7.9.21

राम का निर्णय (कौशल्या)


राम के लिये वे क्षण प्रबल और अनियन्त्रित उथलपुथल में बीते। पिता का शोक और नैराश्य, माँ कैकेयी का अविश्वास और रुक्षता, भरत के असमंजस की आगत स्थिति, लक्ष्मण का क्रोध, सीता को होने वाला विरह का अपार दुख, वनवास की रूपरेखा और उस पर माँ कौशल्या का मूर्छित हो जाना। राम को इस प्रकार बद्ध होना स्वीकार नहीं था। उनका प्रथम प्रयास रहता था कि किस प्रकार परिस्थियों की विषमता में मन का समत्व प्राप्त किया जाये। यद्यपि गुरु वशिष्ठ के इस सिद्धान्त का अनुप्रयोग सरल परिस्थितियों में कई बार कर चुके थे राम, पर आज का प्रश्न जटिलतम था। भावनाओं में बहकर राम को निर्णय लेना स्वीकार नहीं था, राम सदा ही स्थिर बुद्धि से निर्णय लेना चाहते थे। आज भावनाओं का ज्वार प्रबलतम था, आज राम के हृदय की कठिनतम परीक्षा थी।


माँ की चेतना लौटती है, राम को सम्मुख और निकट पा एक स्वाभाविक सी प्रसन्नता हृदय में आती है पर तभी स्मृतियों का झोंका सहसा उन्हें करुण कर जाता है, अश्रु पुनः बहने लगते हैं। “माँ” कहते हैं राम और वह स्वर कुछ आग्रह कर रहा होता है अपनी माँ से। बचपन से ही पुत्र का वह एक स्वर अत्यन्त विशेष रहता है अपनी माँ से, जब किसी वस्तु या अनुग्रह की चाह रहती है पुत्र हृदय में। आज न कोई व्यञ्जन चाहिये था राम को, आज न कोई अनुमति पानी थी राम को, आज न पिता तक कोई बात पहुँचाना चाहते थे राम। आज राम का स्वर अपनी माँ से अपने पुत्र के लिये विलाप न करने की भर का आग्रह कर रहा था।


कौशल्या राम के सर पर हाथ फेरती है और विलाप न करने का आग्रह स्वीकार कर शान्त हो जाती है। विचारों को संयत कर यह निश्चित करती है कि आज राम से मन के सारे भाव कह दूँगी, वह सारे कारण कह दूँगी जो वह वर्षों अपने हृदय में छिपाये रही। कौशल्या निश्चित कर चुकी थी कि आज वह माँ से अधिक महारानी और पूर्व राजपुत्री के रूप में बात करेगी। सब कुछ स्पष्ट बताने के लिये माँ कौशल्या वह छोर ढूढ़ रही थी, जहाँ से बात प्रारम्भ हो सके।


प्रिय राम, आपके जन्म ने मुझे जीवन में एक अपार सुख दिया है। आपके न आने तक मैं वन्ध्या होने का अभिशाप लिये जी रही थी। माँ के लिये पुत्र या पुत्री न होने का दुख अपार होता है। ईश्वर ने कृपा की, पिता ने यज्ञ किया और फलस्वरूप आप जैसा उपहार मुझे मिला। जीवन सच में सुख से परिपूर्ण हो गया था। किन्तु इस क्षण को सम्मुख पा ऐसा लग रहा है कि यदि मैं ही वन्ध्या होती तब भी सारे दुख झेल लेती और जीवन निर्वाह कर लेती। तुम जैसा पुत्र होने के बाद जो सुखानुभूति हुयी, अब वह ही साथ न रहे, वह अत्यन्त दुखदायी है, अपार पीड़ादायी है।


राम, एक ज्येष्ठतम रानी के रूप में जो कल्याण और सुख मेरे अधिकार में थे, वह मुझे मिले नहीं। राजमाता के रूप उस कमी को पूर्ण करने की आस मन में थी, पर अब तुम्हारे वन जाने से छोटी सौत के विदीर्ण करने वाले वचन मुझे सुनने पड़ेंगे। तुम्हारे यहाँ रहने पर भी जब मैं सौतों से तिरस्कृत रही हूँ, पता नहीं तुम्हारे जाने पर क्या होगा? मैं यहाँ अब नहीं रह सकती। मैं भी तुम्हारे साथ ही वन चलूँगी। बोलते बोलते माँ कौशल्या रुक गयी, मानो साथ जाने का निर्णय सभी दुखों को विराम देने वाला हो। 


राम भारी मन से अपनी माँ की पीड़ा सुन रहे थे। अधिकारों के इस विश्व में न जाने कौन सा अभाव मन बिद्ध कर जाये। मन में वर्षों से चुभी व छिपी बातें और उस पर भी व्यक्तिगत व सामाजिक मौन? राम को यह समीकरण ज्ञात थे पर यह बातें कभी कही नहीं गयीं। राजपरिवारों के दुख भौतिक आवश्यकताओं के नहीं वरन मानसिक अधिकारों के होते हैं। कौशल्या को भी लगा कि उनका व्यक्तिगत दुख है, उसमें पुत्र को क्यों व्यथित करना? माँ कौशल्या ने पत्नी के अधिकार के विषय को सहसा बन्द कर दिया। माँ के अधिकारों का स्मरण कर पुनः बोलना प्रारम्भ किया।


प्रिय राम, माता की सेवा करना तुम्हारा धर्म है, तुम वह करो। वन जाने से वह तुम्हारे लिये सम्भव नहीं होगा, अतः वन मत जाओ। तुम्हारे पिता का तुम पर जितना अधिकार है, उतना ही अधिकार माँ के रूप में मेरा भी है। उस अधिकार से मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम वन नहीं जाओगे, राम। यदि तुम फिर भी नहीं मानते हो और अपने पिता की प्रतिज्ञा को माँ से अधिक मान देते हो तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगी जिससे तुम मेरी सेवा कर सको। यदि फिर भी तुम मुझे छोड़कर वन गये तो मैं प्राण त्याग दूँगी और उसका सारा दोष और पाप तुम पर लगेगा।


राम इस तर्क श्रृंखला के बारे में विचार कर के नहीं आये थे। माँ ने कभी इस प्रकार अधिकार नहीं जताया। माँ आज तर्कों को यथासम्भव हर प्रकार से जोड़कर प्रस्तुत कर रही है। माँ का हृदय किसी तरह से अपने पुत्र को रोकना चाह रहा है। राम यह तथ्य समझ तो रहे थे पर यह नहीं सोच पा रहे थे कि किस तरह माँ को समझाया जाये और उनका शोक कम किया जाये। राम के उत्तर देने में आये एक क्षणिक से विराम से माँ की आशायें बढ़ चली थीं पर वह हृदय से जानती थीं कि राम हर पक्ष को भलीभाँति विचार कर ही निर्णय लेते हैं। यदि निर्णय ले लिया है तो उसे अकाट्य तर्क, धर्म संदर्भ और सरल संवाद से व्यक्त भी करेंगे।


राम ने माँ को हाथ जोड़कर पुनः प्रणाम किया और इस प्रकार बोले। माँ, मुझमें पिता की आज्ञा का उल्लंघन करने की शक्ति नहीं है। पिता की आज्ञा के लिये कण्डु ने गाय के, परशुराम ने माँ के, सगर के पुत्रों ने स्वयं के प्राणों की आहुति दी थी। वन मुझे जाना होगा माँ। बस चौदह वर्ष में मैं प्रतिज्ञा पूरी करके लौट आऊँगा और आपकी सेवा का कर्तव्य दुगने प्रयास से पूरा करूँगा। जहाँ तक आपके जाने का प्रश्न है तो वह धर्मसम्मत नहीं है। पति के जीवित होने तक उसके ही साथ रहने का वचन आपको निभाना है। और इस समय तो पिता के विदीर्ण हृदय को सर्वाधिक आवश्यकता आपकी है। आपको ही तो उनके दुख को भी शान्त करना है।


माँ का मन होता है कि मानता नहीं है। अश्रुपूरित माँ वन साथ न चलने के कारण अस्वीकार कर अपनी असहायता और दीनता प्रस्तुत करना चाह रही थी। राम इस प्रकार बार बार रोके जाने पर मन में ही आवेश में भर रहे थे।


यह विषम स्थिति भाँप कर लक्ष्मण ने क्रोध को संयत किया और राम को विमर्श देने की आज्ञा माँगी। राम जानते थे कि लक्ष्मण के हृदय में एक उथलपुथल चल रही है और उसे बाहर आना आवश्यक है। राम लक्ष्मण को अपनी बात कहने के लिये संकेत देते हैं।

4.9.21

जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ

 

मैंने कविता के शब्दों से व्यक्तित्वों को पढ़ कर समझा ।

छन्दों के तारतम्य, गति, लय से जीवन को गढ़ कर समझा ।

यदि दूर दूर रह कर चलती, शब्दों और भावों की भाषा,

यदि नहीं प्रभावी हो पाती जीवन में कविता की आशा ।

तो कविता मेरा हित करती या मैं कविता के हित का हूँ ?

जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ ।

 

सच नहीं बता पाती, झुठलाती, जब भी कविता डोली है,

शब्दों का बस आना जाना, बन बीती व्यर्थ ठिठोली है ।

फिर भी प्रयत्न रहता मेरा, मन मेरा शब्दों में उतरे,

जब भी कविता पढ़ूँ हृदय में भावों की आकृति उभरे ।

भाव सरल हों फिर भी बहुधा, शब्द-पाश में बँधता हूँ ।

जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ ।

 

यह हो सकता है कूद पड़ूँ, मैं चित्र बनाने पहले ही,

हों रंग नहीं, हों चित्र कठिन, हों आकृति कुछ कुछ धुंधली सी ।

फिर भी धीरे धीरे जितना सम्भव होता है, बढ़ता हूँ,

भाव परिष्कृत हो आते हैं, जब भी उनसे लड़ता हूँ ।

यदि कहीं भटकता राहों में, मैं समय रोक कर रुकता हूँ,

जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ ।

 

मन में जो भी तूफान उठे, भावों के व्यग्र उफान उठे,

पीड़ा को पीकर शब्दों ने ही साध लिये सब भाव कहे ।

ना कभी कृत्रिम मन-भाव मनोहारी कर पाया जीवित मैं,

जो दिखा लिखा निस्पृह होकर, कर नहीं सका कुछ सीमित मैं ।

अपनी शर्तों पर व्यक्त हुआ, अपनी शर्तों पर छिपता हूँ

जो दिखता हूँ, वह लिखता हूँ ।

2.9.21

राम का निर्णय (मनःस्थिति)

 

राम ने जैसे ही कहा कि “पिता दीन्ह मोहि कानन राजू”, माँ कौशल्या शोक से मूर्छित हो गयीं। राम को इसका भान था पर माँ को शीघ्र सूचित कर आज्ञा लेना आवश्यक था, आज दिन में ही वन के लिये प्रयाण जो करना था।


पिता दशरथ के महल से निकलने के बाद राम मन में दिन के शेष समय में सम्पन्न करने वाले कार्यों की एक सूची बना रहे थे। उसमें कौशल्या और सीता को समझाना प्रमुख था। लक्ष्मण साथ चल रहे थे। लक्ष्मण सदा ही अपने भाई राम के प्रति समर्पित रहे हैं। राम के प्रति लक्ष्मण का अनुराग एक बड़े भाई से बढ़कर था। राम के सबसे किये व्यवहारों को, वार्तालापों को और स्पष्ट विचारों को लक्ष्मण मन्त्रमुग्ध हो अनुसरित करते थे। विश्वामित्र के कार्य हेतु राम के साथ जाने का जो अवसर लक्ष्मण को प्राप्त हुआ था, उसने दोनों ही भ्राताओं को दुर्धर्ष योद्धाओं के रूप में प्रस्थापित कर दिया था। राज्याभिषेक की सूचना के बाद राम ने लक्ष्मण को प्रमुख कार्य संचालक के रूप में अपना दायित्व निभाने के लिये प्रेरित भी किया था और उसे लक्ष्मण ने स्वीकार भी कर लिया था।


महल से निकलने के बाद राम का मुख शान्त था। लक्ष्मण रथ में साथ पर पीछे खड़े थे, कुछ कहना चाह रहे थे पर राम ने बोलने का संकेत नहीं दिया, बस कंधे पर एक बार हाथ रख कर आगे देखने लगे। राम लक्ष्मण का स्वभाव जानते थे। राम जानते थे कि लक्ष्मण के हृदय में एक ज्वालामुखी फट रहा होगा। राम जिस क्षण को सहन करने की सीमा में थे, लक्ष्मण को उसे सहन करने में कितना प्रयत्न करना पड़ रहा होगा?


अपने वनगमन की स्थिति में राम लक्ष्मण के कारण अयोध्या की व्यवस्थाओं से निश्चिन्त थे। यद्यपि भरत पर राम का विश्वास अटूट था पर राजा की मर्यादाओं और कैकेयी माँ के आदेशों की विवशताओं में कौशल्या और सीता का अहित न हो पाये, इसके लिये लक्ष्मण का यहाँ रहना आवश्यक था। दो मुहूर्त पहले तक राम राज्य में जिन व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करना था, जिन योजनाओं को क्रियान्वित करना था, नगरवासियों की जिस समस्या को प्रथमिकता से हल करना था, जिस आधारभूत ढाँचे का निर्माण करना था, उन सब पर विचार कर रहे थे। राम ने राज्य के लिये कई बड़े स्वप्न देख रखे थे। शासन की व्यवस्था को जिस उत्कर्ष तक राम को पहुँचाने की महत्वाकांक्षा राम हृदय में लिये थे, उसके लिये एक भी क्षण व्यर्थ करना उचित नहीं था।


सहसा मानसिक परिदृश्य बदल जाता है। अब राम को अपने जीवन के आगामी चौदह वर्ष ज्ञानार्जन, सन्त कल्याण, गुरुकुल व्यवस्थायें और वनवासियों के साथ बिताने में दिख रहे थे। राज्य के उत्थान के बारे में देखे स्वप्नों को संभवतः चौदह वर्ष और प्रतीक्षा करनी होगी।


बाहर नगरवासी प्रसन्न थे और राम को देख कर जयकार कर रहे थे। सामान्य परिस्थितियों में अभिवादन स्वीकार करने के समय राम के मुखमंडल पर स्मित सी मुस्कान आ जाती थी। आज राम के चेहरे पर गाढ़ा गाम्भीर्य चढ़ा था। नगरवासी फिर भी उत्साहित थे, स्त्रियाँ अपने भवनों से राम को निहार रही थीं। सहसा माँ कौशल्या का महल आ जाता है। बाहर नगरवासियों, प्रबु्द्धजनों, शुभचिन्तकों और राजकीय पदाधिकारियों की उपस्थिति में भी राम नहीं रुके और न ही उनका कुशलक्षेम पूछा। यद्यपि सबको राम का व्यवहार चकित कर रहा था पर अतिव्यस्तता के कारण राजाओं का यह व्यवहार कई बार जनसाधारण को स्वीकार्य होता था।


माता कौशल्या व्यस्त थीं और अपनी ही बात बताये जा रही थीं। इतना समय राम को संयत होने के लिये पर्याप्त था। शान्तमना हो इतना बड़ा निर्णय ले चुके राम को माँ का मूर्छित होना व्याकुल कर गया। माँ के दुखी होने का या विलाप करने का भान राम को था। बचपन में दौड़ते दौड़ते राम जब गिरते भर थे माँ का हृदय कण्ठ में आ जाता था, आज पता नहीं क्या होगा माँ का?


कब शब्द निकले, कब माँ मूर्छित हुयी, समय निर्द्वन्द्व हो निर्बाध भाग रहा था। राम दौड़ते हैं, माँ को उठाते हैं, सहारा देकर शैय्या पर बैठाते हैं। परिचारिकायें पीछे हट जाती हैं और शीघ्र ही पात्र में जल लाती है। राम माँ को जल पिलाते हैं। माँ की दशा देखकर रोना चाहते हैं राम पर समय आज अवसर नहीं दे रहा है। उनकी आँखों में झलका एक भी अश्रुबिन्दु उनके दृढ़ और गम्भीर निर्णय को क्षति पहुँचा जायेगा। आज न वह स्वयं विह्वल होंगे और न ही माँ को होने देंगे।


माँ सामान्य होने में समय लेती है। आज राम के पास समय नहीं था, उन्हें वनगमन के पूर्व कितने कार्य सम्पन्न करने थे। यह क्या, राम स्वयं को उमड़ रहे विचारों के जाल से बाहर निकालते हैं और झिड़कते हैं। माँ के लिये समय देने में इतनी व्यग्रता क्यों है आज। एक प्रतिज्ञा के त्वरित पालन का बोध क्या माँ के स्नेह और ममता से भी बढ़कर है? राम तात्कालिक शेष सब विस्मृत कर माँ का मुख निहारते हैं। हृदय की पीड़ा कितनी स्पष्ट छलक रही थी माँ की आँखों से। अश्रुपूरित माँ की आँखे। यदि कोई और इन अश्रुओं का कारण होता तो संभवतः राम उससे इस लोक में जीवन का अधिकार छीन लेते। आज तो कारण भी राम है, निदान भी राम। पीड़ा भी राम ने दी है, शब्दों की सान्त्वना भी राम को ही देनी है।


राम संयत होते हैं, लक्ष्मण को देखते हैं। लक्ष्मण तनिक निकट आ गये थे पर सर झुकाये खड़े थे, वह नहीं चाहते थे कि राम उनका तमतमाता मुख देख पायें। लक्ष्मण राम की अवहेलना कभी नहीं करते थे, पर राम समझ गये थे कि कौशल्या से भी अधिक लक्ष्मण को समझाना पड़ेगा। माँ तो शोक में है पर लक्ष्मण में क्रोध भरा हुआ है। माँ तो सारा दोष अपने ही भाग्य को ही देगी पर लक्ष्मण भाग्य या दैवयोग पर विश्वास ही नहीं करता है। माँ को मना लेगें राम पर से अपने अनुचर, सहचर और प्रिय लक्ष्मण की उद्वेलित मनःस्थिति कैसे सम्हालेंगे राम?

31.8.21

राम का निर्णय (कैकेयी)

 

जो राम के वनगमन के निर्णय को विशुद्ध भावनात्मक मानते हैं, वे राम को पूरा नहीं जानते हैं। पिता का मान रखने के लिये सब त्याग कर वन चले जाना भावनात्मक लग सकता है पर उसके पीछे राम के तर्क, धर्म का ज्ञान, परिस्थिति की समझ, सबको साधने की कला, सब सहने का सामर्थ्य और अद्भुत औदार्य, इन पक्षों को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है।


काल ने राम को संभवतः सर्वाधिक कठिन निर्णय लेने के लिये चुना था। मुझे व्यक्तिगत कष्ट है कि राम वन गये पर राम ने जो मानक निर्धारित किये उससे अधिक संतुलित कुछ भी संभव नहीं था।


राम के वनगमन के निर्णय को समझना है तो उसके लिये पाँच संवाद समझने होंगे। पहला माँ कैकेयी से, दूसरा माँ कौशल्या से, तीसरा लक्ष्मण से, चौथा सीता से और पाँचवा भरत से। इसमें प्रथम चार संवाद वनगमन के पहले हुये थे, भरत के साथ संवाद चित्रकूट में हुआ था। इन पाँचों संवादों में राम के निर्णय के आधार दृष्टिगत होते हैं। इन पाँचों संवादों में राम के व्यक्तित्व के वृहद विस्तार प्रकट होते हैं।


दशरथ से राम का विशेष संवाद नहीं हुआ। पहले तो राम ने दशरथ के न बोलने पर पीड़ामिश्रित आश्चर्य व्यक्त किया पर बाद में उन्हें सान्त्वना के ही वचन कहे। जब सबसे आज्ञा लेकर राम दशरथ के पास पुनः पहुँचे तो दशरथ का शोक न रुक सका और उनकी आत्मग्लानि द्रवित होकर बह चली। उन्होंने राम से स्पष्ट कहा कि हे रघुनन्दन, मैं कैकेयी को दिये वर के कारण मोह में पड़ गया हूँ, तुम मुझे कारागार में डालकर स्वयं ही राजा बन जाओ। दशरथ नहीं चाहते थे कि राम वन जायें पर अन्त में क्या यह कहना उचित था? राम शान्त भाव से उत्तर देते हैं कि न मेरे अन्दर राज्य की इच्छा है, न सुख की, न पृथ्वी की, न भोगों की, न स्वर्ग की। मन में यदि कोई इच्छा है तो यह कि आप सत्यवादी बने रहें, आप मिथ्यावादी न होने पावें। यह मैं शपथ लेता हूँ।


राम की यह शपथ उनकी प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से वर्णित करती है। सबके ऊपर उन्होंने अपने पिता का मान ही रखा। जिस राजा को उसकी प्रिय पत्नी श्रीहीन कर देती है, अनुनय विनय तक को मान नहीं देती है, उसका हृदय क्षतविक्षत कर देती है, उसको विवश कर देती है कि वह अन्यायपूर्ण निर्णय में अपनी सहमति दे, उसकी मानसिक दुर्गति कर देती है, उस राजा और अपने पिता दशरथ के वचनों को सब सुखों के ऊपर मान देने का उत्कर्ष केवल राम ही कर सकते हैं। पिता पर मिथ्याभाषी होने का लांछन न लगे, क्या मात्र इसी कारण ही राम ने वनगमन का निर्णय लिया? यह निश्चय रूप से एक आधार था पर शेष संवादों में जो भी प्रश्न उठाये गये हैं, वे सब भी नीतिगत और तर्कसंगत थे। राम के उत्तर व्यापक रूप से वनगमन के निर्णय के आधार निर्धारित करते हैं।


कैकेयी से संवाद के बाद ही राम वनगमन का निर्णय ले चुके थे। माँ कौशल्या, भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ हुये संवादों में राम ने अपने निर्णय को स्पष्ट किया है। कई ऐसे पक्ष जो विषय के विश्लेषण में प्रायः अनुत्तरित रह जाते हैं, राम के व्यक्तित्व के कई आयाम जो अन्यथा प्रकट नहीं हो पाते हैं, इन संवादों के माध्यम से समझे जा सकते हैं।


माँ कैकेयी से राम का संवाद स्पष्ट और सीधा था। पिता मुझसे बोलते क्यों नहीं? पिता तो सदा ही मुझे देखकर प्रसन्न होते थे, क्या कुछ अमंगल हुआ है या आपने कोई कठोर वचन बोला है? कैकेयी ने जब कहा कि राजा को सत्यपालन में बाधा आ रही है और उसका कारण तुम हो। तो राम ने लगभग झिड़कते हुये कहा कि देवी तुम्हें धिक्कार है, पिता की प्रतिज्ञा के लिये कौन सा ऐसा कार्य है जो राम नहीं कर सकता? रामो द्विर्नाभिभाषते। राम दो तरह की बात नहीं करता है।


दोनों वरों के बारे में जानकर और समुचित समय लेकर निर्णय ले चुके राम ने बड़े ही सहज स्वर में माँ कैकेयी से कहा। मैं पिता की प्रतिज्ञा के लिये वन जाने को प्रस्तुत हूँ पर यह जानना अवश्य चाहता हूँ कि फिर भी पिता के दुखी होने का क्या कारण है? मुझे प्रसन्नता है और मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मेरे लिये मेरी माँ और पिता ने मिलकर एक भविष्य सुनिश्चित किया है। इसमें मेरा हित है। वन में ऋषि मुनियों के सानिध्य में राम का उत्थान ही होगा। मुझे तो अभी भी गुरुवृन्द के साथ धर्मचर्चा सर्वाधिक सुखकारी और हितकारी लगती है। वन जाने में अब तो यह सुख निर्बाध मिलेगा। जब मुझे वनगमन में लेशमात्र भी दुख नहीं दीखता तब पिता के शोक का कारण क्या है, यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। पिता मुझपर प्रसन्न हो और मुझसे कुछ बोलें। पिता के न बोलने और दुखनिमग्न शिथिल बैठे रहने के क्षण राम को असह्य थे।


राम के इन वचनों ने दशरथ के मन में ग्लानि के असंख्य भाव प्रस्फुटित कर दिये। हे ईश्वर, कहाँ मैं अपने पुत्र को सामान्य नागरिक सा न्याय नहीं दिला पा रहा हूँ और कहाँ राम मेरी प्रतिज्ञा को अपने माथे पर शिरोधार्य कर वन जाने को प्रस्तुत है। दशरथ के मुख से कुछ भी न निकल सका, क्या बोलूँ में राम से? कंठ रुद्ध हो गया, नेत्रों से अश्रुधार और मोटी हो बह चली, सब दृश्य धुँधला गये, सामने बस राम के प्रसन्न मुख के सैकड़ों स्मृतियाँ चलचित्र के समान आने लगे। सहसा वन के भीषण चित्र भी उभर आये, पीड़ा दशरथ के लिये पुनः असहनीय हो गयी। हे राम, हे राम कह कर दशरथ पुनः अर्धचेत हो गये। 


राम ने पिता को आदर के भाव से निहारा और कैकेयी से कहने लगे। पिता मुझसे कम से कम भरत के अभिषेक की बात तो कह सकते थे, वह बात भी पिता ने मुझसे क्यों नहीं कही? मैं भरत के लिये सब छोड़ने को तैयार हूँ। भरत योग्य हैं, धर्मनिष्ठ हैं, नीतिनिपुण है, सबका सम्मान करते हैं, माताओं के प्रति स्नेह रखते हैं, उनके जैसा राजा पाकर अयोध्या धन्य हो जायेगी, रघुकुल गौरवान्वित हो जायेगा। माँ कैकेयी के कुटिल षड्यन्त्र के बाद भी भरत के प्रति राम के स्नेहिल भाव में किञ्चित भी विकार नहीं था। जैसे बचपन की क्रीड़ाओं में राम अपने छोटे भाईयों का मान रखने के लिये जानबूझ कर हार जाते थे, आज राम अपने मुख से भरत की श्रेष्ठता वर्णित कर स्वयं हार रहे थे। दशरथ के अश्रु अब भी रुक नहीं रहे थे।


भ्राता भरत के प्रति अपने प्रेमपूरित भाव व्यक्त कर राम माँ कैकेयी को षड्यन्त्रकारी कुटिला के भाव से उबार कर उन्हें पुनः माँ के आसन में बिठाने के लिये कहते हैं। जैसे मैं पिता का पुत्र हूँ, वैसे आपका भी हूँ। आपको अपने पुत्र पर इतना तो अधिकार था कि आप अपने मन की बात मुझे बुलाकर कह देतीं। मुझे यह बात पीड़ा देती है कि आपने इतनी छोटी सी बात के लिये अपने वर व्यर्थ किये, आपने इतनी छोटी सी बात के लिये पिता को अकारण कष्ट दिया। पिता न जाने शोक के किस भँवर में डूबे हैं। आपको तो आदेश देने का अधिकार था पर आपने यदि इंगित भी कर दिया होता तो मैं स्वयं ही भरत को सिंहासन पर बैठाकर स्वेच्छा से वन चला जाता। 


कैकेयी को राम से इस उत्तर की आशा नहीं थी। पितृभक्ति पर संशय करने पर क्षणिक क्रोध में आये राम इतने संयत हो सब स्वीकार कर लेंगे, इसका लेशमात्र भी अनुमान नहीं था कैकेयी को। राम के संवाद ने सबको मान दिया था। दशरथ को पिता का मान, भरत को भाई का मान और मुझे अपनी माँ से भी बढ़कर मान। राम के औदार्य और आर्जव व्यक्तित्व की वृहदता के सम्मुख वह भीतर से पूरी तरह से लज्जित हो चुकी थी। मनसपटल पर आत्मग्लानि का स्पर्श होते ही सहसा उसे मन्थरा के शब्द याद आ गये। कैकेयी की मुख कठोर हो गया। कैकेयी पुनः कुटिल आग्रह करती है कि राम, जब तक तुम वन चले नहीं जाते पिता प्रतिज्ञा पूरी न होने के कारण ऐसे ही शोकमग्न बैठे रहेंगे। दशरथ हतप्रभ हो कभी वितृष्णा से कैकेयी को देख रहे थे, कभी करुणा से राम के देख रहे थे। हे ईश्वर, इन दो विपरीत ध्रुवों में मैं अनन्त तक खिंचा जा रहा हूँ, मेरे प्राण ही क्यों नहीं निकल जाते।


राम ने माँ कैकेयी की निर्मम और तर्कजनित कुटिलता का संज्ञान न लेते हुये कहा। माँ, आप निश्चिन्त रहें, माँ कौशल्या से आज्ञा लेकर और सीता को समझाबुझा कर मैं आज ही वन चला जाऊँगा।


इस प्रकार पिता और माता की परिक्रमा कर राम कक्ष से निकल गये। वह अपना मन बना चुके थे।

28.8.21

आशा के शत दीप जले

 

न जाने किस राह चला जग, कातरता व्यापी चहुँ ओर,

अब मानवता रहे संशकित, अब पशुता का चलता जोर ।


शील, धैर्य, सज्जनता, श्रम, सब आदर्शों की गाली हैं,

जिनके पेड़ों पर रुपया है, बस वही आज वनमाली हैं ।


मानवता सिमटी क्षुब्धमना, नित दानवता उत्पातों से,

जन थकता छिपता दीन हीन, नित निशाचरी आघातों से ।


जो हैं समाज के शीर्षबिन्दु, जो मानवता के त्राता हैं,

बिन पिये चढ़े गर्वित मद में, बन बैठे वंद्य विधाता हैं ।


आश्रित तुम पर दुखियारे जो, उनके घर में देखो जाकर,

जो बिता रहे पूरा जीवन, तन ढकने का कपड़ा पाकर ।


तुम उसी राजसी सूट-बूट में, मद-मतवाले फिरते हो,

मानवता का दायित्व लिये, कुत्सित कर्मों में गिरते हो ।


भोली जनता को बहलाते, बस अपना स्वार्थ निभाते हो,

कब आकर इनकी सुध लेते, कब आकर इन्हें बचाते हो?


ये तेरे है, तुम इनके हो, इनमें तुममें कोई भेद नहीं,

बस राह मिलेगी अन्तहीन, हो गया किन्तु विच्छेद कहीं ।


सब यही चाहते देश बढ़े, उन्नति के विकसित पंथ चले,

यदि निशा पसारे तम अपार, तब आशा के शत दीप जले।


26.8.21

वनगमन, पर दोष किसका?


मेरे लिये राम का वनगमन विश्व इतिहास में सर्वाधिक उद्वेलित कर देने वाली घटना है, सर्वाधिक हृदयविदारक क्षण है, सर्वाधिक अन्यायपूर्ण निर्णय है।


पता नहीं मैं कहाँ स्थित हूँ? आराध्य राम के निर्णय पर प्रश्न उठाने की धृष्टता कर रहा हूँ। क्या मैं आँख बन्द कर स्वीकार कर लूँ कि राम ने जो निर्णय लिया वह उचित था, वह भी मात्र इसलिये कि राम मेरे पूजनीय हैं, मेरे आराध्य हैं। क्या औरों की भाँति मैं उन्हें भगवान मान लूँ और यह स्वीकार कर लूँ कि उन्होंने जो भी किया वह उनकी लीला थी। यह लीलावादी तर्क बड़ा ही निर्दयी है, अपने राम के कष्ट पर दुख व्यक्त करने का भी अधिकार आपसे छीन लेता है। तब सर्वसमर्थ राम पर दुख व्यक्त करने से राम के सामर्थ्य का अपमान जो होता है। लीलावादी कह सकते हैं कि राम तो ईश्वर थे, उन्हें कौन सा कष्ट? क्या करूँ मैं? सुनता हूँ पर इस तर्क को स्वीकार नहीं कर पाता।


राम का वन जाना मुझे असाध्य कष्ट देता है, जितनी बार प्रसंग पढ़ता हूँ, उतनी बार देता है। क्योंकि मन में राम के प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा है। बचपन से अभी तक हृदय यह स्वीकार नहीं कर सका कि भला मेरे राम कष्ट क्यों सहें? राम के प्रति प्रेम और श्रद्धा इसलिये और भी है कि राम पिता का मान रखने के लिये वन चले गये। विचित्र सा द्वन्द्व है यह, जिस कारण कष्ट हो रहा है उसी कारण श्रद्धा भी हो रही है, प्रेम भी उमड़ रहा है। राम ने कभी भी पिता को न तो दोषी ठहराया और न कभी दोषमुक्त ही किया। उन्होंने पिता की प्रतिज्ञाजनित आज्ञा का पालन भर किया। किस कारण छोटे भाई भरत को राज्य दिया गया और किस कारण राम को बिना अपराध के वनगमन का दण्ड मिला, इस अन्याय पर राम ने कभी कोई प्रश्न ही नहीं उठाया। हाँ, वन में एक बार राम के दुखी क्षणों में यह बात उठी अवश्य थी। उस समय राम लक्ष्मण को दशरथ के हित वापस अयोध्या लौट जाने को प्रेरित कर रहे थे। दशरथ की क्षीण मनःस्थिति और उनकी संभावित परवशता, ये प्रेरक कारण थे जो राम द्वारा लक्ष्मण को समझाये गये थे।


नियतिवादी कह सकते हैं कि यदि राम वन नहीं जाते तो रावण को कौन मारता? उनके अनुसार सब कारण श्रृंखलाबद्ध हैं, क्रमवत हैं, दैवयोग से प्रेरित हैं, देवों ने ही मन्थरा की मति पलटी। नियतिवादियों का यह सरलीकरण मुझे स्वीकार नहीं है। सीता अपहरण से रावण वध, कारण से कार्य तक का घटनाक्रम अन्तिम दो वर्ष से भी कम समय में हो गया था। तब शेष १२ वर्ष के वनभ्रमण के कष्टों का क्या कारण कहेंगे नियतिवादी? यदि राम वन नहीं जाते तो क्या समय आने पर रावण के विरुद्ध नहीं खड़े होते। यद्यपि रावण ने अयोध्या आदि से सीधी शत्रुता नहीं ली थी पर कालान्तर में उसकी महात्वाकांक्षा बढ़ती और तब राम से टकराव स्वाभाविक होता। या यह भी संभव था कि ऋषि मुनि आकर एक सक्षम राजा से सुरक्षा का आश्रय माँगते, तब भी रावणवध तो होना ही था। उनको अपने सिद्ध शस्त्र तो विश्वामित्र ने दे ही दिये थे, कालान्तर में अगस्त्य भी उन्हें अस्त्र दे ही देते। राम वनगमन के पहले ही इस युद्ध में खींचे जा चुके थे, शेष निष्कर्ष बस काल को प्रकट करने थे। सब नियत मान लेने से या राम के वनगमन को दैवयोग कह देने से क्या हमें उस निर्णय की विवेचना करना बन्द कर देना चाहिये?


वह भले ही त्रेतायुग था पर अन्याय का यह प्रकरण कलियुग का निर्लज्ज प्राकट्य था। वाल्मीकि ने दशरथ की रानियों के बीच प्रतिस्पर्धा और मानसिक वैमनस्य को बड़े ही स्पष्टरूप से व्यक्त किया है। कौशल्या ने राम को वन न जाने के लिये यह भी कारण दिया था कि राजा कैकेयी को अधिक मान देते रहे हैं और राम के राजा बनने से उनका भी मान वापस आयेगा। राम के वन जाने की स्थिति में कैकेयी और भी मदित, क्रूर और निष्कंटक हो सकती है। राजा की सर्वाधिक प्रिय रानी की दासियों में यह अभिमान आना सहज ही तो है। दासियों की राजपरिसर में महत्ता उनकी रानी के मान पर निर्भर थी। कोई भी ऐसी घटना जिससे उनकी रानी का प्रभावक्षेत्र सिकुड़े, उस पर दासियों का सतर्क होना स्वाभाविक था। मन्थरा का व्यवहार और षड्यन्त्रशीलता परिस्थितियों और व्याप्त मानसिकता का एक स्वाभाविक कर्म था, उस प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण का सहज सा निष्कर्ष।


राम के वनगमन का पूरा दोष मन्थरा पर मढ़कर निकल जाना उस अन्यायपूर्ण घटना के साथ भी अन्याय होगा। क्या कैकेयी की भी मति पलट गयी थी, क्या दशरथ को भी न्याय के बारे में विभ्रम हो गया था? क्या दशरथ अपनी सामान्य प्रजा पर यह अन्याय कर पाते जो उन्होंने अपने पुत्र राम पर हो जाने दिया और मौन बैठे रहे। राजकीय उत्तरदायित्वों में भला व्यक्तिगत वरों का क्या मोल? कोई प्रजाजन यदि दशरथ से यह प्रश्न भर पूछ देता तो दशरथ क्या उत्तर देते? जो न्याय दशरथ के लिये अपनी प्रजा के प्रति करना असंभव था वह निर्दयी अन्यायपूर्ण निर्णय राम जैसे गुणी, सौम्य, सर्वप्रिय और आज्ञाकारी पुत्र पर किया गया।


राम के वनगमन में मन्थरा से अधिक कैकेयी का दोष था और सर्वाधिक दोष दशरथ का था। मन्थरा की जिह्वा में सरस्वती बैठ गयी थी? कैकेयी की बु्द्धि पलट गयी थी? यह मतिभ्रम नहीं वरन रानियों की परस्पर प्रतिस्पर्धा में श्रेष्ठ बनने का भाव बुद्धि में बसा बैठा था। सब एक दूसरे से भय भी खातीं थी, सशंकित थीं। कैकेयी युवा थी और दशरथ की प्रिय भी, दशरथ उन पर कामानुरक्त थे। इस पर मन्थरा को खलनायक बनाने का क्या अर्थ? यदि किसी का निर्णय इसमें प्रबलता रखता था, वह दशरथ का था। दशरथ ने राम को न जाने के लिये कहा और न ही रुकने के लिये, बस मौन बने बैठे रहे। मौनं स्वीकृति लक्षणम्।


यद्यपि कैकेयी से दशरथ ने यथासंभव अनुनय विनय और याचना की, पर वह राजा का स्वरूप नहीं दिखा पाये और न ही पिता बन अपने पुत्र की रक्षा कर पाये। क्या वचन न मानने का सामाजिक अपयश राम को अन्यायपूर्ण वन भेजने से अधिक होता? यहाँ तो सर्वथा विपरीत ही हुआ। राम ने पिता की प्रतिज्ञा की रक्षा की, उनके अपयश में बाधा बन कर खड़े हो गये। बिना युवराज बने, रघुकुल और राजा के गुरुतर दायित्वों के निर्वहन का मान रखते हुये स्वयं ही वनगमन का निर्णय ले लिया।


यद्यपि घटनाक्रम अन्यायपूर्ण था, राम ने सबका ध्यान रखते हुये, माँ, पिता और कुल का सम्मान रखते हुये स्वयं ही वनगमन चुना।


राम के निर्णय के आधार क्या थे, विस्तृत विवेचना अगले ब्लाग में।

24.8.21

निर्णय के क्षण


दशरथ को जब पुनः चेतना आती है, कैकेयी राम को दो वरों के बारे में बता रही थी। हा! कितनी निर्दयी हो गयी है कैकेयी।


दशरथ स्वयं ही शान्त रहने का निर्णय ले चुके थे। अब जो भी होना है वह कैकेयी अथवा राम के निर्णय पर होना है। कैकेयी निर्लज्जता से अपना स्वार्थ व्यक्त किये जा रही है। अपने पुत्र से तो सबको प्रेम होता है इसलिये भरत को राज्य की बात तो समझी जा सकती थी पर राम को १४ वर्ष का वनवास दशरथ से न समझा जा रहा था और न ही सहा जा रहा था। 


क्या कैकेयी को राम से भय है? यदि राम यहाँ रहे तो कालान्तर में राम राज्य पर अधिकार का प्रयास करेंगे, क्या यह चिन्तन है कैकेयी का? कैकेयी की राजनीति मति दशरथ की समझ से परे थी। यदि भरत के लिये ही राज्य माँग लेती तो वह सदा के लिये हो जाता। राम यदि चौदह वर्ष बाद लौटे और राज्य पर अपना अधिकार जताया तब क्या स्थिति होगी? यह चौदह वर्ष क्या इसलिये माँगे हैं कि इतने वर्षों में भरत राज्य और सेना पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेंगे। राम क्या जीवनपर्यन्त शक्तिहीन ही रहेंगे? कैकेयी की इस अतार्किक बुद्धि से हताश थे दशरथ।


क्या कैकेयी को नगरवासियों से भय है? राम सबके प्रिय हैं। राम बचपन से ही उदारमना रहे हैं, पहले अपने भ्राताओं के प्रति, महल के परिचारकों और परिचारिकाओं के प्रति और बड़े होने पर सारे नगरवासियों के प्रति। कल ही प्रबुद्ध नगरवासी बता रहे थे कि राम मिलने पर सबकी कुशलक्षेम पूछते हैं। यही नहीं उनके परिजनों और परिचितों के बारे में ज्ञान रखते हैं। जब से नगरवासियों को पता चला है कि राम युवराज बनने वाले हैं और राजकीय कार्यों में उनका दायित्व गुरुतर होगा, तब से नगर में उत्सव का वातावरण बना हुआ है। सब अपने सर्वश्रेष्ठ वस्त्र पहन कर राम के दर्शन को लालायित हैं। जब उनको पता चलेगा कि राम को वन भेजने का षड्यन्त्र चल रहा है, क्या प्रजा विद्रोह कर देगी?


क्या कैकेयी को भरत की क्षमताओं पर विश्वास नहीं है? भरत अपने ज्येष्ठ के समक्ष क्या शासन में समर्थ नहीं रह पायेंगे या राम के रहते वह सिंहासन पर बैठने से मना कर देंगे? भरत क्या राम के भय से निष्कंटक नहीं रह पायेंगे? भरत का राम के प्रति आदर और स्नेह कहाँ कहीं किसी से छिपा है। राम का भी तो प्रेम भरत के प्रति अप्रतिम है। कैकेयी को संभवतः इसी का भय मुख्य हो कि राम के अयोध्या में रहते भरत सहज नहीं रह पायेंगे।


जब तक दशरथ इन विकल्पों में उतरा रहे थे, कैकेयी अपना वक्तव्य दे चुकी थी, दोनों वर बड़े ही रुक्ष स्वर में व्यक्त कर चुकी थी। कैकेयी की आँखों में अब एक स्पष्ट सा प्रश्नवाचक चिन्ह था। राम का मुख शान्त और भावहीन था। जिन शब्दों ने पिता को असहनीय पीड़ा पहुँचायी है, उन शब्दों को वह अपने कानों से सुनना चाहते थे। पिता की पीड़ा समझ सकें, माँ का मन्तव्य समझ सकें, इसके लिये आवश्यक था वह सब शान्त भाव से सुनें।


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। इसलिये नहीं कि वह दुखी है, इसलिये नहीं कि वह क्षुब्ध हैं। बिना किसी पर दृष्टि पहुँचाये वह कक्ष में उपस्थित सभी जनों के मुख की कल्पना कर सकते हैं। पिता शोकमग्न और आर्त मुख लिये, माँ प्रश्नवाचक और आन्दोलित मुख लिये, लक्ष्मण आग्नेय और उद्वेलित मुख लिये, सुमन्त हतप्रभ और वितृष्णा भाव लिये। सबके मन में अपने भाव गाढ़े हैं पर साथ में एक उत्सुकता और स्तब्धता है कि राम क्या कहेंगे? राम पर सबकी दृष्टि टिकी है। सबको साधने का क्रम कठिन है पर राम का उत्तर सबको संतुष्ट करने वाला होना चाहिये।


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। वह अपने निर्णयों के विकल्पों पर विचार करते हैं। प्रत्येक विकल्प के क्या दूरगामी परिणाम होंगे उनके पक्षों पर सोचते हैं। अनवगत प्रिय भरत जो इस चक्र में पिसेगा, कोई भी निर्णय हो पिता दशरथ मन से रुग्ण हो जायेंगे, माँ कौशल्या का क्या होगा, लक्ष्मण क्या करेगा? सीता, उसकी तो कोई सोच भी नहीं रहा है? गुरु, प्रजा, कुल, नीति और स्वयं राम की एक छवि। धर्म का प्रायोगिक क्षण था यह। संस्कार, विद्या, सम्बन्ध, सबके निष्कर्षों की परीक्षा लेनी थी इस निर्णय को।  


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। युवराज बनने के पहले ही उन पर निर्णय का महादायित्व आ गया था। यह निर्णय कोई लघु निर्णय नहीं था। पूरे राजपरिवार में संभावित उथलपुथल का अनुमान राम को हो गया था। एक महाअंधड़ उठ चुका था, रघुकुल की क्षति निश्चित दिख रही थी। राम को अपने निर्णय से यह सुनिश्चित करना है कि किस तरह यह क्षति न्यूनतम हो।


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। राजा और पिता शान्त हैं, कुछ कहते नहीं। माँ कैकेयी की वाणी रुक्ष अवश्य थी पर वह आदेश नहीं दे रही थी। वह सशंकित सी राम के माध्यम से पिता दशरथ से अपने वरों की माँग कर रही थी। राम को यहीं निर्णय लेना था। गुरु या माँ कौशल्या से मंत्रणा का न अवसर था और न ही समय। 


सब सुनने के पश्चात राम समय लेते हैं। उस क्षण का पूरा भार राम के युवा हृदय में संघनित था। सबके व्यवहार ने अनायास ही राम को कितना वयस्क कर दिया था। राम के निर्णय की प्रतीक्षा कक्ष में उपस्थित सब कर रहे थे, राम के निर्णय पर प्रश्न सभी सम्बन्धी करने वाले हैं, राम के निर्णय की परीक्षा कल प्रजा करेगी, राम के निर्णय की समीक्षा आने वाली पीढियाँ करेंगी।


राम क्या निर्णय लेंगे? 

21.8.21

व्यक्त कर उद्गार मन के


व्यक्त कर उद्गार मन के,

क्यों खड़ा है मूक बन के ।

 

व्यथा के आगार हों जब,

सुखों के आलाप क्यों तब,

नहीं जीवन की मधुरता को विकट विषधर बना ले ।

व्यक्त कर उद्गार मन के ।।१।।

 

चलो कुछ पल चल सको पर,

घिसटना तुम नहीं पल भर,

समय की स्पष्ट थापों को अमिट दर्शन बना ले ।

व्यक्त कर उद्गार मन के ।।२।।

 

तोड़ दे तू बन्धनों को,

छोड़ दे आश्रित क्षणों को,

खींचने से टूटते हैं तार, उनको टूटने दे ।

व्यक्त कर उद्गार मन के ।।३।।

 

यहाँ दुविधा जी रही है,

व्यर्थ की ऊष्मा भरी है,

अगर अन्तः चाहता है, उसे खुल कर चीखने दे ।

व्यक्त कर उद्गार मन के ।।४।।

19.8.21

निर्णय की कालरात्रि


कैकेयी प्रतीक्षा में थी कि कब राम अपने पिता की प्रतिज्ञा का पालन करने का वचन दें। जब राम ने तनिक रुक्ष व स्पष्ट स्वर में कहा तब कहीं जाकर कैकेयी को संतोष हुआ कि उसका षड्यन्त्र सफल हो जायेगा। 


मन्थरा द्वारा समझायी हर बात का कैकेयी ने अक्षरशः अनुपालन किया था। पहले कोपभवन में जाना, राजा के पूछने पर उन्हें वर की याद दिलाना, राजा को इस बात के लिये चढ़ाना कि रघुवंशियों के लिये उनकी प्रतिज्ञा ही सर्वोपरि है और तब कहीं दो वर माँगना। मन्थरा को यह भी ज्ञात था कि राजा क्रोध कर सकते हैं या मना कर सकते हैं, उसके लिये कैकेयी को विष पी लेने या अग्नि में कूद जाने की धमकी देने की सीख दी। यदि राजा दयनीय होकर अनुनय विनय करते हैं तब भी टस से मस न होने की अत्यन्त स्पष्ट चेतावनी भी दी थी मन्थरा ने।


कैकेयी को विश्वास था कि एक बार वर देने के पश्चात राजा स्वतः ही अपना निर्णय राम को सुना देंगे। राजा के शोकनिमग्न हो अचेत हो जाने से उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? हर बार उठते और “हा राम” कह कर पुनः अचेत हो जाते। उसे तो अब यह भी समझ नहीं आ रहा था कि राजा ने वर दिये हैं कि नहीं? या केवल विलम्ब करना चाह रहे हैं राजा?


राजा ने कितना धिक्कारा था, बुरा भला कहा था पर मना नहीं किया था। रघुवंशियों की इसी मति पर ही कैकेयी का पूरा छलतन्त्र टिका था। स्पष्ट मना कर देना प्रतिज्ञा का उल्लंघन था। यदि राजा ऐसा करते तो उसे भी रघुकुल के बारे में आक्षेप लगाने का अवसर मिल जाता।


राजा अधर में थे, न मना कर रहे थे और न ही हाँ कर रहे थे। जैसे ही राजा ने अनुनय विनय करना प्रारम्भ किया कैकेयी समझ गयी थी कि राजा अब मना नहीं कर सकते हैं। उस ओर से निश्चिन्त हो बैठी कैकेयी को पर यह समझ में नहीं आ रहा था कि राजा को कैसे प्रेरित करे कि वह अपना निर्णय राम को सुनायें। सारे अस्त्र उपयोग में लाने के बाद उसके पास बस एक ही अस्त्र बचा था जिसका वह रात में कई बार उपयोग कर चुकी थी, और वह थी उसकी कठोर वाणी। कठोर वाणी में उलाहना देने से राजा हर बार पीड़ा में उतर जाते और हा राम कह कर अचेत हो जाते। कैकेयी को लग रहा था कि यदि यह अस्त्र अधिक बार प्रयोग किया तो संभव हो राजा इस पीड़ा को सहन न कर पायें और स्वर्ग सिधार जायें। तब तो कोई वर भी नहीं मिलेगा। वैसे भी राजा पहला वर तो मान ही चुके थे। अब राजा का सारा दुख और प्रयत्न दूसरे वर पर था। इसी कारण उसने चुपचाप रात्रि बिताने का निर्णय लिया।


इधर दशरथ की पीड़ा मर्मान्तक थी। उनके मन में सतत ही उहापोह चल रही थी कि कैकेयी को किस प्रकार समझाया जाये, दूसरे वर के लिये आग्रह न करने के लिये किस तरह मनाया जाये। शोकमग्न हो दशरथ शिथिल अवश्य थे पर मन गतिमान था, ईश्वर से प्रेरणा देने की प्रार्थना कर रहे थे कि किसी तरह प्रातः होने तक कैकेयी को मुझपर कुछ दया आ जाये, उसका हठ कुछ कम हो जाये। जब भरत को राजा बनाने का उसका मन्तव्य सिद्ध हो चुका है तो राम को अकारण कष्ट क्यों दे रही है कैकेयी? यह सब क्यों हो रहा है, दशरथ अभी कुछ नहीं समझना चाह रहे थे। इस समय तो वह समस्त देवों का आह्वान कर रहे थे कि कैकेयी के भीतर तनिक ममत्व जग जाये, या तो राम के लिये या अपने पति के लिये।


दशरथ कैकेयी को समझ तो कभी नहीं सके थे। एक अद्भुत आकर्षण था उसमें, बस खिंचते चले गये और वहाँ निश्चेष्ट हो पड़े रहे, जीवन भर। एक अद्भुत ऊर्जा, जीवन जीने की एक अद्भुत शैली। अपरिमित सौन्दर्य और उस पर अपरिमित शूरता, एक बार बँधे तो जीवन भर बद्ध ही पड़े रहे। युद्धकौशल का ज्ञान तो बहुतों को होता है पर भला कौन नारी घनघोर युद्धक्षेत्र में अपने पति के साथ जाती है। कौतूहलवश नहीं वरन एक सहयोगी बन कर। स्पष्ट याद है वह क्षण जब लगा कि बाणों से बिद्ध पीड़ा अब प्राण हर लेगी तब कैकेयी ने कुशल सारथी बन कर उनके प्राण बचाये थे। प्राणरक्षा के इस उपकार के प्रति कृतज्ञ राजा के लिये दो वर भला कौन सी बड़ी बात थी। तब भी कैकेयी की विनम्रता से उनका हृदय गदगद हो उठा था। “बस आपके प्राण बच गये महाराज, यही मेरा वर है” कैकेयी के इस उत्तर पर जब उन्होंने अधिक आग्रह किया तो समय आने पर माँग लेने के लिये कह कर बात टाल दी थी।


पीड़ा के घोर क्षणों में दशरथ विचार में डूबे थे, उन्हें सच में समझ नहीं आ रहा था कि उनसे भूल कहाँ हुयी। युवा, सुगढ़, सुवाक, सुन्दरी और वीर कैकेयी से अधिक स्नेह तो परिस्थितियों की एक स्वाभाविक सी ही परिणिति थी। कौशल्या और सुमित्रा को यह अखरता अवश्य था पर उनके संस्कारों ने अपने पति की इस एकप्रियता को स्वीकार ही कर लिया था। उन्होनें भी सदा राजकीय और सामाजिक कार्यों में दोनों रानियों को समुचित सम्मान दिया। क्या करें पर व्यक्तिगत क्षणों में उन्हें कैकेयी का सानिध्य ही भाता था।


दशरथ अपने जीवन में कैकेयी के व्यवहार के विश्लेषण में लगे थे कि संभवतः कोई सूत्र मिल जाये जिससे यह अनर्थ होने से बच जाये। अपने पति और राजा पर इतना अधिकार पाकर कैकेयी का व्यवहार और भी उदार हो चला था। एक पुत्र की इच्छा थी और वह भी यज्ञ द्वारा पूरी हो गयी थी। एक नहीं, वरन चार पुत्रों पर कैकेयी का स्नेह देखते ही बनता था, विशेषकर राम उसे अत्यन्त प्रिय थे। वहीं राम थे जो अपनी माँ से अधिक आदर माँ कैकेयी को देते थे। सब कुछ तो ठीक चल रहा था, फिर मुझसे भूल कहाँ हुयी, दशरथ पुनः अचेत हो गये।


मैंने बिना कैकेयी से परामर्श लिये राम को सिंहासन देने का निर्णय ले लिया, कहीं उससे तो कैकेयी आहत नहीं हुयी है? यदि ऐसा होता तो सारा क्रोध मुझ पर होता पर कैकेयी के वरों में लक्ष्य तो राम हैं। इतना आदर और प्रेम पाने के बाद भी कैकेयी राम के प्रति इतनी निर्दयी क्यों बनी हुयी है, यह दशरथ की बुद्धि से परे था। क्या किसी ने कैकेयी को भरा है? वैसे तो कैकेयी स्वतन्त्र विचारधारा रखती है और उसे प्रभावित कर पाना सबके बस की बात नहीं है। शोक और सोच से दशरथ का हृदय फटा जा रहा था।


सुमन्त्र आते हैं, कैकेयी उन्हें राजा की ओर लक्ष्य कर कुछ आदेशित करती हैं, सुमन्त्र वहीं खड़े रहते हैं। हा, पुनः कठोर वचन! हा, कैकेयी को क्या हो गया हैं ईश्वर? राम को बुलाने के लिये इतनी व्यग्रता, इतना क्रोध। दशरथ सुमन्त्र को अनमने हो संस्तुति देते हैं। सहसा राजा कैकेयी के बारे में सोचना बन्द कर देते हैं और इस असमंजस में पड़ जाते हैं कि राम का सामना कैसे कर पायेंगे वह? क्या कहेंगे राम से? किस अपराध के लिये वन भेजेंगे उन्हें? दशरथ निर्णय ले चुके थे, वह शान्त ही रहेंगे। संभवतः राम की विनम्रता या वीरता इस अपार भीषण निर्णय को बदल सके।


राम आते हैं, सारा वार्तालाप सुन कर और राम की निश्छल पितृभक्ति देखकर दशरथ का दुख और भी गाढ़ा हो जाता है, वह पुनः अचेत हो जाते हैं।

17.8.21

रामो द्विर्नाभिभाषते


“राम दो प्रकार से बात नहीं करता है” तनिक व्यथित और खिन्न स्वर में राम माँ कैकेयी से बोले।


शब्द कठोर अवश्य थे पर आवश्यक भी। स्थिति को निष्कर्ष तक लाने के लिये और व्यग्रता के क्षणों को विराम देने के लिये। सुमन्त्र को कुछ ज्ञात नहीं, पिता कुछ बोलते नहीं और माँ कैकेयी हैं, वह जानबूझ कर नीति की बातें लेकर बैठी है कि पुत्र को पिता की बात माननी चाहिये। पर यह नहीं बता रही हैं कि क्या बात है जो माननी है। वह वचन लेना चाह रही हैं, कुछ भी बताने के पहले।


कक्ष में ५ लोग थे। शोकनिमग्न और मौन धरे पिता राजा दशरथ, विजय के प्रति अभी भी अर्धशंकित खड़ी माँ कैकेयी, अनर्थ की आशंका से उद्वेलित और आवेशित लक्ष्मण, अनभिज्ञ पर राजा के लिये दुखी सुमन्त्र और कक्ष के मध्य में राम। दशरथ और कैकेयी के अतिरिक्त किसी को कुछ भी ज्ञात नहीं था कि विगत रात्रि किस प्रकार के क्रूर वचन इस कक्ष में बोले गये थे। किसी को भी यह ज्ञात नहीं था कि किस प्रकार राजा ने कैकेयी को समझाने का प्रयास किया था। राजा द्वारा कितनी अनुनय विनय उस कक्ष में की जा चुकी थी, बस एक वर को वापस लेने के लिये। भरत को राज्य देने में राजा दशरथ मानसिक रूप से तैयार थे पर अकारण ही आज्ञाकारी और सबके प्यारे पुुत्र राम को वनवास जाने से रोकने के लिये दशरथ ने करुणा के न जाने कितने आँसू बहाये थे।


जब प्रातः सुमन्त्र राम को लेने आये थे, लक्ष्मण राम के महल में पहुँच चुके थे और उन्हें नगर में व्याप्त उत्साह के बारे में बता रहे थे। सुमन्त्र ने राम को सूचित किया कि राजा दशरथ ने उन्हें स्मरण किया है। कल से दो बार राजा दशरथ ने और एक बार वशिष्ठ उनसे मन्त्रणा की थी। राज्याभिषेक के निर्णय के बारे में सूचना, उत्तरदायित्व के बारे में दिशा निर्देश, कर्तव्य के प्रति उपदेश और सपत्नीक विशेष व्रत के पालन के आदेश उन्हें प्राप्त हो चुके थे। सुमन्त्र ने कोई कारण विशेष नहीं बताया क्योंकि यदि उनसे पूछा जाता तो संभवतः वह असत्य न कह पाते।  राजकीय कार्यों में प्रयुक्त “आवश्यक सम्भाषण” के सूत्र को सदा ही निभाते थे सुमन्त्र। अनावश्यक सम्भाषण और तज्जनित मर्यादा के अतिक्रमण की किसी भी संभावना से दूर ही रहने का व्यक्तित्व विकसित किया था सुमन्त्र ने। तभी संभवतः वह राजा के अत्यन्त प्रिय और विश्वासप्राप्त भी थे।


राजा दशरथ नियम से सूर्योदय के दो मुहूर्त पहले ही उठ जाते थे और सुमन्त्र से प्राप्त सूचना और दिये निर्देशों से उनके शेष दिन का प्रारम्भ होता था। तब महल के सारे तन्त्र तदानुसार चल पड़ते थे। यही कारण था कि सुमन्त्र को कभी भी और कहीं भी राजा दशरथ तक पहुँचने के अधिकार प्राप्त थे। आज जब प्रातः कोई सूचना नहीं आयी, वन्दीजनों की स्तुतियाँ अनुत्तरित रहीं और राजा ने दर्शन नहीं दिये, तब सुमन्त्र को कर्तव्यवश स्वयं ही जाना पड़ा। जाने पर पता चला कि राजा कैकेयी के महल में हैं। अन्तःपुर तक उनको किसी ने रोका नहीं अपितु द्वारपालों और परिचारिकाओं ने उन्हें उस कक्ष की ओर इंगित किया जहाँ पर राजा दशरथ कल रात्रि गये थे और अभी तक निकले नहीं थे।


कुल की महिमा कहकर, राजा के अभिवादन और अपने आगमन का संकेत देने की परम्परा थी राजवंश में। स्वस्थ परम्परा थी, जो सदा ही राजकीय कार्यों में आवश्यक गाम्भीर्य और गुरुता का वातावरण उत्पन्न कर देती थी। कुल की परम्परायें पथ प्रदर्शित करने वाले दीपों की भाँति होती हैं जो भटकने से रोकती हैं। कभी कभी राजा दशरथ को व्यक्तिगत संवादों में यह अतिरिक्त और अनावश्यक लगता था पर सुुमन्त्र ने कभी इसका अनियमन नहीं किया था। जब राजा दशरथ ने कोई उत्तर नहीं दिया तब सुमन्त्र ने कक्ष में प्रवेश किया और परिस्थिति समझने का प्रयत्न किया। राजा को उन्होंने इतना शोकनिमग्न कभी नहीं देखा था। राजा के कुछ न कहने पर कैकेयी ने स्वतः ही सुमन्त्र को राम को बुला लाने के लिये कहा। राजा की उपस्थिति में किसी और के आदेश स्वीकार करना सुमन्त्र को तभी स्वीकार होता था तब राजा अपने नेत्रों से उसका अनुमोदन करते। सुमन्त्र राजा की ओर देखते रहे, न राजा ने कुछ कहा, न सुमन्त्र कक्ष से बाहर गये।


अपने माँगे वरों को राजकीय आदेश के रूप में थोपने को आतुर कैकेयी ने राजा को पुनः कठोर वचन कहे।  सुमन्त्र को अनुमोदन देने में विलम्ब का अर्थ जब कैकेयी ने उनकी प्रतिज्ञा से जोड़ कर कहा तब राजा दशरथ क्षोभ से व्याकुल हो उठे और अपना मस्तक हिला सुमन्त्र को जाने को कहा।


शीघ्र ही राम लक्ष्मण और सुमन्त्र के साथ कक्ष में उपस्थित थे। पिता शोकमग्न सर झुकाये बैठे थे, न राम को देखकर कुछ कहा, न कोई प्रतिक्रिया की। राम को अनर्थ का पूर्वाभास हो चुका था। पीछे लक्ष्मण सशंकित खड़े थे। पिता से राम ने सीधे पूछा कि आप मुझे देखकर सदा की भाँति प्रसन्न क्यों नहीं हैं, आप कुछ कहते क्यों नहीं? क्या मेरा कोई अपराध है? भरत, शत्रुघ्न, मातायें आदि तो सब सकुशल हैं? किसी ने आपको कुछ कहा है? तब माता कैकेयी को ओर मुख कर राम ने पूछा कि माँ क्या आपने पिता को कोई कठोर वचन कहे हैं?


तुरन्त उत्तर न पाकर राम समझ गये थे कि माँ कैकेयी ही पिता के शोक का कारण है। राम को इस प्रकार अपनी ओर आक्रोशित देखकर कैकेयी असहज हो गयी और बोली कि शोक का कारण तो तुम हो राम। राजा तुमसे कुछ कहने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। मुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा करते समय तो शूरवीर बन रहे थे पर तुम्हारे कारण शिथिल पड़ गये हैं। वैसे तो पुत्र को पिता की प्रतिज्ञा को आज्ञा के रूप में पालन करना चाहिये पर पता नहीं कि तुम उनकी प्रतिज्ञा पालन में सहायता करोगे कि नहीं? इसी संशय में राजा शोकनिमग्न हैं।


पिता दशरथ के हृदय को दुख से जीर्णशीर्ण कर देने के बाद माँ कैकेयी राम की पितृभक्ति पर भी आक्षेप लगा रही थी। राम यह स्वीकार नहीं कर पाये क्योंकि वह जानते थे कि वह अपने पिता के लिये कुछ भी कर सकते हैं। राम पिता के इस प्रकार किये गये अपमान को सहन नहीं कर पाये और बोले।


“देवी आपको धिक्कार है। मेरे प्रति ऐसी बात आपको नहीं कहनी चाहिये। राम पिता के लिये प्राण भी दे सकता है। जो राजा को अभीष्ट हो, स्पष्ट कहो। राम दो प्रकार से बात नहीं करता। रामो द्विर्नाभिभाषते।”

14.8.21

मन मेरा फिर डोल रहा है

  

शान्ति धरो स्थान, व्यक्त जीवन में तेरा मोल रहा है ।

देखो अभी कहीं मत जाना, मन मेरा फिर डोल रहा है ।।

 

शान्ति, सुधा का रस बरसाती,

जीवन के मनभावों में ।

नयन ज्योत्सना, धैर्य दिलाती,

अति से अधिक विषादों में ।।

शान्ति, क्रिया का अन्त शब्द, 

पर मन कर्कशता बोल रहा है ।

मन मेरा फिर डोल रहा है ।।१।।

 

क्यों अशान्ति अपनायी मैंने,

सुख-निकेत से किया प्रयाण ।

कालचक्र के दूतों से,

मिल गया मुझे साक्षात प्रमाण ।।

क्यों अशान्ति का शब्द हृदय में, 

गरल भयंकर घोल रहा है ।

मन मेरा फिर डोल रहा है ।।२।।


कर्म विरत हो नहीं सहज,

मन घोर मचाये हाहाकार,

कैसे जीवन तब तटस्थ,

मन चाह रहा उद्धत व्यापार,

त्यक्त रहूँ या व्यक्त करूँ,

मन असमंजस नित खोल रहा है,

मन मेरा फिर डोल रहा है ।।३।।


बढ़ता जीवन का कर्मचक्र,

बढ़ता जाता है नवल नाद,

है नहीं अपेक्षित, आवश्यक, 

बिन चाहे बढ़ जाता विषाद,

क्या प्राप्त रहे, क्या छोड़ सकूँ,

सब लाभहानि में तोल रहा है,

मन मेरा फिर डोल रहा है ।।४।।


नहीं कभी भी मुुड़ पाता मन,

एक विशिष्ट आकर्ष भरा,

रागयुक्त यह कोलाहल है,

जो जीवन बनकर पसरा।

कितना चाहूँ, उसी परिधि पर,

घूम रहा मन, गोल रहा है,

मन मेरा फिर डोल रहा है ।।५।।