9.8.14

नैतिकता के स्थापन

कहाँ रह गये अब वह जीवन,
जिनकी हमको मिली धरोहर ।
छिन्न-भिन्न सारी जग रचना,
मचा हुआ क्यों ताण्डव भू पर ।।

जीवन के सारे दृश्यों से,
रोदन स्वर क्यों फूट रहे हैं ।
क्यों नैतिकता के स्थापन,
जगह जगह से टूट रहे हैं ।।

16 comments:

  1. जीवन के सारे दृश्यों से,
    रोदन स्वर क्यों फूट रहे हैं ।
    क्यों नैतिकता के स्थापन,
    जगह जगह से टूट रहे हैं ।।

    विचारणीय..... यह हर संवेदनशील मन सोच रहा है

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  2. अाज के सर्वाधिक उपयोगी चिन्तन की काव्य रुप में प्रभावकारी प्रसतुति है।

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  3. सुन्दर पंक्तियाँ जो प्रेरणा देती हैं:-
    नैतिकता के प्रहरी जो हैं
    सदा चुनौती से आहत हैं
    दुष्ट लगे हैं अपकृत्यों में
    मानव दुष्ट-दलन में रत हैं

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  4. इसे और विस्तृत करें

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  5. सब के मन में केवल सवाल है

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  6. अंधेरों में भी--किरण मौजूद होती है---काले बादलों में इंद्रधनुष होता ही है.
    प्रश्न जरूरी भी हैं----प्रश्नों में ही उत्तर निहित भी होते हैं.

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  7. आधुनिकता की टीस उभर के आती है पंक्तियों में।

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  8. बहुत सुंदर ...रक्षाबंधन की शुभकामनायें

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  9. शायद कलियुग अपने चरम की ओर बढ़ रहा है..

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  10. स्वार्थ की अंधी दौड में सब भाग रहे हैं
    किसे फिक्र है मूल्यों की, नैतिकता की।

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  11. बहुत सुंदर , मंगलकामनाएं आपको !

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  12. मानव चरित्र का ह्रासमान होता जा रहा है।

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  13. जीवन के सारे दृश्यों से,
    रोदन स्वर क्यों फूट रहे हैं ।
    क्यों नैतिकता के स्थापन,
    जगह जगह से टूट रहे हैं ।।

    एकदम सुन्दर

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  14. प्रश्न उठने दीजिए। उत्तर कहीं आसपास ही होता है।

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