Showing posts with label झूला. Show all posts
Showing posts with label झूला. Show all posts

8.10.14

झूला बन क्यों झूम रहा हूँ

झूला बन क्यों झूम रहा हूँ 

नियत दिशा है, बढ़ते जाना,
ज्ञान-कोष का वृहद खजाना,
किन्तु हृदय की लोलुपता है,
मन में कुछ अनतृप्त व्यथा है ।
भटक रहा मैं, घूम रहा हूँ ।
झूला बनकर झूम रहा हूँ ।।१।।

विजय कहाँ की, उत्सव कैसे,
रुका यहाँ किस आकर्षण से ।
अहं आज क्यों शान्त नहीं है,
आवश्यकता , अन्त नहीं है ।
विजय तुच्छ क्यों चूम रहा हूँ,
झूला बनकर झूम रहा हूँ ।।२।।

ज्ञात नहीं कब तक झूमूँगा,
पद्धति यह कैसे भूलूँगा  ।
सच पूछो तो याद नहीं है,
कब से ऐसे झूम रहा हूँ ।।३।।