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10.8.13

मन की भाषायी चेतना

मन की भाषा के प्रश्न का प्रारम्भ तो ज्ञानदत्तजी के सरल से अवलोकन से हुआ था, पर वह छोटी सी प्रतीत होने वाली लहर अपने अन्दर इतनी उत्सुकता लेकर आयेगी, इसका तनिक भी आभास नहीं था। पिछले कुछ दिन बस भाषा पर लिखे गये शोधपत्रों को पढ़ने में बीते हैं। यह प्रश्न अविश्वसनीय ढंग से न जाने कितनी विधाओं में फैला है, मनोविज्ञान, दर्शन, शैक्षणिक क्षेत्र, भाषाविज्ञान, ध्वनिशास्त्र, उपनिषद, अध्यात्म आदि से होता हुआ पुनः मन पर आकर टिक जाता है। लगा था कि पिछली पोस्ट पर आनी वाली टिप्पणियाँ रही सही उलझन सुलझा देंगी, सीधे ही निष्कर्ष पर पहुँचा देंगी, पर जितना अधिक छोर को समेटना चाहा, जितना अधिक चिन्तन का धागा लपेटता गया, उतना अधिक उलझता गया। प्रश्न अधिक हो गये, विमायें अधिक हो गयीं, जिस मन की मौलिक भाषा ढूँढ़ने निकला था, वही मन अत्यधिक रहस्यमयी हो गया।

बड़ा ही रोचक लगता है न, कि चिन्तन अपने बारे में ही चिन्तन कर रहा है, अपनी भाषा के बारे में अपनी भाषा में ही चिन्तन कर रहा है। ठीक उसी तरह कि भोजन स्वयं को खा रहा है, स्वयं का ही पोषण कर रहा है। वैसे भी सारा चिन्तन स्वयं नहीं किया, इस चिन्तन पर ढेरों चिन्तन हो चुका है, आज से नहीं, सृष्टि के आदि बिन्दु से चल रहा है। यदि अस्तित्व के मूल प्रश्न को अब भी उठाना पड़ रहा है, तब तो यह प्रश्न अस्तित्व से भी बड़ा हो गया। जब सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्माजी स्वयं को अकेले पा पूरी तरह संभ्रमित हो गये थे, उन्हें कुछ भी नहीं सूझ रहा था, तब उन्होंने ईश्वर को पुकारा और ईश्वर ने उनके अन्तःकरण में सारा ज्ञान प्रस्फुटित किया। ज्ञान के आनन्द से विह्वल ब्रह्मा स्तुति गाने लगे, ब्रह्मसंहिता के रूप में, गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि। कभी सोचा है, वह प्रथम पुकार और वह प्रथम ज्ञान किस भाषा में रहा होगा?

ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न उमड़ पड़ते हैं जब मन को कुरेदा जाता है, स्वयं की पहचान का कोई भी बिन्दु झंकृत किया जाता है, अनुनाद होने लगता है, बहुत देर तक, मानो अन्तःकरण को अपने बारे में कुछ पता होने देना अच्छा ही नहीं लगता है। पर जो भी हो, प्रश्न तो तब तक उठाये जायेंगे जब तक अस्तित्व है, सब जान जाने तक प्रश्न करना ही तो हमारी मूल प्रवृत्ति है, संभव है वेदांत सी जिज्ञासा ही हमारे निर्वाण का मार्ग हो।

मन की अपनी ही भाषा होती है, यह तो निश्चित है, पर उस भाषा का स्वरूप क्या होता है, उसका हमारे अस्तित्व और वाह्य विश्व से क्या संबंध है, इन प्रश्नों के उत्तर अपने आप में गहरे प्रश्न छोड़ जाते हैं। ऐसे प्रश्न, जो लोगों ने अनुभव तो किये हैं पर उसे व्यक्त नहीं कर पाये। व्यक्त कर पायें तो कैसे, क्योंकि व्यक्त करने के लिये जिस भाषा का हम उपयोग करते हैं, वह भाषा यह कार्य करने में सक्षम ही नहीं। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार आप रोमन अंकों में दो बड़ी संख्याओं का गुणा करने या पृथ्वी से चाँद की दूरी मापने का प्रयास करें, क्योंकि बिना दशमलव और शून्य के सिद्धान्त के यह संभव ही नहीं। उसे गणित की रोमन भाषा में नहीं वरन दशमलवीय भाषा में ही व्यक्त किया जा सकता है।

मन की भाषा की गहनता को समझने के लिये एक तुलना करना उचित रहेगा। मन की भाषा की, मानव की भाषा की और कम्प्यूटर की भाषा की। संभवतः यह तुलना मन की भाषा के बारे में कुछ कल्पना सूत्र दे जाये।

यदि हमें आपको कोई शब्द कम्प्यूटर के माध्यम से ईमेल करके भेजना है तो कम्प्यूटर उस टाइप शब्द को ० या १ में परिवर्तित कर एक श्रंखला बना लेगा। जो ईमेल होगी वह इन्हीं ० और १ की श्रंखलाओं के पैकेट होंगॆ। वह पैकेट जब दूसरे कम्प्यूटर पर पहुँचेंगे तो वह उन्हें वापस संकलित कर स्क्रीन पर वही शब्द दिखायेगा। कम्प्यूटर को ० और १ के अतिरिक्त कुछ आता ही नहीं है, किसी भी शब्द को वह ० और १ में तोड़ता है और तभी प्रेषित कर पाता है। हमें यह देख कर और समझ कर बहुत अटपटा लग सकता है, पर यही कम्प्यूटर की विधि है, यही उसकी विवशता है। वहीं दूसरी ओर हम वह शब्द मानव की भाषा में एक दूसरे से सहज ही कह देते हैं, न केवल शब्द, वरन सम्बन्धित रंग, रूप, आकार आदि सभी संप्रेषित कर देते हैं, एक ही शब्द में।

इसी प्रकार हमारे मन की भाषा के भाव हैं, उन्हें किसी दूसरे व्यक्ति को समझाने के लिये हमें एक मानवीय भाषा की आवश्यकता होती है। शब्द, वाक्य और व्याकरण उस संप्रेषण की आवश्यक सामग्री हैं, बिना उनके हम संवाद कर ही नहीं सकते। किसी के प्रति संवेदना व्यक्त करने के शाब्दिक प्रयास बड़े भारी भरकम होते हैं और उन प्रयास का भावनात्मक सहजता से अन्तर मानवीय भाषा की सीमित सीमाओं को स्पष्ट रूप से बता देता हैं। यह सब जानते हुये भी हम मानवीय भाषा से बद्ध हैं, ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार कम्प्यूटर अपनी भाषा से बद्ध है। किसी की एक मुस्कान पर लोग अध्याय लिख देते हैं, काश वह मुस्कान लिखी व समझायी जा सकती, मन की भाषा में, एक ही शब्द में।

मन में आये एक विचार को व्यक्त करने में कितने शब्द सजाने पड़ते हैं और मन है कि ऐसे सहस्र विचारों की श्रंखलायें लिये बैठा है, एक के बाद एक सहज ही प्रस्तुत। मन का एक झोंका मानवीय भाषा के सैकड़ों अध्यायों से नहीं व्यक्त हो पाता है, कुछ न कुछ छूट ही जाता है, कुछ न कुछ संप्रेषण दोष रह ही जाता है। मात्र कहने में ही नहीं, वरन उसे समझने में भी कितना कुछ छूट जाता है। उसके मन में क्या विचार जगा, उसने उसे कैसे व्यक्त किया, हमने उसे कैसे समझा, यदि तुलना कर सकते तो लगता कि जिस प्रकार कम्प्यूटर महोदय इतने श्रम के बाद केवल शब्द ही संप्रेषित कर पाये थे, रूप, रंग, आकार के बिना, हम भी न जाने भाव की कितनी विमायें छोड़ देते हैं, जब मन की भाषा के भावों को मानव की भाषा में व्यक्त करते हैं। संगीत और चित्रों की भाषा में मन की भाषा के कुछ अंश देखे जा सकते हैं।

यदि मन की भाषा श्रेष्ठ है तो क्या मानव की भाषा से हमारा कोई विकास नहीं होता है? मानव की भाषा के बिना तो समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। सारे ज्ञान को प्रचारित और प्रसारित करने का कार्य तो भाषा ही करती है। नये सिद्धान्त, नयी प्रमेय, नये आविष्कार, नये विचार कैसे समस्त मानवता को प्राप्त हो पायेंगे। पर यह सारा ज्ञान स्रोत मन की भाषा से ही निकला है, मन की भाषा में समझा गया है, मानव की भाषा बस वह सीमित प्रयास कर पाती है, बार बार कई प्रयासों में उसे संप्रेषित करने का।

किसी भी भाषा का ज्ञानकोष, उस भाषा बोलने वाले समाज के लोगों की सम्मिलित मन की भाषा में उत्पन्न ज्ञान का संग्रहण होता है। कोई नयी मानवीय भाषा जानकर हम उन सारे ज्ञानकोष को अपना सकते हैं, अपना ज्ञानकोष समृद्ध कर सकते हैं। भिन्न भाषाओं मे फैली इस निधि को समेटना और सहेजना निश्चय ही मानवता का प्रमुख कार्य है, पर जिस मन की भाषा से यह सकल ज्ञान उत्प्रेरित रहा है, संवर्धित हुआ है, नयी विमाओं को छूकर आया है, उसे जानने और अनुभव करने का प्रयास भी हो, उस भाषा को जानने का प्रयास, जिस भाषा में हम मूलतः चिन्तन करते हैं।

अगली पोस्ट में मन की भाषा में और गहरे उतरेंगे और वह शब्द को किस तरह प्रभावित करती है या प्रभावित होती है, इन तथ्यों को भी समझेंगे। और आप निश्चय मानिये कि जो मन आपको सदा रोचकता बनाये रखने के लिये कचोटता रहता हो, उसके बारे में जानना कितना रोचक होगा?