28.5.14

स्मृति

कहीं शीर्ष पर स्थिर जो है,
संकल्पों की प्रखर ज्योत्सना ।
बिना ध्येय का दीप जलाये,
अंधकूप में उतर न जाये ।।१।।

कहीं समय की भगदड़ में मैं,
जीवन का पथ भूल न जाऊँ ।
रुको ध्येय की वेदी पर मैं,
स्मृति के कुछ पुष्प चढ़ा दूँ ।।२।।

24 comments:

  1. " मुझे तोड लेना वन - माली उस पथ पर तुम देना फेंक ।
    मातृ - भूमि पर शीष चढाने जिस पथ जायें वीर अनेक ॥"
    माखन लाल चतुर्वेदी

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  2. नयी पुरानी हलचल का प्रयास है कि इस सुंदर रचना को अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    जिससे रचना का संदेश सभी तक पहुंचे... इसी लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 29/05/2014 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...

    [चर्चाकार का नैतिक करतव्य है कि किसी की रचना लिंक करने से पूर्व वह उस रचना के रचनाकार को इस की सूचना अवश्य दे...]
    सादर...
    चर्चाकार कुलदीप ठाकुर
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  3. बहुत सुंदर ।

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  4. यूँ ही स्मृति के पुष्प ध्येय की वेदी पर समर्पित होते रहें । आमीन

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  5. अति सुन्दर...

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  6. स्मृति की शिखा जलती रहे तो मार्ग प्रशस्त हो जाता है, स्मृति लब्ध्वा...

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  7. स्मृति के पुष्प बिसराने न दे !

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  8. शीर्ष पर पहुंच कर स्मृति पुष्प कर्मवेदी पर अर्पित!

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  9. स्मृति की शिखा यूँ ही जलती रहे ..बहुत सुन्दर..

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  10. गहन सशक्त भाव सुन्दर अभिव्यक्ति !!

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  11. ध्येय की वेदी पर कर्म के पुष्प चढाने होते हैं स्मृति के नहीं ...

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  12. रुको ध्येय की वेदी पर मैं,
    स्मृति के कुछ पुष्प चढ़ा दूँ
    अति सुन्दर........

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  13. ​बहुत सुन्दर शब्द और अभिव्यक्ति

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  14. सुंदर पंक्तियाँ

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  15. जहाँ इतनी जागरूकता, इतना कर्तव्य बोध हो, वहां कोई जीवन का पथ भूल कैसे सकता है.

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  16. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (30-05-2014) को "समय का महत्व" (चर्चा मंच-1628) पर भी है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  17. सुन्दर भाव ... कर्म पथ पे जागरूक ही रहना होगा ...

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  18. ​बहुत सुन्दर शब्द सुन्दर भाव

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