यह एक यक्ष प्रश्न है। इसलिये नहीं कि सब लोग इसके बारे में जानना चाहते हैं, इसलिये भी नहीं कि यह प्रश्न कठिन है, इसलिये भी नहीं कि यह आधुनिक यन्त्रों में उपयोग में आ रहा है, इसलिये भी नहीं कि सारी बड़ी कम्पनियाँ इस पर अरबों डॉलर व्यय कर रही हैं, वरन इसलिये क्योंकि इस विषय की सही समझ और इस प्रश्न के सही उत्तर इण्टरनेट आधारित हमारे जीवन को अप्रत्याशित रूप से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
देखा जाये तो इण्टरनेट क्लॉउड ही है, सूचनायें इण्टरनेट पर विद्यमान हैं, हम जब चाहें अपने मोबाइल, कम्प्यूटर या लैपटॉप से उसे देख सकते हैं, उपयोग में ला सकते हैं। मेरी सारी पोस्टें और उन पर की गयी टिप्पणियाँ मेरे ब्लॉग के पते पर सहज ही सुलभ है, जो चाहे, जब चाहे, उन्हें वहाँ पर जाकर देख सकता है। इस स्थिति में मेरे और मेरे पाठकों के लिये क्लॉउड का क्या महत्व? एक कम्प्यूटर हो, उस पर एक वेब ब्राउज़र हो, इण्टरनेट आ रहा हो, कोई कुछ भी पढ़ना चाहे, पढ़ लेगा। सूचनायें किसी न किसी कम्प्यूटर पर विद्यमान हैं, सूचनायें इण्टरनेट के माध्यम से सारे कम्प्यूटरों से जुड़ी हैं, तब क्लॉउड की क्या आवश्यकता?
जो भी सूचना का स्रोत है, वह अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली सूचनायें परिवर्तित और परिवर्धित कर सकता है। जो सूचना का उपयोगकर्ता है, वह तदानुसार उसे अपने कार्य में ला सकता है। यहाँ तक तो इण्टरनेट की समझ क्लॉउड के मर्म के बाहर ही रहती है। जटिलता जब इसके पार जाती है तब क्लॉउड का सिद्धान्त आकार लेने लगता है।
अब सबके पास इण्टरनेट पर डालने के लिये सूचनायें तो रहती हैं, पर उसे रखने के लिये स्रोत या सर्वर नहीं रहता है। इस प्रकार स्रोत की संख्या सर्वरों की संख्या से कहीं अधिक हो जाती है, स्रोत अपनी सूचना रखने के लिये सुरक्षित ठिकाना ढूंढ़ने लगते हैं, यहाँ से क्लॉउड के सिद्धान्त के बीज पड़ते हैं। ऐसी वेब सेवायें आपकी सूचना को क्लॉउड के माध्यम से पहले ग्रहण करती हैं, कहीं और सुरक्षित रखती हैं और वेब साइटों के माध्यम से व्यक्त भी करती हैं। समान्यतः इन सेवाओं के लिये कुछ शुल्क लिया जाता है। तब तक क्लॉउड का आकार सीमित रहता था।
ब्लॉगर, वर्डप्रेस जैसी निशुल्क ब्लॉग सेवाओं ने लाखों को अभिव्यक्ति का वरदान दे दिया, सबके अपने ब्लॉग उनके सर्वर में अपना स्थान पाये पड़े रहते हैं। यद्यपि आपको इण्टरनेट के माध्यम से उन्हें संपादित करने का अधिकार होता है, आपका लेखन क्लॉउड में रहता है। धीरे धीरे सूचनाओं का आकार और बढ़ा, क्लॉउड का आकार बढ़ा। फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग ने सूचनाओं के इस आदानप्रदान में भूचाल सा ला दिया। न जाने कितनी ऐसी सूचनायें जो आप वेब पर रखना चाहते हैं, लोगों से बाटना चाहते हैं, आपके द्वारा बनाये हुये क्लॉउड में पहुँच जाती हैं।
यही नहीं, जब हर सूचना एक विशेष प्रकार के फाइल के ढाँचे में रखी जाती है, तो उस प्रकार के फाइलों को चला पाने वाले प्रोग्राम क्लॉउड में होने आवश्यक हैं, जिससे उन्हें उसी रूप में संपादित और व्यक्त किया जा सके। अब सूचनायें और प्रोग्राम क्लॉउड पर उपस्थित रहने से क्लॉउड की जटिलता और व्यापकता बढ़ जाती है। बात यहीं पर समाप्त हो गयी होती तो संभवतः क्लॉउड उतना कठिन विषय न होता।
क्लॉउ़ड को सदा क्रियाशील बनाये रखने के लिये इण्टरनेट का होना आवश्यक है। इण्टरनेट हम समय और हर स्थान पर नहीं होता है, पर सूचनायें तो कहीं पर और कभी भी उत्पन्न होती रहती हैं। उन्हें एकत्र करने वाले यन्त्रों न उन्हें सम्हालकर रखने की क्षमता हो वरन वे प्रोग्राम भी हों जिनके माध्यम से वे देखी जा सकें। ऑफलाइन या इण्टरनेट न रहने पर भी उन सूचनाओं को संपादित करने की सुविधा क्लॉउड तन्त्र की आवश्यकता है। यही नहीं इण्टरनेट से जुड़ने पर, वही सूचनायें क्लॉउड में स्वतः पहुँच जायें, इसकी भी सुनिश्चितता क्लॉउड को सशक्त बनाती है।
देखा जाये तो क्लॉउड पर पड़ी आपकी सूचनाओं की प्रति आपको रखने की आवश्यकता नहीं है, पर इण्टरनेट न होने की दशा में आप अपनी सूचनाओं से वंचित न हो जायें, उसके लिये उसकी प्रति आपके सभी यन्त्रों में होनी आवश्यक है। यह होने से ही आपको ऑफलाइन संपादन की सुविधा मिल पाती है।
उदाहरण स्वरूप देखा जाये तो यह पोस्ट मैं अपने आईपैड मिनी पर लिख रहा हूँ, थोड़ी देर में मैं अपने वाहन से कहीं और जाऊँगा, वहाँ मेरे पास मोबाइल ही रहेगा, कुछ भाग मुझे मोबाइल पर लिखना पड़ेगा। वहाँ से घर आऊँगा तो बिटिया मेरे आईपैड मिनी पर कोई गेम खेल रही होगी, तब मुझे शेष पोस्ट मैकबुक एयर में लिखनी पड़ेगी। सौभाग्य से क्लॉउड के माध्यम से मेरा लेखन सारे यन्त्रों में अद्यतन रहता है। जहाँ पर इण्टरनेट नहीं भी रहता है, वहाँ पर भी संपादन का कार्य ऑफलाइन हो जाता है, और इण्टरनेट आते ही सेकेण्डों में अद्यतन हो जाता है। क्लॉउड को सही अर्थों में ऐसे ही परिभाषित और अनुशासित होना चाहिये।
देखा जाये तो सभी अग्रणी कम्पनियाँ इसी दिशा में कार्य कर भी रहीं है, वे यह भी सुनिश्चित कर रही हैं कि इस प्रक्रिया में घर्षण कम से कम हो। पर मेरा स्वप्न क्लॉउड के माध्यम से उस लक्ष्य को पाना है, जो हमारी सारी सूचनाओं के रखरखाव और आदानप्रदान को सरलतम बना दे। जब क्लॉउड सरलतम हो जायेगा तो उसका प्रारूप कैसा होना चाहिये, इसको अगली पोस्ट पर प्रस्तुत करूँगा।
देखा जाये तो इण्टरनेट क्लॉउड ही है, सूचनायें इण्टरनेट पर विद्यमान हैं, हम जब चाहें अपने मोबाइल, कम्प्यूटर या लैपटॉप से उसे देख सकते हैं, उपयोग में ला सकते हैं। मेरी सारी पोस्टें और उन पर की गयी टिप्पणियाँ मेरे ब्लॉग के पते पर सहज ही सुलभ है, जो चाहे, जब चाहे, उन्हें वहाँ पर जाकर देख सकता है। इस स्थिति में मेरे और मेरे पाठकों के लिये क्लॉउड का क्या महत्व? एक कम्प्यूटर हो, उस पर एक वेब ब्राउज़र हो, इण्टरनेट आ रहा हो, कोई कुछ भी पढ़ना चाहे, पढ़ लेगा। सूचनायें किसी न किसी कम्प्यूटर पर विद्यमान हैं, सूचनायें इण्टरनेट के माध्यम से सारे कम्प्यूटरों से जुड़ी हैं, तब क्लॉउड की क्या आवश्यकता?
जो भी सूचना का स्रोत है, वह अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली सूचनायें परिवर्तित और परिवर्धित कर सकता है। जो सूचना का उपयोगकर्ता है, वह तदानुसार उसे अपने कार्य में ला सकता है। यहाँ तक तो इण्टरनेट की समझ क्लॉउड के मर्म के बाहर ही रहती है। जटिलता जब इसके पार जाती है तब क्लॉउड का सिद्धान्त आकार लेने लगता है।
अब सबके पास इण्टरनेट पर डालने के लिये सूचनायें तो रहती हैं, पर उसे रखने के लिये स्रोत या सर्वर नहीं रहता है। इस प्रकार स्रोत की संख्या सर्वरों की संख्या से कहीं अधिक हो जाती है, स्रोत अपनी सूचना रखने के लिये सुरक्षित ठिकाना ढूंढ़ने लगते हैं, यहाँ से क्लॉउड के सिद्धान्त के बीज पड़ते हैं। ऐसी वेब सेवायें आपकी सूचना को क्लॉउड के माध्यम से पहले ग्रहण करती हैं, कहीं और सुरक्षित रखती हैं और वेब साइटों के माध्यम से व्यक्त भी करती हैं। समान्यतः इन सेवाओं के लिये कुछ शुल्क लिया जाता है। तब तक क्लॉउड का आकार सीमित रहता था।
ब्लॉगर, वर्डप्रेस जैसी निशुल्क ब्लॉग सेवाओं ने लाखों को अभिव्यक्ति का वरदान दे दिया, सबके अपने ब्लॉग उनके सर्वर में अपना स्थान पाये पड़े रहते हैं। यद्यपि आपको इण्टरनेट के माध्यम से उन्हें संपादित करने का अधिकार होता है, आपका लेखन क्लॉउड में रहता है। धीरे धीरे सूचनाओं का आकार और बढ़ा, क्लॉउड का आकार बढ़ा। फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग ने सूचनाओं के इस आदानप्रदान में भूचाल सा ला दिया। न जाने कितनी ऐसी सूचनायें जो आप वेब पर रखना चाहते हैं, लोगों से बाटना चाहते हैं, आपके द्वारा बनाये हुये क्लॉउड में पहुँच जाती हैं।
यही नहीं, जब हर सूचना एक विशेष प्रकार के फाइल के ढाँचे में रखी जाती है, तो उस प्रकार के फाइलों को चला पाने वाले प्रोग्राम क्लॉउड में होने आवश्यक हैं, जिससे उन्हें उसी रूप में संपादित और व्यक्त किया जा सके। अब सूचनायें और प्रोग्राम क्लॉउड पर उपस्थित रहने से क्लॉउड की जटिलता और व्यापकता बढ़ जाती है। बात यहीं पर समाप्त हो गयी होती तो संभवतः क्लॉउड उतना कठिन विषय न होता।
क्लॉउ़ड को सदा क्रियाशील बनाये रखने के लिये इण्टरनेट का होना आवश्यक है। इण्टरनेट हम समय और हर स्थान पर नहीं होता है, पर सूचनायें तो कहीं पर और कभी भी उत्पन्न होती रहती हैं। उन्हें एकत्र करने वाले यन्त्रों न उन्हें सम्हालकर रखने की क्षमता हो वरन वे प्रोग्राम भी हों जिनके माध्यम से वे देखी जा सकें। ऑफलाइन या इण्टरनेट न रहने पर भी उन सूचनाओं को संपादित करने की सुविधा क्लॉउड तन्त्र की आवश्यकता है। यही नहीं इण्टरनेट से जुड़ने पर, वही सूचनायें क्लॉउड में स्वतः पहुँच जायें, इसकी भी सुनिश्चितता क्लॉउड को सशक्त बनाती है।
देखा जाये तो क्लॉउड पर पड़ी आपकी सूचनाओं की प्रति आपको रखने की आवश्यकता नहीं है, पर इण्टरनेट न होने की दशा में आप अपनी सूचनाओं से वंचित न हो जायें, उसके लिये उसकी प्रति आपके सभी यन्त्रों में होनी आवश्यक है। यह होने से ही आपको ऑफलाइन संपादन की सुविधा मिल पाती है।
उदाहरण स्वरूप देखा जाये तो यह पोस्ट मैं अपने आईपैड मिनी पर लिख रहा हूँ, थोड़ी देर में मैं अपने वाहन से कहीं और जाऊँगा, वहाँ मेरे पास मोबाइल ही रहेगा, कुछ भाग मुझे मोबाइल पर लिखना पड़ेगा। वहाँ से घर आऊँगा तो बिटिया मेरे आईपैड मिनी पर कोई गेम खेल रही होगी, तब मुझे शेष पोस्ट मैकबुक एयर में लिखनी पड़ेगी। सौभाग्य से क्लॉउड के माध्यम से मेरा लेखन सारे यन्त्रों में अद्यतन रहता है। जहाँ पर इण्टरनेट नहीं भी रहता है, वहाँ पर भी संपादन का कार्य ऑफलाइन हो जाता है, और इण्टरनेट आते ही सेकेण्डों में अद्यतन हो जाता है। क्लॉउड को सही अर्थों में ऐसे ही परिभाषित और अनुशासित होना चाहिये।
देखा जाये तो सभी अग्रणी कम्पनियाँ इसी दिशा में कार्य कर भी रहीं है, वे यह भी सुनिश्चित कर रही हैं कि इस प्रक्रिया में घर्षण कम से कम हो। पर मेरा स्वप्न क्लॉउड के माध्यम से उस लक्ष्य को पाना है, जो हमारी सारी सूचनाओं के रखरखाव और आदानप्रदान को सरलतम बना दे। जब क्लॉउड सरलतम हो जायेगा तो उसका प्रारूप कैसा होना चाहिये, इसको अगली पोस्ट पर प्रस्तुत करूँगा।