Showing posts with label पिताजी. Show all posts
Showing posts with label पिताजी. Show all posts

17.6.14

फुटबाल, पिताजी, एक और पीढ़ी

जब क्रिकेट, बैडमिन्टन और स्वीमिंग नहीं करता था, तब भी फुटबॉल खेलता था। गृहनगर के स्टेडियम में फुटबॉल नियमित रूप से होती थी। उस समय अन्य खेल हम खिलाड़ियों को मँहगे पड़ जाते थे। फुटबॉल की व्यवस्था खेल अधिकारी कर देते थे और हम २२ खिलाड़ी संतुष्ट हो जाते थे। किस खेल में कौन अच्छा है, इस बात से खिलाड़ियों को क्या लेना देना। मनोरंजन और स्वास्थ्य फुटबॉल से बना रहता था, उसके बाद कोई भी खेल खिलवा लीजिये। संभवतः फुटबॉल का ही जीवन में यह योगदान रहा है कि शरीर अभी भी स्वस्थ है और अन्य खेल खेलने में सक्षम भी।

९० मिनट कैसे एक फुटबॉल के पीछे दौड़ते भागते निकल जाते थे? समय का पता ही नहीं चलता था, अँधेरा होता था, फुटबॉल दिखनी बन्द होती थी तब कहीं जाकर खेल बन्द होता था। एक फुफेरे भाई यूनीवर्सिटी के लिये खेलते थे, जब भी टूर्नामेन्ट खेल कर आते थे, उनकी १० नम्बर वाली शॉर्ट चिरौरी करके माँग लिया करता था। उसे पहनकर खेलने में मैराडोना जैसा अनुभव होता था। फुटबॉल पैरों में चिपके, न चिपके, दौड़ उसी गति से लगाते थे और कई बार गोल तक पहुँच जाने में सफल भी हो जाते थे। गर्मियों की छुट्टियों में दोपहर को लेटे लेटे इसी बात की प्रतीक्षा रहती थी कि कब सायं हो और कब खेलने निकलें। खेलने आने वालों की कभी कमी नहीं रहती थी, आज भी सबके नाम और चेहरे स्पष्ट रूप से याद हैं। भले ही सब अपने अपने व्यवसायों में व्यस्त हैं पर जब भी घर जाना होता है, फुटबॉल के उस समय की चर्चा अवश्य होती है। सबके मन में उस समय की विशेष स्मृतियाँ आज भी विद्यमान हैं।

मैदान अच्छा नहीं था और गिरने की स्थिति में खरोंच आदि नित्यरूप से लगती थीं। पैरों में सामने वाले के जूते से लगे कई घाव आज भी लगे हैं। कुहनी की चोट, पैर की मोच, गिरते समय कन्धे पर लगे झटके और घर पहुँच कर उन सब चोटों को माँ से छिपाने के लिये सामान्य दिखने का क्रम, उन स्मृतियों में एक विशेष अनुभूति आज भी हो आती है। मूक राणा सांगा बने रहते थे, डर लगा रहता था कि कहीं यह सब देख कर खेल बन्द न करवा दिया जाये। भले ही हम कितना अभिनय कर लें पर माँ को सब पता चल जाता था, यदि लँगड़ाना छिपा भी ले गये तो भी कई बार छोटा भाई ही पोल खोल देता था। चोट पर हल्दी चूने लेपना, हल्दी का दूध, रात की गाढ़ी नींद और अगले दिन फिर से खेलने के लिये शत प्रतिशत प्रस्तुत। फुटबॉल का उन्माद इस तरह व्यापा रहता था कि कहीं बाहर जाने के नाम पर भाँति भाँति के बहाने बनाने में दिन निकल जाता था।

१९८६ का समय था, उस वर्ष दसवीं बोर्ड की परीक्षा देकर गर्मी की छुट्टी पर घर आया था। १९८२ के एशियाड में टीवी लेने की पिताजी की इच्छा १९८६ में फलीभूत हुयी। अवसर था फुटबॉल के वर्ल्डकप का। मेरी उम्र १४ वर्ष की थी, पर फुटबॉल के प्रति उत्सुकता परिपूर्ण थी। पिताजी को भी बहुत रुचि थी, हमने साथ बैठ कर सारे मैच देखे थे। उसके बाद से आज तक कोई भी वर्ल्डकप छोड़ा नहीं है, यद्यपि हर बार स्थान बदलता रहा है। इस वर्ष बनारस में आने के बाद पिताजी के साथ बनारस में ही वर्ल्डकप देखने की योजना थी। पिताजी का स्वास्थ्य अचानक से बिगड़ा, कानपुर में ऑपरेशन कराना पड़ा। यद्यपि स्वास्थ्य लाभ कर सामान्य होने के पश्चात उनको बनारस में लेकर आयेंगे, पर उस बीच प्रथम सप्ताह के मैच साथ साथ देखने से छूट जायेंगे।

१९८६ में मैं १४ वर्ष का था, आज २८ वर्षों के बाद मेरा पुत्र १४ वर्षों का हो गया है। उसकी भी फुटबॉल में उतनी ही रुचि है, जितनी मेरी रही है। पिताजी के घर आने के बाद तीन पीढ़ियाँ एक साथ बैठकर मैच देखेंगी। पिताजी और पुत्रजी दोनों ही ब्रॉजील के समर्थक हैं, हमारा मन १९८६ से ही जर्मनी के साथ रहा है। अभी चार दिन के ही मैच निकले हैं, घर में उत्साह और उत्सुकता चरम पर है। बिटिया और श्रीमतीजी के कार्यक्रमों के समय पर पहला मैच आता है, उस समय थोड़ा जूझना पड़ता है, पर मैच देखने को मिल जाता है। शेष दो मैच देर रात में आते हैं, टाटा स्काई प्लस की कृपा से उनकी रिकॉर्डिंग हो जाती है, वे अगले दिन देख लिये जाते हैं। कोई बहुत ही महत्वपूर्ण मैच जिसमें रात भर की प्रतीक्षा करना संभव न हो, उसे रात में ही देखने की पूर्व और पूर्ण व्यवस्था कर ली जाती है। जो रिकॉर्डेड मैच अगले दिन देखें जाते हैं, उनके बारे में नियम बनाया हुआ है कि उनका निष्कर्ष क्या हुआ, न कोई इण्टरनेट पर देखेगा, न ही किसी को बतायेगा। 

याद है, ४ वर्ष पहले लगभग इसी समय अपना ब्लॉग प्रारम्भ किया था और फुटबॉल के ऊपर एक आलेख लिखा भी था। भारत में भले ही फुटबॉल को क्रिकेट जैसी लोकप्रियता न मिल पायी हो, पर मेरे मन में फुटबॉल आज भी प्रथम स्थान पर अवस्थित है। फुटबॉल देखना जितना रुचिकर है, खेलना उतना कठिन। खेला हूँ, इसलिये कह सकता हूँ कि किसी का खेल जितना सरल और प्राकृतिक दिखता है, उसके पीछे उतनी ही श्रम और समय लगा होता है। कोई खिलाड़ी किसी को पास देता है, पास दूसरे खिलाड़ियों के ठीक पैर पर पहुँचता है। दूसरा खिलाड़ी उसे बिना छिटकाये अपने नियन्त्रण में ले लेता है। तेज़ और ऊँचे पास तो नियन्त्रण की दृष्टि से और भी कठिन होते हैं।

आज भी प्रश्न तीन S का ही है, गति(Speed), सहनशक्ति(Stamina) और कुशलता(Skill़) । यूरोपीय टीमें गति और सहनशक्ति के लिये जानी जाती रही हैं, लैटिन अमेरिका की टीमें अपनी कुशलता के लिये विख्यात हैं। पिछले वर्ल्डकप में तो गति की जीत हुयी थी। इस वर्ल्डकप में यूरोपीय और लैटिन अमेरिका की खेल शैलियों का अन्तर सिमटता जा रहा है। छोटे पासों की गति और लम्बे पासों की सटीकता हर टीमों के द्वारा अपनायी जा रही हैं। जैसे जैसे वर्ल्डकप अपने पट खोलेगा, टीमों की तकनीक के बारे में और भी पता चलेगा।

हॉलैंड ने पिछले वर्ल्डकप फ़ाइनल में मिली हार का भरपूर बदला लिया है। अभी तक ११ मैच हो चुके हैं, विशेष तथ्य यह है कि सारे के सारे मैच निष्कर्षपूर्ण रहे हैं, कोई भी बराबरी पर नहीं छूटे हैं। आज जर्मनी और पुर्तगाल का मैच है, मेरा मन जर्मनी के साथ है, अब देखना है क्या होता है? मेरी २८ साल की वर्ल्डकपीय यात्रा में जर्मनी भले ही अधिक बार न जीता हो, पर उसने हर बार जान लगाकर खेल खेला है और खेल के स्तर को हर बार बढ़ाया है। जिस प्रकार से विश्व में फुटबॉल का वातावरण बना हुआ है, उससे फुटबॉल की लोकप्रियता का अनुमान हो जाता है। मन में दबी इच्छा तो यह भी है कि वर्ल्डकप में कभी मुझे अपने देश की टीम को देखने का अवसर मिले। तब सच कहता हूँ कि उसके आगे किसी और देश की तकनीक अच्छी नहीं लगेगी। इस बार तो जर्मनी के साथ हैं।

24.9.11

शब्द जो थपेड़े से थे

शब्दों का बल नापा नहीं जा सकता है, पर जब उनका प्रभाव दिखता है तो अनुमान हो जाता है कि शब्द तीर से चुभते हैं, हृदय में लगते हैं, भावों को प्रेरित करते हैं, अस्तित्व उद्वेलित करते हैं। कुछ शब्दों में अथाह शक्ति थी, उन्होने इतिहास की दिशा बदल दी। पिता का वचन और राम चौदह वर्ष के वनवास स्वीकार कर लेते हैं, पत्नी की झिड़की और तुलसीदास राम का चरित्र गढ़ने में जीवन बिता देते हैं, सौतेली माँ की वक्र टिप्पणी और ध्रुव विश्व में अपना स्थायी स्थान ढूढ़ने निकल जाते हैं। शब्दों का मान रखने के लिये के लिये वीरों ने राजपाट तो दूर, अपना रक्त भी बहा दिया है। शरणागत की रक्षा के लिये अपना सब कुछ स्वाहा करने के उदाहरणों से हमारा इतिहास भरा पड़ा है।

वैसे तो कितना कुछ हम बोलते रहते हैं, सुनते रहते हैं, बातें आयी गयी हो जाती हैं। शब्दों की उसी भीड़ में कब कौन सा वाक्य आपको झंकृत कर देन जाने कौन सा वाक्य कब आप पर प्रभाव डाल दे, चुभ जाये या जीवन की दिशा बदल दे, आपको भान नहीं रहता है। वह कौन सी मनःस्थिति होती है जिस पर शब्द प्रभावकारी हो जाते हैं? भारतीय जनमानस वैसे तो सहने के लिये विख्यात है, हम न जाने कितनी बातें पचा जाते हैं पर कब शब्दों के प्रवाह हमें बहा ले जाये, इस पर बड़ी अनिश्चितता है।

जिन घरों में नित्य टोका टाकी होती है वहाँ के बच्चे इस प्रकार के शब्द-प्रहारों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं, धीरे धीरे संवेदनशीलता कुंठित होने लगती है, किसी का कुछ कहना बहुत अधिक प्रेरित या उद्वेलित नहीं करता है उन्हें। समस्या तब आती है जब आपको पहली बार कुछ सुनने को मिलता है, आपकी संवेदनशीलता पर पहली चोट पड़ती है। याद कीजिये, आप सबके जीवन में वह क्षण आया होगा जब शब्दों ने अपनी वाक-ऊर्जा से कई गुना कंपन आपके शरीर में उत्पन्न किया होगा, आप हिल गये होंगे, आप बहुत कुछ सोचने लगे होंगे। ऐसे अवसर प्रकृति सबको देती है, भले ही कोई विद्यालय गया हो या न गया हो, जीवन की पाठशाला में कोई निरक्षर नहीं है, ऐसी परिस्थितियों और घटनाओं के माध्यम से सबकी समुचित शिक्षा और परीक्षा चलती रहती है। संवेदनशीलता यही है कि हम सदा ही सीखने और उसे व्यक्त करने को तत्पर रहें।

संवेदनशीलता यदि कुछ नयापन लाती है तो दुःख भी लाती है। जिन पर भावों का आश्रय टिका होता है, जिनसे अभिलाषाओं के सूत्र बँधे होते हैं, जिनसे आपको उत्तरों की प्रतीक्षा रहती है, उनसे यदि कुछ कठोर सा लगने वाला शब्द आपको सुनायी देता है तो आपको संभावनाओं के सारे कपाट बंद से दिखते हैं। कई अतिभावुक जन इसे सहन नहीं कर पाते हैं और बहुधा अप्रिय कर बैठते हैं। जो शब्दों का मर्म समझते हैं उनके लिये एक कपाट का बन्द होना उन प्रयत्नों का प्रारम्भ है जिसके द्वारा जीवन के उजले पक्ष खुलते जाते हैं।

भाग्यशाली हैं हम सब भाई बहन कि घर में सदा ही निर्णय लेने का अधिकार मिला है, स्वतन्त्र विचारशैली व जीवनशैली को सम्मान मिला है, माता-पिता का स्नेह-कवच सदा ही पल्लवित करता रहा है। यही कारण था कि लड़कपन तक एक हल्कापन और स्वच्छन्दता जीवनशैली में रची बसी रही। हाईस्कूल में सामान्य से अंक देख बस पिता ने यही कहा कि यदि इतनी सुविधा उन्हें मिली होती तो उनका प्रदेश में कोई स्थान आया होता। ये शब्द पूरे अस्तित्व को झंकृत कर गये, आने वाले वर्षों की दिशा निर्धारित कर गये। इण्टरमीडियेट में बोर्ड में स्थान आ गया, आईआईटी में पढ़ने का अवसर मिल गया, सिविल सेवा में चयन हो गया, जीवन में स्थायित्व भी आ गया, पर 25 वर्ष बाद भी वे शब्द स्मृति पटल पर स्पष्ट अंकित हैं।

न उसके पहले पिता ने कभी कुछ कहा था, न उसके बाद पिता ने अभी तक कुछ कहा, पर वे शब्द तो निश्चय ही थपेड़े से थे, अपने बल से आपका प्रवाह बदलने में सक्षम।