22.8.12

स्तब्धता

उनींदी सी शान्ति जग में, हवायें बहकर थकीं हैं 
रात खेलीं चन्द्रमा संग, प्रात के द्वारे रुकी हैं ।।१।।

फूल अकड़े खड़े सारे, सह प्रवेगों को निरन्तर ।
आज हैं मुरझा गये वे, झेलकर, दुख-वेग क्षण भर ।।२।।

आज नदियाँ, भूलकर निज अहं, निज उन्मुक्तता ।
जा मिली हैं सब जलधि में, छोड़ जो अस्तित्व था ।।३।।

किस प्रलय की साँस है यह, रुक गयी गतियाँ सभी ।
किस तृषा की आस जागी, जो कि बुझनी है अभी ।।४।।

किस हृदय के शून्य का, उत्तर लिखा जाता प्रकृति में ।
घात या प्रतिघात उठता, किस कुटिल संगूढ़ मति में ।।५।।

फैलती स्तब्धता और, काटने मन दौड़ता है ।
थका क्या वह, जगत को जो, चेतना से जोड़ता है ।।६।।

किस अशुभ की चीख में लिपटी हुयी यह शान्ति है ।
कुछ सुनिश्चित घट रहा है, नहीं कहना भ्रान्ति है ।।७।।

63 comments:

  1. शान्ति तूफ़ान से पहले की या बाद की|

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  2. कविता में पिरोई अभिव्‍यक्ति पसंद आई। लेकिन अंत में चुप कराता चित्र समझ नहीं आया। क्‍या कमेंट पर है विराम लगवाया?
    ............
    डायन का तिलिस्‍म!
    हर अदा पर निसार हो जाएँ...

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    1. शान्ति के पीछे छिपा कोलाहल सुनने को इंगित कर रहा है यह चित्र।

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  3. किस अशुभ की चीख में लिपटी हुयी यह शान्ति है ।
    कुछ सुनिश्चित घट रहा है, नहीं कहना भ्रान्ति है ।।७।।

    मुखर अभिव्यक्ति ,स्तब्धता के पार गूंजता स्वर संचेतना की आहट का पुट ........

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  4. कविता में भावोद्गार अद्भुत हैं |

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  5. आँखों में , पट्टी बाँध
    कर, गाड़ी चला रहे !
    टकरायेंगे , कहाँ पर ?
    हमें खुद पता नहीं !
    जब तक जियेंगे, हम भी जलाये रहें दिया !
    कब आसमान रो पड़े ? हमको पता नहीं !

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  6. आपकी एक और श्रेष्ठ रचना कविता और गद्य पर आपकी ऐसी सिद्धहस्त सामान पकड़ आह्लादित करती है और चमत्कृत भी ..
    इस छोटी सी कविता में रहस्य, छाया,मिलन- विछोह आगत अनागत ,प्रारब्ध भविष्यत् का इतना सुन्दर और सहज आमेलन हुआ है कि बस लगता है गागर में सागर आ समाया हो ....इसे याद करने का मन हो आया है !

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  7. दिल में कहीं हलचल मची है,
    पर कोई सुनता नहीं है !

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  8. लगती है जो स्तब्धता ,आसार है किसी विस्फोट का,अंदर ही अंदर जिसकी तैयारियां चल रही हैं !

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  9. शान्ति के स्वर मुखर होकर बिखर गए हैं आपकी लेखनी के चमत्कार से!!

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  10. बहुत प्रभावी और लय बद्ध गीतों की सीरिज पढता जा रहा हूँ आजकल ।।
    सुन्दर रचना के लिए बधाई ।।

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  11. कुछ तो घटित होना तय है .... अन्धकार, शांति से ही आरम्भ होता है

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  12. बेहद सशक्‍त भाव लिए उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति ...आभार

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  13. किस अशुभ की चीख में लिपटी हुयी यह शान्ति है ।
    कुछ सुनिश्चित घट रहा है, नहीं कहना भ्रान्ति है ।।७।।
    /
    Wएक बहुत अच्छी रचना है ! जो कुछ सुनिश्चित घट रहा है, उसे घटना ही है वर्ना बदलाव कैसे आयेगा? Waiting for since long.

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  14. कभी-२ खुद को समझने के अन्दर-बाहर उठ रहे हर कोलाहल को शांत करना पड़ता है...

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  15. बेहद सशक्‍त भाव लिए सुन्दर प्रस्‍तुति ...आभार

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  16. सर जी मुट्ठी में संसार रखने की लालसा दबोये जा रही है इस शांति को |

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  17. सर, आप के व्यक्तित्व का यह आयाम, आज पहली बार देखा और पढा,जो घटित हो रह्ह है विश्व में और हमारे इर्द-गिर्द उस्के प्रति इतनि सम्वेदनशीलता,चमत्कृत हूं |

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  18. उत्कृष्ट अभिव्यक्ति
    शान्ति अशान्ति का दुविधा भेद……

    फैलती स्तब्धता और, काटने मन दौड़ता है ।
    थका क्या वह, जगत को जो, चेतना से जोड़ता है ।।६।।

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  19. शायद पहली बार आपकी कोई कविता पढ़ी है.. अच्छी लगी

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  20. शांत हैं,स्तब्ध हैं!
    शब्दों के जाल में उलझे बिना स्वयं को समझने का प्रयास जारी रहता है.
    उत्कृष्ट प्रस्तुति.

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  21. सशक्त भाव लिए उत्कृष्ट अभिव्यक्ति लिए,,,,प्रवीण जी बहुत२ बधाई,आभार,

    RECENT POST ....: प्यार का सपना,,,,

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  22. हालात इस वक्त कुछ ऐसे ही हैं .
    बेहद गंभीर लेकिन सच्चाई बयां करती रचना .

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  23. शांति विस्फोट का सूचक है .... चिंता के भाव लिए सुंदर रचना

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  24. फैलती स्तब्धता और, काटने मन दौड़ता है ।
    थका क्या वह, जगत को जो, चेतना से जोड़ता है ..

    अगर नहीं भी थका तो जल्दी ही आदम जात उसे थका देगी ... सच्चाई से परिचय करवाती रचना ... लाजवाब ...

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  25. बहुत गहरे भाव और सुंदर शब्दावली...बधाई!

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  26. अहं से दूर होते ही शान्ति हो अथवा कोलाहल सब सहज लगता है .......

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  27. फैलती स्तब्धता और, काटने मन दौड़ता है ।
    थका क्या वह, जगत को जो, चेतना से जोड़ता है ।।६।।

    किस अशुभ की चीख में लिपटी हुयी यह शान्ति है ।
    कुछ सुनिश्चित घट रहा है, नहीं कहना भ्रान्ति है ।।७।।
    वाह वाह क्या बात है बहुत खूब आज तो अपने, अपनी लेखनी का कायल बना दिया... :)

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  28. .
    .
    .
    बेहतरीन, बहुत अच्छी लगी आपकी यह कविता...

    आभार!


    ...

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  29. 'स्तब्धता " कविता में कवि कहता है प्रकृति की लीला हरेक व्यक्ति को समझ नहीं आती .प्रक्रति अपना खेल खेलती है आदमी कुछ और सोचता रह जाता है .प्रकृति की निगूढ़ता वह समझ नहीं पाता .वजह इसकी यह है ,व्यक्ति की बुद्धि कई मर्तबा हृदय को पीछे की और धकेलती है जब की प्रकृति को समझने के लिए बुद्धि से ज्यादा हृदय की ज़रुरत होती है .आज का हमारे वक्त का यही द्वंद्व कविता में ढल गया है .बधाई प्रवीण जी को इस सशक्त रचना के लिए .
    .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    बुधवार, 22 अगस्त 2012
    रीढ़ वाला आदमी कहलाइए बिना रीढ़ का नेशनल रोबोट नहीं .
    What Puts The Ache In Headache?
    कविता पढ़ें अगली पोस्ट में "आतंकवादी धर्म -निरपेक्षता "

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  30. abominable lull is very bad..

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  31. फैलती स्तब्धता और, काटने मन दौड़ता है ।
    थका क्या वह, जगत को जो, चेतना से जोड़ता है ।।६।।

    अद्भुत ...जो कुछ हो रहा वो यूँ ही स्तब्ध करता है.....

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  32. This comment has been removed by the author.

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  33. कुछ सुनिश्चित घट रहा है, नहीं कहना भ्रान्ति है ।।७।।
    --No doubt, coming time is full of CHANGES...We are on the verge of Transition! Things ii not be as it used to be.

    And yes Awesome poem! Loved it!

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  34. किस हृदय के शून्य का, उत्तर लिखा जाता प्रकृति में ।
    घात या प्रतिघात उठता, किस कुटिल संगूढ़ मति में ।।
    मानव मन के विभिन्न भावों को उकेरती उत्तम रचना।

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  35. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 23-08 -2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में .... मेरी पसंद .

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  36. शांति या क्रांति के पीछे का कोलाहल , हर हृदय में टीस है , आगत का आतंक ! कुछ है जो अदृश्य होकर भी कुछ आँखों में दृश्यमान है !
    वर्तमान परिस्थितियों में उपजी क्लांत मन की सारगर्भित अभिव्यक्ति !

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  37. किस अशुभ की चीख में लिपटी हुयी यह शान्ति है ।
    कुछ सुनिश्चित घट रहा है, नहीं कहना भ्रान्ति है ।।७।।

    just too good...kuch to hai!!

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  38. गज़ब ...भाव और शिल्प दोनों ही..

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  39. प्रकृति भी जब रह जाए स्तब्ध,
    क्या तभी सिद्ध होगा मानवीय लब्ध |

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  40. आपकी पोस्ट आज 23/8/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 980 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  41. अभी बहुत अच्छी लगी है। रात में और डूबता हूँ। चित्र न लगाये होते तब भी ठीक था। कमेंट से ही पता चल रहा है कि चित्र क्यों लगाया गया है। मैं भी थोड़ी देर सोचता रह गया था।..बधाई।

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  42. फैलती स्तब्धता और, काटने मन दौड़ता है ।
    थका क्या वह, जगत को जो, चेतना से जोड़ता है ।।६।।
    ......बहुत ही सुन्दर एवं गहन रचना !

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  43. बहुत ही बढ़िया सर!


    सादर

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  44. फैलती स्तब्धता और, काटने मन दौड़ता है ।
    थका क्या वह, जगत को जो, चेतना से जोड़ता है ।।
    आपकी कवितायें सशक्त होती हैं,ठीक आपके गद्य की तरह ...

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  45. उर्मिला सिंह जी की ईमेल से प्राप्त टिप्पणी

    किस अशुभ की चीख में लिपटी हुई यह शांति है—

    भावों की लहरों पर जीवन का छलावा,

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  46. बहुत बढ़िया प्रभावपूर्ण रचना ..

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  47. उत्कृष्ट भाव बेहतरीन शब्द संयोजन जितनी तारीफ की जाय कम होगी

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  48. अबूझ बनी हुई है यह प्रकृति नटी अपने बहुलामंश में ..फिर भी इठ्लातें हैं हम ,एहम लिए मर जाएं हैं ये द्वंद्व कहीं का न छोड़े ,हर वक्त चित्त को ये घेरे बढ़िया प्रस्तुति है . . .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    बृहस्पतिवार, 23 अगस्त 2012
    Neck Pain And The Chiropractic Lifestyle
    Neck Pain And The Chiropractic Lifestyle

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  49. अबूझ बनी हुई है यह प्रकृति नटी अपने बहुलांश में ..फिर भी इठ्लातें हैं हम ,एहम लिए मर जातें हैं ये द्वंद्व कहीं का न छोड़े ,हर वक्त चित्त को ये घेरे बढ़िया प्रस्तुति है . . .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    बृहस्पतिवार, 23 अगस्त 2012
    Neck Pain And The Chiropractic Lifestyle
    Neck Pain And The Chiropractic Lifestyle

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  50. आपकी रचना काव्यरूप में पहली बार देखी है । बहुत ही प्रभावी । आलेख तो रोचक व पठनीयहोते ही हैं ।

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  51. अभी यही हालात बने हुए हैं, पता नहीं यह शांति किस विकराल रूप से ध्वस्त होगी ।

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  52. फैलती स्तब्धता और, काटने मन दौड़ता है ।
    थका क्या वह, जगत को जो, चेतना से जोड़ता है ।।६।

    ....बहुत गहन और प्रभावी अभिव्यक्ति...

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  53. उत्कृष्ट रचना ...

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  54. और हर युग में इन्हीं भ्रांतियों पर सत्य की जीत होती है ..

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  55. बढ़िया! मुझे बहुत अच्छी लगी आपकी कविता।
    बधाई हो।

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  56. वह थक नही सकता
    वह चेतना का चेत है
    वह रुक नही सकता
    वह प्रवाह का वेग है
    वह अंधेरों को चीरता सा
    सूर्य है
    देख लो वही तो वीरों का वीर्य है ।

    वह भ्रांति का भ्रम तोड देगा ।

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  57. sundar arthpoorn kavita.

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  58. दुष्यन्त जी की पंक्तियाँ याद आ गईं.
    हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए.
    इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.

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  59. सुन्दर! इसे मै आपके नाम सहित अपने कुछ मित्रों के साथ बांटना चाह्ती हूं .. अनुमति है ?

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    1. निश्चय ही, आपका अधिकार है..

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