3.4.13

त्वम्‌ चरैवेति

विविध विधा के फूल खिले हैं,
आकर्षण के थाल सजे है,
किन्तु शब्द गुञ्जित मन में,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।१।।

भाव-वृक्ष की सुखद छाँह है,
सम्बन्धों की मधुर बाँह है,
पर बन्धन से मुक्त पथिक,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।२।।

सुविधाआें से संचित जन हैं,
मुग्ध छटा से सिंचित वन हैं,
पर मन की दुर्बलता तज,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।३।।

जीवन पथ पर विघ्न बड़े हैं,
अट्टाहस कर आज खड़े हैं,
पर पथ के सब विघ्न तोड़,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।४।।

यदि विरोध की हवा बही है,
बहुमत तेरी ओर नहीं है,
पर सुलक्ष्य पर दृढ़-प्रतिज्ञ,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।५।।

कार्य-क्षेत्र यह तन क्षीणित हो,
जीवन-रस से आज रहित हो,
पर अन्तः में शक्ति निहित,
त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।६।।

58 comments:

  1. वह जीवन भी क्या जीवन है जिसमें गति न रवानी है, ...बहुत प्रेरक और सुन्दर ।

    ReplyDelete
  2. प्रेरणादायी , उत्कृष्ट कविता .. कितने ही प्रश्नों का हल सुझाती ..

    ReplyDelete
  3. जीवन के विविध विचारों का प्रदर्शन .. अनुपम बन पड़ा है ।

    ReplyDelete
  4. वाह -प्राणदायी ,स्फूर्ति -अनुप्राणित प्रयाण गीत -

    राबर्ट फ्रास्ट की कविता भी याद हो आयी सहसा, जो नेहरु जी को अतिशय प्रिय थी -
    सुन्दर सघन मनोहर वन तरु
    मुझको आज बुलाते हैं
    मगर किये जो वादे मैंने
    याद मुझे आ जाते हैं
    अभी कहाँ आराम मुझे
    यह मूक निमंत्रण छलना है
    और अभी तो मीलों मुझकों
    मीलों मुझको चलना है !

    ReplyDelete
    Replies
    1. ...इसे मेरी भी टीप समझी जाय !

      Delete
  5. यदि विरोध की हवा बही है,
    बहुमत तेरी ओर नहीं है,
    पर सुलक्ष्य पर दृढ़-प्रतिज्ञ,
    त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।

    मनोबल को दृढता का पोषण देती अद्भूत शब्द-राशि.

    ReplyDelete
  6. अच्छी रचना प्रस्तुत करने हेतु आभार.

    ReplyDelete
  7. reminding the lines...

    "miles to go before i sleep..."

    ReplyDelete
  8. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  9. खूबसूरत रचना , आभार

    ReplyDelete
  10. बेहतरीन प्रेरणाप्रद रचना...आभार.

    ReplyDelete
  11. प्रेरणादायी ,खूबसूरत रचना , आभार

    ReplyDelete
  12. यदि विरोध की हवा बही है,
    बहुमत तेरी ओर नहीं है,
    पर सुलक्ष्य पर दृढ़-प्रतिज्ञ,
    त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।५

    वाह पाण्डेय जी ......बिलकुल सटीक चित्रण कर दिया ....सादर बधाई स्वीकारें

    ReplyDelete
  13. यदि विरोध की हवा बही है,
    बहुमत तेरी ओर नहीं है,
    पर सुलक्ष्य पर दृढ़-प्रतिज्ञ,
    त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।
    बहुत ही सशक्‍त भाव लिये उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति

    सादर

    ReplyDelete
  14. बहुत प्रेरक और सुन्दर रचना आभार।

    ReplyDelete
  15. चरैवेति, चरैवेति॥ यही हमारा भी कहना है।

    ReplyDelete
  16. सभी के मन में छिपे सवालों का जवाब है यह रचना :)

    ReplyDelete
  17. जीवन पथ पर विघ्न बड़े हैं,
    अट्टाहस कर आज खड़े हैं,
    पर पथ के सब विघ्न तोड़,
    त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ..

    जीवन की चुनुतियों का सामना करना ही तो जीवन है ...
    बहुत लाजवाब ...

    ReplyDelete
  18. चलते जाना है , बस यूँ ही चलते जाना.

    ReplyDelete
  19. इसके अतिरिक्त कोई विकल्प भी तो नहीं है.सुन्दर कृति ..

    ReplyDelete
  20. कभी न ख़त्म होने वाला दृढ सफ़र !

    ReplyDelete
  21. दृढ़ता और एकाग्रता ....बहुमूल्य रत्न जीवन के ...
    सुन्दर सशक्त सार्थक रचना .....

    ReplyDelete
  22. सुमंज़िल जानिब चलता जा ,चलता जा ,

    रहे हौसला कायम तेरा ,बढ़ता चल राही बढ़ता चल .

    जोश और दृढ प्रतिज्ञा होने की और दो कदम ....धरता चल धरता चल

    ReplyDelete
  23. एकदम दुरस्‍त।

    ReplyDelete
  24. सुन्दर भाव ,सुन्दर रचना !!!

    ReplyDelete
  25. गतिमान होना ही जीवन्तता का प्रमाण है!

    ReplyDelete
  26. Akela chal chala chal fakira chal chala chal .....

    ReplyDelete
  27. जीवन पथ पर विघ्न बड़े हैं,
    अट्टाहस कर आज खड़े हैं,
    पर पथ के सब विघ्न तोड़,
    त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।४।।

    प्रेरणा देती बहुत सुंदर रचना ।

    ReplyDelete
  28. anand badhaatee
    rasmay man bhatee
    rachna yeh geharee
    anupranit kar jaatee

    kya baat hai Praveenje
    bahut achche
    Ashok Vyas

    ReplyDelete
  29. पर पथ के सब विघ्न तोड़,
    त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।४।।

    ..........प्रेरणाप्रद सुंदर रचना...आभार

    ReplyDelete
  30. त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।|
    .
    सुन्दर ,प्रेरणादायी सन्देश

    सादर

    ReplyDelete
  31. चलना ही जिन्दगी है.

    ReplyDelete
  32. सतात संसरण-शील जगत का,
    यह है शाश्वत सत्य .......
    सुन्दर सृजन

    ReplyDelete
  33. हर हाल मे चलते रहना ही जीवन है

    ReplyDelete
  34. beautiful expression..
    I keep reading it :)

    ReplyDelete
  35. सार्थकता से पूर्ण।

    ReplyDelete
  36. Ati sundar, aakarshak shabdon se saji man bhawan aur prerak kavita. Abhar...

    ReplyDelete
  37. यदि विरोध की हवा बही है,
    बहुमत तेरी ओर नहीं है,
    पर सुलक्ष्य पर दृढ़-प्रतिज्ञ,
    त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।५।।... अनुकरणीय

    ReplyDelete
  38. शानदार प्रस्तुती

    ReplyDelete
  39. प्रेरणा देती रचना.
    चलते रहना ही तो जीवन है!

    ReplyDelete
  40. Your poems are too good. Though I google for some words, my hindi is not that good. :(

    ReplyDelete
  41. नदिया चले ,चले रे धारा
    चंदा चले रे तारा ,तुझको चलना होगा ,तुझको चलना होगा ।
    बहुत सुन्दर रचना ।

    ReplyDelete
  42. Nice Blog.

    Check http://makealivingwriting.blogspot.in/ if you want practical information on how to make money by writing

    ReplyDelete

  43. बहुत सुंदर संदेश---त्वम चरैवेति,त्वम चरैवेति

    ReplyDelete
  44. चलते ही चले जाना है ...जीवन बस इस चलने का ही नाम है !
    प्रेरक गीत !

    ReplyDelete
  45. बहुत खूब .....!!
    किसी प्रवीण पांडे को युवा साहित्य पुरस्कार मिला है क्या आप ही हैं .....?

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी नहीं हरकीरतजी, वह संस्कृत के लिये मिला है और प्रवीण पान्ड्या जी को मिला है..

      Delete
    2. प्रवीण जी इसी तरह लिखते रहें..हमारी कामना है कि आप भी एक रोज इस सूची में होंगे..

      Delete
  46. जीवन पथ पर विघ्न बड़े हैं,
    अट्टाहस कर आज खड़े हैं,
    पर पथ के सब विघ्न तोड़,
    त्वम्‌ चरैवेति, त्वम्‌ चरैवेति ।।४।।
    प्रेरणादाई सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  47. एक बार फिर आपकी लेखनी से निःसृत उत्कृष्ट रचना। जिस समय इन पंक्तियों को पढ़ रहा हूँ, पार्श्व में हरिप्रसाद चौरसिया का बजाया हुआ राग पहाड़ी बज रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे काव्य और संगीत के बीच जुगलबंदी हो रही है। एक अद्भुत साम्य है -दोनों में गजब का प्रवाह है , जैसे कोई झरना बह रहा हो। छंद भी कितने साफ सुथरे हैं। पहाड़ों में उगे अनगढ़ फूल की तरह- निर्दोष, नैसर्गिक, सहज. चरैवेति चरैवेति .....................................चरैवेति ..............चरैवेति ................

    ReplyDelete
  48. रात अन्‍धेरी है,

    कहीं न ठिकाना,

    दूर सितारा चमके,

    वहीं तू ठहरना

    राही चलता जा, राही चलता जा

    ReplyDelete
  49. रात अन्‍धेरी है, कहीं न ठिकाना

    दूर सितारा चमके, वहीं तू ठहरना

    वही तेरी मंजिल है, वहीं है ठिकाना

    राही चलता जा, राही चलता जा

    ReplyDelete