25.10.14

खोज सुख की

प्रेम की पिपास अन्तर्निहित है जो,
घूमते चहुँ ओर उसके कर्म सारे ।
दे सके जो हर किसी को प्रेम तृप्ति,
बिका उसको कौड़ियों के मूल्य जीवन ।।

प्रेम के आनन्द की ही लालसा में,
जी रहे हैं और सतत ही तृप्त करते,
घर को, समाज को,
देश पर बलिदान को,
मनुजता के आवरण में,
प्रेम का प्रतिबिम्ब पाकर,
स्वयं को सन्तुष्ट करते ।।

हुयी निष्फल चेतना में खोज पूरी, 
ढूढ़ते हैं स्रोत वे स्थूल में भी ।
किन्तु मानव यह तुम्हारा कर्म सारा,
क्या हृदय को प्रेम का सुख दे सकेगा ?
क्या कभी तुमने सहज हो चेष्टा की,
या सहज हो, सत्य का प्रारूप समझा ।।

स्रोत सारे, लिया था आधार जिन पर,
देखते तो, तुम्हे भी यह ज्ञात होता ।
स्वयं ही वे प्यास में दुख पी रहे है,
सुखों का उद्गम, भला वो कहाँ पाते ।।

11 comments:

  1. अति सुन्दर विचार अभिव्यक्ति

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  2. अति सुन्दर विचार अभिव्यक्ति

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  3. बहुत सार्थक चिंतन...

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  4. कल 26/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (26-10-2014) को "मेहरबानी की कहानी” चर्चा मंच:1778 पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    प्रकाशोत्सव के महान त्यौहार दीपावली से जुड़े
    पंच पर्वों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. गहरे भावों से सजी सुंदर प्रस्तुति।

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  7. प्रभावशाली प्रस्तुती....

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  8. प्रभावशाली प्रस्तुती....

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  9. वाह भावमय करते शब्‍द ...

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