16.4.14

मध्यमार्गी पथ असाध्य है

आदर्शों के मरुथल में, जीवन कष्टों का छोर नहीं है,
भ्रष्टाचारी दलदल में आ बचा सके, कोई जोर नहीं है ।
इन दो विषम उपायों से जीवन-रजनी में भोर नहीं है,
मध्यमार्गी पथ असाध्य है, अनुभव-युक्त किशोर नहीं है ।।

अन्तः दीपक जला हुआ है,
राग द्वेष से घिरा हुआ है,
मानव क्या निष्कर्ष निकाले, नियत बुद्धि का ठौर नहीं है ।
मध्यमार्गी पथ असाध्य है, अनुभव-युक्त किशोर नहीं है ।।१।।

संस्कार की सतोपासना,
औ’ समाज की कुटिल वासना,
स्वयं निरन्तर संग्रामित, जीवन निश्चय की ओर नहीं है ।
मध्यमार्गी पथ असाध्य है, अनुभव-युक्त किशोर नहीं है ।।२।।

आदर्शों का ध्येय मिला है,
आत्मोन्नति का पंथ खुला है,
पर समाज में जीवन यह, कटु सम्बन्धों की डोर नहीं है ।
मध्यमार्गी पथ असाध्य है, अनुभव-युक्त किशोर नहीं है ।।३।।

(एक किशोर के रूप में लिखी यह कविता आज पुनः याद आ गयी, पता नहीं क्यों?)

33 comments:

  1. -सुंदर रचना...
    आपने लिखा....
    मैंने भी पढ़ा...
    हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 17/04/ 2014 की
    नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
    आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
    हलचल में सभी का स्वागत है...

    ReplyDelete
  2. किशोर वय में ऐसा अच्‍छा रचते रहे हो
    वैसे अब भी किशोर ही हो
    बस सोशल मीडिया का चहुं ओर शोर है
    जिससे घिरते हुए भी सब तक पहुंच रहे हो
    प्रवीण भाई।

    ReplyDelete
  3. प्रशंसनीय प्रस्तुति ।

    ReplyDelete
  4. किशोर के रूप में लिखी गयी यह रचना .. बहुत ही परिपक्व एवं समर्थ रचना है .. बहुत बधाई ऐसी रचना के लिए.

    ReplyDelete
  5. तो किशोरावस्था में भी गंभीर चिन्तन चलता था - पृष्ठभूमि अध्ययन -मनन की रही होगी !

    ReplyDelete
  6. भावों का सैलाब उस समय और इस समय ... कोई अंतर नहीं है आपके चिंतन में ...

    ReplyDelete
  7. किशोर अब वय हो चला, चिन्तन में भी, आय़ु में भी।

    ReplyDelete
  8. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  9. अन्तः दीपक जला हुआ है,
    राग द्वेष से घिरा हुआ है,
    मानव क्या निष्कर्ष निकाले, नियत बुद्धि का ठौर नहीं है ।
    मध्यमार्गी पथ असाध्य है, अनुभव-युक्त किशोर नहीं है ।

    बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  10. मौलिकता और गम्‍भीरता का सुंदर सामंजस्‍य प्रदर्शित करती कविता।

    ReplyDelete
  11. किशोर के रूप में लिखी यह कविता बड़ी गंभीर और परिपक्व है ..
    बहुत बढ़िया .

    ReplyDelete
  12. मध्य मार्ग ही सहज मार्ग है...नो एक्सट्रीम...

    ReplyDelete
  13. किशोर उम्र में मध्यमार्ग को समझौता-वादी मार्ग समझने की प्रवृत्ति होती है जो तब स्वीकर्य नहीं होती। इसीलिए असाध्य लगती है। उम्र बढ़ने के साथ अनुभव जुटता जाता है और तब यह मध्यमार्ग ही बुद्ध की तरह स्वर्णिम लगने लगता है। किशोरावस्था तो चरम की ओर, एक आदर्श की ओर जाने की जल्दी में होती है।

    आपकी कविता से तो मैं यही समझ पाया हूँ। पता नहीं कहाँ तक सही हूँ।

    आपके शब्द बहुत समर्थ हैं। साधुवाद।

    ReplyDelete
  14. जब संग्राम है स्‍वयं से तो अनिश्‍चयता तो तब बढ़ती ही है।

    ReplyDelete
  15. Kabhi kabarhi tabiyat ijazat deti hai ki baithke kuchh padh sakun....muddaton baad aapke blogpe aayi aur man trupt ho gay!

    ReplyDelete
  16. भाषा के रवानी और गेयता लिखे की देखते भी बनती है किशोर व्यय से ही यह व्यसन पाले बैठे हैं ज़नाब। सुन्दर मनोहर पल्लवन कालानुक्रम में विकास की सीढ़ी आप चढ़ते ही जा रहे हैं।

    ReplyDelete
  17. किशोरावस्था में लिखी गयी यह बहुत ही अच्छी कविता है !
    वैसे लगता नहीं किशोर की कलम से निकली है ]

    ReplyDelete
  18. आपकी कविताएँ हमेशा से प्रभावशाली रही हैं... चाहे किशोरवय की हों या हाल की!

    ReplyDelete
  19. बहुत सुन्दर कविता है ....

    ReplyDelete
  20. किशोरावस्था में मध्यमार्गी पथ असाध्य ही होता है.

    ReplyDelete
  21. किशोरावस्था में मध्यमार्गी पथ असाध्य ही होता है.

    ReplyDelete
  22. किशोरावस्था की यह प्रौढ़ता कविता को दर्शन देती है !

    ReplyDelete
  23. बहुत सारगर्भित और उत्कृष्ट रचना...

    ReplyDelete
  24. बहुत बढ़िया सारगर्भित रचना.....

    ReplyDelete
  25. फेसबुक से पता चला कि आज आप का जन्म दिन है। आप के जन्म दिन पर आप को अनेक बधाइयाँ प्रवीण भाई। सदा प्रसन्न रहें और ख़ूब तरक़्क़ी करें। जय श्री कृष्ण।

    ReplyDelete
  26. Behaad khoobsurat shaqd :)

    ReplyDelete
  27. बहुत ही सुंदर रचना कैशोर्य में परिपक्वता लिये।

    ReplyDelete
  28. सुन्दर कविता..

    ReplyDelete
  29. आदर्शों का ध्येय मिला है,
    आत्मोन्नति का पंथ खुला है,

    जीवन की जद्दोजहद और मन के दृढ़ भाव ...सुंदर कविता ....!!

    ReplyDelete