प्रस्थित,

चलती रहती सर्व समन्वित

संयत अनुशासित उपमान,

वयं राष्ट्रे जागृयाम।



(यजुर्वेद से उद्धृत "वयं राष्ट्रे जागृयाम" हमारे रेल संस्थान का ध्येय वाक्य है। रचना के बाद उसे संगीतबद्ध और छायांकित करने में संस्थान के प्रशिक्षु अधिकारियों का अद्भुत योगदान रहा है। मनन से प्रकटन तक के प्रकल्प की प्रेरणा संस्थान की महानिदेशिका श्रीमती चन्द्रलेखा मुखर्जी जी से प्राप्त हुयी है)