उनींदी सी शान्ति जग में, हवायें बहकर थकीं हैं ।
रात खेलीं चन्द्रमा संग, प्रात के द्वारे रुकी हैं ।।१।।
फूल अकड़े खड़े सारे, सह प्रवेगों को निरन्तर ।
आज हैं मुरझा गये वे, झेलकर, दुख-वेग क्षण भर ।।२।।
आज नदियाँ, भूलकर निज अहं, निज उन्मुक्तता ।
जा मिली हैं सब जलधि में, छोड़ जो अस्तित्व था ।।३।।
किस प्रलय की साँस है यह, रुक गयी गतियाँ सभी ।
किस तृषा की आस जागी, जो कि बुझनी है अभी ।।४।।
किस हृदय के शून्य का, उत्तर लिखा जाता प्रकृति में ।
घात या प्रतिघात उठता, किस कुटिल संगूढ़ मति में ।।५।।
फैलती स्तब्धता और, काटने मन दौड़ता है ।
थका क्या वह, जगत को जो, चेतना से जोड़ता है ।।६।।
किस अशुभ की चीख में लिपटी हुयी यह शान्ति है ।
कुछ सुनिश्चित घट रहा है, नहीं कहना भ्रान्ति है ।।७।।