8.10.14

झूला बन क्यों झूम रहा हूँ

झूला बन क्यों झूम रहा हूँ 

नियत दिशा है, बढ़ते जाना,
ज्ञान-कोष का वृहद खजाना,
किन्तु हृदय की लोलुपता है,
मन में कुछ अनतृप्त व्यथा है ।
भटक रहा मैं, घूम रहा हूँ ।
झूला बनकर झूम रहा हूँ ।।१।।

विजय कहाँ की, उत्सव कैसे,
रुका यहाँ किस आकर्षण से ।
अहं आज क्यों शान्त नहीं है,
आवश्यकता , अन्त नहीं है ।
विजय तुच्छ क्यों चूम रहा हूँ,
झूला बनकर झूम रहा हूँ ।।२।।

ज्ञात नहीं कब तक झूमूँगा,
पद्धति यह कैसे भूलूँगा  ।
सच पूछो तो याद नहीं है,
कब से ऐसे झूम रहा हूँ ।।३।।

10 comments:

  1. अंतर्नाद सा कुछ

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  2. वाह बहुत सुंदर
    सादर

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  3. झूमते रहिये जब तक झूम सको.
    निम्नवत् लिंक पर भी आशीर्वचन प्रदान कीजिये:
    http://disarrayedlife.blogspot.in/2014/10/science-vis-vis-india-part-2.html

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  4. Anonymous9/10/14 19:10

    bahut khoob...
    नियत दिशा है, बढ़ते जाना,
    ज्ञान-कोष का वृहद खजाना,
    ummda

    Hi I am back to blogging check my blog at
    http://drivingwithpen.com/

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  5. ''झूमने वाले झूम रहे है ,विजय श्री को चूम रहे है''

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  6. जीवन यह अनमोल बहुत है वर्त्तमान को क्यों खोता है
    सब का समाधान जो बनता वह क्यों खुद रोता है ?

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  7. आपकी ये रचना चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.in/ पर चर्चा हेतू 11 अक्टूबर को प्रस्तुत की जाएगी। आप भी आइए।
    स्वयं शून्य

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  8. सादर प्रणाम सर ! यह तो आध्यात्मिक दिवानगी की काव्यमय प्रस्तुति है ।इस पर मैं कहना चाहूॅंगा -------- अनिश्चितता नई नहीं यह /पर , चिन्तन पद्धति यह नूतन / ज्ञान तर्क से आत्म परीक्षण / अध्यात्म यह अति उर - वन्दन / आजन्म ही चढ़े हिंडोले / आत्म यशोबल का कर कीर्तन / चलता जाता लोक इसी पर / अस्थिर वास्तव में जीवन ।

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